कटोच

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कटोच, चन्द्रवंशी क्षत्रिय हैं। उनका मूल निवास त्रिगर्त राज्य था जिसका वर्णन महाभारत में मिलता है।

परिचय[संपादित करें]

सेपेल ग्रिफिन के अनुसार कटोच राजपूत वंश विश्व का सबसे पुराना राजवंश है। कटोच चंद्रवंशी क्षत्रिय माने जाते है। कटोच वंश महाभारत काल से भी पहले से उत्तर भारत के हिमाचल व पंजाब क्षेत्र में राज कर रहा है। महाभारत काल में कटोच राज्य को त्रिगर्त राज्य के नाम से जाना जाता था और आज के कटोच, त्रिगर्त राजवंश के ही उत्तराधिकारी हैं। कल्हण की राजतरंगिणी में त्रिगर्त राज्य का उल्लेख है। कल्हण के अनुसार कटोच वंश के राजा इन्दुचंद की दो राजकुमारियों का विवाह कश्मीर के राजा अनन्तदेव (१०३०-१०४०) के साथ हुआ था।

गोत्र - अत्रि
ऋषि - कश्यप
देवी - ज्वालामुखी देवी
वंश - चन्द्रवंश, भूमिवंश
गद्दी एवं राज्य - मुल्तान, जालन्धर, नगरकोट, कांगड़ा, गुलेर, जसवान, सीबा, दातारपुर, लम्बा आदि
शाखाएँ - जसवाल, गुलेरिया, सबैया, डढवाल, धलोच आदि
उपाधि - मिया
वर्तमान निवास - हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, पंजाब आदि

पृथ्वीराज रासो में इस वंश का नाम कारटपाल मिलता है। अबुल फजल ने भी नगरकोट राज्य, कांगड़ा दुर्ग एवं ज्वालामुखी मन्दिर का जिक्र किया है। यूरोपियन यात्री विलियम फिंच ने 1611 में अपनी यात्रा में कांगड़ा का जिक्र किया था। डा व्युलर लिखता है की कांगड़ा राज्य का एक नाम सुशर्मापुर था जो कटोच वंश को प्राचीन त्रिगर्त वंश के शासक सुशर्माचन्द का वंशज सिद्ध करता है। त्रिगर्त राज्य की सीमाएँ एक समय पूर्वी पाकिस्तान से लेकर उत्तर में लद्दाख तथा पूरे हिमाचल प्रदेश में फैलि हुईं थीं। त्रिगर्त राज्य का जिक्र रामायण एवं महाभारत में भी भली भांति मिलता है। कटोच राजा सुशर्माचन्द्र ने दुर्योधन का साथ देते हुए पांडवों के विरुद्ध युद्ध लड़ा था। सुशर्माचन्द्र का अर्जुन से युद्ध का जिक्र भी महाभारत में मिलता है। त्रिगर्त राज्य की मत्स्य और विराट राज्य के साथ शत्रुता का जिक्र महाभारत में उल्लेखित है।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]