राजा

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राजा (king) राजतंत्रात्मक शासन तंत्र का सर्वोच्च पद है। प्रायः यह वंशानुगत होता है। कुछ उदाहरण ऐसे जरूर मिलते हैं जहाँ राजा का चुनाव वंश परंपरा के बाहर के लोगों में से किया गया है। वह अपने मंत्रियों की सलाह से अपने राज्य पर शासन करता है। वह अपने शासन क्षेत्र, अधिपत्य या नियंत्रण वाले क्षेत्रों के लोगों के लिए नियम और नीतियाँ बनाता है। उसकी सहायता के लिए दरबार में विभिन्न स्तर के पद होते हैं। राजा के गुण और कर्तव्यों पर महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में प्रकाश डाला गया है।

राजा सम्बन्धी भारतीय विचार[संपादित करें]

राज्य के सप्ताङ्गों का शिरोभाग राजा होता है। शुक्रनीति में कहा गया है-

सप्ताङ्गमुच्यते राज्यं तत्र मूर्धा नृपः स्मृतः (शुक्रनीति 1/61))।
(अर्थ - राज्य, सात अंगो वाल होता है। उसमें भी सबसे ऊपर राजा का स्थान है।)

राजारहित इस विश्व में भयाक्रान्त प्राणियों के द्वारा आत्म रक्षार्थ इधर-उधर भ्रमण करने पर, परमात्मा ने इस संसार की रक्षा के लिए इन्द्र, वायु, अष्ट लोकपालों की चिरन्तन शक्ति को संग्रहीत करके उन शक्तियों द्वारा पृथ्वी पालक राजा की सृष्टि की।

अराजके हि सर्वस्मिन् सर्वतो विद्वते भयात्।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानसृजत् प्रभुः ॥ (शुक्रनीति - 1/71)
इन्द्रानिलयमार्काणाभग्नेश्च वरूणस्य च ।
चन्द्राक्तिशयोश्चापि मात्रा निर्हत्य शाश्वतीः ॥ (शुक्रनीति - 1/72)

राज्य की सप्तप्रकृतियों में राजा का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। आचार्य चाणक्य ने तो राजा को सप्ताङ्ग राज्य का मूल मानते हुए उसे राज्य ही मान लिया है।

तत्कूटस्थानीयो हि स्वामीति। राजा राज्यमिति प्रकृतिसंक्षेपः ॥ (कौटिल्य अर्थशास्त्र - 8/1,2)

महाभारत में भी राजा की महत्ता का गुणगान किया गया है।

राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं प्रजाश्च राजोऽप्रतिमं शरीरम् ॥
राजा विहीना न भवन्ति देशाः, देशैविहीना न नृपा भवन्ति॥ (महाभारत, शान्तिपर्व - 67/59)

भारतीय राजनीतिशास्त्रियों की मान्यता है कि ईश्वर ने अत्याचारियों के भय से डरी हुई प्रजा की रक्षा के लिए इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरूण, चन्द्रमा तथा कुबेर के अंश से राजा का निर्माण किया है। इस मान्यता का अर्थ है दिव्य शक्तियों के समान राजा भी प्रजा का कल्याण करे, उसकी रक्षा-सुरक्षा करे, उसका लालन-पालन करे।

ब्राह्मप्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम् ॥ ( मनुस्मृति - 7/2)
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट्।
सः कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥' ( मनुस्मृति - 7/7)
निक्षेप्यस्यसमंमूल्यं दण्डयोनिक्षेपमुक्तथा।
वस्त्रादिकसभस्तस्य तदाधम्र्मोनहीयते ॥ ( मत्स्यपुराण - 226/1)
नेच्छत्यन्याधिकारं हि निःस्पृहे मोदते सदा।
तद्दत्तवस्त्रभूषादिधारकस्तत्पुरोऽनिशम् ॥ ( शुक्रनीति - 2/26)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]