मिहिरकुल

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शिव भक्त गुर्जर सम्राट मिहिरकुल हूण[संपादित करें]

पांचवी शताब्दी के मध्य में, ४५० इसवी के लगभग, हूण गांधार इलाके के शासक थे, जब उन्होंने वहा से सारे सिन्धु घाटी प्रदेश को जीत लिया| कुछ समय बाद ही उन्होंने मारवाड और पश्चिमी राजस्थान के इलाके भी जीत लिए| ४९५ इसवी के लगभग हूणों ने तोरमाण के नेतृत्व में गुप्तो से पूर्वी मालवा छीन लिया| एरण, सागर जिले में वराह मूर्ति पर मिले तोरमाण के अभिलेख से इस बात की पुष्टि होती हैं| जैन ग्रन्थ कुवयमाल के अनुसार तोरमाण चंद्रभागा नदी के किनारे स्थित पवैय्या नगरी से भारत पर शासन करता था| यह पवैय्या नगरी ग्वालियर के पास स्थित थी|

तोरमाण के बाद उसका पुत्र मिहिरकुल हूणों का राजा बना| मिहिरकुल तोरमाण के सभी विजय अभियानों हमेशा उसके साथ रहता था| उसके शासन काल के पंद्रहवे वर्ष का एक अभिलेख ग्वालियर एक सूर्य मंदिर से प्राप्त हुआ हैं| इस प्रकार हूणों ने मालवा इलाके में अपनी स्थति मज़बूत कर ली थी| उसने उत्तर भारत की विजय को पूर्ण किया और गुप्तो सी भी नजराना वसूल किया| मिहिरकुल ने पंजाब स्थित स्यालकोट को अपनी राजधानी बनाया|मिहिकुल हूण एक कट्टर शैव था| उसने अपने शासन काल में हजारों शिव मंदिर बनवाये| मंदसोर अभिलेख के अनुसार यशोधर्मन से युद्ध होने से पूर्व उसने भगवान स्थाणु (शिव) के अलावा किसी अन्य के सामने अपना सर नहीं झुकाया था| मिहिरकुल ने ग्वालियर अभिलेख में भी अपने को शिव भक्त कहा हैं| मिहिरकुल के सिक्कों पर जयतु वृष लिखा हैं जिसका अर्थ हैं- जय नंदी| वृष शिव कि सवारी हैं जिसका मिथकीय नाम नंदी हैं|

कास्मोस इन्दिकप्लेस्तेस नामक एक यूनानी ने मिहिरकुल के समय भारत की यात्रा की थी, उसने “क्रिस्टचिँन टोपोग्राफी” नामक अपने ग्रन्थ में लिखा हैं की हूण भारत के उत्तरी पहाड़ी इलाको में रहते हैं, उनका राजा मिहिरकुल एक विशाल घुड़सवार सेना और कम से कम दो हज़ार हाथियों के साथ चलता हैं, वह भारत का स्वामी हैं|मिहिरकुल के लगभग सौ वर्ष बाद चीनी बौद्ध तीर्थ यात्री हेन् सांग ६२९ इसवी में भारत आया , वह अपने ग्रन्थ “सी-यू-की” में लिखता हैं की सैंकडो वर्ष पहले मिहिरकुल नाम का राजा हुआ करता था जो स्यालकोट से भारत पर राज करता था | वह कहता हैं कि मिहिरकुल नैसर्गिक रूप से प्रतिभाशाली और बहादुर था|

हेन् सांग बताता हैं कि मिहिरकुल ने भारत में बौद्ध धर्म को बहुत भारी नुकसान पहुँचाया| वह कहता हैं कि एक बार मिहिरकुल ने बौद्ध भिक्षुओं से बौद्ध धर्म के बारे में जानने कि इच्छा व्यक्त की| परन्तु बौद्ध भिक्षुओं ने उसका अपमान किया, उन्होंने उसके पास, किसी वरिष्ठ बौद्ध भिक्षु को भेजने की जगह एक सेवक को बौद्ध गुरु के रूप में भेज दिया| मिहिरकुल को जब इस बात का पता चला तो वह गुस्से में आग-बबूला हो गया और उसने बौद्ध धर्म के विनाश कि राजाज्ञा जारी कर दी| उसने उत्तर भारत के सभी बौद्ध बौद्ध मठो को तुडवा दिया और भिक्षुओं का कत्ले-आम करा दिया| हेन् सांग कि अनुसार मिहिरकुल ने उत्तर भारत से बौधों का नामो-निशान मिटा दिया|

गांधार क्षेत्र में मिहिरकुल के भाई के विद्रोह के कारण, उत्तर भारत का साम्राज्य उसके हाथ से निकल कर, उसके विद्रोही भाई के हाथ में चला गया| किन्तु वह शीघ्र ही कश्मीर का राजा बन बैठा| कल्हण ने बारहवी शताब्दी में “राजतरंगिणी” नामक ग्रन्थ में कश्मीर का इतिहास लिखा हैं| उसने मिहिरकुल का, एक शक्तिशाली विजेता के रूप में ,चित्रण किया हैं| वह कहता हैं कि मिहिरकुल काल का दूसरा नाम था, वह पहाड से गिरते है हुए हाथी कि चिंघाड से आनंदित होता था| उसके अनुसार मिहिरकुल ने हिमालय से लेकर लंका तक के इलाके जीत लिए थे| उसने कश्मीर में मिहिरपुर नामक नगर बसाया| कल्हण के अनुसार मिहिरकुल ने कश्मीर में श्रीनगर के पास मिहिरेशवर नामक भव्य शिव मंदिर बनवाया था| उसने गांधार इलाके में ७०० ब्राह्मणों को अग्रहार (ग्राम) दान में दिए थे| कल्हण मिहिरकुल हूण को ब्राह्मणों के समर्थक शिव भक्त के रूप में प्रस्तुत करता हैं|

मिहिरकुल ही नहीं वरन सभी हूण शिव भक्त थे| हनोल ,जौनसार –बावर, उत्तराखंड में स्थित महासु देवता (महादेव) का मंदिर हूण स्थापत्य शैली का शानदार नमूना हैं, कहा जाता हैं कि इसे हूण भट ने बनवाया था| यहाँ यह उल्लेखनीय हैं कि भट का अर्थ योद्धा होता हैं |

हर हर महादेव का जय घोष भी हूणों से जुडा प्रतीत होता है क्योकि हूणों कि दक्षिणी शाखा को हारा-हूण कहते थे, संभवत हारा-हूण से ही हारा/हाडा गोत्र कि उत्पत्ति हुई हैं| हाडा लोगों के आधिपत्य के कारण ही कोटा-बूंदी इलाका हाडौती कहलाता हैं राजस्थान का यह हाडौती सम्भाग कभी हूण प्रदेश कहलाता था| आज भी इस इलाके में हूणों गोत्र के गुर्जरों के अनेक गांव हैं| यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध इतिहासकार वी. ए. स्मिथ, विलियम क्रुक आदि ने गुर्जरों को श्वेत हूणों से सम्बंधित माना हैं| इतिहासकार कैम्पबेल और डी. आर. भंडारकर गुर्जरों की उत्त्पत्ति श्वेत हूणों की खज़र शाखा से मानते हैं | बूंदी इलाके में रामेश्वर महादेव, भीमलत और झर महादेव हूणों के बनवाये प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं| बिजोलिया, चित्तोरगढ़ के समीप स्थित मैनाल कभी हूण राजा अन्गत्सी की राजधानी थी, जहा हूणों ने तिलस्वा महादेव का मंदिर बनवाया था| यह मंदिर आज भी पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता हैं| कर्नल टाड़ के अनुसार बडोली, कोटा में स्थित सुप्रसिद्ध शिव मंदिर पंवार/परमार वंश के हूणराज ने बनवाया था|

इस प्रकार हम देखते हैं की हूण और उनका नेता मिहिरकुल भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और शैव धर्म के विकास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े हैं|

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • 1. K C Ojha, History of foreign rule in Ancient India, Allahbad, 1968.
  • 2. Prameswarilal Gupta, Coins, New Delhi, 1969.
  • 3. R C Majumdar, Ancient Iindia
  • 4. Rama Shankar Tripathi, History of Ancient India, Delhi, 1987.
  • 5. Atreyi Biswas, The Political History of Hunas in India, Munshiram Manoharlal Publishers, 1973.
  • 6. Upendera Thakur, The Hunas in India.
  • 7. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, vol.2
  • 8. J M Campbell, The Gujar, Gazeteer of Bombay Presidency, vol.9, part.2, 1896
  • 9. D R Bhandarkarkar Gurjaras, J B B R A S, Vol.21, 1903
  • 10. Tod, Annals and Antiquities of Rajasthan, edit. William Crooke, Vol.1, Introduction
  • 11. P C Bagchi, India and Central Asia, Calcutta, 1965
  • 12. V A Smith, Earley History of India

http://janitihas.blogspot.in/2012/10/shiv-bhakt-samrat-mihirkul-hun.html?m=1

परिचय[संपादित करें]

मिहिरकुल हूण सम्राट तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल भारतीय इतिहास में अपनी खूँखार और ध्वंसात्मक प्रवृत्ति के लिये प्रसिद्धश् हैं। भारतीय स्रोतों के अतिरिक्त इनकी बर्बरता का चित्रण चीनी तथा यूनानी इतिहासकारों ने भी किया है। कुमारगुप्त के राज्यकाल (ई० ४१४-४५५) के अंतिम वर्षो में हूणों ने उत्तरी भारत पर धावा बोल दिया। राजकुमार स्कंदगुप्त ने इस आक्रमण को रोक लिया पर छठी शताब्दी के प्रथम चरण मे हूणों का आधिपत्य मालवा तक छा गया। तोरमाण का पुत्र मिहिरकुल लगभग ५१५ ई० में सिंहासन पर बैठा। उसकी राजधानी साकल अथवा स्यालकोट थी। "राजतरंगिणी' के अनुसार इसका राज्य कश्मीर तथा गंधार से लेकर दक्षिण में लंका तक फैला था। किंतु इस वृतांत में तथ्य नहीं है। कल्हण ने तोरमाण को मिहिरकुल से १८ वीं पीढ़ी बाद रखा है पर वास्तव में मिहिरकुल तोरमाण का पुत्र था। इस ग्रंथ में उल्लिखित मिहिरकुल की नृशंस प्रवृत्तियों की पुष्टि युवान्‌ च्वांङ के वृत्तांत से भी होती है। चीनी स्रोतों में संगु युग का वृत्तांत भी उल्लेखनीय है। यह लगभग ५२० ई० में गंधार में हूण सम्राट के यहाँ राजदूत था। इसके अतिरिक्त एक यूनानी भौगोलिक कासमॉस इंद्रिको प्लूस्तस ने श्वेत हूण सम्राट, गोलस का उल्लेख किया है जो लगभग ५२५-५३५ ई० मे उत्तरी भारत का सम्राट था। कदाचित्‌ इसकी समानता मिहिरकुल से की जा सकती है। उपर्युक्त स्रोतों के आधार पर हूण सम्राट, मिहिरकुल का साम्राज्य सिंधु नदी से पश्चिम में था और उसका आधिपत्य उत्तरी भारत के शासक स्वीकार करते थे। बौद्ध धर्म का वह कट्टर विरोधी था और इसने मठों तथा संघारामों को ध्वस्त किया। इसके राज्यकाल के १५ वें वर्ष का एक लेख ग्वालियर में मिला है जिसमें मातृचेत नामक एक व्यक्ति द्वारा सूर्यमंदिर की स्थापना का उल्लेख है।

मिहिरकुल अधिक समय तक राज्य न कर सका। हूणों की बर्बरता ने उत्तरी भारत के शासकों में नवीन स्फूर्ति डाल दी थी। अत: यशोधर्मन के नेतृत्व में इन शासकों ने उसे हराया। मंदसोर (मध्यभारत) के यशोधर्मन्‌ के लेख से ज्ञात होता है कि मिहिरकुल ने इस भारतीय सम्राट, का आधिपत्य स्वीकार कर लिया था। युवान्‌ च्वाङ के वृत्तांतानुसार मगध शासक बालादित्य पर जब मिहिरकुल ने आक्रमण किया तो उसने एक द्वीप में शरण ली। मिहिरकुल ने उसका पीछा किया पर वह स्वयं पकड़ा गया। उसका वध न कर, उसे मुक्त कर दिया गया। मिहिरकुल की अनुपस्थिति में उसके छोटे भाई ने राज्य पर अधिकार कर लिया अत: कश्मीर में मिहिरकुल ने शरण ली। यहाँ के शासक का वध कर वह सिंहासन पर बैठ गया। उसने स्तूपों और संघारामों को जलाया और लूटा। एक वर्ष बाद उसका देहांत हो गया और उसी के साथ हूण राज्य का भी अंत हो गया।

सन्दर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • मजुमदार, आर.सी.-दी क्लासिकल एज; फ़्लीट-गुप्त इंस्क्रिप्शंस।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]