सिसोदिया (राजपूत)

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सिसोदिया राजपूतों की कुलदेवी (बाणमाता)

सिसोदिया भारतीय राजपूत जाती में पाए जानेवाला एक गोत्र है, जिसका राजस्थान के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। सिसोदिया शब्द की उत्पत्ति शिसोदा गांव से हुई , तत्कालीन समय में राव रोहितास्व भील को पराजित कर करणसिंह ने आधिपत्य कर लिया और उसी गांव के आधार पर सिसोदिया शब्द प्रचलन में आया [1]

सिसोदिया राजपूत सूर्यवंशी होने का दावा करते हैं।[2]

सिसोदिया मेवाड़ के शासक थे , सिसोदिया और भील दोनों जातियों के संबंध अच्छे रहे है , जब भी कोई राजा गद्धी पर बैठता तो उसका राजतिलक भील प्रमुख द्वारा किया जाता था , दर्शाल भील राजस्थान के प्राचीन शासकों में से एक थे , दर्शल इस प्रथा के पीछे राजपूत और भील में एकता बनाए रखना था । मेवाड़ चिन्ह में एक तरफ महाराणा प्रताप और एक तरफ राणा पूंजा यानी राजपूत और भील का प्रतीक चिन्ह अपनाया गया [3]

सिसोदिया वर्णसंकर के अनुसार, जब दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खलजी ने 1303 में चित्तौड़गढ़ पर हमला किया, तो सिसोदिया पुरुषों ने शक (मौत से लड़ने) का प्रदर्शन किया, जबकि उनकी महिलाओं ने शत्रु बंदी बनने से पहले जौहर (आत्मदाह) किया। बांकली में भी इस वंश के वंशज आज भी शान से रहते हैं.[4]

मेवाड़ के राजपूत राजवंश
(1326–1884)
राणा हम्मीर सिंह (1326–1364)
राणा क्षेत्र सिंह (1364–1382)
राणा लखा (1382–1421)
राणा मोकल (1421–1433)
राणा कुम्भ (1433–1468)
उदयसिंह प्रथम (1468–1473)
राणा रायमल (1473–1508)
राणा सांगा (1508–1527)
रतन सिंह द्वितीय (1528–1531)
राणा विक्रमादित्य सिंह (1531–1536)
बनवीर सिंह (1536–1540)
उदयसिंह द्वितीय (1540–1572)
महाराणा प्रताप (1572–1597)
अमर सिंह प्रथम (1597–1620)
करण सिंह द्वितीय (1620–1628)
जगत सिंह प्रथम (1628–1652)
राज सिंह प्रथम (1652–1680)
जय सिंह (1680–1698)
अमर सिंह द्वितीय (1698–1710)
संग्राम सिंह द्वितीय (1710–1734)
जगत सिंह द्वितीय (1734–1751)
प्रताप सिंह द्वितीय (1751–1754)
राज सिंह द्वितीय (1754–1762)
अरी सिंह द्वितीय (1762–1772)
हम्मीर सिंह द्वितीय (1772–1778)
भीम सिंह (1778–1828)
जवान सिंह (1828–1838)
सरदार सिंह (1838–1842)
स्वरूप सिंह (1842–1861)
शम्भू सिंह (1861–1874)
उदयपुर के सज्जन सिंह (1874–1884)
फतेह सिंह (1884–1930)
भूपाल सिंह (1930–1947)
भगवंत सिंह (1947-1970)
महेन्द्र सिंह (1970-

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संदर्भ[संपादित करें]

  1. साँचा:Https://www.google.com/url?sa=t&source=web&rct=j&url=http://jaibherunathbawaji.weebly.com/-231123402367236123662360.html&ved=2ahUKEwirx6PnqPbqAhXa4XMBHY3ECdUQFjAHegQIBRAB&usg=AOvVaw2HNQs9nVBkrzgZ3JpmBJHo
  2. Williams, Joanna; Tsuruta, Kaz; Culture, Asian Art Museum--Chong-Moon Lee Center for Asian Art and (2007-01-10). Kingdom of the sun: Indian court and village art from the Princely State of Mewar (अंग्रेज़ी में). Asian Art Museum - Chong-Moon Lee Center for Asian Art and Culture. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-939117-39-0. मूल से 11 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 15 मई 2020.
  3. {{https://books.google.co.in/books?id=F2w-fta-2qgC&q=%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%B2&dq=%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE+%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%B2&hl=hi&sa=X&ved=0ahUKEwiukJrj44HrAhXglEsFHaoZBToQ6AEINjAC}}
  4. Bose, Melia Belli (2015-08-27). Royal Umbrellas of Stone: Memory, Politics, and Public Identity in Rajput Funerary Art (अंग्रेज़ी में). BRILL. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-90-04-30056-9.