ग्वालियर

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ग्वालियर
—  नगर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य मध्य प्रदेश
महापौर vivek narayan shajwalkar
नगर पालिका अध्यक्ष
जनसंख्या
घनत्व
2,030,543 (2011 तक )
• 445 /कि.मी. (1,153 /वर्ग मी.)
क्षेत्रफल 5,214 कि.मी²
आधिकारिक जालस्थल: www.gwalior.nic.in/

निर्देशांक: 26°08′N 78°06′E / 26.14°N 78.10°E / 26.14; 78.10

ग्वालियर भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त का एक प्रमुख शहर है। भौगोलिक दृष्टि से ग्वालियर म.प्र. राज्य के उत्तर में स्थित है। यह शहर और इसका क़िला उत्तर भारत के प्राचीन शहरोँ के केन्द्र रहे हैँ। यह शहर गुर्जर प्रतिहार, तोमर तथा कछवाहा राजवंशो की राजधानी रहा है। इस शहर में इनके द्वारा छोड़े गये प्राचीन चिन्ह स्मारकों, किलों, महलों के रूप में मिल जाएंगे। सहेज कर रखे गए अतीत के भव्य स्मृति चिन्ह इस शहर को पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाते हैं। ग्वालियर शहर के इस नाम के पीछे भी एक इतिहास छिपा है; आठवीं शताब्दि में एक राजा हुए सूरजसेन, एकबार वे एक अज्ञात बीमारी से ग्रस्त हो मृत्युशैया पर थे, तब ग्वालिपा नामक संत ने उन्हें ठीक कर जीवनदान दिया। बस उन्हीं के सम्मान में इस शहर की नींव पडी और इसे नाम दिया ग्वालियर।

इसके बाद आने वाली शताब्दियों में यह शहर बडे-बडे राजवंशो की राजस्थली बना। हर सदी के साथ इस शहर के इतिहास को नये आयाम मिले। महान योध्दाओं, राजाओं, कवियों संगीतकारों तथा सन्तों ने इस राजधानी को देशव्यापी पहचान देने में अपना-अपना योगदान दिया। आज ग्वालियर एक आधुनिक शहर है और एक जाना-माना औद्योगिक केन्द्र है।


अंकेश भार्गव के द्वारा संक्षिप्त में ग्वालियर का इतिहास :- १ ) मोरार : पहले यह मिलिट्री एरिया हुआ करता था। जिसे मिलिट्री ऑफिसर्स रेजिडेंशियल एरिया रिजर्व्ड (morar) कहा जाता था इतना लम्बा नाम न बोल पाने के कारन इसका नाम मोरार पड़ा।


२ ) थाटीपुर : रियासत काल में यहाँ सेना के सरकारी क्वार्टर थे। का नाम थर्टी फोर लांसर था। आज़ादी के बाद यह क्वार्टर म प्र शासन के अधीन आ गए , जिसे थर्टी फोर की जगह थाटीपुर कहा गया।


३ ) सहस्त्रबाहु या सासबहू : ग्वालियर दुर्ग पर इस मंदिर के बारे में मान्यता है की यह सहत्रबाहु अर्थात हजार भुजाओं वाले भगवन विष्णु को समर्पित है। बाद में धीरे-२ सासबहू का मंदिर कहा जाने लगा।


४ ) गोरखी : पुराने रजिस्ट्रार ऑफिस से गजराराजा स्कूल तक सिंधियावंश ने रहने का स्थान बनाया था। यही उनकी कुल देवी गोराक्षी का मंदिर बनाया गया। बाद में यह गोरखी बन गई।


५ ) पिछड़ी ड्योढ़ी : स्टेट टाइम में महल बनने से पहले सफ़ेद झंडा गाड़ा जाता था। जब महल बना तो इसके पीछे की ड्योढ़ी और बाद में पिछड़ी ड्योढ़ी कहलाने लगी।


६ ) तेली का मंदिर : ८ वी शताब्दी में प्रतिहार राजा के सेनापति तेल्प ने दुर्ग पर दक्षिण और उत्तर भारतीय शैली का मंदिर बनवाया था , जिसे तेल्प का मंदिर कहा जाता था। इसे तेली का मंदिर कहा जाता है।


७ ) पान पत्ते की गोठ : पूना की मराठा सेना जब पानीपत युद्ध से पराजित होकर लौट रही थी , तब उसने यहीं अपना डेरा डाल लिया। पहले इसे पानीपत की गोठ कहा जाता था। बाद में यह पान पत्ते की गोठ हो गई।


८ ) डफरिन सराय : १८ वी शतदि में यहां कचहरी लगाई जाती थी। यहां ग्वालियर अंचल के करीब ८०० लोगों को लार्ड डफरिन ने फांसी की सजा सुनाई थी। इसी के चलते डफरिन सराय कहा जाता है।

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पर्यटन स्थल[संपादित करें]

ग्वालियर के किले का सिंहद्वार

सूरज सिंह क़िला

सेन्ड स्टोन से बना यह किला शहर की हर दिशा से दिखाई देता और शहर का प्रमुखतम स्मारक है। एक उँचे पठार पर बने इस किले तक पहुंचने के लिये एक बेहद ऊंची चढाई वाली पतली सडक़ से होकर जाना होता है। इस सडक़ के आसपास की बडी-बडी चट्टानों पर जैन तीर्थकंरों की विशाल मूर्तियां बेहद खूबसूरती से और बारीकी से गढी ग़ई हैं। किले की तीन सौ फीट उंचाई इस किले के अविजित होने की गवाह है। इस किले के भीतरी हिस्सों में मध्यकालीन स्थापत्य के अद्भुत नमूने स्थित हैं। पन्द्रहवीं शताब्दि में निर्मित गूजरी महल उनमें से एक है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है। इस महल के बाहरी भाग को उसके मूल स्वरूप में राज्य के पुरातत्व विभाग ने सप्रयास सुरक्षित रखा है किन्तु आन्तरिक हिस्से को संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया है जहां दुर्लभ प्राचीन मूर्तियां रखी गई हैं जो कार्बन डेटिंग के अनुसार प्रथम शती ए डी की हैं। ये दुर्लभ मूर्तियां ग्वालियर के आसपास के इलाकों से प्राप्त हुई हैं। यह किला अवश्य देखे | ग्वालिअर का किला आगरा के पास है

मानमंदिर महल[संपादित करें]

इसे 1486 से 1517 के बीच ग्वालियर के प्रतापी राजा मानसिंह तोमर द्वारा बनवाया गया था। सुन्दर रंगीन टाइलों से सजे इस किले की समय ने भव्यता छीनी जरूर है किन्तु इसके कुछ आन्तरिक व बाह्य हिस्सों में इन नीली, पीली, हरी, सफेद टाइल्स द्वारा बनाई उत्कृष्ट कलाकृतियों के अवशेष अब भी इस किले के भव्य अतीत का पता देते हैं।राजा मानसिंह तोमर पराक्रमी योद्धा होने के साथ ही ललित कला प्रेमी व स्थापत्य शैली के जानकार भी थे।उनके शासनकाल को ग्वालियर का स्वर्ण युग कहा जाता है।इस किले के विशाल कक्षों में अतीत आज भी स्पंदित है। यहां जालीदार दीवारों से बना संगीत कक्ष है, जिनके पीछे बने जनाना कक्षों में राज परिवार की स्त्रियां संगीत सभाओं का आनंद लेतीं और संगीत सीखतीं थीं। इस महल के तहखानों में एक कैदखाना है, इतिहास कहता है कि औरंगज़ेब ने यहां अपने भाई मुराद को कैद रखवाया था और बाद में उसे समाप्त करवा दिया। जौहर कुण्ड भी यहां स्थित है। इसके अतिरिक्त किले में इस शहर के प्रथम शासक के नाम से एक कुण्ड है ' सूरज कुण्ड। नवीं शती में गुर्जर प्रतिहार वंश द्वारा निर्मित एक अद्वितीय स्थापत्यकला का नमूना विष्णु जी का तेली का मन्दिर है, जो कि 100 फीट की ऊंचाई का है। यह द्रविड स्थापत्य और आर्य स्थापत्य का बेजोड़ संगम है। भगवान विष्णु का ही एक और मन्दिर है 'सहस्रबाहु का मन्दिर' जिसे अब सास-बहू का मंदिर नाम से भी जानते हैं। इसके अलावा यहां एक सुन्दर गुरूद्वारा है जो सिखों के छठे गुरू गुरू हरगोबिन्द जी की स्मृति में निर्मित हुआ, जिन्हें जहांगीर ने दो वर्षों तक यहां बन्दी बना कर रखा था।

जयविलास महल और संग्रहालय[संपादित करें]

ग्वालियर का किला

यह सिन्धिया राजपरिवार का वर्तमान निवास स्थल ही नहीं एक भव्य संग्रहालय भी है। इस महल के 35 कमरों को संग्रहालय बना दिया गया है। इस महल का ज्यादातर हिस्सा इटेलियन स्थापत्य से प्रभावित है। इस महल का प्रसिध्द दरबार हॉल इस महल के भव्य अतीत का गवाह है, यहां लगा हुए दो फानूसों का भार दो-दो टन का है, कहते हैं इन्हें तब टांगा गया जब दस हाथियों को छत पर चढा कर छत की मजबूती मापी गई। इस संग्रहालय की एक और प्रसिद्ध चीज है, चांदी की रेल जिसकी पटरियां डाइनिंग टेबल पर लगी हैं और विशिष्ट दावतों में यह रेल पेय परोसती चलती है। और इटली, फ्रान्स, चीन तथा अन्य कई देशों की दुर्लभ कलाकृतियां यहाँ हैं।

तानसेन स्मारक[संपादित करें]

हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के स्तंभ महान संगीतकार तानसेन जो कि अकबर के नवरत्नों में से एक थे, उनका स्मारक यहां स्थित है, यह मुगल स्थापत्य का एक नमूना है। तानसेन की स्मृति में ग्वालियर में हर वर्ष नवम्बर में तानसेन समारोह आयोजित होता है।

विवस्वान सूर्य मन्दिर[संपादित करें]

यह बिरला द्वारा निर्मित करवाया मन्दिर है जिसकी प्रेरणा कोर्णाक के सूर्यमन्दिर से ली गई है।

गोपाचल पर्वत[संपादित करें]

गोपाचल पर्वत ग्वालियर के किले के अंचल में, प्राचीन कलात्मक जैन मूर्ति समूह का अद्वितीय स्थान है। यहाँ पर हजारों विशाल दि. जैन मूर्तियाँ सं. 1398 से सं. 1536 के मध्य पर्वत को तराशकर बनाई गई हैं। इन विशाल मूर्तियों का निर्माण तोमरवंशी राजा वीरमदेव, डूँगरसिंह व कीर्तिसिंह के काल में हुआ। अपभ्रंश के महाकवि पं॰ रइधू के सान्निध्य में इनकी प्रतिष्ठा हुई।

रानी लक्ष्मीबाई स्मारक[संपादित करें]

रानी लक्ष्मीबाई स्मारक शहर के पड़ाव क्षैत्र में है। कहते हैं यहां झांसी की रानी लक्ष्मी बाई की सेना ने अंग्रेजों से लड़ते हुए पड़ाव डाला और यहां के तत्कालीन शासक से सहायता मांगी किन्तु सदैव से मुगलों और अंग्रेजों के प्रभुत्व में रहे यहां के शासक उनकी मदद न कर सके और वे यहां वीरगति को प्राप्त हुईं। यहां के राजवंश का गौरव तब संदेहास्पद हो गया। इसी प्रकार यहां तात्या टोपे का भी स्मारक है।

खेल[संपादित करें]

लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालय, भारत के बडे शारीरिक शिक्षा विश्वविद्यालयों में से एक है। ग्वालियर में कृत्रिम टर्फ़ का रेलवे हॉकी स्टेडियम भी है। रूप सिंह स्टेडियम ४५,००० की क्षमता वाला अन्तर्रष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम है, जहाँ १० एक दिवसिय अन्तर्रष्ट्रीय मैचों क आयोजन हो चुका है। यह स्टेडियम दुधिया रोशनी से सुसज्जित है, तथा १९९६ के क्रिकेट विश्व कप का भारत - वेस्ट इन्डीज़ मेच का आयोजन कर चुका है। इस मैदान पर सचिन तेंडुलकर, एक दिवसिय मेच में दोहरा शतक जमाने वाले विश्व के पहले खिलाडी बने थे।

संगीत[संपादित करें]

ग्वालियर संगीत के शहर के रूप में भी जाना जाता है।राजा मानसिंह तोमर (१४८६ ई.)के शासनकाल में संगीत महाविद्यालय की नींव रखी गई। बैजू बावरा, हरिदास ,तानसेन आदि ने यहीं संगीत साधना की। संगीत सम्राट तानसेन ग्वालियर के बेहट में पैदा हुए।म. प्र. सरकार द्वारा तानसेन समारोह ग्वालियर में हर साल आयोजित किया जाता है। सरोद उस्ताद अमजद अली खान भी ग्वालियर के शाही शहर से है। उनके दादा गुलाम अली खान बंगश ग्वालियर के दरबार में संगीतकार बने। बैजनाथ प्रसाद (बैजू बावरा) ध्रुपद के गायक थे जिन्होने ग्वालियर को अपनी कर्म भूमि बनाई।

ग्वालियर घराना, खयाल घरानो मे एक ऐसा सब से पुराना घराना है, जिससे कई महान संगीतज्ञ निकले है। ग्वालियर घराने का उदय महान मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल (1542-1605) के साथ शुरू हुआ। मियां तानसेन जैसे इस कला के संरक्षक ग्वालियर से आये।

आवागमन[संपादित करें]

वायु मार्ग

ग्वालियर का राजमाता विजया राजे सिंधिया विमानतल, शहर को दिल्‍ली, मुंबई, इंदौर, भोपाल व जबलपुर से जोड़ता है। यहाँ भारतीय वायु सेना का मिराज़ विमानों का विमान केन्द्र है।

रेल मार्ग

ग्वालियर का रेलवे स्थानक देश के विविध रेलवे स्थानकों से जुड़ा हुआ है। यह रेलवे स्थानक भारतीय रेल के दिल्‍ली-चैन्‍नई मुख्य मार्ग पर पड़ता है। साथ ही यह शहर मुम्‍बई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नै, बंगलूरू, हैदराबाद आदि शहरों से अनेक रेलगाडियों के माध्‍यम से जुड़ा हुआ है।

सडक मार्ग

ग्वालियर शहर राज्य व देश के अन्य भागों से काफ़ी अच्छे से जुड़ा हुआ है। आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय राजमार्ग NH-३, ग्वालियर से गुजरता है। ग्वालियर झाँसी से NH-७५ से जुड़ा है। नॉर्थ-साउथ कॉरीडोर भी ग्वालियर से गुजरता है।

ग्वालियर के कुम्हार[संपादित करें]

ग्वालियर मृणशिल्पों की द्वष्टि से आज उतना समृद्व भले ही न दीखता हो किन्तु लगभग पच्चीस वर्ष पहले तक यहां अनेक सुन्दर खिलौने बनाये जाते थे। दीवाली दशहरे के समय यहां का जिवाजी चौक जिसे बाड़ा भी कहा जाता है, में खिलौनों की दुकाने बड़ी संख्या में लगती थी। मिट्टी के ठोस एवं जल रंगों से अलंकृत वे खिलौने अधिकांशतः बनना बन्द हो गए हैं। गूजरी, पनिहारिन, सिपाही, हाथी सवार, घोड़ा सवार, गोरस, गुल्लक आदि आज भी बिकते है। अब यहां मिटटी के स्थान पर कागज की लुगदी के खिलौने अधिक बनने लगे हैं जिन पर स्प्रेगन की सहायता से रंग ओर वार्निश किया जाता है।

यहां बनाये जाने वाले मृण शिल्पों में अनुष्ठानिक रूप से महत्वपूर्ण है, महालक्ष्मी का हाथी, हरदौल का धोड़ा, गणगौर, विवाह के कलश, टेसू, गौने के समय वधू को दी जाने वाली चित्रित मटकी आदि।

ग्वालियर, कुम्हार समुदाय की सामाजिक संरचना के अध्ययन की दृष्टि से भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है, कयोंकि यहां हथेरिया एवं चकरेटिया दोनों ही प्रकार के कुम्हार पाये जाते है। हथरेटिया कुम्हार, चकरेटिया कुम्हारों की भांति बर्तन बनाने हेतू चाक का प्रयोग नहीं करते, वे हाथों से ही, एक कूंढे की सहायता से मिटटी को बर्तनों को आकार देते हैं। उनके बनाये बर्तनों की दीवारें मोटी होती हैं। ये लोग खिलौनें बनाने में दक्ष होते है।

ग्वालियर से प्रकाशित होने वाली हिन्दी की लघु-पत्रिकायें[संपादित करें]

  • आचार्य कुल
  • चैतन्य प्रकाश
  • सुनहरा सन्सार

शिक्षा एवं शिक्षण संस्थान[संपादित करें]

ग्वालियर में जीवाजी विश्वविद्यालय (1964) और इससे संबंद्ध कला, विज्ञान, वाणिज्य, चिकित्सा तथा कृषि महाविद्यालय हैं और नगर में साक्षरता की दर काफ़ी ऊंची है। ग्वालियर में संगीत की यशस्वी परंपरा रही है और उसकी अपनी ख़ास शैली रही है। जो ग्वालियर 'घराना' नाम से प्रसिद्ध है।

  1. बी आई पी एस ग्रुप आफॅ कालेज
  2. मिस हिल विद्यालय, ग्वालियर
  3. गजरा राजा चिकित्सा महाविद्यालय, ग्वालियर
  4. कमला राजा महिला महाविद्यालय, ग्वालियर
  5. सिंधिया स्कूल, ग्वालियर
  6. सिंधिया कन्या विद्यालय, ग्वालियर
  7. माधव प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान, ग्वालियर
  8. पद्मा राजे कन्या विद्यालय, ग्वालियर
  9. रुस्तमजी प्रौद्योगिकी संस्थान, टेकनपुर
  10. आई आई आई टी एम, ग्वालियर
  11. लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिज़िकल एजुकेशन
  12. राष्ट्रीय पर्यटन संस्थान, ग्वालियर
  13. प्रौद्योगिकी एवं प्रबंधन संस्थान, ग्वालियर
  14. महाराणा प्रताप कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी, ग्वालियर
  15. आई पी एस कॉलेज ऑफ टेक्नोलॉजी एन्ड मेनेजमेन्ट, ग्वालियर
  16. वसुंधरा राजे होम्योपैथिक चिकित्सा महाविद्यालय, ग्वालियर
  17. राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय,ग्वालियर

जनसंख्या,साक्षरता एवं धर्म[संपादित करें]

२०११ की जनगणना के मुताबिक ग्वालियर की कुल जनसंख्या २०,३०,५४३ है, जिसमे पुरुष १०,९०,६४७ व महिला ९,३९,८९६ है। साक्षरता ५७.४७% है (पुरुष ७०.८१%, महिला ४१.७२%)।

Religions in Gwalior City[1]
Religion Percent
सनातन हिन्दू धर्म
  
88.84%
इस्लाम
  
8.58%
सिख
  
0.56%
ईसाई
  
0.29%
जैन
  
1.41%
अन्य†
  
0.19%
Distribution of religions

ग्वालियर से प्रसिद्ध हस्तियाँ[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

साँचा:मध्य प्रदेश

  1. "Gwalior Population Census 2011". Office of the Registrar General and Census Commissioner, भारत. http://www.census2011.co.in/data/town/802100-gwalior-madhya-pradesh.html. अभिगमन तिथि: 2015-11-29.