कुम्हार

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search


मिट्टी के बर्तन बनाने वाले को कुम्हार कहते हैं। इस समाज की देवी श्री यादे माँ है।[1]

कुम्हार Prajapati

कुम्हार (कुम्भकार) जाति सपूर्ण भारत में हिन्दू धर्म में पायी जाती है।[1] क्षेत्र व उप-सम्प्रदायो के आधार पर कुम्हारों को अन्य पिछड़ा वर्ग[2] [3] के रूप में वर्गीकृत किया गया है। [4][5]

शाब्दिक अर्थ[संपादित करें]

कुम्हार शब्द का जन्म संस्कृत भाषा के "कुंभकTर" शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है-"मिट्टी के बर्तन बनाने वाला"। [6] द्रविढ़ भाषाओ में भी कुंभकार शब्द का यही अर्थ है। "भांडे" शब्द का प्रयोग भी कुम्हार जाति के सम्बोधन हेतु किया जाता है, जो की कुम्हार शब्द का समानार्थी है। भांडे का शाब्दिक अर्थ है-बर्तन। अमृतसर के कुम्हारों को "कुलाल" या "कलाल" कहा जाता है , यह शब्द यजुर्वेद में कुम्हार वर्ग के लिए प्रयुक्त हुये हैं।[1]

उत्पत्ति की काल्पनिक कथा[संपादित करें]

वैदिक भगवान प्रजापति के नाम का उपयोग करते हुये हिन्दू कुम्हारों का एक वर्ग खुद को प्रजापति कहता है। कहते है कि भगवान प्रजापति ने ही सम्पूर्ण ब्रह्मांड की रचना की थी। [1]

कुम्हारों में प्रचलित एक दंतकथा के अनुसार

एक बार ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों को गन्ने वितरित किए। सभी पुत्रों ने अपने हिस्से का गन्ना खा लिए, किन्तु अपने कार्य मे व्यस्त होने के कारण कुम्हार ने मिट्टी के ढेर के पास गन्ने को रख दिया जो कि मिट्टी के संपर्क मे होने के कारण पौधे के रूप मे विकसित हो गया। कुछ दिन बाद जब ब्रह्मा जी ने अपने पुत्रों से गन्ने मांगे तो कोई नही गन्ने लौटा नही सका, परंतु कुम्हार ने ब्रह्मा जी को पूरा गन्ने का पौधा भेंट कर दिया। कुम्हार के काम के प्रति निष्ठा देख ब्रह्मा जी ने उसे प्रजापति नाम से पुरस्कृत किया।[1]

परंतु कुछ लोगो का मत है कि कुम्हारों के पारंपरिक मिट्टी से बर्तन बनाने की रचनात्मक कला को सम्मान देने हेतु उन्हे प्रजापति कहा गया।[7]

वर्गीकरण[संपादित करें]

कुम्हारों को मुख्यतया हिन्दू सांस्कृतिक समुदायो ही किया गया है।[1] हिन्दुओ में कुम्हारों को निसंदेह शूद्र वर्ग में रखा गया है। साथ ही कुम्हारों को दो वर्गो- शुद्ध कुम्हार में विभाजित किया जाता है।[8]

कुम्हारों के कई समूह है, जैसे कि - गुजराती कुम्हार, परदेसी कुम्हार, राणा कुम्हार, लाद, तेलंगी इत्यादि। यह विभिन्न नाम भाषा या सांस्कृतिक क्षेत्रों पर आधारित नाम है ओर इन सभी को सम्मिलित रूप से कुम्हार जाति कहा जाता है।[9]

भारत मे व्याप्ति[संपादित करें]

चम्बा (हिमाचल)[संपादित करें]

चम्बा के कुम्हार घड़े, सुराही, बर्तन, अनाज संग्राहक, मनोरंजन के लिए खिलौने इत्यादि बनाने में निपुण होते है। कुछ बर्तनो पर चित्रण कार्य भी किया जाता है।[7]

महराष्ट्र[संपादित करें]

सतारा, कोल्हापुर,भंडारा-गोंदिया , नागपुर विदर्भ, सांगली, शोलापुर तथा पुणे क्षेत्रों में कुम्हार पाये जाते है। वे आपस में मराठी भाषा बोलते है परन्तु बाहरी लोगो से मराठी ओर हिन्दी दोनों भाषाओ में बात करते हैं। पत्र व्यवहार में वे देवनागरी लिपि का प्रयोग करते है।[2] यहाँ कुछ गैर मराठी कुम्हार भी है जो मूर्तिया ओर बर्तन बनाते है।[1] कुम्हार हिन्दू वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते है ओर खुद को kshatrya वर्ण में मानते है।[2]

मध्य प्रदेश[संपादित करें]

यहा हथरेटी ओर चकारेटी कुम्हार पाये जाते है। बर्तन बनाने के लिए चाक को हाथ से घुमाने के कारण इन्हे हथरेटी कहा जाता है। कुम्हारों को गोला भी कहा जाता है।[10] कुम्हार जाति(not working on holy chak and have different technique) प्रदेश के छतरपुर, दतिया, टीकमगढ़, पन्ना, सतना, सीधीशहडोल जिलों में अनुसूचित जाति में शामिल है व शेष इलाकों में अन्य पिछड़े वर्ग मे।[3]

राजस्थान[संपादित करें]

राजस्थान में कुम्हारों (प्रजापतियों) के 6 उप समूह है-माथेरा, कुमावत, खेतेरी, मारवाडा., तिमरिया, और मालवी। सामाजिक वर्ण क्रम में इनका स्थान उच्च जातियो व हरिजनो के मध्य का है। वे जातिगत अंतर्विवाही व गोत्र वाहिर्विवाही होते है।[6]

उत्तर प्रदेश,बिहार तथा झारखंड[संपादित करें]

उत्तर प्रदेश व बिहार में कुम्हार जाति वर्गीकरण समान है। समाज में कनौजिया कुम्हारों का सम्मान होता है तथा उन्हे पंडित कहा जाता है, किन्तु वे असली ब्राह्मणो से भिन्न है। माघीय कुम्हारों को कनौजिया कुम्हारों से नीचा माना जाता है तथा तुकरना या गधेरे कुम्हारों को अछूत वर्ग में सम्मिलित नहीं किया जाता है। झारखंड में बंगला भाषा बोलने वाले कुम्हारों की जनसंख्या अन्य कुम्हारों की तुलना में अधिक है। पाल, भकत, कुम्भकार, बेरा, प्रधान, चौधरी, आदि उपनाम वाले कुम्हार यहां के मूलवासी हैं जिन्हे खुंटकाटी कुम्हार भी कहा जाता है। इसके अलावा प्रजापति कुम्हार भी झारखंड में रहते हैं।[11]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Saraswati, Baidyanath (1979). Pottery-Making Cultures And Indian Civilization. Abhinav Publications. पपृ॰ 46–47. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7017-091-4. अभिगमन तिथि 6 April 2013.
  2. Khan, I. A. (2004). "Kumbhar/Kumhar". प्रकाशित Bhanu, B. V. People of India: Maharashtra, Part 2. Popular Prakashan. पपृ॰ 1175–1176. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8-17991-101-3.
  3. मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग आयोग जतियों की सूची क्रम संख्या 38
  4. Natrajan, Balmurli (2011). The Culturalization of Caste in India: Identity and Inequality in a Multicultural Age. Routledge. पृ॰ 2.1. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-13664-756-7.
  5. Deptt of social justice and empowerment. "Scheduled Caste Welfare - List of Scheduled Castes". GOI. Min of social justice and empowerment. पपृ॰ social justice and empowerment. अभिगमन तिथि 19 June 2015.
  6. Mandal, S. K. (1998). "Kumhar/Kumbhar". प्रकाशित Singh, Kumar Suresh. People of India: Rajasthan. Popular Prakashan. पपृ॰ 565–566. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8-17154-769-2.
  7. Bhāratī, Ke. Āra (2001). Chamba Himalaya: Amazing Land, Unique Culture. Indus Publishing. पृ॰ 178. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-8-17387-125-2.
  8. Saraswati, Baidyanath (1979). Pottery-Making Cultures And Indian Civilization. Abhinav Publications. पृ॰ 48. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7017-091-4. अभिगमन तिथि 6 April 2013.
  9. Vidyarthi, Lalita Prasad (1976). Rise of Anthropology in India. Concept Publishing Company. पृ॰ 293.
  10. "The Kumhars of Gwalior". ग्वालियर के प्रजापती%5d मूल जाँचें |url= मान (मदद) से 2010-03-23 को पुरालेखित.
  11. Saraswati, Baidyanath (1979). Pottery-Making Cultures And Indian Civilization. Abhinav Publications. पपृ॰ 49–50. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-7017-091-4. अभिगमन तिथि 6 April 2013.