चारण (जाति)

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चरण एक जाति है को सिंध, राजस्थान और गुजरात में निवास करती है। 🔶 *चारण क्या थे?कौन थे ? (मध्य कालीन युग)*

अगर हम इतिहास मे एक द्रष्टि डाले तो पायेंगे की राजपूताना (राजस्थान)व गुजरात मे चारणो का इतिहास मे सदेव ही एैतीहासीक योगदान रहा है । ये बहोत से राजघराने के स्तम्भ रहे है । इन्हे समय समय पर अपनी वीरता एवम शौर्य के फल स्वरूप जागीरे प्राप्त हुई है । चारण राज्य मे दरबारीमंत्री,श्रेष्ठकवि ,कुशळ सलाहकार, विर योद्धा,उपदेशक एवं पथप्रदशक होते थे । वह कीसी भी युद्ध की सेना मे जुडकर राजा व सेना को उचित सलाह व प्रोत्साहित करते थे। व खुद रणभुमी मे अपना युद्ध कौश्ल्य दिखा कर विरता से लडते थे।

राजनीति मे भी चारण का बड़ा योगदान रहेता था। कीसी भी बडे या छोटे फैसलो की चर्चा राजा उनसे करते थे। राजपूताना व गुजरात के रजवाडो मे वह एक  सर्वश्रेष्ठ,प्रभावशाली एवम महत्वपूर्ण व्यक्ति होते थे ।
  • जीवन स्तर* :
मध्यकालीन युग मे  राजपूताना व गुजरात के चारण सभी प्रकार से सर्वश्रेष्ठ थे ।  दरबार के राजकवि(मंत्री) और जागीरदार थे । उनके पास जागीरे थी उनसे उनका जीवनयापन होता था ।

> *राजपूताना से मिले कुरब कायदे*:

चारणो को समय समय पर उनके शौर्यपूर्ण कार्य एवं बलिदान के एवज मे सन्न्मानीत किया जाता था ।जिनका विवरण इस प्रकार है :

*लाख पसाव, करोड़ पसाव, अरब पसाव,जागीर,उठण और बेठण का कुरब ,बांहपसाव,ठाकुर की पदवी,चंवर व पाळखी का सम्मान, हाथी पर तोरण ,सोना जवेरात, हाथी ,पैरो मे सोने के लंगर, घोडे, तलवारे,बंदुके,भाले व कटारीया आदी....*
  • चारण का दरबार मे स्थान*:

दरबार मे चारण के बेठने का स्थान छठा था जो राजपूत सिरदारो के तुरंत बाद का होता था। चारण दोवडी ताजीम सीरदारों मे ओहदेदार गिने जाते थे। चारण को दरबार मे आने व जाने पर राजा खुद खडे होकर सन्मान भरा अभीवादन करते थे।

  • चारण के कार्य* :

चारण राजा के सलाहकार व प्रतिनीधी होते थे। वह युद्धभुमी मे सबसे आगे खडे रेहकर शौर्य से भरपुर शब्द से सेना के सैनीको मे जोश भरते थे व शूरविर चारण युद्ध भूमि मे दुश्मनो को मारकर तलवार को रक्तरजींत करते थे। चारणो ने एक उच्च कक्षा के साहीत्य का सर्जन कीया था जीसमे दो भाषाए मुख्य है, डींगल व पींगल । ये साहीत्य चारणी साहीत्य के नाम से जाना जाता है। *पूरे विश्व मे कोई और एसा साहीत्य नही जो कीसी जाती के नाम से जाना जाता हो!*

वह श्रेष्ठ कवि के अतिरिक्त स्पष्टवक्ता भी थे । राजा को कीसी भी समय मुह पर सच सुनाने मे बीलकुल नही हीचकाते थे। राजघराने की सुरक्षा उनका कर्तव्य था,राज्य के कोई आदेश अध्यादेश उनकी सहमती से होता था । संकट समय पर राजपूत और राजपूत स्त्रीया भी चारण के स्थान को सुरक्षित मान कर पनाह लेते थे ।
  • देवकुल* :

चारण कुल मे कई सारी देवियां हुई जो राजपूतो की कुलदेवीया व ईष्टदेवीया है। चारण एक देवजाती है। जीसका प्रमाण वेदो और पुराणो मे देखने को मीलता है। सबसे ज्यादा देवियो ने चारण कुल मे अवतार लीया है ईसी वजह से चारणो को देवीपुत्र भी कहा जाता है ।

  • अभीवादन :*

चारण एक दुसरे से मीलने पर अभिवादन "जय माताजी" से करते है।

> *ठिकाणा(गाँव) व जागीरी* : स्थिति - पुरातन व मध्यकालीन समय में तो चारण राज्य के सर्वोच्च एवं सर्वश्रेष्ठ अधिकारी होते थे । मध्यकाल में श्रेष्ठ साहीत्य सर्जन करना ,युद्धो में लड कर वीरगति पाना तथा उत्कृष्ठ एवं शौर्य पूर्ण कार्य कर मातृभूमि व स्वामिभक्ति निभाने वालो को अलग-अलग प्रकार की जागीरे दी जाती थी । इसमें राजपूत,चारण व राजपुरोहित ये तीन जातियाँ मुख्य थी ।

प्रमुख ताजीमें निम्न थी - 1. एकवडी ताजीम 2. दोवडी ताजीम 3. आडा शासण जागीर

(क) इडाणी परदे वाले
(ख) बिना इडाणी परदे वाले

4. भोमिया डोलीदार

(क) राजपूतो में भोमिया कहलाते

(ख) चारण में डोलीदार कहलाते

  • राजपूत साधारण जागीरदार, परंतु चारण सांसण/शासन (शुल्क माफ) जागीरदार कहलाते थे।*
  • रस्म रिवाज* -

समस्त रस्मो रिवाज,विवाह, तीज-त्यौहार, रहन-सहन, पहनावा ,डील-डोल, रेहणी केहणी इत्यादि राजपूतो व चारणो के एक ही है।

  • वर्तमान स्थिति :*

बदलते युग के थपेड़ो के बिच चारण की गौरवगाथा मात्र ऐतिहासिक घटनाओ पर रह गयी है। अल्प संख्यक समाज है राजस्थान ,गुजरात एवं मध्यप्रदेश के कुछ भाग मे चारणो की संख्या है। सरकारी नोकरी मे चारण को जाना ज्यादा पसंद है।कुछ चारण निजी व्यवसाय एवम खेती पर निर्भर है। देश की तीनो सशस्त्र सेना एवं सुरक्षा कर्मिआदि नोकरी करनी ज्यादा पसंद करते है। देशभक्त एवम वफादार है। आज भी कुछ कुछ चारण काव्य रचते है।

  • उपसंहार -*

चारणो का राजपूतो से अतूट संबंध रहा है। स्पष्ट है कि पुरातन एवं मध्यकाल में चारण एवं राजपूत का चोलीदामन का प्रगाढ़ रिश्ता रहा है तो, सांस्कृति दृष्टि से ये कभी भिऩ्न नहीं हो सकते , एक दूसरे के अभिऩ्न अंग की तरह है। इतिहास साक्षी है की पुरातन व मध्यकालीन समय में चारणों ने समय-समय पर राजपूतो को कर्तव्यपालन हेतु उत्साहित किया । उन्होने काव्य में विड़द का धन्यवाद दिया एवं त्रुटियों पर राजाओं को मुंह पर कडवा सत्य सुनाकर पुनः मर्यादा एवं कर्तव्यपालन का बोध कराया। किन्तु समय के दबले करवटों के पश्चात् देश आजाद होने के बाद ऐसा कुछ नहीं रहा एवं धीरे-धीरे मिटता गया ।

संदर्भ : > *भारतीय संस्कृति का विकास क्रम* -एम.एल माण्डोत > *राजपुरोहित जाती का का इतिहास*

-प्रहलादसिंह राजपुरोहित

> *चारण की अस्मिता* -लक्ष्मणसिंह गढवी > *चारण दीगदर्शन*

-ठा.शंकरसिंह आशीया

सामाजिक संरचना[संपादित करें]

सदस्यों के जाति माना जाता है परमात्मा के द्वारा समाज के एक बड़े वर्ग है। जाति की महिला के बहुत अच्छा लगा रहे हैं के रूप में माँ देवी द्वारा अन्य प्रमुख समुदायों के इस क्षेत्र सहित राजपूतों.

Charan समाज पर आधारित है, लिखा वंशावलीहै। एक चरण पर विचार करेंगे सभी अन्य Charans बराबर के रूप में यहां तक कि अगर वे एक दूसरे को जानते नहीं है और मौलिक अलग आर्थिक या भौगोलिक स्थिति.

अनिल चन्द्र बनर्जी, एक इतिहास के प्रोफेसर, ने कहा कि

In them we have a combination of the traditional characteristics of the Brahmin and the Kshatriyas. Like the Brahmins, they adopted literary pursuits and accepted gifts.Like the Rajput, they worshipped Shakti, drank liquor, took meat and engaged in military activities. They stood at the chief portal on occasions of marriage to demand gifts from the bridegrooms, they also stood at the gate to receive the first blow of the sword."[1]

खाद्य और पेय[संपादित करें]

अपने खाने और पीने की आदतों के उन सदृश राजपूतों. Charans इस्तेमाल का आनंद करने के लिए की खपत अफीम और शराब पीने के लिए शराब, प्रथाओं जो भी कर रहे हैं के बीच लोकप्रिय राजपूतों के इस क्षेत्र.Charans खाने को नहीं है मांस के लिए गाय और पकड़, जो उन लोगों में क्या बोलना उपेक्षा. गायों का सम्मान कर रहे हैं की तरह. एक पति और पत्नी नहीं होगा दूध पीने से एक ही गाय, दूध या गंदे द्वारा अपने काउंटर भाग है। दूध पीने से एक माँ (गाय) का प्रतीक है कि जो लोग ऐसा माना जाता हो जाना चाहिए के रूप में भाई बहन हैं। इससे पहले 1947 में भारतीय स्वतंत्रता, एक बलिदान के एक पुरुष भैंस के गठन का एक प्रमुख हिस्सा का उत्सव नवरात्रिहै। इस तरह के समारोहों में अक्सर इस्तेमाल किया जा करने के लिए की अध्यक्षता Charan औरत है।

भारतीय साहित्य में योगदान[संपादित करें]

एक पूरी शैली साहित्य के रूप में जाना जाता है चरण साहित्य है। के Dingal भाषा और साहित्य के बड़े पैमाने पर मौजूद होने के कारण इस जाति है। Zaverchand Meghani बिताते हैं Charani साहित्य (साहित्य) में तेरह उपशैलियों:

  • प्रशंसा में गीत के देवी देवताओं (stavan)
  • प्रशंसा में गीत के नायकों, संतों और संरक्षक (birdavalo)
  • विवरण के युद्ध (varanno)
  • Rebukes के ढुलमुल महान राजाओं और पुरुषों के लिए जो उनकी शक्ति का उपयोग बुराई के लिए (upalambho)
  • मजाक का एक स्थायी विश्वासघात की वीरता (thekadi)
  • प्रेम कहानियों
  • अफसोस जताया के लिए मृत योद्धाओं, संरक्षक और दोस्तों (marasiya या vilap काव्य)
  • प्रशंसा के प्राकृतिक सौंदर्य, मौसमी सुंदरता और त्योहारों
  • विवरण हथियारों के
  • गीत की प्रशंसा में शेर, घोड़े, ऊंट और भैंस
  • बातें के बारे में शिक्षाप्रद और व्यावहारिक चतुराई
  • प्राचीन महाकाव्यों
  • गाने का वर्णन पीड़ा में लोगों की अकाल के समय और प्रतिकूल परिस्थितियों

अन्य वर्गीकरण के Charani साहित्य हैं Khyatas (इतिहास), Vartas और Vatas (कहानियां), रासो (मार्शल महाकाव्यों), Veli - Veli कृष्ण Rukman री, दोहा-छंद (छंद).

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Banerjee, Anil Chandra. (1983). Aspects of Rajput State and Society. पपृ॰ 124–125. OCLC 12236372.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]