चारण (जाति)

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चारण

Chāran Gordhan Singh on a Terrace at Night ca. 1725.jpg

बीकानेर रियासत में एक चारण, सन् 1725 - (मेट्रोपोलिटन कला संग्रहालय)
धर्म हिन्दू धर्म, इस्लाम
भाषा राजस्थानी भाषा, हरियाणवी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, गुजराती, सिन्धी, मराठी और हिन्दी
देश भारत, पाकिस्तान
क्षेत्र राजस्थान, हरियाणा,[1] गुजरात, मध्य प्रदेश,[2] महाराष्ट्र,[3] सिंध,[4] और बलूचिस्तान[5].

चारण (असंलिव: Cāraṇ; संस्कृत: चारण; गुजराती: ચારણ; उर्दू: ارڈ; अ.ध्व.व: cɑːrəɳə) भारतीय उपमहाद्वीप की एक जाति है जो राजस्थान, सिंध, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और बलूचिस्तान के निवासी हैं। ऐतिहासिक रूप से, चारण कवि और साहित्यकार होने के साथ-साथ योद्धा और जागीरदार भी रहे हैं। चारण सैन्य कौशल, इतिहासकारों, कृषि, व व्यापारियों के रूप में प्रतिष्ठित थे।[6][7][8][9][10][11][12][13][14]

चारण को देव जाती माना जाता है , चारणो में कई देवीयों ने अवतार लिया है, चारणों की काव्य रचना सराहनीय होती है।

धार्मिक संस्कृति चारण अपने पूर्वजों की भी पूजा करते हैं। चारण प्रारम्भ से ईश्वर के उपासक एवं प्रकृति पूजक 'वैदिक' सनातन धर्मी रहे है। चारण जाति की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न मत हैं परन्तु स्वीकृत सिद्धांत के अनुसार चारण मूलतः भारतीय है।

चारणों का अपना एक लम्बा इतिहास रहा है।चारणों का साहित्य-लेखन में विशेष योगदान रहा है, कुछ इतिहासकारों ने चारणों को आर्यों से पहले का भारतीय निवासी माना तो कुछ ने चारणों को आर्य ही माना है।


चारणों में करणी माता,आई आवड़, स्वांगिया माता,खोडियार मां आदि प्रसिद्ध देवियां हुई है,जिन्हे राजपूत अपनी कुलदेवी मानते है।

सामाजिक संरचना[संपादित करें]

समाज के एक बड़े वर्ग द्वारा जाति के सदस्यों को दिव्य माना जाता है , राजपूतों सहित इस क्षेत्र के अन्य प्रमुख समुदायों द्वारा चारण जाति की महिलाओं को देवी के रूप में माना जाता है। [१] सदियों से चारण एक वादे को तोड़ने के बजाय मरने के लिए अपनी प्रतिष्ठा के लिए जाने जाते है ।

एक चारण पर विचार करेंगे सभी अन्य चारण बराबर के रूप में यहां तक कि अगर वे एक दूसरे को जानते नहीं है और मौलिक अलग आर्थिक या भौगोलिक स्थिति.


अनिल चन्द्र बनर्जी, एक इतिहास के प्रोफेसर, ने कहा कि

In them we have a combination of the traditional characteristics of the Brahmin and the Kshatriyas. Like the Brahmins, they adopted literary pursuits and accepted gifts.Like the Rajput, they worshipped Shakti, drank liquor, took meat and engaged in military activities. They stood at the chief portal on occasions of marriage to demand gifts from the bridegrooms, they also stood at the gate to receive the first blow of the sword."[15]

खाद्य और पेय[संपादित करें]

उनके खाने-पीने की आदतें राजपूतों से मिलती जुलती हैं। चारण अफीम की खपत और शराब पीने का आनंद लेते थे, जो इस क्षेत्र के राजपूतों में भी प्रचलित हैं। [६] चारण गायों का मांस नहीं खाते हैं, और जो लोग ऐसा करते हैं, उनकी अवहेलना करते हैं। गायों को माता की तरह सम्मान दिया जाता है । इससे पहले 1947 में भारतीय स्वतंत्रता, एक बलिदान के एक पुरुष भैंस के गठन का एक प्रमुख हिस्सा का उत्सव नवरात्रिहै। इस तरह के समारोहों में अक्सर इस्तेमाल किया जा करने के लिए की अध्यक्षता Charan औरत है।

भारतीय साहित्य में योगदान[संपादित करें]

चारण साहित्य, साहित्य की एक विधा के रूप में सुस्थापित है। डिंगल भाषा और साहित्य का अस्तित्व मुख्यतः चारणों के कारण है। झवेरचन्द मेघाणी ने चारण साहित्य को १३ उपविधाओं में विभाजित किया है।

  • (१) स्तवन - देवी-देवताओं की स्तुतियाँ
  • (२) बीरदवालो - नायकों, सन्तों और संरक्षकों की प्रसंशा
  • (३) वरन्नो - युद्ध का वर्णन
  • (४) उपलम्भो - उन राजाओं की आलोचना/निन्दा जो अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके कोई गलत कार्य करते हैं।
  • (५) थेकड़ी - किसी महनायक के साथ किए गए विश्वासघात का मजाक उड़ाना
  • (६) मरस्या या विलाप-काव्य -- योद्धाओं, संरक्षको, मित्रों या राजा के मृत्योपरान्त शोक व्यक्त करने के लिए रचित काव्य, जिसमें उस व्यक्ति के चारित्रिक गुणों के अलावा अन्य क्रिया-कलापों का वर्णन किया जाता है।
  • (७) प्रेमकथाएँ
  • (८) प्राकृतिक सुन्दरता का वर्णन, ऋतु वर्णन, उत्सव वर्णन
  • (९) अस्त्र-शस्त्र का वर्णन
  • (१०) सिंह (शेर), घोड़े, ऊँट और भैंसों की प्रसंसा
  • (११) शिक्षाप्रद एवं व्यावहारिक चतुराई से सम्बन्धित कहावतें
  • (१२) प्राचीन महाकाव्य
  • (१३) अकाल और दुर्दिन के समय प्रजा की पीड़ा का वर्णन

चारणी साहित्य का एक अन्य वर्गीकरण यह है-

  • ख्यात : राजस्थानी साहित्य के इतिहासपरक ग्रन्थ जिनको रचना तत्कालीन शासकों ने अपनी मान-मर्यादा एवं वंशावली के चित्रण हेतु करवाई। उदाहरण - मुहणोत नैणसी री ख्यात, दयालदास को बीकानेर रां राठौड़ा री ख्यात आदि।
  • वंशावली : इस श्रेणी की रचनाओं में राजवंशों की वंशावलियाँ विस्तृत विवरण सहित लिखी गई हैं, जैसे राठौड़ा री वंशावली, राजपूतों री वंशावली आदि।
  • दवावैत – यह उर्दू-फारसी की शब्दावली से युक्त राजस्थानी कलात्मक लेखन शैली है, किसी की प्रशंसा दोहों के रूप में की जाती है।
  • वार्ता या वात : वात का अर्थ कथा या कहानी से है । राजस्थान मे ऐतिहासिक, पौराणिक, प्रेमपरक एवं काल्पनिक कथानकों पर अपार वात साहित्य है।
  • रासो (सैन्य महाकाव्य) -- राजाओं की प्रशंसों में लिखे गए काव्य ग्रन्थ जिनमें उनके युद्ध अभियानों व वीरतापूर्ण कृत्यों के विवरण के साथ उनके राजवंश का विवरण भी मिलता है। बीसलदेव रासी, पृथ्वीराज रासो आदि मुख्य रासो ग्रन्थ हैं।
  • वेलि -- राजस्थानी वेलि साहित्य में यहाँ के शासकों एवं सामन्तों की वीरता, इतिहास, विद्वता, उदरता, प्रेम-भावना, स्वामिभक्ति, वंशावली आदि घटनाओं का उल्लेख होता है। पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा रचित 'वेलि किसन रुकमणी री' प्रसिद्ध वेलि ग्रन्थ है।
  • विगत : यह भी इतिहासपरक ग्रन्थ लेखन की शैली है। 'मारवाड़ रा परगना री विगत' इस शैली की प्रमुख रचना है।
  • प्रकास : किसी वंश अथवा व्यक्ति विषेष की उपलब्धियाँ या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियाॅं ‘प्रकास‘ कहलाती है। राजप्रकास, पाबू प्रकास, उदय प्रकास आदि इनके मुख्य उदाहरण है।
  • वचनिका : यह एक गद्य-पद्य तुकान्त रचना होती है, जिससे अन्त्यानुप्रास मिलता है। राजस्थानी साहित्य में "अचलदास खाँची री वचनिका" एवं "राठौड़ रतनसिंह जी महेस दासोत से वचनिका" प्रमुख हैं। वचनिका मुख्यतः अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी मे लिखी हुई हैं।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. "List of Backward Classes | Welfare of Scheduled Caste & Backward Classes Department, Government of Haryana". haryanascbc.gov.in. अभिगमन तिथि 2022-04-29.
  2. Bhargava, Hem Bala (2000). Royalty, Feudalism, and Gender: As Portrayed by Foreign Travellers (अंग्रेज़ी में). Rawat Publications. पृ॰ 192. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7033-616-7. Heber writes that not only in Rajputana but in the wilder districts of South-west more war-like Charans were found. In Gujarat and Malwa the merchants and travellers hired Charans to protect them through their journey.
  3. Hiramani, A. B. (1977). Social Change in Rural India (अंग्रेज़ी में). B. R. Publishing Corporation. पृ॰ 47.
  4. Commissioner, Pakistan Office of the Census (1962). Population Census of Pakistan, 1961: West Pakistan: 1.Karachi. 2.Lahore. 3.Gujranwala. 4.Rawalpindi. 5.Lyallpur. 6.Multan. 7.Quetta. 8.Peshawar. 9.Hyderabad. 10.Sukkur. 11.Bahawalpur. 12.Hazara. 13.Sialkot. 14.Sargodha. 15.Mianwali. 16.Jhang. 17.Loralai. 18.Sibi. 19.Jacobabad. 20.Campbellpur. 21.Gujrat. 22.Bannu. 23.Jhelum. 24.Tharparker. 25.Larkana. 26.Thatta. 27.Mekran (अंग्रेज़ी में). There are other castes of Hindus i.e. , Brahmans , Lohanas , Khatries , Sutars , Charans , Sonaras , Kalals etc.
  5. Kothiyal, Tanuja (2016-03-14). Nomadic Narratives: A History of Mobility and Identity in the Great Indian Desert (अंग्रेज़ी में). Cambridge University Press. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-316-67389-8. Charan migratory history traces their movements between Baluchistan, Jaisalmer, Marwar, Gujarat and Kutch.
  6. Palriwala, Rajni (1993). "Economics and Patriliny: Consumption and Authority within the Household". Social Scientist. 21 (9/11): 47–73. JSTOR 3520426. आइ॰एस॰एस॰एन॰ 0970-0293. डीओआइ:10.2307/3520426. In Rajasthan, they were bards and 'literateurs', but also warriors and jagirdars, holders of land and power over men; the dependents of Rajputs, their equals and their teachers. On my initial visit and subsequently, I was assured of this fact vis-a-vis Panchwas and introduced to the thakurs, who in life-style, the practice of female seclusion, and various reference points they alluded to appeared as Rajputs. While other villagers insisted that Rajputs and Charans were all the same to them, the Charans, were not trying to pass themselves off as Rajputs, but indicating that they were as good as Rajputs if not ritually superior....most of the ex-landlord households, the Charans and one Pathan, remained in the middle and upper ranks of village society
  7. Sharma, K. L. (2019-02-02). Caste, Social Inequality and Mobility in Rural India: Reconceptualizing the Indian Village (अंग्रेज़ी में). SAGE Publishing India. पपृ॰ 322–323. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-5328-202-8. Charans, a landowning caste (ex-zamindars), Brahmins and Banias were at the centre of the village...the upper castes, namely, Brahmins, Charans and Banias were dominant and grabbed new jobs and opportunities.
  8. Patel, Tulsi (2006-11-30). Fertility Behaviour: Population and Society in a Rajasthan Village (अंग्रेज़ी में). OUP India. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-568706-4. The jagir was held by members of the Charan caste...By this criterion most of the vegetarian castes enjoy a high rank while the non-vegetarian castes belong to the lower category, except Charan and Rajput who belong to the highest category, despite being non-vegetarian and non-teetotaler...While the abolition of feudal land tenures has led to downward mobility of Charans and Rajputs, it has helped upward mobility of Patels and Jats...Except for Charans and Rajputs, all others cultivate land as tenants and sharecroppers, especially if their own holding is small...However, Brahmins do take up wage labour in agriculture, unlike Banias, Charans and Rajputs...My entry into homes of higher castes, especially those of Charans and Rajputs, was not easy either.
  9. Paul, Kim (1993-01-01). "Negotiating sacred space: The Mandirand the Oran as contested sites". South Asia: Journal of South Asian Studies. 16 (sup001): 49–60. आइ॰एस॰एस॰एन॰ 0085-6401. डीओआइ:10.1080/00856409308723191. In the past some Charans were agriculturalists, engaged in farming lands which were divided equally between male descendants of the lineage. Others were cowherds and caravan escorts....
  10. Harald Tambs-Lyche (9 August 2017). Transaction and Hierarchy: Elements for a Theory of Caste. Routledge. पृ॰ 130. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-351-39396-6. Their vegetarian, non-violent and economically puritan ethos conflicts with the Charan tradition, marked by the aristocratic values...Some Charan bards received lands in jagir for their services, and in parts of Marwar, certain Charan families were effectively Darbars.
  11. Marcus, George E. (1983). Elites, Ethnographic Issues (अंग्रेज़ी में). University of New Mexico Press. पृ॰ 219. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8263-0658-6. Charans were court poets and historians, "bards".
  12. Shah, P. R. (1982). Raj Marwar During British Paramountcy: A Study in Problems and Policies Up to 1923 (अंग्रेज़ी में). Sharda Publishing House. पृ॰ 194. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-7855-1985-0. The Charans constituted a body of faithful companions of the Rajputs. They composed poems in praise of the heroic deeds of the Rajputs, and thus inspired them with courage and fortitude. They also guarded the mansions of their patrons, gave protection to their women and children during emergency and also acted as tutors for the young ones. In return land gifts and honours were conferred upon them. The Charans, who could not devote themselves to intellectual pursuits, took to trade. They also protected merchants and travellers passing through desolate regions and forests.
  13. Gupta, Saurabh (2015-10-01). Politics of Water Conservation: Delivering Development in Rural Rajasthan, India (अंग्रेज़ी में). Springer. पृ॰ 42. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-3-319-21392-7. Sharma (ibid) argues that the ex-Zamindars (or landlords) who own big landholdings even today are influential but those who do not retain it are not only less influential but have also slid down the scale of status hierarchy. The families most affected by this belong to the Rajputs, Jats, Charans and Brahmins (all traditionally powerful caste groups).
  14. Hastings, James M. (2002). Poets, Sants, and Warriors: The Dadu Panth, Religious Change and Identity Formation in Jaipur State Circa 1562-1860 Ce (अंग्रेज़ी में). University of Wisconsin--Madison. पृ॰ 23. In Rajasthan, the Charans are a highly esteemed caste seen as occupying a social position slightly lower than that of Brahmins but above that of Rajputs, with whom they maintain a symbiotic relationship...Like Rajputs, with whom they often shared company, Charans would eat meat, drink liquor and engage in martial activities...Although, in a way, poetic composition and recitation was for them a “pastime” subordinate to the primary income producing occupations of military service, agriculture, and horse and cattle trading...
  15. Banerjee, Anil Chandra. (1983). Aspects of Rajput State and Society. पपृ॰ 124–125. OCLC 12236372.

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बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]