इन्द्र

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ऐरावत पर सवार इन्द्र हाथ में वज्र धारण किए हुए (सोमनाथपुर, लगभग १२६५ ई.)

इन्द्र (या इंद्र) हिन्दू धर्म में सभी देवताओं के राजा का सबसे उच्च पद था[1] जिसकी एक अलग ही चुनाव-पद्धति थी। इस चुनाव पद्धति के विषय में स्पष्ट वर्णन उपलब्ध नहीं है। वैदिक साहित्य में इन्द्र को सर्वोच्च महत्ता प्राप्त है लेकिन पौराणिक साहित्य में इनकी महत्ता निरन्तर क्षीण होती गयी और त्रिदेवों की श्रेष्ठता स्थापित हो गयी।

ऋग्वेद में इन्द्र[संपादित करें]

ऋग्वेद के लगभग एक-चौथाई सूक्त इन्द्र से सम्बन्धित हैं। 250 सूक्तों के अतिरिक्त 50 से अधिक मन्त्रों में उसका स्तवन प्राप्त होता है।[2] वह ऋग्वेद का सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण देवता है। उसे आर्यों का राष्ट्रीय देवता भी कह सकते हैं।[3] मुख्य रूप से वह वर्षा का देवता है जो कि अनावृष्टि अथवा अन्धकार रूपी दैत्य से युद्ध करता है तथा अवरुद्ध जल को अथवा प्रकाश को विनिर्मुक्त बना देता है।[4] वह गौण रूप से आर्यों का युद्ध-देवता भी है, जो आदिवासियों के साथ युद्ध में उन आर्यों की सहायता करता है। इन्द्र का मानवाकृतिरूपेण चित्रण दर्शनीय है। उसके विशाल शरीर, शीर्ष भुजाओं और बड़े उदर का बहुधा उल्लेख प्राप्त होता है।[5] उसके अधरों और जबड़ों का भी वर्णन मिलता है।[6] उसका वर्ण हरित् है। उसके केश और दाढ़ी भी हरित्वर्णा है।[7] वह स्वेच्छा से विविध रूप धारण कर सकता है।[8] ऋग्वेद इन्द्र के जन्म पर भी प्रकाश डालता है। पूरे दो सूक्त इन्द्र के जन्म से ही सम्बन्धित हैं।[9] ‘निष्टिग्री’ अथवा ‘शवसी’ नामक गाय को उसकी माँ बतलाया गया है।[10] उसके पिता ‘द्यौः’ या ‘त्वष्टा’ हैं।[11] एक स्थल पर उसे ‘सोम’ से उत्पन्न कहा गया है। उसके जन्म के समय द्यावा-पृथ्वी काँप उठी थी। इन्द्र के जन्म को विद्युत् के मेघ-विच्युत होने का प्रतीक माना जा सकता है।[12]

इन्द्र के सगे-सम्बन्धियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अग्नि और पूषन् उसके भाई हैं।[13] इसी प्रकार इन्द्राणी उसकी पत्नी[14] है। संभवतः 'इन्द्राणी' नाम परम्परित रूप से पुरुष (पति) के नाम का स्त्रीवाची बनाने से ही है[15] मूल नाम कुछ और ('शची')[16] हो सकता है। मरुद्गण उसके मित्र तथा सहायक हैं। उसे वरुण, वायु, सोम, बृहस्पति, पूषन् और विष्णु के साथ युग्मरूप में भी कल्पित किया गया है तीन चार सूक्तों में वह सूर्य का प्रतिरूप है।[17]

इन्द्र एक वृहदाकार देवता है। उसका शरीर पृथ्वी के विस्तार से कम से कम दस गुना है। वह सर्वाधिक शक्तिमान् है। इसीलिए वह सम्पूर्ण जगत् का एक मात्र शासक और नियन्ता है। उसके विविध विरुद शचीपति (=शक्ति का स्वामी), शतक्रतु (=सौ शक्तियों वाला) और शक्र (=शक्तिशाली), आदि उसकी विपुला शक्ति के ही प्रकाशक हैं।

सोमरस इन्द्र का परम प्रिय पेय है। वह विकट रूप से सोमरस का पान करता है। उससे उसे स्फूर्ति मिलती है। वृत्र के साथ युद्धके अवसर पर पूरे तीन सरोवरों को उसने पीकर सोम-रहित कर दिया था। दशम मण्डल के 119वें सूक्त में सोम पीकर मदविह्वल बने हुए स्वगत भाषण के रूप में अपने वीर-कर्मों और शक्ति का अहम्मन्यतापूर्वक वर्णन करते हुए इन्द्र को देखा जा सकता है। सोम के प्रति विशेष आग्रह के कारण ही उसे सोम का अभिषव करने वाले अथवा उसे पकाने वाले यजमान का रक्षक बतलाया गया है।

इन्द्र का प्रसिद्ध आयुध ‘वज्र’ है, जिसे कि विद्युत्-प्रहार से अभिन्न माना जा सकता है। इन्द्र के वज्र का निर्माण ‘त्वष्टा’ नामक देवता-विशेष द्वारा किया गया था। इन्द्र को कभी-कभी धनुष-बाण और अंकुश से युक्त भी बतलाया गया है। उसका रथ स्वर्णाभ है। दो हरित् वर्ण अश्वों द्वारा वाहित उस रथ का निर्माण देव-शिल्पी ऋभुओं द्वारा किया गया था।

इन्द्रकृत वृत्र-वध ऋग्वेद में बहुधा और बहुशः वर्णित और उल्लिखित है। सोम की मादकता से उत्प्रेरित हो, प्रायः मरुद्गणों के साथ, वह ‘वृत्र’ अथवा ‘अहि’ नामक दैत्यों (=प्रायः अनावृष्टि और अकाल के प्रतीक) पर आक्रमण करके अपने वज्र से उनका वध कर डालता है और पर्वत को भेद कर बन्दीकृत गायों के समान अवरुद्ध जलों को विनिर्मुक्त कर देता है। उक्त दैत्यों का आवास-स्थल ‘पर्वत’ मेघों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिनका भेदन वह जल-विमोचन हेतु करता है। इसी प्रकार गायों को अवरुद्ध कर रखने वाली प्रस्तर-शिलाएँ भी जल-निरोधक मेघ ही हैं।[18] मेघ ही वे प्रासाद भी हैं जिनमें पूर्वोक्त दैत्य निवास करते हैं। इन प्रासादों की संख्या कहीं 90, कहीं 99 तो कहीं 100 बतलाई गई है, जिनका विध्वंस करके इन्द्र ‘पुरभिद्’ विरुद धारण करता है। वृत्र या अहि के वधपूर्वक जल-विमोचन के साथ-साथ प्रकाश के अनवरुद्ध बना दिये जाने की बात भी बहुधा वर्णित है। उस वृत्र या अहि को मार कर इन्द्र सूर्य को सबके लिये दृष्टिगोचर बना देता है। यहाँ पर उक्त वृत्र या अहि से अभिप्राय या तो सूर्य प्रकाश के अवरोधक मेघ से है, या फिर निशाकालिक अन्धकार से। सूर्य और उषस् के साथ जिन गायों का उल्लेख मिलता है, वे प्रातः कालिक सूर्य की किरणों का ही प्रतिरूप हैं, जो कि अपने कृष्णाभ आवास-स्थल से बाहर निकलती हैं। इस प्रकार इन्द्र का गोपपतित्व भी सुप्रकट हो जाता है। वृत्र और अहि के वध के अतिरिक्त अन्य अनेक उपाख्यान भी इन्द्र के सम्बन्ध में उपलब्ध होते हैं। ‘सरमा’ की सहायता से उसने ‘पणि’ नामक दैत्यों द्वारा बन्दी बनाई गई गायों को छीन लिया था। ‘उषस्’ के रथ का विध्वंस, सूर्य के रथ के एक चक्र की चोरी, सोम-विजय आदि उपाख्यान भी प्राप्त हैं।

इन्द्र ने कम्पायमान भूतल और चलायमान पर्वतों को स्थिर बनाया है। चमड़े के समान उसने द्यावापृथिवी को फैला कर रख दिया है। जिस प्रकार एक धुरी से दोनों पहिये निकाल दिये जायँ, उसी प्रकार उसने द्युलोक और पृथ्वी को पृथक् कर दिया है। इन्द्र बड़े उग्र स्वभाव का है। स्वर्ग की शान्ति को भंग करने वाला वही एकमात्र देवता है। अनेक देवताओं से उसने युद्ध किया। उषस् के रथ को उसने भंग किया, सूर्य के रथ का एक चक्र उसने चुराया, अपने अनुयायी मरुतों को उसने मार डालने की धमकी दी। अपने पिता ‘त्वष्टा’ को उसने मार ही डाला। अनेक दैत्यों को भी उसने पराजित और विनष्ट किया, जिसमें से वृत्र, अहि, शम्बर, रौहिण के अतिरिक्त उरण विश्वरूप, अर्बुद, बल, व्यंश और नमुचि प्रमुख हैं। आर्यों के शत्रुभूत दासों अथवा दस्युओं को भी उसने युद्धों में पराभूत किया। कम से कम 50000 अनार्यों का विनाश उसके द्वारा किया गया।

इन्द्र अपने पूजकों का सदा रक्षक, सहायक और मित्र रहा है। वह दस्युओं को बन्दी बना कर उनकी भूमि आदि अपने भक्तों में विभक्त कर देता है। आहुति प्रदाता को वह धन-सम्पत्ति से मालामाल कर देता है। उसकी इस दानशीलता के कारण ही उसकी उपाधि ‘मघवन्’ (=ऐश्वर्यवान्) की सार्थकता है। इन्द्र का अनेक ऐतिहासिक पुरुषों से भी साहचर्य उल्लिखित है। उसकी ही सहायता से दिवोदास ने अपने दास-शत्रु तथा कुलितर के पुत्र ‘शम्बर’ को पराजित किया। ‘तुर्वश’ और ‘यदु’ दोनों को नदियों के पार उस इन्द्र ने ही पहुँचाया। दस नृपतियों के विरुद्ध युद्ध में राजा सुदास की उसने सहायता की।

इस प्रकार इन्द्र ऋग्वेद का सर्वप्रधान देवता है, जिसे मैक्समूलर सूर्य का वाची, रॉथ मेघों और विद्युत् का देवता, बेनफ़े वर्षाकालिक आकाश का प्रतीक, ग्रॉसमन उज्ज्वल आकाश का प्रतीक, हापकिन्स विद्युत् का प्रतिरूप और मैकडॉनल तथा कीथ आदि पाश्चात्य से लेकर आचार्य बलदेव उपाध्याय जैसे भारतीय विद्वान् वर्षा का देवता मानते हैं।[19]

आकार-प्रकार[संपादित करें]

हिन्दू मन्दिरों में प्रायः पूर्व दिशा के रक्षक देवता के रूप में इन्द्र की प्रतिष्टा होती है।

इन्द्र वृहदाकार है। देवता और मनुष्य उसके सामर्थ्य की सीमा को नहीं पहुँच पाते। वह सुन्दर मुख वाला है। उसका आयुध वज्र अथवा शरु है। उसकी भुजाएँ भी वज्रवत् पुष्ट एवं कठोर हैं। वह सप्त संख्यक पर्जन्य रूपी रश्मियों वाला एवं परम कीर्तिमान् है।

महाबलशाली[संपादित करें]

‘नृमणस्य मह्ना स जनास इन्द्रः’ कह कर स्वयं गृत्समद ऋषि ने उसके बलविक्रम का उद्घोष कर दिया है। पर्वत उससे थर-थर काँपते हैं। द्यावा-पृथिवी अर्थात् वहाँ के लोग भी इन्द्र के बल से भय-भीत रहते हैं। वह शत्रुओं की धन-सम्पत्ति को जीत कर उसी प्रकार अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है, जिस प्रकार एक आखेटक कुक्कुरों की सहायता से मृगादिक का वध कर व्याध अपनी लक्ष्य-सिद्धि करता है अथवा विजय-प्राप्त जुआरी जिस प्रकार जीते हुए दाँव के धन को समेट कर स्वायत्त कर लेता है। इतना ही नहीं वह शत्रुओं की पोषक समृद्धि को नष्ट-विनष्ट भी कर डालता है। वह एक विकट योद्धा है और युद्ध में वृक् (=भेड़िया) के समान हिंसा करता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह ‘मनस्वान्’ (=मनस्वी) है।

रक्षक एवं सहायक[संपादित करें]

इन्द्र अपने भक्तों का रक्षक, सहायक एवं मित्र है। कहा भी है कि--‘यो ब्रह्मणो नाधमानस्य कीरेः.............अविता’।[20] उसकी सहायता के बिना विजयलाभ असम्भव है। इस लिये योद्धा-गण विजय के लिए और अपनी रक्षा के लिये उसका आवाहन करते हैं। यह बात निम्नलिखित मन्त्र से और भी स्पष्ट हो जाती है :- ‘यं क्रन्दसी संयती विह्वयेते परेऽवर उभया अमित्राः। समानं चिद्रथमातस्थिवांसा नाना हवेते स जनास इन्द्रः।।’[21]

इन्द्र आर्यों को अनार्यों के विरुद्ध युद्ध में सहायता प्रदान कर उन्हें विजयी बनाता है। एतदर्थ वह वस्तुओं का हनन एवं अपने अपूजकों व विरोधियों का वध करता है। वह जिस पर प्रसन्न हुआ, उसे समृद्ध और जिस पर अप्रसन्न हुआ, उसे कृश (=निर्धन) बना देता है। उसके तत्तद् गुणों के प्रभाव से अश्व, गो, ग्राम एवं रथादि उसके वश में रहते हैं। इस प्रकार वह निखिल विश्व का प्रतिनिधि है। देवता तक उसकी कृपा के पात्र हैं।

अनेक सृष्टि-कार्यों का सम्पादक[संपादित करें]

इन्द्र ने अस्थिर पृथ्वी को स्थैर्य प्रदान किया है। इधर-उधर उड़ते-फिरते पर्वतों के पङ्ख-छेदन कर इन्द्र ने ही उन्हें तत्तत् स्थान पर प्रस्थापित किया है। उसने द्यु-लोक को भी स्तब्ध किया और इस प्रकार अन्तरिक्ष का निर्माण किया। दो मेघों के मध्य में वैद्युत् अग्नि अथवा दो प्रस्तर-खण्डों के मध्य में सामान्य अग्नि का जनक इन्द्र ही है। इन्द्र को सूर्य और हवा उषा का उद्भावक भी कहा गया है। वह अन्तरिक्ष-गत अथवा भूतलवर्ती जलों का प्रेरक है। इसीलिए उसे वर्षा का देवता मानते हैं। पृथ्वी को ही नहीं प्रत्युत सम्पूर्ण लोकों को स्थिर करने वाला अथवा उन्हें रचने वाला भी इन्द्र से भिन्न कोई और नहीं है। इससे ‘उसने सभी पदार्थों को गतिमान बनाया’ यह अर्थ ग्रहण करने पर भी इन्द्र का माहात्म्य नहीं घटता।

इन्द्र के वीरकर्म[संपादित करें]

इन्द्र ने भयवशात् पर्वतों में छिपे हुए ‘शम्बर’ नाम के दैत्य को 40 वें वर्ष (अथवा शरद् ऋतु की 40 वीं तिथि को) ढूँढ निकाला और उसका वध कर दिया।[22] बल-प्रदर्शन करने वाले ‘अहि’ नामक दानव का भी उसने संहार किया। उक्त ‘अहि’ को मार कर इन्द्र ने समर्पणशील जलों को अथवा गङ्गा आदि सात नदियों को प्रवाहित किया। हिंसार्थ स्वर्ग में चढ़ते हुए रौहिण असुर को भी इन्द्र ने अपने वज्र से मार डाला। बल नामक दैत्य ने असंख्य गायों को अपने बाड़े में निरुद्ध कर रखा था। उन गायों की लोककल्याणार्थ बलपूर्वक बाहर निकालने का श्रेय इन्द्र को ही है।

कुछ विद्वान् अहि-विनाश, वृत्र-वध, शम्बर-संहार एवं बल-विमर्दनादि का ऐक्यारोपण करके सूर्य रूप में इन्द्र द्वारा ध्रुवप्रदेशीय अन्धकार का नाश अथवा जलों को जमा देने वाली घोर सर्दी का विनाश अथवा अहिरूपी मेघों का विमर्दन करके जल-विमोचन अथवा बलरूपी मेघों से आच्छन्न सूर्य की किरणरूपी गायों के विमुक्त किये जाने की कल्पना करते हैं, जो सत्य से अधिक दूर नहीं प्रतीत होता।[23]

सोमपानकर्त्ता[संपादित करें]

‘यः सोमपा’ कह कर ऋषि ने इन्द्र की दुर्व्यसन-परता की ओर भी इङ्गित किया है। ‘सोम’ इन्द्र का परमप्रिय पेय पदार्थ है। उसके बराबर कोई अन्य देवता सोम-पान नहीं कर सकता। ‘सोम’ उसे युद्धों के लिए शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करता है। सोम-सेवी होने के कारण इन्द्र को वे लोग परमप्रिय हैं, जो सोम का अभिषव करते हैं अथवा पका कर उसे सिद्ध करते हैं। ऐसे लोगों की वह रक्षा करता है। इतना ही नहीं, ऐसे प्रिय व्यक्तियों को वह धन-वैभव से पुरस्कृत भी करता है।

पूजनीय[संपादित करें]

यह बात दूसरी है कि वह सोम पायी है, अपने अपूजकों का अपने आयुध वज्र से वध करता है, शूद्रों को अधोगति प्रदान करने वाला अथवा अपने अपूजकों को नरक प्रदान करने वाला है, फिर भी वह अपने अन्य सद्गुणों के कारण सर्वथा पूजनीय है। द्यावापृथिवी के प्राणी उसे सदा नमन करते हैं। लोग उससे यह प्रार्थना किया करते हैं कि ‘हे इन्द्र! सुन्दर पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर तथा तुम्हारे प्रियपात्र बने हुए हम सदा तुम्हारी प्रार्थना में तत्पर रहें।’[24]

इस प्रकार स्पष्ट है कि इन्द्र वैदिक देवी-देवताओं में सर्वोपरि और सर्वोत्तम स्थान का अधिकारी है।

वृत्र-वध पर कुछ मन्तव्य[संपादित करें]

इन्द्र की चरितावली में वृत्रवध का बड़ा महत्त्व है।

  • इन्द्र और वृत्र के युद्ध को आरम्भ से ही सांकेतिक माना गया है। यास्ककृत निरुक्त में कहा गया है कि 'वृत्र' निरुक्तकारों के अनुसार 'मेघ' है। ऐतिहासिकों के अनुसार त्वष्टा का पुत्र असुर है (इसी मत का विकसित रूप महाभारत[25] और भागवत महापुराण[26] में वर्णित वृत्र-वध आख्यान है।) और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार वह 'अहि' (सर्प) समान है जिसने अपने शरीर-विस्तार से जल-प्रवाह को रोक लिया था और इन्द्र के द्वारा विदीर्ण किये जाने पर अवरुद्ध जल प्रवाहित हुआ।[27]
  • निरुक्तकार के मतानुसार वृत्र अन्धकारपूर्ण, आवरण करने वाला है। जल और प्रकाश (विद्युत) का मिश्रण होने से वर्षा होती है ; ऐसा होना रूपक के रूप में युद्ध का वर्णन है।[28]
  • लोकमान्य तिलक के अनुसार इन्द्र सूर्य का प्रतीक है तथा वृत्र हिम का। यह उत्तरी ध्रुव में शीतकाल में हिम जमने और वसंतकालीन सूर्य द्वारा पिघलाने पर नदियों के प्रवाहित होने का प्रतीक है।[29]
  • हिलेब्राण्ट के मत से भी वृत्र हिमानी का प्रतीक है। परन्तु अधिकांश पश्चिमी विद्वान् भी निरुक्त के पूर्वोक्त मत से सहमत हैं और ये लोग मानते हैं कि इन्द्र वृष्टि लाने वाला तूफान का देवता है।[29]

देव-युग्म : इन्द्र और वरुण[संपादित करें]

ऋग्वेद में इन्द्र का नाम सात देव-युग्मों में भी आता है। ऐसे युग्मों में 11 सूक्त इन्द्र-अग्नि के लिए हैं, 9 सूक्त इन्द्र-वरुण के लिए, 7 इन्द्र-वायु के लिए, 2 इन्द्र-सोम, 2 इन्द्र-बृहस्पति, 1 इन्द्र-विष्णु और 1 सूक्त इन्द्र-पूषण के लिए हैं।[30] इनमें से सबके साथ इन्द्र की समानता होने के साथ भिन्नताएँ भी हैं। उदाहरण के लिए इन्द्र और वरुण के युग्म को लिया जा सकता है। यद्यपि वरुण का वर्णन काफी कम सूक्तों में है, परन्तु वे इन्द्र के बाद सर्वाधिक महनीय माने गये हैं। 9 सूक्तों में इन्द्र और वरुण का संयुक्त वर्णन है। दोनों में अनेक समानताएँ हैं। कहा गया है कि जगत् के अधिपति इन्द्रावरुण ने सरिताओं के पथ खोदे और सूर्य को द्युलोक में गतिमान बनाया।[31] वे वृत्र को पछाड़ते हैं।[32] युद्ध में सहायक हैं।[33] उपासकों को विजय प्रदान करते हैं।[34] क्रूरकर्मा पामरों पर अपना अमोघ वज्र फेंकते हैं।[35]

इन समानताओं के बावजूद दोनों में कई वैषम्य भी हैं :-

  1. एक (इन्द्र) युद्ध में शत्रुओं को मारता है। दूसरा (वरुण) सर्वदा व्रतों का रक्षण करता है।[36]
  2. वरुण मनुष्यों को विवेक प्रदान कर पोषण करता है और इन्द्र शत्रुओं को इस प्रकार मारता है कि वे पुनः उठ न सके।[37] इसलिए इन्द्र को युद्ध प्रिय माना गया है[38] और वरुण को शान्तिप्रिय, बुद्धिदाता।[39]
  3. वरुण का अपना अस्त्र पाश कहा गया है।[40]
  4. वरुण व्रत का उल्लंघन करने वाले को दण्ड देते हैं पर पाश को ढीला भी कर देते हैं।[41]
  5. वरुण सम्पूर्ण भुवनों के राजा हैं।[42]
  6. वरुण की वेश-भूषा जल है।[43]
  7. सप्त सिन्धु वरुण के मुख में प्रवाहित है;[44] तथा वे समुद्र में चलने वाली नाव (जहाज) को भी जानते हैं।[45] वरुण का गहरा सम्बन्ध समुद्र से भी है।[46]
  8. वरुण औषधियों के भी स्वामी हैं। उनके पास 100 या 1000 औषधियाँ हैं जिनसे वे मृत्यु को जीत लेते हैं तथा भक्तों का पाप-भञ्जन करते हैं।[47]
  9. वरुण अत्यधिक क्षमाशील हैं[48] और जीवन का अंत भी कर सकते हैं तो आयु बढ़ा देने वाले के रूप में भी उनका स्मरण किया गया है।[49] अपवाद रूप में इन्द्र ने भी शुनःशेप की आयु बचायी थी पर वरुण का सामान्य रूप से ऐसा उल्लेख किया गया है। दोनों में और भी कतिपय विभिन्नताएँ हैं। जिस प्रकार इन्द्र भौतिक स्तर पर सबसे बड़े देवता थे उसी प्रकार वरुण नैतिक स्तर पर महनीय देवता थे।[50]

आत्म-ज्ञान विषयक कथा[संपादित करें]

उपनिषदों में स्वाभाविक विषयानुसार यदा-कदा इन्द्र को भी ज्ञान-प्राप्ति हेतु उत्सुक दिखाया गया है। छान्दोग्योपनिषद् से ऐसी एक कथा दी जा रही है :- प्रजापति की उक्ति थी कि पापरहित, जराशून्य, मृत्यु-शोक आदि विकारों से रहित आत्मा को जो कोई जान लेता है, वह संपूर्ण लोक तथा सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। प्रजापति की उक्ति सुनकर देवता तथा असुर दोनों ही उस आत्मा को जानने के लिए उत्सुक हो उठे, अत: देवताओं के राजा इन्द्र तथा असुरों के राजा विरोचन परस्पर ईर्ष्याभाव के साथ हाथों में समिधाएं लेकर प्रजापति के पास पहुंचे। दोनों ने बत्तीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन किया, तदुपरांत प्रजापति ने उनके आने का प्रयोजन पूछा। उनकी जिज्ञासा जानकर प्रजापति ने उन्हें सुन्दर वस्त्रालंकरण से युक्त होकर जल से आपूरित सकोरे में स्वयं को देखने के लिए कहा और बताया कि वही आत्मा है। दोनों सकोरों में अपना-अपना प्रतिबिंब देखकर, संतुष्ट होकर चल पड़े। प्रजापति ने सोचा कि देव हों या असुर, आत्मा का साक्षात्कार किये बिना उसका पराभव होगा। विरोचन संतुष्ट मन से असुरों के पास पहुंचे और उन्हें बताया कि आत्मा (देह) ही पूजनीय है। उसकी परिचर्या करके मनुष्य दोनों लोक प्राप्त कर लेता है।

देवताओं के पास पहुँचने से पूर्व ही इन्द्र ने सोचा कि सकोरे में आभूषण पहनकर सज्जित रूप दिखता है, खंडित देह का खंडित रूप, अंधे का अंधा रूप, फिर यह अजर-अमर आत्मा कैसे हुई? वे पुन: प्रजापति के पास पहुंचे। प्रजापति ने इन्द्र को पुन: बत्तीस वर्ष अपने पास रखा तदुपरांत बताया-'जो स्वप्न में पूजित होता हुआ विचरता है, वही आत्मा, अमृत, अभय तथा ब्रह्म हैं।' इन्द्र पुन: पुनः शंका लेकर प्रजापति की सेवा में प्रस्तुत हुए। इस प्रकार तीन बार बत्तीस-बत्तीस वर्ष तक तथा एक बार पांच वर्ष तक (कुल 101 वर्ष तक) इन्द्र को ब्रह्मचर्यवास में रखकर प्रजापति ने उन्हें आत्मा के स्वरूप का पूर्ण ज्ञान कुछ इस तरह करवाया :-

  • यह आत्मा स्वरूप स्थित होने पर अविद्याकृत देह (मरणशील) तथा इन्द्रियों एवं मन से युक्त है। सर्वात्मभाव की प्राप्ति के उपरांत वह आकाश के समान विशुद्ध हो जाता है। आत्मा के ज्ञान को प्राप्त कर मनुष्य कर्तव्य-कर्म करता हुआ अपनी आयु की समाप्ति कर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है और फिर नहीं लौटता।[51]

पौराणिक मत[संपादित करें]

पौराणिक देवमण्डल में इन्द्र का वह स्थान नहीं है जो वैदिक देवमण्डल में है। पौराणिक देवमण्डल में त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु और शिव का महत्व बढ़ जाता है। इन्द्र फिर भी देवाधिराज माना जाता है। वह देव-लोक की राजधानी अमरावती में रहता है। यहीं नन्दन वन है, पारिजात तथा कल्पवृक्ष है। सुधर्मा उसकी राजसभा तथा सहस्र मन्त्रियों का उसका मन्त्रिमण्डल है। शची अथवा इन्द्राणी पत्नी, ऐरावत हाथी (वाहन) तथा अस्त्र वज्र अथवा अशनि है। इनके घोड़े का नाम उच्चैःश्रवा है।[52] जब भी कोई मानव अपनी तपस्या से इन्द्रपद प्राप्त करना चाहता है तो इन्द्र का सिंहासन संकट में पड़ जाता है। अपने सिंहासन की रक्षा के लिए इन्द्र प्राय: तपस्वियों को अप्सराओं से मोहित कर पथभ्रष्ट करता हुआ पाया जाता है। पुराणों में इस सम्बन्ध की अनेक कथाएँ मिलती हैं। पौराणिक इन्द्र शक्तिमान, समृद्ध और विलासी राजा के रूप में चित्रित है। अनेक शक्तियों से युक्त तथा मान्य राजा होने पर भी कभी-कभी इन्हें असंयत एवं उद्धत भी दिखाया गया है, जिसके कारण इनका पतन भी होते रहा है। दुर्वासा के शाप से पतन की एक कथा आगे दी जा रही है।

दुर्वासा के शाप की कथा[संपादित करें]

एक बार दुर्वासा ऋषि ने विद्याधरी से प्राप्त सन्तानक पुष्पों की एक माला आशीर्वाद के साथ इन्द्र को दिया। इन्द्र को ऐश्वर्य का इतना मद था कि उन्होंने वह पुष्प अपने हाथी के मस्तक पर रख दिया। पुष्प के प्रभाव से हाथी उसकी सुगन्ध से आकर्षित होकर होकर उसे सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दिया। इन्द्र उसे संभालने में असमर्थ रहे। दुर्वासा ने उन्हें श्रीहीन होने का श्राप दिया। अमरावती भी अत्यंत भ्रष्ट हो चली। इन्द्र पहले बृहस्पति की और फिर ब्रह्मा की शरण में पहुंचे। समस्त देवता विष्णु के पास गये। उन्होंने लक्ष्मी को सागर-पुत्री होने की आज्ञा दी। अत: लक्ष्मी सागर में चली गयी। विष्णु ने लक्ष्मी के परित्याग की विभिन्न स्थितियों का वर्णन करके उन्हें सागर-मंथन करने का आदेश दिया। मंथन से जो अनेक रत्न निकले, उनमें लक्ष्मी भी थी। लक्ष्मी ने नारायण को वरमाला देकर प्रसन्न किया। लक्ष्मी ने देवों को त्रिलोक से अब विरहित नहीं होने का वरदान दिया।[53]

रामायण में इन्द्र[संपादित करें]

देवताओं का राजा इन्द्र कहलाता था। वाल्मीकीय रामायण में वर्णित है कि मेघगिरि नामक पर्वत् पर देवताओं ने हरित रंग के अश्व वाले पाकशासन इन्द्र को राजा के पद पर अभिषिक्त किया था।[54] रामायण में भी इन्हें वर्षा का देवता माना गया है।[55] गौतम के शाप के परिणामस्वरूप उन्हें मेषवृषण भी कहा गया है।[56] रामायण में इनका चित्रण कठोर शासक, महान् योद्धा, विश्ववन्द्य लोकपाल तथा सहानुभूतिशील देवता के साथ-साथ विलासी, ईर्ष्याशील एवं षड्यंत्री के रूप में भी हुआ है। इन्होंने त्रिशंकु को स्वर्ग में पहुँचा देखकर उसे वहाँ से उल्टा गिरा दिया।[57] इन्होंने अम्बरीष के यज्ञ-पशु का अपहरण कर लिया था।[58] अम्बरीष ने जब ऋचीक के मँझले पुत्र शुनःशेप को यज्ञ-पशु बनाया तो शुनःशेप की स्तुति से प्रसन्न होकर इन्होंने उसे बचाया तथा दीर्घायु बनाया।[59] इनके प्रति आदर भाव तथा संकट से बचाने की भावना जन-सामान्य में बरकरार है। वन-यात्रा में राम की रक्षा के लिए कौसल्या इन्द्र का भी आह्वान करती है।[60] रामायण में इनका षड्यंत्री रूप भी दिखता है। एक सत्यवादी और पवित्र तपस्वी की तपस्या में विघ्न डालने के लिए इन्होंने अपना उत्तम खड्ग धरोहर के रूप में उसे दे दिया था।[61] वैदिक इन्द्र भयभीत नहीं होते थे। रामायण में इन्द्र भी रावण के भय से काँप उठते थे।[62] मरुत्त के यज्ञ के समय रावण को उपस्थित देखकर इन्द्र मोर बन गये थे।[63] हालाँकि इनकी वीरता असंदिग्ध रही है। शची से विवाह के लिए इन्होंने शची के पिता पुलोम तथा छलपूर्वक शची को हरने वाले अनुह्लाद को भी मार डाला था।[64] रावण के स्वर्ग पर आक्रमण के समय देवसेना को विनष्ट होते देखकर इन्होंने बिना किसी घबराहट के रावण का सामना कर उसे युद्ध से विमुख कर दिया था।[65] मेघनाद माया के बल से ही इन्हें बन्दी बना पाया था।[66] राम-रावण युद्ध देखकर देव-गन्धर्व-किन्नरों ने कहा कि यह युद्ध समान नहीं है क्योंकि रावण के पास तो रथ है और राम पैदल हैं। अत: इन्द्र ने अपना रथ राम के लिए भेजा, जिसमें इन्द्र का कवच, विशाल धनुष, बाण तथा शक्ति भी थे। विनीत भाव से हाथ जोड़कर मातलि ने रामचंद्र से कहा कि वे रथादि वस्तुओं को ग्रहण करें और जैसे महान् इन्द्र दानवों का संहार करते हैं, उसी तरह रावण का वध करें।[67] युद्ध-समाप्ति के बाद राम ने मातलि को आज्ञा दी कि वह इन्द्र का रथ आदि लौटाकर ले जाय।[68]

इन्द्र-अहल्या प्रसंग[संपादित करें]

इन्द्र के प्रसंग में कुछ लोग अहल्या की पौराणिक (विशेषतः वाल्मीकीय रामायण और रामचरितमानस आदि की) कथा को मनगढ़ंत वैदिक सन्दर्भ देकर उसकी मनमानी व्याख्या करके अपनी विद्वता का अनर्थक प्रदर्शन करते हैं। वैसे लोग वैदिक सन्दर्भ के नाम पर अहल्या का अर्थ 'बिना हल चलायी हुई भूमि' (बंजर भूमि) अर्थ करते हैं। इस सन्दर्भ में अनिवार्यतः ध्यातव्य पहली बात यह है कि ऋग्वेद में 'अहल्या' या 'अहिल्या' शब्द का प्रयोग हुआ ही नहीं है।[69] ऋग्वेद ही नहीं, अन्य वैदिक संहिताग्रन्थों में भी यह शब्द नहीं है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका उल्लेख मात्र है। शतपथ ब्राह्मण (३.३.४.१८) में इन्द्र के लिए 'अहल्यायै जार' शब्द का प्रयोग हुआ है।[70] स्पष्टतः यह प्रयोग उसी कथा की ओर संकेत करता है जिसका वर्णन वाल्मीकीय रामायण आदि ग्रन्थों में है। दूसरी बात यह कि ऋग्वेद में 'हल' शब्द का भी प्रयोग नहीं हुआ है। कृषिकार्य में प्रयुक्त हल के लिए ऋग्वेद में 'लाङ्गल' शब्द का प्रयोग हुआ है।[71] हल के लिए प्रयुक्त दूसरा शब्द है 'सीरा' (डाॅ. सूर्यकान्त ने 'वैदिक कोश' में सम्भवतः 'वैदिक इण्डेक्स'[72] के प्रभाव में 'सीर' शब्द ही लिखा है,[73] परन्तु सही शब्द 'सीरा' है।)[74] अन्य संहिता ग्रन्थों तथा ब्राह्मणों में भी 'हल' का प्रयोग नहीं है।[75] वस्तुतः हल का प्रयोग वेदाङ्गों के समय में सम्भवतः आरंभ हुआ होगा और लौकिक संस्कृत में ही इसका अधिक प्रयोग हुआ है। ऐसी स्थिति में अहल्या की पूर्वोक्त व्याख्या कम-से-कम वैदिक सन्दर्भों से भिन्न अथवा दूर अवश्य है। रही प्रतीकात्मक व्याख्या की बात तो वह तो अनेकानेक पौराणिक कथाओं के लिए सम्भव है और ऐसे प्रयत्न होते भी रहे हैं। परन्तु इन्द्र तथा अहल्या की कथा को मनगढ़ंत वैदिक संस्पर्श देकर उसके कथारूप को राम का ईश्वरत्व सिद्ध करने के लिए रामकथा के कवियों की कल्पना मानना वास्तव में राम तथा ईश्वर के प्रति अपनी तथ्यहीन अश्रद्धा प्रकट करना ही है जो वस्तुतः अपनी व्यक्तिगत मान्यता की बात है; किसी ज्ञानकोशीय सामग्री के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।

कथा[संपादित करें]

वाल्मीकीय रामायण में इन्द्र-अहल्या प्रसंग की कथा दी गयी है। इन्द्र ने गौतम की धर्मपत्नी अहल्या का सतीत्व अपहरण किया था। कहानी इस प्रकार है- शचीपति इन्द्र ने आश्रम से गौतम की अनुपस्थिति जानकर और मुनि का वेष धारण कर अहल्या से कहा।। 17।। हे अति सुन्दरी! कामीजन भोगविलास के लिए ऋतुकाल की प्रतीक्षा नहीं करते, अर्थात यह बात नहीं मानते कि जब स्त्री मासिक धर्म से निवृत हों केवल तभी उनके साथ समागम करना चाहिए। अतः हे सुन्दर कमर वाली! मैं तुम्हारे साथ समागम करना चाहता हूं।। 18।। विश्वामित्र कहते हैं कि हे रघुनन्दन! वह मूर्खा मुनिवेशधारी इन्द्र को पहचान कर भी इस विचार से कि 'स्वयं देवराज इन्द्र मुझे चाहते हैं', इस प्रस्ताव से सहमत हो गयी।। 19।। तदनंतर (समागम के पश्चात्) वह संतुष्टचित्त होकर देवताओं में श्रेष्ठ इन्द्र से बोली कि हे सुरोत्तम! मैं कृतार्थ हो गयी। अब आप यहां से शीघ्र चले जाइये।। 20।। तब इन्द्र ने भी हँसते हुए कहा कि हे सुन्दर नितम्बों वाली! मैं पूर्ण सन्तुष्ट हूं। अब जहां से आया हूं, वहां चला जाऊँगा। इस प्रकार अहल्या के साथ संगम कर वह कुटिया से निकला।[76]

वाल्मीकीय रामायण में इस प्रसंग का काफी हद तक मानवीय रूप में वर्णन है। यहाँ अहल्या के पत्थर या नदी होने का उल्लेख भी नहीं है। शाप में बस यही कहा गया है कि वह लम्बे समय तक सबसे छिपकर (अदृश्य) रहेगी। वायु पीकर ही अर्थात् उपवास करती हुई रहेगी और राम के आने पर उनका आतिथ्य-सत्कार करने पर पूर्व रूप में आ जाएगी।[77] शाप की समाप्ति के बारे में भी स्पष्ट लिखा है कि राम के दर्शन से पहले उसको देख पाना किसी के लिए कठिन था (दुर्निरीक्ष्या), राम के दर्शन हो जाने पर वह सबको दिखायी देने लगी।[78] इससे पूरी तरह स्पष्ट है कि शिला(पत्थर) या नदी होने की कल्पना वाल्मीकीय रामायण से बहुत बाद की है। त्रिदेवों की श्रेष्ठता स्थापित होने तथा इन्द्र की महत्ता निरन्तर कम होने के क्रम में ही सारा दोष इन्द्र पर ही मढ़ दिया गया और अहल्या का चरित्र पावन माना गया।

कतिपय विद्वानों ने इस कथा को प्रतीकात्मक अर्थ देने का प्रयत्न किया है।[79] धार्मिक ग्रन्थों में रहस्यवादी शब्दावली का प्रयोग प्राचीनकाल से प्रचलित है उसपर वैदिक शब्दावली सोने पे सुहागा का काम करती थी अत: उपरोक्त कथन प्रतीकात्मक भी हो सकता है। विश्लेषण करने पर भिन्न-भिन्न अर्थ सामने आते हैं:-

लौकिक संस्कृत में अहल्या का एक अर्थ होता है " बिना हल चली " यानि बंजर भूमि। जैसा कि ज्ञात ही है इंद्र दूसरे देशों (असुरो के) पर आक्रमण करता था तो परिणाम स्वरूप हरी-भरी भूमि बंजर हो जाती थी (उस समय लोग कृषि पर निर्भर रहते थे और खेती ही उनका मुख्य भोजन का स्रोत भी था।) इंद्र, इस भोजन के स्रोत या जंगल के स्रोत जिससे फल, कंद-मूल आदि मिलते थे उन्हें नष्ट कर के अपने दुश्मनों को नुकसान पहुँचाता था। कालांतर में विश्वामित्र ने राम से जब कहा कि ये अहल्या है, तो हो सकता है उनका तात्पर्य हो कि ये "बिना हल चली" यानि बंजर भूमि है इसे उपजाऊ बनाओ और राम ने उस भूमि को फिर से उपजाऊ बनाया हो। दूसरा प्रसंग 'नदी' के सन्दर्भ में 'ब्रह्मपुराण (87-59)" और "आनंद रामायण (1.3.21)" के अनुसार हो सकता है। अपभ्रंश में 'सिरा '(शिला) शब्द के दो अर्थ हैं एक तो पत्थर और दूसरा सूखी नदी। जैसा कृषि के रूप में विश्लेषण किया गया है उसी तरह यह भी हो सकता है कि वस्तुत: कोई नदी होगी जो इंद्र के दुश्मन देश में जाती होगी और उसके मुख्य पानी के स्रोत को इंद्र ने सुखा दिया होगा ताकि दुश्मन देश को पानी न मिल सके और बाद में राम ने इसे जलयुक्त बनाया होगा।

इस प्रकार देखें तो अहल्या-प्रसंग प्रकृति का मानवीकरण मात्र है।

महाभारत में इन्द्र[संपादित करें]

महाभारत में इन्द्र का पौराणिक स्वरूप ही मिलता है। यहां उनका वैदिक-साहित्य में वर्णित गौरव नहीं रह गया है। इन्हें विशेषतः 'शक्र' नाम से सम्बोधित किया गया है।[80] अपना देवराज पद खो जाने का भय इन्हें बराबर सताया करता है और इससे बचने के लिए ये उचित-अनुचित प्रयत्न करते रहते हैं। विश्वामित्र के तप से भयभीत होकर मेनका नामक अप्सरा को उनका तप भंग करने भेजा।[81] शरद्वत के तप से भयभीत होकर जानपदी नामक अप्सरा को उनका तप भंग करने भेजा।[82] यवक्रीत के तप से भयभीत होकर इन्द्र ने एक ब्राह्मण का रूप धारण कर उन्हें तप से विरत किया।[83]

वाल्मीकीय रामायण में वर्णित अहल्या-प्रसंग का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। यहाँ उसे बलात्-कार्य माना गया है।[84]

ऋग्वेद में उल्लिखित इन्द्र के 'हरिश्मश्रु' होने का कथात्मक समर्थन महाभारत में भी मिलता है। यहाँ कहा गया है कि गौतम के शाप के कारण ही इन्द्र को हरिश्मश्रु (हरी दाढ़ी-मूँछों से युक्त) होना पड़ा।[85]

ये ही अर्जुन के पिता थे। वृत्रासुर के भय से सभी देवताओं ने अपनी शक्तियाँ इन्हें समर्पित कर दी थी। इसलिए अर्जुन को उनसे ही दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए कहा गया।[86] इनसे सम्बन्धित अनेक कहानियाँ महाभारत में दी गयी हैं।

इन्द्र एक 'पद' का नाम[संपादित करें]

इन्द्र वस्तुतः एक पद का नाम है। देवताओं के राजा के पद को 'इन्द्र' कहते हैं। उस पद पर बैठने वाले व्यक्ति का नाम भी इन्द्र हो जाता है। इसके संकेत तो अनेक पौराणिक कथाओं एवं विवरणों में मिलता है, परन्तु महाभारत के अनेक सन्दर्भों से यह भलीभाँति स्पष्ट हो जाता है कि यह एक पद का नाम है। जिन-जिन कथाओं में ये पद छिन जाने से भयभीत होते हैं उन कथाओं के साथ इन्द्र बनने की अन्य व्यक्तियों की कथाओं को मिलाकर देखने पर बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है। अनेक जगह 'इन्द्र' शब्द का व्यक्तिवाची प्रयोग न होकर पदवाची ('इन्द्रत्व') प्रयोग हुआ है। कुछ सन्दर्भ द्रष्टव्य हैं :-

शिव ने इन्द्र को मूर्छित कर पूर्वकाल के अन्य चार इन्द्रों के साथ एक गुफा में डाल दिया।[87] इन्द्रपद('ऐन्द्रं प्रार्थयते स्थानं') की अभिलाषा रखने वाले नरकासुर का विष्णु ने वध किया।[88] शक्र के नेतृत्व में ऋषियों, देवताओं ने(तथा स्वयं शक्र ने भी) स्कन्द से देवों का 'इन्द्र' बनने के लिए कहा।[89] ब्रह्महत्या से ग्रस्त हो जाने पर शक्र के इन्द्र-पद छोड़ देने पर नहुष 'इन्द्र' बने। बाद में नहुष का पतन होने पर विष्णु के आदेशानुसार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करके शक्र ने पुनः इन्द्र-पद प्राप्त किया।[90] इनके सिवा भी इन्द्र-पद (इन्द्रत्व) के अनेक स्पष्ट उल्लेख महाभारत में उपलब्ध हैं।[91]

श्रीविष्णुपुराण में तृतीय अंश के प्रथम एवं द्वितीय अध्याय में तथा भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध के प्रथम एवं त्रयोदश अध्याय में 14 मन्वन्तरों के अलग-अलग इन्द्रों के नाम दिये गये हैं।[92]

अवांतर कथा[संपादित करें]

महाकवि स्वयम्भू विरचित 'पउम चरिउ' महाकाव्य की अट्ठमो संधि (आठवीं संधि) में एक ऐसे व्यक्ति की कथा दी गयी है जिसने देवराज इन्द्र से प्रभावित होकर अपने नाम के साथ सब कुछ इन्द्रवत् करना चाहा था।

रथनूपुर नगर के विद्याधर राजा सहस्रार की सुनितम्बिनी पीनपयोधरा पत्नी का नाम था मानस सुन्दरी। सुरश्री से(देव-शोभा निरीक्षण के पश्चात्) उसे जो पुत्र हुआ, उसका नाम इन्द्र रखा गया। इन्द्र जब राजा बना तो सहायक विद्याधरों में से मंत्री का नाम रखा बृहस्पति, हाथी ऐरावत, इसी प्रकार पवन, कुबेर, वरुण, यम और चन्द्र तथा अपनी गायिकाओं के नाम उर्वशी, रम्भा, तिलोत्तमा आदि रखकर घोषित किया कि इन्द्र के जो-जो चिह्न हैं वे मेरे भी हैं। मैं पृथ्वी मंडल का इन्द्र हूँ। उसकी समृद्धि की बात सुनकर लंका के शासक राक्षस मालि ने अपने भाई सुमालि तथा विशाल सेना के साथ आक्रमण किया। घमासान युद्ध के पश्चात् राक्षसराज मारा गया तथा सुमालि पाताल लंका में प्रवेश कर गया। इन्द्र कुछ समय के लिए इन्द्रवत् शासन करने लगा।[93]

यह कथा पउम चरिउ की अन्य अनेक कथाओं की तरह ही संस्कृत-परम्परा से बिल्कुल भिन्न है। वाल्मीकीय रामायण में इस विद्याधर इन्द्र का उल्लेख तो नहीं ही है, मालि (माली) के वध के बारे में भी स्पष्ट लिखा है कि राक्षसों द्वारा स्वर्गलोक पर आक्रमण के समय द्वन्द्व युद्ध में विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर डाला।[94]

जैन धर्म में इन्द्र[संपादित करें]

बौद्ध धर्म में इन्द्र[संपादित करें]

अन्य सभ्यताओं में इन्द्र[संपादित करें]

कम्बोज (कम्बोडिया) में इन्द्र

बोगाजकोई शिलालेख के अनुसार मितन्नी जाति के देवताओं में वरुण, मित्र एवं नासत्यों (अश्विन्) के साथ इन्द्र का भी उल्लेख मिलता है (1400 ई.पू.)। ईरानी धर्म में इन्द्र का स्थान है, परन्तु देवतारूप में नहीं, दानवरूप में। वेरेथ्रघ्न वहाँ विजय का देवता है, जो वस्तुतः 'वृत्रघ्न' (वृत्र को मारने वाला) का ही रूपान्तर है। इसी कारण डाॅ.कीथ इन्द्र को भारत-पारसीक एकता के युग से सम्बद्ध मानते हैं।[19]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. 'पद' से संबंधित सन्दर्भों के लिए द्रष्टव्य - 'इन्द्र एक पद का नाम' शीर्षक इसी आलेख का अनुभाग।
  2. वैदिक देवशास्त्र (मैकडाॅनल रचित 'वैदिक माइथोलाॅजी') अनुवादक- डाॅ.सूर्यकान्त; मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1961, पृ.127.
  3. पूर्ववत्-पृ.38 एवं 126.
  4. ऋग्वेद-1.32.2[इस आलेख के लिए प्रयुक्त संस्करण--(क)ऋग्वेद संहिता (पदपाठ, सायण भाष्य एवं पं.रामगोविन्द त्रिवेदी कृत हिन्दी अनुवाद सहित) - चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी; संस्करण-2007 ई.; (ख)ऋग्वेदसंहिता (सायण भाष्य एवं भाष्यानुवाद सहित) - चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी; संस्करण-2013 ई.; (ग)ऋग्वेद का सुबोध भाष्य, भाग-1से4, श्रीपाद दामोदर सातवलेकर; स्वाध्याय मण्डल, किल्ला पारडी, वलसाड (गुजरात); संस्करण-भाग1एवं4-अनुल्लिखित,भाग2-2007, भाग3-2011; (घ)ऋग्वेद (दयानन्द भाष्य) भाग-1से3 - महर्षि दयानन्द सरस्वती; आर्य प्रकाशन, दिल्ली; संस्करण-2010-11 ई.
  5. पूर्ववत्-2.16.2.
  6. पूर्ववत्-2.11.17
  7. पूर्ववत्-10.23.4.
  8. पूर्ववत्-3.48.4;3.53.8;6.47.18.
  9. पूर्ववत्-3.48 एवं 4.18.
  10. पूर्ववत्-4.18.10; 10.101.12 की व्याख्या में आचार्य सायण निष्टिग्री को अदिति का पर्याय मानते हैं।
  11. ऋग्वेद में इन्द्र - सुधा रस्तोगी; चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी; संस्करण-1981 ई., पृ.55,56,एवं आगे।
  12. वैदिक देवशास्त्र (मैकडाॅनल रचित 'वैदिक माइथोलाॅजी') अनुवादक- डाॅ.सूर्यकान्त; मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1961, पृ.133.
  13. ऋग्वेद,पूर्ववत्, 6.55.5;6.59.2
  14. पूर्ववत्-10.86.11.
  15. द्रष्टव्य- पूर्ववत्-1.22.12.
  16. इसका विभिन्न रूपों में अनेक बार प्रयोग हुआ है। एकत्र रूपगत सन्दर्भों के लिए द्रष्टव्य--(क)ऋग्वेदपदानां अकारादिवर्णक्रमानुक्रमणिका - स्वामी विश्वेश्वरानन्द एवं स्वामी नित्यानन्द; निर्णयसागर प्रेस, मुम्बई; संस्करण-1908 ई., पृ.404 (ख)वैदिक पदानुक्रम कोषः (संहिता विभाग, खण्ड-6) - सं. विश्वबन्धु शास्त्री; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर; संस्करण-1962 ई., पृ.3061,2
  17. ऋग्वेद, पूर्ववत्-4.26.1;10.89.2;2.30.1.
  18. वैदिक देवशास्त्र (मैकडाॅनल रचित 'वैदिक माइथोलाॅजी') अनुवादक- डाॅ.सूर्यकान्त; मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1961, पृ.142-144.
  19. हिंदी विश्वकोश, खण्ड-1; नागरी प्रचारिणी सभा,वाराणसी; संस्करण(संशोधित-परिवर्धित)-1973ई., पृ.500.
  20. ऋग्वेद, पूर्ववत्-2.12.6.
  21. पूर्ववत्-2.12.8.
  22. ऋग्वेद, पूर्ववत्-2.12.11.
  23. डाॅ.यदुनन्दन मिश्र, 'वेद-सञ्चयनम्', चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी, संस्करण-1976, पृ.34.
  24. ऋग्वेद, पूर्ववत्-2.12.15.
  25. महाभारत, शान्तिपर्व-281,282.
  26. स्कन्ध-6, अध्याय-10-12.
  27. (क)हिन्दी निरुक्त (निघण्टु सहित) - पं.सीताराम शास्त्री; मुन्शीराम मनोहरलाल दिल्ली, संस्करण-अनुल्लिखित, पृ.-100(अध्याय-2, पाद-5, खण्ड-2).(ख)निरुक्त (भाषा भाष्य) - पं.राजाराम; बाॅम्बे मैशीन प्रेस, लाहौर; प्रथम संस्करण-1914, पृ.118 (2-16)
  28. पूर्ववत्; तथा हिन्दी निरुक्त - उमाशंकर शर्मा 'ऋषि'; चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी; संस्करण-1961, पृ.55 (2-16).
  29. वैदिक साहित्य और संस्कृति - आचार्य बलदेव उपाध्याय, शारदा संस्थान, वाराणसी; संस्करण-2006, पृ.498.
  30. वैदिक देवशास्त्र (मैकडाॅनल रचित 'वैदिक माइथोलाॅजी') अनुवादक- डाॅ.सूर्यकान्त; मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1961, पृ.326.
  31. ऋग्वेद, पूर्ववत्-1.71.1 तथा 7.82.3.
  32. पूर्ववत्-6.68.2.
  33. पूर्ववत्-4.41.11.
  34. पूर्ववत्-1.17.7.
  35. पूर्ववत्-4.41.4.
  36. पूर्ववत्-7.83.9.
  37. पूर्ववत्-7.85.3.
  38. पूर्ववत्-6.68.3.
  39. पूर्ववत्-7.82.5.
  40. पूर्ववत्-1.24.15; 1.25.21; 6.74.4; 10.85.24.
  41. पूर्ववत्-2.28.5; 5.85.7.
  42. पूर्ववत्-2.27.10; 8.42.1.
  43. पूर्ववत्-9.90.2.
  44. पूर्ववत्-8.69.12.
  45. पूर्ववत्-1.25.7.
  46. पूर्ववत्-1.161.14; 7.87.6.
  47. पूर्ववत्-1.24.9.
  48. पूर्ववत्-5.85.7,8.
  49. पूर्ववत्-1.24.11; 1.25.12.
  50. (क)ऋग्वेद में इन्द्र - सुधा रस्तोगी; चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी; संस्करण-1981 ई., पृ.182.(ख)वैदिक देवशास्त्र (मैकडाॅनल रचित 'वैदिक माइथोलाॅजी') अनुवादक- डाॅ.सूर्यकान्त; मेहरचन्द लछमनदास, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-1961, पृ.130-131.
  51. छान्दोग्योपनिषद्-अध्याय-8, खण्ड-7से15; उपनिषद्-अंक, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1998ई., पृ.455से458.तथा छान्दोग्योपनिषद् (सानुवाद शांकरभाष्य सहित), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2004ई., पृ.808से886.
  52. पौराणिक कोश, राणाप्रसाद शर्मा; ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी, संस्करण-1986, पृ.50.
  53. श्रीविष्णुपुराण-1.9.7से138.
  54. वाल्मीकीय रामायण-4.42.35; श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण(सटीक,दो खण्डों में), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996ई.
  55. वाल्मीकीय रामायण-1.9.18; श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण(सटीक,दो खण्डों में), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996ई.
  56. पूर्ववत्-1.49.10
  57. पूर्ववत्-1.60.16-18.
  58. पूर्ववत्-1.61.6.
  59. पूर्ववत्-1.62.26
  60. पूर्ववत्-2.25.9.
  61. पूर्ववत्-3.9.17,18.
  62. पूर्ववत्-3.48.7.
  63. पूर्ववत्-7.18.4,5.
  64. 4.39.6,7.
  65. पूर्ववत्-7.29.20.
  66. पूर्ववत्-7.29.28,29.
  67. पूर्ववत्-6.102.5-16.
  68. पूर्ववत्-6.112.5
  69. द्रष्टव्य--ऋग्वेदपदानां अकारादिवर्णक्रमानुक्रमणिका - स्वामी विश्वेश्वरानन्द एवं स्वामी नित्यानन्द; निर्णयसागर प्रेस, मुम्बई; संस्करण-1908 ई.
  70. 15.शतपथ ब्राह्मण (प्रथम भाग) - सं. स्वामी सत्यप्रकाश सरस्वती, अनुवादक- पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय; विजयकुमार गोविन्दराम हासानन्द, दिल्ली; संस्करण-2010 ई. पृ.390-391.
  71. द्रष्टव्य-ऋग्वेद, पूर्ववत्-4.57.4.
  72. वैदिक इण्डेक्स - ए.ए. मैकडौनेल एवं ए.बी. कीथ (हिन्दी अनुवाद - रामकुमार राय); चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी; संस्करण-1962 ई। खण्ड-2,पृ.498.
  73. वैदिक कोश - डाॅ. सूर्यकान्त; चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी; संस्करण-2012 ई. पृ.558.
  74. पूर्ववत् ऋ.10.101.3,4.
  75. (क)वैदिक पदानुक्रम कोषः (संहिता विभाग, खण्ड-6) - सं. विश्वबन्धु शास्त्री; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर; संस्करण-1963 ई.(ख)वैदिक पदानुक्रम कोषः (ब्राह्मण-आरण्यक विभाग, खण्ड-1 एवं 2) - सं. विश्वबन्धु शास्त्री; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लवपुर; संस्करण-1935 ई.,1933 ई.(ग) वैदिक पदानुक्रम कोषः (उपनिषद् विभाग, खण्ड-1,2) - सं. विश्वबन्धु शास्त्री; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, लाहौर; संस्करण-1945 ई.(घ)चतुर्वेद वैयाकरण पद-सूची, खण्ड-1,2) - सं. विश्वबन्धु शास्त्री; विश्वेश्वरानन्द वैदिक शोध संस्थान, होशियारपुर; संस्करण-1960,1963 ई.
  76. वा.रा.1.48.17-22। वाल्मीकीय रामायण(सटीक), प्रथम खण्ड, गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-1996ई., पृ.125,126.
  77. पूर्ववत्-1.48.29-32.
  78. पूर्ववत्-1.49.16.
  79. हिंदी विश्वकोश,खण्ड-1, नागरी प्रचारिणी सभा,वाराणसी, संस्करण-1973, पृ.318.
  80. 'शक्र' नाम के अनेकानेक सन्दर्भों के लिए द्रष्टव्य-- महाभारत-कोश, खण्ड-1, रामकुमार राय; चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस,वाराणसी; संस्करण-1964ई.,पृ.124 से 127.
  81. महाभारत-1.71.20से42.(गीताप्रेस गोरखपुर, खण्ड-1से6., सटीक संस्करण-1996ई.) खण्ड-1, पृ.209 से 211.
  82. महाभारत, पूर्ववत्-1.129.5
  83. पूर्ववत्-3.135.17 एवं आगे।
  84. पूर्ववत्-5.12.6; 12.342.23.
  85. पूर्ववत्-12.342.23.
  86. पूर्ववत्-3.37.14,49.
  87. पूर्ववत्-1.196.16-20.
  88. पूर्ववत्-3.142.17,18.
  89. पूर्ववत्-3.229.7,12,13,15.
  90. पूर्ववत्-12.342.25-52.
  91. महाभारत-कोश, रामकुमार राय; चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस,वाराणसी; खण्ड-1, संस्करण-1964, पृ.116-117.
  92. (क)श्रीविष्णुपुराण (सटीक), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2001ई., पृ.163से169.(ख)श्रोमद्भागवत महापुराण (सटीक, दो खण्डों में), गीताप्रेस गोरखपुर, संस्करण-2001ई., प्रथम खण्ड,पृ.757-760 एवं 815-817.
  93. पउम चरिउ (सटीक), भाग-1, सं.डाॅ.एच.सी.भायाणी, अनुवादक- डाॅ.देवेन्द्र कुमार जैन; भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, तृतीय संस्करण-1975ई., पृ.130से142.
  94. वाल्मीकीय रामायण, पूर्ववत्-7.7.31-43.