राजपूत

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राजपूत

Rajpoots 2.png

इलस्ट्रेटेड लंदन समाचार से, 1876 राजस्थान के राजपूतों का उत्कीर्णन
धर्म हिन्दू
भाषा हिन्द-आर्य भाषाएँ
वासित राज्य भारतीय उपमहाद्वीप, मुख्यतः उत्तर भारत, सौराष्ट्र (गुजरात)

राजपूत (संस्कृत के "राजपुत्र" से) भारतीय उपमहाद्वीप का एक जातीय समूह है जिसमें कई जातियाँ, उपजातियाँ और कुल सम्मिलित हैं। राजस्थान को ब्रिटिशकाल में राजपुताना भी कहा गया है। भारतीय इतिहास के विवरणों में हर्षवर्धन के उपरान्त के कालखण्ड, सातवीं से बारहवीं शताब्दी के दौर को "राजपूत युग" कहा जाता है। इस काल के महत्त्वपूर्ण राजपूत वंशों में चौहान वंश, परमार वंश एवं गुर्जर-प्रतिहार वंश आते हैं। राजपूत लोग भारत के उत्तरी, पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भागों में पाए जाते हैं; इनका विस्तार राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, जम्मू, कश्मीर, उत्तराखण्ड, बिहार, और मध्य प्रदेश में है।

Cultivators, Russia Rajpoots, Hindoos, Dehra Dhoon (NYPL b13409080-1125407).jpg
Bihari Rajput villagers watching Mallah fishermen.jpg

राजपूतों की उत्पत्ति

हर्षवर्धन के उपरान्त भारत में कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जिसने भारत के वृहद भाग पर एकछत्र राज्य किया हो। इस युग में भारत अनेक छोटे बड़े राज्यों में विभाजित हो गया जो आपस मे लड़ते रहते थे। इनके राजा 'राजपूत' कहलाते थे तथा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के इस युग को 'राजपूत युग' कहा गया है।[1] राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।

विदेशी उत्पत्ति

विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्त्वपूर्ण स्थान कर्नल जेम्स टॉड का है। इनके अनुसार राजपूत वह विदेशी जातियाँ है जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था। वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते हैं।[2] तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है। उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन, वेश-भूषा की समानता, मांसाहार का प्रचलन, रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना, याज्ञिक अनुष्ठानों का प्रचलन, अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे।[3]

विलियम क्रुक ने 'कर्नल जेम्स टॉड' के मत का समर्थन किया है। 'वी.ए. स्मिथ' के अनुसार शक तथा कुषाण जैसी विदेशी जातियां भारत आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई। भारतीय इतिहासकारों में 'ईश्वरी प्रसाद' एवं 'डी.आर. भंडारकर' ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर तथा कनिंघम के अनुसार राजपूत विदेशी थे।[4]

स्थानीय उत्पत्ति

इसे मानने वाले राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से उत्पन्न बताते हैं। यह अनुश्रति पृथ्वीराजरासो (चंदरबरदाई कृत) के वर्णन पर आधारित है। चंदबरदाई लिखते हैं कि परशुराम द्वारा क्षत्रियों के सम्पूर्ण विनाश के बाद ब्राह्मणों ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया व यज्ञ कि अग्नि से चौहान, परमार, गुर्जर प्रतिहारसोलंकी राजपूत वंश उत्पन्न हुए।[5] पृथ्वीराजरासो के अतिरिक्त 'नवसाहसांक' चरित, 'हम्मीररासो', 'वंश भास्कर' एवं 'सिसाणा' अभिलेख में भी इस अनुश्रति का वर्णन मिलता है। कथा का संक्षिप्त रूप इस प्रकार है- 'जब पृथ्वी दैत्यों के आतंक से आक्रान्त हो गयी, तब महर्षि वशिष्ठ ने दैत्यों के विनाश के लिए आबू पर्वत पर एक अग्निकुण्ड का निर्माण कर यज्ञ किया। इस यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार, परमार, चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई। भारत में अन्य राजपूत वंश इन्हीं की सन्तान हैं। दशरथ शर्मा, डॉ. गौरी शंकर ओझा एवं चिन्तामण विनायक वैद्य इस कथा को मात्र काल्पनिक मानते हैं।[6]

स्थानीय उत्पत्ति के समर्थक राजतरंगिणी का उद्धरण भी देते हैं जिसमें 36 क्षत्रिय कुलों का वर्णन मिलता है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

मिश्रित उत्पत्ति

कुछ इतिहासकार विदेशियों के हिंदू समाज में विलय हेतु यज्ञ द्वारा शुद्धिकरण की पारम्परिक घटना के रूप मे देखते हैं।[7]

सोलहवीं सदी के, फ़ारसी भाषा में तारीख़-ए-फ़िरिश्ता नाम से भारत का इतिहास लिखने वाले इतिहासकार, मोहम्मद क़ासिम फ़िरिश्ता ने राजपूतों की उत्पत्ति के बारे में कहा है कि:-

जब राजा, उनकी विवाहित पत्नियों से संतुष्ट नहीं होते थे, अक्सर उनकी महिला दासियो द्वारा बच्चे पैदा करते थे, जो सिंहासन के लिए वैध रूप से जायज़ उत्तराधिकारी तो नहीं होते थे, लेकिन राजपूत या राजाओं के पुत्र कहलाते थे।[8][9]

सबसे प्रशंसनीय सिद्धांत

हाल के शोध से पता चलता है कि राजपूत विभिन्न जातीय और भौगोलिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ शूद्रों सहित वर्णों से आए थे। .[10] मूल शब्द "राजपुत्र" (शाब्दिक रूप से "एक राजा का पुत्र") पहली बार 11 वीं शताब्दी के संस्कृत शिलालेखों में शाही अधिकारियों के पदनाम के रूप में दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार, यह एक राजा के तत्काल रिश्तेदारों के लिए आरक्षित था; अन्य लोगों का मानना ​​है कि इसका उपयोग उच्च श्रेणी के पुरुषों के एक बड़े समूह द्वारा किया गया था। व्युत्पन्न शब्द "राजपूत" का अर्थ 15 वीं शताब्दी से पहले 'घुड़सवार', 'टुकड़ी', 'एक गांव का मुखिया' या 'अधीनस्थ प्रमुख' था। जिन व्यक्तियों के साथ 15 वीं शताब्दी से पहले "राजपूत" शब्द जुड़ा हुआ था, उन्हें वर्ण-जाति ("मिश्रित जाति का मूल") और क्षत्रिय से हीन माना जाता था। समय के साथ, "राजपूत" शब्द एक वंशानुगत राजनीतिक स्थिति को निरूपित करने के लिए आया था, जो जरूरी नहीं कि बहुत उच्च था: यह पद रैंक-धारकों की एक विस्तृत श्रृंखला को निरूपित कर सकता है, जो राजा के वास्तविक पुत्र से लेकर सबसे कम-भूमि वाले भू-स्वामी तक होता है।[11][12][13][14]

अत:, राजपूत पहचान एक साझा वंश का परिणाम नहीं है। बल्कि, यह तब सामने आया जब मध्ययुगीन भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों ने क्षत्रिय स्थिति का दावा करके अपनी नई अधिग्रहीत राजनीतिक शक्ति को वैध बनाने की मांग की। इन समूहों ने अलग-अलग समय पर, अलग-अलग तरीकों से राजपूत के रूप में पहचान शुरू की। इस प्रकार, आधुनिक विद्वानों ने संक्षेप में कहा कि राजपूत आठवीं शताब्दी के बाद से "एक खुली स्थिति का समूह" थे, ज्यादातर अनपढ़ योद्धा जो प्राचीन भारतीय क्षत्रियों के पुनर्जन्म का दावा करते थे - एक ऐसा दावा जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं था। [15][16]

राजपूत राज्य एवं कबीले

Niltoo, Hill porter, Rajpoot, Dehra Dhoon (NYPL b13409080-1125408).jpg

नीचे भारतीय उपमहाद्वीप की कुछ राजपूत वंशों के नाम और उनका प्राप्ति-क्षेत्र दिया गया है।


इन्हें भी देखें

सन्दर्भ

  1. वेदलंकार, हरिदत्त (2009). भारतीय संकृति का संक्षिप्त इतिहास. ए॰ आर॰ एस॰ पब्लिशर्स ए॰ डिस॰. पृ॰ 87. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 8183460054. मूल से 5 मार्च 2016 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 जनवरी 2016.
  2. Alf Hiltebeitel 1999, pp. 439–440.
  3. Tod, James (1832). Annals and Antiquities of Rajasthan or the Central and Western Rajpoot States of India, Volume 2. Archived 28 अप्रैल 2019 at the वेबैक मशीन. London: Smith, Elder.
  4. Alf Hiltebeitel 1999, pp. 439–440.
  5. Barbara N. Ramusack 2004, p. 13.
  6. Bhartiya Sanskriti Ka Sankshipt Itihas Archived 9 जुलाई 2017 at the वेबैक मशीन. (पृष्ठ ८७)
  7. Singh, Upinder (2008). A History of Ancient and Early Medieval India: From the Stone Age to the 12th Century. New Delhi: Pearson Education. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-317-1677-9.
  8. "History of the rise of the Mahomedan power in India, till the year A.D. 1612: to which is added an account of the conquest, by the kings of Hydrabad, of those parts of the Madras provinces denominated the Ceded districts and northern Circars : with copious notes, Volume 1". Spottiswoode, 1829. पृ॰ xiv. अभिगमन तिथि 29 Sep 2009.
  9. Mahomed Kasim Ferishta (2013). History of the Rise of the Mahomedan Power in India, Till the Year AD 1612. Briggs, John द्वारा अनूदित. Cambridge University Press. पपृ॰ 64–. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-1-108-05554-3.
  10. Satish Chandra (2008). Social Change and Development in Medieval Indian History. Har-Anand Publications. पृ॰ 44. Modern historians are more or less agreed that the Rajputs consisted of miscellaneous groups including shudras and tribals
  11. Satish Chandra 1982, पृ॰ 92.
  12. Norman Ziegler 1976, पृ॰ 141:...individuals or groups with which the word was associated were generally considered to owe their origin to miscegenation or varna-samkara("the mixing of castes") and were thus inferior in rank to Ksatriyas.[...]What I perceive from the above data is a rather widespread change in the subjective perception and the attribution of rank to groups and individuals who emerged in Rajasthan and North India as local chiefs and rulers in the period after the muslim invasions(extending roughly from the thirteenth to the fifteenth centuries). These groups were no longer considered kshatriyas and though they filled roles previously held by kshatriyas and were attributed similar functions of sustaining society and upholding the moral order, they were either groups whose original integrity were seen to have been altered or who had emerged from the lower ranks of the caste system. This change is supported by material from the Rajput chronicles themselves...
  13. Parita Mukta (1994). Upholding the Common Life: The Community of Mirabai. Oxford University Press. पृ॰ 51. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-563115-9. The term 'Rajput' before the fifteenth century meant 'horse soldier', 'trooper', 'headman of a village' or 'subordinate chief'. Moreover, individuals with whom the word was associated were generally considered to be products of varna-samkara of mixed caste origin, and thus inferior in rank to Kshatriyas.
  14. Burton Stein (2004). David N. Lorenzen (संपा॰). Religious Movements in South Asia, 600–1800. Oxford University Press. पृ॰ 82. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-19-566448-5. When the rank of persons was in theory rigorously ascribed according to the purity of the birth-group, the political units of India were probably ruled most often by men of very low birth. This generalization applies to south indian warriors and may be equally applicable for many clans of Rajputs in northern India. The capacity of both ancient and medieval Indian society to ascribe to its actual rulers, frequently men of low social origins, a "clean" or "Kshatriya" rank may afford one of the explanations for the durability and longevity of the unique civilization of India.
  15. André Wink (2002). Al-Hind, the Making of the Indo-Islamic World: Early Medieval India and the Expansion of Islam 7Th-11th Centuries. BRILL. पृ॰ 282. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-391-04173-8. In short, a process of development occurred which after several centuries culminated in the formation of new groups with the identity of 'Rajputs'. The predecessors of the Rajputs, from about the eighth century, rose to politico-military prominence as an open status group or estate of largely illiterate warriors who wished to consider themselves as the reincarnates of the ancient Indian Kshatriyas. The claim of Kshatriyas was, of course, historically completely unfounded. The Rajputs as well as other autochthonous Indian gentry groups who claimed Kshatriya status by way of putative Rajput descent, differed widely from the classical varna of Kshatriyas which, as depicted in literature, was made of aristocratic, urbanite and educated clans...
  16. Norman Ziegler 1976, पृ॰ 150: Rajputs were, with some exceptions, almost totally illiterate as a caste group
  17. John F. Richards (1995). The Mughal Empire. Cambridge University Press. पृ॰ 275. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-56603-2. मूल से 11 मार्च 2020 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 5 अप्रैल 2020.
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  21. McLeod, John (1999). Sovereignty, Power, Control: Politics in the States of Western India, 1916-1947 (अंग्रेज़ी में). BRILL. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789004113435.
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