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निर्वाचित लेख

कालिंजर दुर्ग के महल
कालिंजर दुर्ग, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश के बांदा जिला स्थित एक दुर्ग है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में विंध्य पर्वत पर स्थित यह दुर्ग विश्व धरोहर स्थल खजुराहो से ९७.७ किमी दूर है। इसे भारत के सबसे विशाल और अपराजेय दुर्गों में गिना जाता रहा है। इस दुर्ग में कई प्राचीन मन्दिर हैं। इनमें कई मंदिर तीसरी से पाँचवीं सदी गुप्तकाल के हैं। यहाँ के शिव मन्दिर के बारे में मान्यता है कि सागर-मन्थन से निकले कालकूट विष को पीने के बाद भगवान शिव ने यही तपस्या कर उसकी ज्वाला शांत की थी। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर लगने वाला कतिकी मेला यहाँ का प्रसिद्ध सांस्कृतिक उत्सव है। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात इसकी पहचान एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर के रूप में की गयी है। वर्तमान में यह दुर्ग भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग के अधिकार एवं अनुरक्षण में है। विस्तार में...

समाचार

योशिहिडे सुगा
  • भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का 84 वर्ष की आयु में निधन हो गया।


हाल के निधन: राहत इन्दौरी

क्या आप जानते हैं?

स्पेन के फ़िलिप पंचम
  • ... कि बैटमैन के प्रकाशन का इतिहास मई 1939 से प्रारंभ होता है?
  • ... कि हैब्सबर्ग राजवंश अन्य राजघरानों के उत्तराधिकारों से विवाह के कारण कई क्षेत्रों का स्वामी बन गया?
  • ... कि मोहम्मद ग़ोरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराने के उपरान्त उन्हें अपने अधीन राजा बनाने का प्रयास किया था?
  • ... कि फ्रांस के शाही घराने के फ़िलिप (चित्रित) को स्पेन के पूर्व राजा ने अपना वारिस नामित किया था?
  • ... कि अपने नाम के विपरीत, किलर व्हेलें मनुष्यों पर हमला नही करती हैं, और मनुष्य इनके आहार में शामिल नही हैं?


निर्वाचित चित्र

आज का आलेख

श्रीकालहस्ती मंदिर का मुख्य गोपुरम
श्रीकालाहस्ती आंध्रप्रदेश के तिरुपति शहर के पास स्थित कालहस्ती नामक कस्बे में एक शिव मंदिर है। ये मंदिर पेन्नार नदी की शाखा स्वर्णामुखी नदी के तट पर बसा है। दक्षिण भारत में स्थित भगवान शिव के तीर्थस्थानों में इस स्थान का विशेष महत्व है। ये तीर्थ नदी के तट से पर्वत की तलहटी तक फैला हुआ है और लगभग २००० वर्षों से इसे दक्षिण कैलाश या दक्षिण काशी के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के पार्श्व में तिरुमलय की पहाड़ी दिखाई देती हैं, और मंदिर का शिखर विमान दक्षिण भारतीय शैली का सफ़ेद रंग में बना है। इस मंदिर के तीन विशाल गोपुरम हैं जो स्थापत्य की दृष्टि से अनुपम हैं। मंदिर में सौ स्तंभों वाला मंडप है, जो अपने आप में अनोखा है। अंदर सस्त्रशिवलिंग भी स्थापित है, जो यदा कदा ही दिखाई देता है। मंदिर का अंदरूनी भाग ५वीं शताब्दी का बना है और बाहरी भाग बाद में १२वीं शताब्दी में निर्मित है। विस्तार में...

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