झाला

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झाला (अंग्रेजी: Jhala,Zala) भारतवर्ष में हिन्दू धर्म को मानने वाली क्षत्रिय वर्ण की राजपूत जाति है, जो मुख्य रूप से गुजरात और राजस्थान में निवास करते है ।

झाला (मखवान) वंश का इतिहास :-

एसा माना जाता है की ब्रह्माजी के चार पुत्र थे भृगु,अंगीरा,मरीचि,अत्री।भृगु ऋषि के पुत्र विधाता हुए,विधाता के पुत्र मृकुंड हुए और मृकुंड के पुत्र मार्कंडेय हुए। उस समय बद्रिनारायण के क्षेत्र में अनेक ऋषि के आश्रम हुवा करते थे। ऋषि के यज्ञ को भंग करने वाले राक्षसों का आतंक खूब बढ़ गया था,राक्षसों के संहार करने के लिए मार्कंडेय ऋषि ने अपने यज्ञ बल से एक वीर पुरुष उत्पन्न किया। उस वीर पुरुष का नाम कुंडमाल दिया।जो फिर मखवान शाखा के महावीर प्रसिद्ध हुए "मख"यानी यज्ञ का कुंड "मखवान" यानी यज्ञ से उत्पन हुवा परुष। उस समय चंड और चंडाक्ष नाम के दो राक्षस को देवी वरदान प्राप्त थे की 'वो दोनों ही एक दूसरे को मार सकते थे'।कुंडमालजी ने भी भगवान शिवजी की तपस्या कर अनेक देवी शस्त्र प्राप्त किये और अनेक राक्षसों का वध किया। कुंडमाल जी ने उस देवी शास्त्र का प्रयोग चंड और चंडाक्ष के विरुद्ध किया जिस से एक मोहिनी उत्पन हुई और उस मोहिनी को पाने की लालच में दोनों रक्षसो के बिच लड़ाई हो गई और दोनों ने एक दुसरे को मार डाला । कुंडमालजी ने उस क्षेत्र में चमत्कारपुर नामक राज्य की स्थापना की और उनकी तिन पीढियो ने वह शासन किया। फिर राजा कुंत ने हिमालय की तलेटी में कुंतलपुर नामक राज्य की स्थापना की। राजा कुंत के ३३२ वे वंशज राजा अमृतसेन जी हुए राजा अमृतसेन जी के पांच पुत्र थे। चाचकदेवजी,वाचकदेवजी,शिवराजजी,वत्सराज, जो यादवो के भांजे थे और पांचवे पुत्र मालदेवजी हस्तिनापुर के भांजे थे । एक बार वो पांचो भाई शेर के शिकार के लिए गए वहा उन पांचोके बिच लड़ाई हो गई और मालदेवजी वहा से रूठ कर हस्तिनापुर चले गए और वहा से सेना लाके चाचकदेव जी पे आक्रमण कर दिया चाचकदेव जी युद्ध में हार गए और वहा से निकल कर फतेहपुरशिक्री चले गए वहा अपनी राजसत्ता की स्थापना की। उनके ७२ वे वंशज शिक्री की सत्ता पे आये उन्होंने सिंध के किर्तिगढ़ राज्य को जित लिया और वहा प्रजा की सुखकारी के लिए अनेक कार्य किये।

'मकवाणा' से "झाला" नामकरण

उनके ५० साल बाद श्री केशरदेवजी विक्रमसवंत ११०५ में किर्तिगढ़ की सत्ता पे आए। केशरदेवजी हमीरसुमरा के विरुद्ध हुए युद्ध में अपने ७ पुत्र के साथ शहीद हुए।उनके आठवे पुत्र हरपाल देवजी वहा से गुजरात की और निकल गए।उस समय गुजरात में करणदेव सोलंकी का शासन था। करणदेव के कुटुंब के प्रतापसिंह सोलंकी की पुत्री शक्तिदेवी से हरपालदेवजी का विवाह हुवा। वहा पाटन के आसपास में बाबरभूत नामके मायावी डाकू का आतंक था। हरपालदेवजी ने लोगो को बाबराभूत के आतंक से छुड़ाया।हरपालदेवजी ने अपने बाहुबल से बाबरा भूत को अपने वश में किया,हरपालदेवजी के इस कार्य से राजा करणदेवजी प्रसन्न हो गए और हरपालदेवजी को वचन दिया की एक रात में वो जितने गाव को तोरण बांधेगे उतने गाव उनको दे दिई जाएंगे। हरपालदेव,शक्तिमाता और बाबराभुत ने मिलके २३०० गॉव को तोरण बांधे।पहला तोरण पाटडी गाव को बंधा,टूवा में विश्राम किया और आखरी तोरण दिघडीया गाव को बाँधा और सुबह हो गइ। इस तरह हरपालदेवजी,शक्ति माता और बाबर भुत ने मिलके २३०० गॉव को तोरण बांधे जिन में से ५०० गॉव रानी कफुलंदा को दे दिए और इस तरह विक्रमसावंत ११५६ में १८०० गॉव वाले विशाल साम्राज्य की स्थापना की। अपनी राजधानी पाटडी रखी।हरपालदेवजी और शक्तीमा के तिन पुत्र हुए सोढाजी,मंगुजी,शेखाराजी,और एक पुत्री हुई उमादेवि।

  • थोड़े दिन बाद जब शक्ति माता के तीनो कुंवर और एक चारण का बालक जब खेल रहे थे तब गजशाला से एक भड़का हुवा हाथी उनकी और दोडा आ रहथा,तभी इ सब शक्ति माता ने देखा और महल के जरुखे उन तीनो राजकुमारों को हठ से उठा कर अपने पास ले लिया और उस चारण के बालक को टापरी मार कर एक ओर करदिया। इस घटना के बाद हरपालदेवजी के वशज झाला कहला ने लगे और उस चारण के वंशज टपरिया चरण कहला ने लगे
                               इस घटना से शक्तिदेवी का दैवी स्वरुप सब के सामने उजागर हुवा उनके वचन के अनुसार अगर कोई उनकी वास्तविकता जान लेगा तो वो समाधी ले लेंगी इस लिए उन्हों ने पाटडी से थोड़ी दूर धामा में समाधी ले ली,धामा में आज भी चेत्र वद तेरस के दिन हवन और पूजा होती है