१८५७ का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
1857/58 का भारत का स्वाधीनता संग्राम
Indian Rebellion of 1857.jpg
1857-59' के दौरान हुये भारतीय विद्रोह के प्रमुख केन्द्रों: मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी और ग्वालियर को दर्शाता सन 1912 का नक्शा।
तिथि 10 मई 1857
स्थान भारत (cf. 1857)[1]
परिणाम विद्रोह का दमन,
ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत,
नियंत्रण ब्रिटिश ताज के हाथ में।
क्षेत्रीय
बदलाव
पूर्व ईस्ट इंडिया कंपनी के क्षेत्रों को मिलाकर बना भारतीय साम्राज्य, इन क्षेत्रों मे से कुछ तो स्थानीय राजाओं को लौटा दिये गये जबकि कईयों को ब्रिटिश ताज द्वारा जब्त कर लिया गया।
योद्धा
Fictional flag of the Mughal Empire.svg मुग़ल साम्राज्य
Flag of the British East India Company (1801).svg ईस्ट इंडिया कंपनी सिपाही
मंगल पाण्डेय दुगवा नरेश फैजाबाद

7 भारतीय रियासतें

यूनाइटेड किंगडम ब्रिटिश सेना

Flag of the British East India Company (1801).svg ईस्ट इंडिया कंपनी के सिपाही
देशी उपद्रवी
और ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश सैनिक यूनाइटेड किंगडम बंगाल प्रेसीडेंसी के ब्रिटिश नागरिक स्वयंसेवक
21 रियासतें

Pre 1962 Flag of Nepal.png नेपाल की राजशाही
क्षेत्र के अन्य छोटे राज्य

सेनानायक
दुगवा नरेश मंगल पाण्डेय
       मुग़ल साम्राज्य बहादुर शाह द्वितीय
नाना साहेब
मुग़ल साम्राज्य मिर्ज़ा मुग़ल
Flag of the British East India Company (1801).svg बख़्त खान
रानी लक्ष्मीबाई
Flag of the British East India Company (1801).svg तात्या टोपे
अवध ध्वज.gif बेगम हजरत महल
प्रधान सेनापति, भारत:
यूनाइटेड किंगडम जॉर्ज एनसोन (मई 1857 से)
यूनाइटेड किंगडम सर पैट्रिक ग्रांट
यूनाइटेड किंगडम कॉलिन कैंपबैल (अगस्त 1857 से)
Pre 1962 Flag of Nepal.png जंग बहादुर[2]
१८५७ के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को समर्पित भारत का डाकटिकट।

१८५७ का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति की शुरूआत '10 मई 1857' की संध्या को मेरठ मे हुई थी और इसको समस्त भारतवासी 10 मई को प्रत्येक वर्ष ”क्रान्ति दिवस“ के रूप में मनाते हैं, क्रान्ति की शुरूआत करने का श्रेय अमर शहीद कोतवाल धनसिंह गुर्जर को जाता है

10 मई 1857 को मेरठ में विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध साझा मोर्चा गठित कर क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया।1 सैनिकों के विद्रोह की खबर फैलते ही मेरठ की शहरी जनता और आस-पास के गांव विशेषकर पांचली, घाट, नंगला, गगोल इत्यादि के हजारों ग्रामीण मेरठ की सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए। इसी कोतवाली में धन सिंह कोतवाल (प्रभारी) के पद पर कार्यरत थे।2 मेरठ की पुलिस बागी हो चुकी थी। धन सिंह कोतवाल क्रान्तिकारी भीड़ (सैनिक, मेरठ के शहरी, पुलिस और किसान) में एक प्राकृतिक नेता के रूप में उभरे। उनका आकर्षक व्यक्तित्व, उनका स्थानीय होना, (वह मेरठ के निकट स्थित गांव पांचली के रहने वाले थे), पुलिस में उच्च पद पर होना और स्थानीय क्रान्तिकारियों का उनको विश्वास प्राप्त होना कुछ ऐसे कारक थे जिन्होंने धन सिंह को 10 मई 1857 के दिन मेरठ की क्रान्तिकारी जनता के नेता के रूप में उभरने में मदद की। उन्होंने क्रान्तिकारी भीड़ का नेतृत्व किया और रात दो बजे मेरठ जेल पर हमला कर दिया। जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया और जेल में आग लगा दी।3 जेल से छुड़ाए कैदी भी क्रान्ति में शामिल हो गए। उससे पहले पुलिस फोर्स के नेतृत्व में क्रान्तिकारी भीड़ ने पूरे सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। रात में ही विद्रोही सैनिक दिल्ली कूच कर गए और विद्रोह मेरठ के देहात में फैल गया। मंगल पाण्डे 8 अप्रैल, 1857 को बैरकपुर, बंगाल में शहीद हो गए थे। मंगल पाण्डे ने चर्बी वाले कारतूसों के विरोध में अपने एक अफसर को 29 मार्च, 1857 को बैरकपुर छावनी, बंगाल में गोली से उड़ा दिया था। जिसके पश्चात उन्हें गिरफ्तार कर बैरकपुर (बंगाल) में 8 अप्रैल को फासी दे दी गई थी। 10 मई, 1857 को मेरठ में हुए जनक्रान्ति के विस्फोट से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है।

क्रान्ति के दमन के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने 10 मई, 1857 को मेरठ मे हुई क्रान्तिकारी घटनाओं में पुलिस की भूमिका की जांच के लिए मेजर विलियम्स की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की गई।4 मेजर विलियम्स ने उस दिन की घटनाओं का भिन्न-भिन्न गवाहियों के आधार पर गहन विवेचन किया तथा इस सम्बन्ध में एक स्मरण-पत्र तैयार किया, जिसके अनुसार उन्होंने मेरठ में जनता की क्रान्तिकारी गतिविधियों के विस्फोट के लिए धन सिंह कोतवाल को मुख्य रूप से दोषी ठहराया, उसका मानना था कि यदि धन सिंह कोतवाल ने अपने कर्तव्य का निर्वाह ठीक प्रकार से किया होता तो संभवतः मेरठ में जनता को भड़कने से रोका जा सकता था।5 धन सिंह कोतवाल को पुलिस नियंत्रण के छिन्न-भिन्न हो जाने के लिए दोषी पाया गया। क्रान्तिकारी घटनाओं से दमित लोगों ने अपनी गवाहियों में सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि धन सिंह कोतवाल क्योंकि स्वयं गूजर है इसलिए उसने क्रान्तिकारियों, जिनमें गूजर बहुसंख्या में थे, को नहीं रोका। उन्होंने धन सिंह पर क्रान्तिकारियों को खुला संरक्षण देने का आरोप भी लगाया।6 एक गवाही के अनुसार क्रान्तिकरियों ने कहा कि धन सिंह कोतवाल ने उन्हें स्वयं आस-पास के गांव से बुलाया है 7

यदि मेजर विलियम्स द्वारा ली गई गवाहियों का स्वयं विवेचन किया जाये तो पता चलता है कि 10 मई, 1857 को मेरठ में क्रांति का विस्फोट काई स्वतः विस्फोट नहीं वरन् एक पूर्व योजना के तहत एक निश्चित कार्यवाही थी, जो परिस्थितिवश समय पूर्व ही घटित हो गई। नवम्बर 1858 में मेरठ के कमिश्नर एफ0 विलियम द्वारा इसी सिलसिले से एक रिपोर्ट नोर्थ - वैस्टर्न प्रान्त (आधुनिक उत्तर प्रदेश) सरकार के सचिव को भेजी गई। रिपोर्ट के अनुसार मेरठ की सैनिक छावनी में ”चर्बी वाले कारतूस और हड्डियों के चूर्ण वाले आटे की बात“ बड़ी सावधानी पूर्वक फैलाई गई थी। रिपोर्ट में अयोध्या से आये एक साधु की संदिग्ध भूमिका की ओर भी इशारा किया गया था।8 विद्रोही सैनिक, मेरठ शहर की पुलिस, तथा जनता और आस-पास के गांव के ग्रामीण इस साधु के सम्पर्क में थे। मेरठ के आर्य समाजी, इतिहासज्ञ एवं स्वतन्त्रता सेनानी आचार्य दीपांकर के अनुसार यह साधु स्वयं दयानन्द जी थे और वही मेरठ में 10 मई, 1857 की घटनाओं के सूत्रधार थे। मेजर विलियम्स को दो गयी गवाही के अनुसार कोतवाल स्वयं इस साधु से उसके सूरजकुण्ड स्थित ठिकाने पर मिले थे।9 हो सकता है ऊपरी तौर पर यह कोतवाल की सरकारी भेंट हो, परन्तु दोनों के आपस में सम्पर्क होने की बात से इंकार नहीं किया जा सकता। वास्तव में कोतवाल सहित पूरी पुलिस फोर्स इस योजना में साधु (सम्भवतः स्वामी दयानन्द) के साथ देशव्यापी क्रान्तिकारी योजना में शामिल हो चुकी थी। 10 मई को जैसा कि इस रिपोर्ट में बताया गया कि सभी सैनिकों ने एक साथ मेरठ में सभी स्थानों पर विद्रोह कर दिया। ठीक उसी समय सदर बाजार की भीड़, जो पहले से ही हथियारों से लैस होकर इस घटना के लिए तैयार थी, ने भी अपनी क्रान्तिकारी गतिविधियां शुरू कर दीं। धन सिंह कोतवाल ने योजना के अनुसार बड़ी चतुराई से ब्रिटिश सरकार के प्रति वफादार पुलिस कर्मियों को कोतवाली के भीतर चले जाने और वहीं रहने का आदेश दिया।10 आदेश का पालन करते हुए अंग्रेजों के वफादार पिट्ठू पुलिसकर्मी क्रान्ति के दौरान कोतवाली में ही बैठे रहे। इस प्रकार अंग्रेजों के वफादारों की तरफ से क्रान्तिकारियों को रोकने का प्रयास नहीं हो सका, दूसरी तरफ उसने क्रान्तिकारी योजना से सहमत सिपाहियों को क्रान्ति में अग्रणी भूमिका निभाने का गुप्त आदेश दिया, फलस्वरूप उस दिन कई जगह पुलिस वालों को क्रान्तिकारियों की भीड़ का नेतृत्व करते देखा गया।11 धन सिंह कोतवाल अपने गांव पांचली और आस-पास के क्रान्तिकारी गूजर बाहुल्य गांव घाट, नंगला, गगोल आदि की जनता के सम्पर्क में थे, धन सिंह कोतवाल का संदेश मिलते ही हजारों की संख्या में गूजर क्रान्तिकारी रात में मेरठ पहुंच गये। मेरठ के आस-पास के गांवों में प्रचलित किवंदन्ती के अनुसार इस क्रान्तिकारी भीड़ ने धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में देर रात दो बजे जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ा लिया12 और जेल को आग लगा दी। मेरठ शहर और कैंट में जो कुछ भी अंग्रेजों से सम्बन्धित था उसे यह क्रान्तिकारियों की भीड़ पहले ही नष्ट कर चुकी थी।

उपरोक्त वर्णन और विवेचना के आधार पर हम निःसन्देह कह सकते हैं कि धन सिंह कोतवाल ने 10 मई, 1857 के दिन मेरठ में मुख्य भूमिका का निर्वाह करते हुए क्रान्तिकारियों को नेतृत्व प्रदान किया था।1857 की क्रान्ति की औपनिवेशिक व्याख्या, (ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों की व्याख्या), के अनुसार 1857 का गदर मात्र एक सैनिक विद्रोह था जिसका कारण मात्र सैनिक असंतोष था। इन इतिहासकारों का मानना है कि सैनिक विद्रोहियों को कहीं भी जनप्रिय समर्थन प्राप्त नहीं था। ऐसा कहकर वह यह जताना चाहते हैं कि ब्रिटिश शासन निर्दोष था और आम जनता उससे सन्तुष्ट थी। अंग्रेज इतिहासकारों, जिनमें जौन लोरेंस और सीले प्रमुख हैं ने भी 1857 के गदर को मात्र एक सैनिक विद्रोह माना है, इनका निष्कर्ष है कि 1857 के विद्रोह को कही भी जनप्रिय समर्थन प्राप्त नहीं था, इसलिए इसे स्वतन्त्रता संग्राम नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रवादी इतिहासकार वी0 डी0 सावरकर और सब-आल्टरन इतिहासकार रंजीत गुहा ने 1857 की क्रान्ति की साम्राज्यवादी व्याख्या का खंडन करते हुए उन क्रान्तिकारी घटनाओं का वर्णन किया है, जिनमें कि जनता ने क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया था, इन घटनाओं का वर्णन मेरठ में जनता की सहभागिता से ही शुरू हो जाता है। समस्त पश्चिम उत्तर प्रदेश के बन्जारो, रांघड़ों और गूजर किसानों ने 1857 की क्रान्ति में व्यापक स्तर पर भाग लिया। पूर्वी उत्तर प्रदेश में ताल्लुकदारों ने अग्रणी भूमिका निभाई। बुनकरों और कारीगरों ने अनेक स्थानों पर क्रान्ति में भाग लिया। 1857 की क्रान्ति के व्यापक आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक कारण थे और विद्रोही जनता के हर वर्ग से आये थे, ऐसा अब आधुनिक इतिहासकार सिद्ध कर चुके हैं। अतः 1857 का गदर मात्र एक सैनिक विद्रोह नहीं वरन् जनसहभागिता से पूर्ण एक राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम था। परन्तु 1857 में जनसहभागिता की शुरूआत कहाँ और किसके नेतृत्व में हुई ? इस जनसहभागिता की शुरूआत के स्थान और इसमें सहभागिता प्रदर्शित वाले लोगों को ही 1857 की क्रान्ति का जनक कहा जा सकता है। क्योंकि 1857 की क्रान्ति में जनता की सहभागिता की शुरूआत धन सिंह कोतवाल के नेतृत्व में मेरठ की जनता ने की थी। अतः ये ही 1857 की क्रान्ति के जनक कहे जाते हैं।

10, मई 1857 को मेरठ में जो महत्वपूर्ण भूमिका धन सिंह और उनके अपने ग्राम पांचली के भाई बन्धुओं ने निभाई उसकी पृष्ठभूमि में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान छुपी हुई है। ब्रिटिश साम्राज्य की औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था की कृषि नीति का मुख्य उद्देश्य सिर्फ अधिक से अधिक लगान वसूलना था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अंग्रेजों ने महलवाड़ी व्यवस्था लागू की थी, जिसके तहत समस्त ग्राम से इकट्ठा लगान तय किया जाता था और मुखिया अथवा लम्बरदार लगान वसूलकर सरकार को देता था। लगान की दरें बहुत ऊंची थी, और उसे बड़ी कठोरता से वसूला जाता था। कर न दे पाने पर किसानों को तरह-तरह से बेइज्जत करना, कोड़े मारना और उन्हें जमीनों से बेदखल करना एक आम बात थी, किसानों की हालत बद से बदतर हो गई थी। धन सिंह कोतवाल भी एक किसान परिवार से सम्बन्धित थे। किसानों के इन हालातों से वे बहुत दुखी थे। धन सिंह के पिता पांचली ग्राम के मुखिया थे, अतः अंग्रेज पांचली के उन ग्रामीणों को जो किसी कारणवश लगान नहीं दे पाते थे, उन्हें धन सिंह के अहाते में कठोर सजा दिया करते थे, बचपन से ही इन घटनाओं को देखकर धन सिंह के मन में आक्रोष जन्म लेने लगा।13 ग्रामीणों के दिलो दिमाग में ब्रिटिष विरोध लावे की तरह धधक रहा था। 1857 की क्रान्ति में धन सिंह और उनके ग्राम पांचली की भूमिका का विवेचन करते हुए हम यह नहीं भूल सकते कि धन सिंह गूजर जाति में जन्में थे, उनका गांव गूजर बहुल था। 1707 ई0 में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात गूजरों ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में अपनी राजनैतिक ताकत काफी बढ़ा ली थी।14 लढ़ौरा, मुण्डलाना, टिमली, परीक्षितगढ़, दादरी, समथर-लौहा गढ़, कुंजा बहादुरपुर इत्यादि रियासतें कायम कर वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक गूजर राज्य बनाने के सपने देखने लगे थे।15 1803 में अंग्रेजों द्वारा दोआबा पर अधिकार करने के वाद गूजरों की शक्ति क्षीण हो गई थी, गूजर मन ही मन अपनी राजनैतिक शक्ति को पुनः पाने के लिये आतुर थे, इस दषा में प्रयास करते हुए गूजरों ने सर्वप्रथम 1824 में कुंजा बहादुरपुर के ताल्लुकदार विजय सिंह और कल्याण सिंह उर्फ कलवा गूजर के नेतृत्व में सहारनपुर में जोरदार विद्रोह किये।16 पश्चिमी उत्तर प्रदेष के गूजरों ने इस विद्रोह में प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया परन्तु यह प्रयास सफल नहीं हो सका। 1857 के सैनिक विद्रोह ने उन्हें एक और अवसर प्रदान कर दिया। समस्त पश्चिमी उत्तर प्रदेष में देहरादून से लेकिन दिल्ली तक, मुरादाबाद, बिजनौर, आगरा, झांसी तक। पंजाब, राजस्थान से लेकर महाराष्ट्र तक के गूजर इस स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। हजारों की संख्या में गूजर शहीद हुए और लाखों गूजरों को ब्रिटेन के दूसरे उपनिवेषों में कृषि मजदूर के रूप में निर्वासित कर दिया। इस प्रकार धन सिंह और पांचली, घाट, नंगला और गगोल ग्रामों के गूजरों का संघर्ष गूजरों के देशव्यापी ब्रिटिष विरोध का हिस्सा था। यह तो बस एक शुरूआत थी।

1857 की क्रान्ति के कुछ समय पूर्व की एक घटना ने भी धन सिंह और ग्रामवासियों को अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए प्रेरित किया। पांचली और उसके निकट के ग्रामों में प्रचलित किंवदन्ती के अनुसार घटना इस प्रकार है, ”अप्रैल का महीना था। किसान अपनी फसलों को उठाने में लगे हुए थे। एक दिन करीब 10 11 बजे के आस-पास बजे दो अंग्रेज तथा एक मेम पांचली खुर्द के आमों के बाग में थोड़ा आराम करने के लिए रूके। इसी बाग के समीप पांचली गांव के तीन किसान जिनके नाम मंगत सिंह, नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह (अथवा भज्जड़ सिंह) थे, कृषि कार्यो में लगे थे। अंग्रेजों ने इन किसानों से पानी पिलाने का आग्रह किया। अज्ञात कारणों से इन किसानों और अंग्रेजों में संघर्ष हो गया। इन किसानों ने अंग्रेजों का वीरतापूर्वक सामना कर एक अंग्रेज और मेम को पकड़ दिया। एक अंग्रेज भागने में सफल रहा। पकड़े गए अंग्रेज सिपाही को इन्होंने हाथ-पैर बांधकर गर्म रेत में डाल दिया और मेम से बलपूर्वक दायं हंकवाई। दो घंटे बाद भागा हुआ सिपाही एक अंग्रेज अधिकारी और 25-30 सिपाहियों के साथ वापस लौटा। तब तक किसान अंग्रेज सैनिकों से छीने हुए हथियारों, जिनमें एक सोने की मूठ वाली तलवार भी थी, को लेकर भाग चुके थे। अंग्रेजों की दण्ड नीति बहुत कठोर थी, इस घटना की जांच करने और दोषियों को गिरफ्तार कर अंग्रेजों को सौंपने की जिम्मेदारी धन सिंह के पिता, जो कि गांव के मुखिया थे, को सौंपी गई। ऐलान किया गया कि यदि मुखिया ने तीनों बागियों को पकड़कर अंग्रेजों को नहीं सौपा तो सजा गांव वालों और मुखिया को भुगतनी पड़ेगी। बहुत से ग्रामवासी भयवश गाँव से पलायन कर गए। अन्ततः नरपत सिंह और झज्जड़ सिंह ने तो समर्पण कर दिया किन्तु मंगत सिंह फरार ही रहे। दोनों किसानों को 30-30 कोड़े और जमीन से बेदखली की सजा दी गई। फरार मंगत सिंह के परिवार के तीन सदस्यों के गांव के समीप ही फांसी पर लटका दिया गया। धन सिंह के पिता को मंगत सिंह को न ढूंढ पाने के कारण छः माह के कठोर कारावास की सजा दी गई। इस घटना ने धन सिंह सहित पांचली के बच्चे-बच्चे को विद्रोही बना दिया।17 जैसे ही 10 मई को मेरठ में सैनिक बगावत हुई धन सिंह और ने क्रान्ति में सहभागिता की शुरूआत कर इतिहास रच दिया।

क्रान्ति मे अग्रणी भूमिका निभाने की सजा पांचली व अन्य ग्रामों के किसानों को मिली। मेरठ गजेटियर के वर्णन के अनुसार 4 जुलाई, 1857 को प्रातः चार बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले ने तोपों से हमला किया। रिसाले में 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपची थे। पूरे ग्राम को तोप से उड़ा दिया गया। सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनमें से 46 लोग कैद कर लिए गए और इनमें से 40 को बाद में फांसी की सजा दे दी गई।18 आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक स्वाधीनता आन्दोलन और मेरठ के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। पूरे गांव को लगभग नष्ट ही कर दिया गया। ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फाँसी की सजा दी गई और पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया। आज भी इस ग्राम में दश्हरा नहीं मनाया जाता।

संदर्भ एवं टिप्पणी

1. मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर, गवर्नमेन्ट प्रेस, 1963 पृष्ठ संख्या 52

2. वही

3. पांचली, घाट, गगोल आदि ग्रामों में प्रचलित किवदन्ती, बिन्दु क्रमांक 191, नैरेटिव ऑफ इवेन्टस अटैन्डिग द आऊट ब्रैक ऑफ डिस्टरबैन्सिस एण्ड दे रेस्टोरेशन ऑफ औथरिटी इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ 1857-58, नवम्बर 406, दिनांक 15 नवम्बर 1858, फ्राम एफ0 विलयम्बस म्.59 सैकेट्री टू गवर्नमेंट नार्थ-वैस्टर्न प्राविन्स, इलाहाबाद, राष्ट्रीय अभिलेखागार, दिल्ली। आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, 1993 पृष्ठ संख्या 143

4. वही, नैरेटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।

5. मैमोरेन्डम ऑन द म्यूंटनी एण्ड आऊटब्रेक ऐट मेरठ इन मई 1857, बाई मेजर विलयम्स, कमिश्नर ऑफ द मिलेट्री पुलिस, नार्थ-वेस्टर्न प्राविन्सिस, इलाहाबाद, 15 नवम्बर 1858; जे0ए0बी0 पामर, म्यूटनी आऊटब्रेक एट मेरठ, पृष्ठ संख्या 90-91।

6. डेपाजिशन नम्बर 54, 56, 59 एवं 60, आफ डेपाजिशन टेकन एट मेरठ बाई जी0 डबल्यू0 विलयम्बस, वही म्यूटनी नैरेटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।

7. वही, डेपाजिशन नम्बर 66

8. वही, बिन्दु क्रमांक 152, म्यूटनी नैरेटिव इन मेरठ डिस्ट्रिक्ट।

9. वहीं, डेपाजिशन नम्बर 8

10. वही, सौन्ता सिंह की गवाही।

11. वही, डेपाजिशन संख्या 22, 23, 24, 25 एवं 26।

12. वही, बिन्दु क्रमांक 191, नैरेटिव इन मेरठ डिस्ट्रिक्ट; पांचली, नंगला, घाट, गगोल आदि ग्रामों में प्रचलित किंवदन्ती।

13. वही किंवदन्ती।

14. नेविल, सहारनपुर ए गजेटेयर, 1857 की घटना से सम्बंधित पृष्ठ।

15. मेरठ के मजिस्ट्रेट डनलप द्वारा मेजर जनरल हैविट कमिश्नर मेरठ को 28 जून 1857 को लिखा पत्र, एस0ए0ए0 रिजवी, फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश्, खण्ड टए लखनऊ, 1960 पृष्ठ संख्या 107-110।

16. नेविल, वही; एच0जी0 वाटसन, देहरादून गजेटेयर के सम्बन्धित पृष्ठ।

17. वही, किंवदन्ती यह किवदन्ती पांचली ग्राम के खजान सिंह, उम्र 90 वर्ष के साक्षात्कार पर आधारित है।

18. बिन्दु क्रमांक 265, 266, 267, वही, नैरटिव इन डिस्ट्रिक्ट मेरठ।

संदर्भ ग्रन्थ

1. आचार्य दीपांकर, स्वाधीनता संग्राम और मेरठ, जनमत प्रकाषन, मेरठ 1993

2. मेरठ डिस्ट्रिक्ट गजेटेयर, गवर्नमेनट प्रैस, इलाहाबाद, 1963

3. मयराष्ट्र मानस, मेरठ।

4. रमेश चन्द्र मजूमदार, द सिपोय म्यूटनी एण्ड रिवोल्ट ऑफ 1857

5. एस0 बी0 चैधरी, सिविल रिबैलयन इन इण्डियन म्यूटनीज 1857-59

6. एस0 एन0-सेन, 1857

7. पी0सी0 जोशी रिबैलयन 1857।

8. एरिक स्ट्रोक्स, द पीजेण्ट एण्ड द राज।

9. जे0ए0बी0 पामर, द म्यूटनी आउटब्रैक एट मेरठ [3]

भारत में ब्रितानी विस्तार का संक्षिप्त इतिहास[संपादित करें]

ईस्ट इंडिया कम्पनी ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में सन 1757 में प्लासी का युद्ध जीता। युद्ध के बाद हुई संधि में अंग्रेजों को बंगाल में कर मुक्त व्यापार का अधिकार मिल गया। सन 1764 में बक्सर का युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों का बंगाल पर पूरी तरह से अधिकार हो गया। इन दो युद्धों में हुई जीत ने अंग्रेजों की ताकत को बहुत बढ़ा दिया और उनकी सैन्य क्षमता को परम्परागत भारतीय सैन्य क्षमता से श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। कंपनी ने इसके बाद सारे भारत पर अपना प्रभाव फैलाना आरंभ कर दिया।

1857 की क्रांति के समय के भारतीय राज्य।

सन 1843 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने सिन्ध क्षेत्र पर रक्तरंजित लडाई के बाद अधिकार कर लिया। सन १८३९ में महाराजा रणजीत सिंह की मृत्यु के बाद कमजोर हुए पंजाब पर अंग्रेजों ने अपना हाथ बढा़या और सन 1848 में दूसरा अंग्रेज-सिख युद्ध हुआ। सन 1849 में कंपनी का पंजाब पर भी अधिकार हो गया। सन 1853 में आखरी मराठा पेशवा बाजी राव के दत्तक पुत्र नाना साहेब की पदवी छीन ली गयी और उनका वार्षिक खर्चा बंद कर दिया गया।

सन 1854 में बरार और सन 1856 में अवध को कंपनी के राज्य में मिला लिया गया।

विद्रोह के कारण[संपादित करें]

सन 1857 के विद्रोह के विभिन्न राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सैनिक तथा सामाजिक कारण बताये जाते है

वैचारिक मतभेद[संपादित करें]

कई इतिहासकारों का मानना है कि उस समय के जनमानस में यह धारणा थी कि, अंग्रेज उन्हें जबर्दस्ती या धोखे से ईसाई बनाना चाहते हैं। यह पूरी तरह से गलत भी नहीं था, कुछ कंपनी अधिकारी धर्म परिवर्तन के कार्य में जुटे थे। हालांकि कंपनी ने धर्म परिवर्तन को स्वीकृति कभी नहीं दी। कंपनी इस बात से अवगत थी कि धर्म, पारम्परिक भारतीय समाज में विद्रोह का एक कारण बन सकता है। इससे पहले सोलहवीं सदी में भारत तथा जापान से पुर्तगालियों के पतन का एक कारण यह भी था कि उन्होंने जनता पर ईसाई धर्म बलात लादने का प्रयास किया था।

लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़पने की नाति (डाक्ट्रिन औफ़ लैप्स) के अन्तर्गत अनेक राज्य जैसे झाँसी, अवध, सतारा, नागपुर और संबलपुर को अंग्रेजी़ राज्य में मिला लिया गया और इनके उत्तराधिकारी राजा से अंग्रेजी़ राज्य से पेंशन पाने वाले कर्मचारी बन गये। शाही घराने, जमींदार और सेनाओं ने अपने आप को बेरोजगार और अधिकारहीन पाया। ये लोग अंग्रेजों के हाथों अपनी शर्मिंदगी और हार का बदला लेने के लिये तैयार थे। लॉर्ड डलहौजी के शासन के आठ वर्षों में दस लाख वर्गमील क्षेत्र को कंपनी के अधिकार में ले लिया गया। इसके अतिरिक्त ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल सेना में बहुत से सिपाही अवध से भर्ती होते थे, वे अवध में होने वाली घटनाओं से अछूते नहीं रह सके। नागपुर के शाही घराने के आभूषणों की कलकत्ता में बोली लगायी गयी इस घटना को शाही परिवार के प्रति अनादर के रूप में देखा गया।

भारतीय, कंपनी के कठोर शासन से भी नाराज थे जो कि तेजी से फैल रहा था और पश्चिमी सभ्य्ता का प्रसार कर रहा था। अंग्रेजों ने हिन्दुओं और मु्सलमानों के उस समय माने जाने वाले बहुत से रिवाजों को गैरकानूनी घोषित कर दिया जो कि अंग्रेजों द्वारा असमाजिक माने जाते थे। इसमें सती प्रथा पर रोक लगाना शामिल था। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि सिखों ने यह बहुत पहले ही बंद कर दिया था और बंगाल के प्रसिद्ध समाज सुधारक राजा राममोहन राय इस प्रथा को बंद करने के पक्ष में प्रचार कर रहे थे। इन कानूनों ने समाज के कुछ पक्षों मुख्यतः बंगाल में क्रोध उत्पन्न कर दिया। अंग्रेजों ने बाल विवाह प्रथा को समाप्त किया तथा कन्या भ्रूण हत्या पर भी रोक लगायी। अंग्रेजों द्वारा ठगी की समाप्ति भी की गई परन्तु यह सन्देह अभी भी बना हुआ है कि ठग एक धार्मिक समुदाय था या केवल साधारण डकैतों का समुदाय।

ब्रितानी न्याय व्यवस्था भारतीयों के लिये अन्यायपूर्ण मानी जाती थी। सन १८५३ में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री लौर्ड अब्रेडीन ने प्रशासनिक सेवा को भारतीयों के लिये खोल दिया परन्तु कुछ प्रबुद्ध भारतीयों के हिसाब से यह सुधार पर्याप्त नहीं था। कंपनी के अधिकारियों को भारतीयों के विरुद्ध न्यायालयों में अनेक अपीलों का अधिकार प्राप्त था। कंपनी भारतीयों पर भारी कर भी लगाती थी जिसे न चुकाने की स्थिति में उनकी संपत्ति अधिग्रहित कर ली जाती थी। कंपनी के आधुनिकीकरण के प्रयासों को पारम्परिक भारतीय समाज में सन्देह की दृष्टि से देखा गया। लोगो ने माना कि रेलवे जो बाम्बे से सर्वप्रथम चला एक दानव है और लोगो पर विपत्ति लायेगा।

परन्तु बहुत से इतिहासकारों का यह भी मानना है कि इन सुधारों को बढ़ा चढ़ा कर बताया गया है क्योंकि कंपनी के पास इन सुधारों को लागू करने के साधन नहीं थे और कलकत्ता से दूर उनका प्रभाव नगण्य था[4]

आर्थिक कारण[संपादित करें]

१८५७ के विद्रोह का एक प्रमुख कारण कंपनी द्वारा भारतीयों का आर्थिक शोषण भी था। कंपनी की नीतियों ने भारत की पारम्परिक अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से समाप्त कर दिया था। इन नीतियों के कारण बहुत से किसान, कारीगर, श्रमिक और कलाकार कंगाल हो गये। इनके साथ साथ जमींदारों और बड़े किसानों की स्थिति भी बदतर हो गयी। सन १८१३ में कंपनी ने एक तरफा मुक्त व्यापार की नीति अपना ली इसके अन्तर्गत ब्रितानी व्यापारियों को आयात करने की पूरी छूट मिल गयी, परम्परागत तकनीक से बनी हुई भारतीय वस्तुएं इसके सामने टिक नहीं सकी और भारतीय शहरी हस्तशिल्प व्यापार को अकल्पनीय क्षति हुई।

रेल सेवा के आने के साथ ग्रामीण क्षेत्र के लघु उद्यम भी नष्ट हो गये। रेल सेवा ने ब्रितानी व्यापारियों को दूर दराज के गावों तक पहुँच दे दी। सबसे अधिक क्षति कपड़ा उद्योग (कपास और रेशम) को हुई। इसके साथ लोहा व्यापार, बर्तन, कांच, कागज, धातु, बन्दूक, जहाज और रंगरेजी के उद्योगों को भी बहुत क्षति हुई। १८ वीं और १९ वीं शताब्दी में ब्रिटेन और यूरोप में आयात कर और अनेक रोकों के चलते भारतीय निर्यात समाप्त हो गया। पारम्परिक उद्योगों के नष्ट होने और साथ साथ आधुनिक उद्योगों का विकास न होने की कारण यह स्थिति और भी विषम हो गयी। साधारण जनता के पास खेती के अलावा कोई और साधन नहीं बचा।

खेती करने वाले किसानो की हालत भी खराब थी। ब्रितानी शासन के प्रारम्भ में किसानों को जमीदारों की दया पर छोड़ दिया गया, जिन्होने लगान को बहुत बढा़ दिया और बेगार तथा अन्य तरीकों से किसानो का शोषण करना प्रारम्भ कर दिया। कंपनी ने खेती के सुधार पर बहुत कम खर्च किया और अधिकतर लगान कंपनी के खर्चों को पूरा करने में प्रयोग होता था। फसल के खराब होने की दशा में किसानो को साहूकार अधिक ब्याज पर कर्जा देते थे और अनपढ़ किसानो को कई तरीकों से ठगते थे। ब्रितानी कानून व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि हस्तांतरण वैध हो जाने के कारण किसानों को अपनी भूमि से भी हाथ धोना पड़ता था। इन समस्याओं के कारण समाज के हर वर्ग में असंतोष व्याप्त था।

राजनैतिक कारण[संपादित करें]

सन १८४८ और १८५६ के बीच लार्ड डलहोजी ने डाक्ट्रिन औफ़ लैप्स के कानून के अन्तर्गत अनेक राज्यों पर अधिकार कर लिया। इस सिद्धांत अनुसार कोई राज्य, क्षेत्र या ब्रितानी प्रभाव का क्षेत्र कंपनी के अधीन हो जायेगा, यदि क्षेत्र का राजा निसन्तान मर जाता है या शासक कंपनी की दृष्टि में अयोग्य साबित होता है। इस सिद्धांत पर कार्य करते हुए लार्ड डलहोजी और उसके उत्तराधिकारी लार्ड कैन्निग ने सतारा,नागपुर,झाँसी,अवध को कंपनी के शासन में मिला लिया। कंपनी द्वारा तोडी गय़ी सन्धियों और वादों के कारण कंपनी की राजनैतिक विश्वसनियता पर भी प्रश्नचिन्ह लग चुका था। सन १८४९ में लार्ड डलहोजी की घोषणा के अनुसार बहादुर शाह के उत्तराधिकारी को ऐतिहासिक लाल किला छोड़ना पडेगा और शहर के बाहर जाना होगा और सन १८५६ में लार्ड कैन्निग की घोषणा कि बहादुर शाह के उत्तराधिकारी राजा नहीं कहलायेंगे ने मुगलों को कंपनी के विद्रोह में खडा कर दिया।

सिपाहियों की आशंका[संपादित करें]

सिपाही मूलत: कंपनी की बंगाल सेना में काम करने वाले भारतीय मूल के सैनिक थे। बम्बई, मद्रास और बंगाल प्रेसीडेन्सी की अपनी अलग सेना और सेनाप्रमुख होता था। इस सेना में ब्रितानी सेना से अधिक सिपाही थे। सन १८५७ में इस सेना में २,५७,००० सिपाही थे। बम्बई और मद्रास प्रेसीडेन्सी की सेना में अलग अलग क्षेत्रों के लोग होने की कारण ये सेनाएं विभिन्नता से पूर्ण थी और इनमे किसी एक क्षेत्र के लोगो का प्रभुत्व नहीं था। परन्तु बंगाल प्रेसीडेन्सी की सेना में भर्ती होने वाले सैनिक मुख्यत: अवध और गन्गा के मैदानी इलाको के भूमिहार ब्राह्मण और राजपूत थे। कंपनी के प्रारम्भिक वर्षों में बंगाल सेना में जातिगत विशेषाधिकारों और रीतिरिवाजों को महत्व दिया जाता था परन्तु सन १८४० के बाद कलकत्ता में आधुनिकता पसन्द सरकार आने के बाद सिपाहियों में अपनी जाति खोने की आशंका व्याप्त हो गयी। [5] सेना में सिपाहियों को जाति और धर्म से सम्बन्धित चिन्ह पहनने से मना कर दिया गया। सन १८५६ में एक आदेश के अन्तर्गत सभी नये भर्ती सिपाहियों को विदेश में कुछ समय के लिये काम करना अनिवार्य कर दिया गया। सिपाही धीरे-धीरे सेना के जीवन के विभिन्न पहलुओं से असन्तुष्ट हो चुके थे। सेना का वेतन कम था। भारतीय सैनिकों का वेतन महज सात रूपये प्रतिमाह था। और अवध और पंजाब जीतने के बाद सिपाहियों का भत्ता भी समाप्त कर दिया गया था। एनफ़ील्ड बंदूक के बारे में फ़ैली अफवाहों ने सिपाहियों की आशन्का को और बढा़ दिया कि कंपनी उनकी धर्म और जाति परिवर्तन करना चाहती है।

एनफ़ील्ड बंदूक[संपादित करें]

सन १८५३ की ३-बैण्ड इनफिल्ड बन्दूक

विद्रोह का प्रारम्भ एक बंदूक की वजह से हुआ। सिपाहियों को पैटऱ्न १८५३ एनफ़ील्ड बंदूक दी गयीं जो कि ०.५७७ कैलीबर की बंदूक थी तथा पुरानी और कई दशकों से उपयोग में लायी जा रही ब्राउन बैस के मुकाबले में शक्तिशाली और अचूक थी। नयी बंदूक में गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग किया गया था परन्तु बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक भरने के लिये कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था और उसमे भरे हुए बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस को डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी आवरण में चर्बी होती थी जो कि उसे पानी की सीलन से बचाती थी।

सिपाहियों के बीच अफ़वाह फ़ैल चुकी थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। यह हिन्दू और मुसलमान सिपाहियों दोनों की धार्मिक भावनाओं के विरुद्ध था ब्रितानी अफ़सरों ने इसे अफ़वाह बताया और सुझाव दिया कि सिपाही नये कारतूस बनाये जिसमे बकरे या मधुमक्क्खी की चर्बी प्रयोग की जाये। इस सुझाव ने सिपाहियों के बीच फ़ैली इस अफ़वाह को और पुख्ता कर दिया। दूसरा सुझाव यह दिया गया कि सिपाही कारतूस को दांतों से काटने की बजाय हाथों से खोलें। परंतु सिपाहियों ने इसे ये कहते हुए अस्विकार कर दिया कि वे कभी भी नयी कवायद को भूल सकते हैं और दांतों से कारतूस को काट सकते हैं।

तत्कालीन ब्रितानी सेना प्रमुख (भारत) जार्ज एनसन ने अपने अफ़सरों की सलाह को दरकिनार हुए इस कवायद और नयी बंदूक से उत्पन्न हुई समस्या को सुलझाने से

अफ़वाहें[संपादित करें]

ऐक और अफ़वाह जो कि उस समय फ़ैली हुई थी, कंपनी का राज्य सन १७५७ में प्लासी का युद्ध से प्रारम्भ हुआ था और सन १८५७ में १०० वर्षों बाद समाप्त हो जायेगा। चपातियां और कमल के फ़ूल भारत के अनेक भागों में वितरित होने लगे। ये आने वाले विद्रोह के लक्ष्ण थे।

युद्ध का प्रारम्भ[संपादित करें]

विद्रोह प्रारम्भ होने के कई महीनो पहले से तनाव का वातावरण बन गया था और कई विद्रोहजनक घटनायें घटीं। २४ जनवरी १८५७ को कलकत्ता के निकट आगजनी की कयी घटनायें हुई। २६ फ़रवरी १८५७ को १९ वीं बंगाल नेटिव इनफ़ैन्ट्री ने नये कारतूसों को प्रयोग करने से मना कर दिया। रेजीमेण्ट् के अफ़सरों ने तोपखाने और घुडसवार दस्ते के साथ इसका विरोध किया पर बाद में सिपाहियों की मांग मान ली।

1857 की क्रान्ति के जनक - अमर शहीद कोतवाल धनसिंह गुर्जर[संपादित करें]

कोतवाल धनसिंह गुर्जर

कमिशनरी चौक, मेरठ में विद्यमान कोतवल धन सिंह गुर्जर की प्रतिमा

इतिहास की पुस्तकें कहती हैं कि 1857 की क्रान्ति का प्रारम्भ/आरम्भ ”10 मई 1857“ को ”मेरठ“ में हुआ था और इसको समस्त भारतवासी 10 मई को प्रत्येक वर्ष ”क्रान्ति दिवस“ के रूप में मनाते हैं, क्रान्ति की शुरूआत करने का श्रेय अमर शहीद कोतवाल धनसिंह गुर्जर को जाता है उस दिन मेरठ में धनसिंह के नेतृत्व में विद्रोही सैनिकों और पुलिस फोर्स ने अंग्रेजों के विरूद्ध क्रान्तिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। धन सिंह कोतवाल जनता के सम्पर्क में थे, धनसिंह का संदेश मिलते ही हजारों की संख्या में भारतीय क्रान्तिकारी रात में मेरठ पहुंच गये। विद्रोह की खबर मिलते ही आस-पास के गांव के हजारों ग्रामीण मेरठ की सदर कोतवाली क्षेत्र में जमा हो गए। इसी कोतवाली में धन सिंह पुलिस चीफ के पद पर थे। 10 मई 1857 को धन सिंह ने की योजना के अनुसार बड़ी चतुराई से ब्रिटिश सरकार के वफादार पुलिस कर्मियों को कोतवाली के भीतर चले जाने और वहीं रहने का आदेश दिया। और धन सिंह के नेतृत्व में देर रात २ बजे जेल तोड़कर 836 कैदियों को छुड़ाकर जेल को आग लगा दी। छुड़ाए कैदी भी क्रान्ति में शामिल हो गए। उससे पहले भीड़ ने पूरे सदर बाजार और कैंट क्षेत्र में जो कुछ भी अंग्रेजों से सम्बन्धित था सब नष्ट कर चुकी थी। रात में ही विद्रोही सैनिक दिल्ली कूच कर गए और विद्रोह मेरठ के देहात में फैल गया। इस क्रान्ति के पश्चात् ब्रिटिश सरकार ने धन सिंह को मुख्य रूप से दोषी ठहराया, और सीधे आरोप लगाते हुए कहा कि धन सिंह कोतवाल क्योंकि स्वयं गुर्जर है इसलिए उसने गुर्जरो की भीड को नहीं रोका और उन्हे खुला संरक्षण दिया। इसके बाद घनसिंह को गिरफ्तार कर मेरठ के एक चौराहे पर फाँसी पर लटका दिया गया 1857 की क्रान्ति की शुरूआत धन सिंह कोतवाल ने की अतः इसलिए 1857 की क्रान्ति के जनक कहे जाते है। मेरठ की पृष्ठभूमि में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान छुपी हुई है। मेरठ गजेटियर के वर्णन के अनुसार 4 जुलाई, 1857 को प्रातः 4 बजे पांचली पर एक अंग्रेज रिसाले ने 56 घुड़सवार, 38 पैदल सिपाही और 10 तोपों से हमला किया। पूरे ग्राम को तोप से उड़ा दिया गया। सैकड़ों किसान मारे गए, जो बच गए उनको कैद कर फांसी की सजा दे दी गई। आचार्य दीपांकर द्वारा रचित पुस्तक "स्वाधीनता आन्दोलन" और मेरठ के अनुसार पांचली के 80 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। ग्राम गगोल के भी 9 लोगों को दशहरे के दिन फाँसी की सजा दी गई और पूरे ग्राम को नष्ट कर दिया। आज भी इस ग्राम में दश्हरा नहीं मनाया जाता।

मेरठ और दिल्ली[संपादित करें]

मेरठ के शहीद स्मारक परिसर में स्थित एक सूचना पट्टी जिस पर कोर्ट मार्शियल किये गए ८५ सैनिकों के नाम दर्ज हैं

मेरठ एक दूसरा बड़ा सैनिक अड्डा था जहां २,३५७ भारतीय, २,०३८ ब्रितानी सिपाही, १२ ब्रितानी सिपाहियों द्वारा सन्चालित तोपें उपस्थित थीं। बंगाल सेना में असंतोष की बात सभी लोग उस समय भलीभान्ती जानते थे, फ़िर भी २४ अप्रैल को ३ बंगाल लाइट कैवलरी (घुडसवार दस्ता) के सेनानायक लैफ़्टिनेण्ट-कर्नल जार्ज कार्मिशैल स्मिथ ने अपने ९० सिपाहियों को परेड़ करने और गोलाबारी का अभ्यास करने को कहा। पांच को छोड़ कर सभी सिपाहियों ने परेड करने और कारतूस लेने से मना कर दिया। ९ मई को ८५ सिपाहियों का सैनिक अदालत द्वारा कोर्ट मार्शल कर दिया गया, अधिकतर सिपाहियों को १० वर्ष के कठोर कारावास का दंड सुनाया गया। ११ सिपाही जिनकी आयु कुछ कम थी उन्हें ५ वर्ष का दंड सुनाया हया। बंदी सिपाहियों को बेडि़यों में बाँधकर और वर्दी उतार कर सेना के सामने परेड़ कराई गयी। इसके लिये बंदी सिपाहियों ने अपने साथी सैनिकों को समर्थन न करने के लिये भी दोषी ठहराया। सबसे ज्यदा योगदान कोतवाल धन सिन्ह गुर्जर का था यहाँ कमान उनके हाथ में रही।

अगला दिन रविवार का था, इस दिन अधिकतर ईसाई आराम और पूजा करते थे। कुछ भारतीय सिपाहियों ने ब्रितानी अफ़सरों को, बंदी सिपाहियों को जबरन छुड़ाने की योजना का समाचार दिया, परंतु बड़े अधिकारियों ने इस पर कोइ ध्यान नहीं दिया। मेरठ शहर में भी अशान्ति फ़ैली हुयी थी। बाज़ार में कई विरोध प्रदर्शन हुए थे और आगजनी की घटनायें हुयी थी। शाम को बहुत से यूरोपिय अधिकारी चर्च जाने को तैयार हो रहे थे, जबकि बहुत से यूरोपिय सैनिक छुट्टी पर थे और मेरठ के बाज़ार या कैंटीन गये हुए थे। भारतीय सिपाहियों ने ३ बंगाल लाइट कैवलरी के नेत्रत्व में विद्रोह कर दिया। कनिष्ठ अधिकारियों ने विद्रोह को दबाने का प्रयास किया पर वे सिपाहियों द्वारा मारे गये। यूरोपिय अधिकारीयों और असैनिकों के घरों पर भी हमला हुआ और ४ असैनिक, ८ महिलायें और ८ बच्चे मारे गये। छुट्टी पर गये सिपाहियों ने बाज़ार में भीड पर भी हमला किया। सिपाहियों ने अपने ८५ बन्दी साथियों और ८०० अन्य बंदियों को भी छुडा लिया।[6]

कुछ सिपाहियों ने (मुख्य्त: ११ बंगाल नेटिव ईन्फ़ैंट्री) विद्रोह करने से पहले विश्वस्नीय अधिकारियों और उन्के परिवारों को सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दिया। [7] कुछ अधिकारी और उनके परिवार रामपुर बच निकले और उन्होने रामपुर के नवाब के यहां शरण ली। ५० भारतीय असैनिक (अधिकारियों के नौकर जिन्होने अपने मालिको को बचाने या छुपाने का प्रयास किया) भी विद्रोहियों द्वारा मारे गये।[8] नर संहार की अतिश्योक्ति पूर्ण कहानियों और मरने वालों की संख्या ने कंपनी को असैनिक भारतीय और विद्रोहियों के दमन का एक बहाना दे दिया।

वरिष्ठ कंपनी अधिकारी, मुख्य्त: मेजर-जनरल हेविट्ट जो कि सेना के प्रमुख थे और ७० वर्ष के थे प्रतिक्रिया में धीमें रहे। ब्रितानी सैनिक (६० राईफ़लों और यूरोपिय सैनिकों द्वारा संचालित बंगाल तोपखाना) आगे बड़े परंतु उन्हें विद्रोही सिपाहियों से लडने का कोई आदेश नहीं मिला और वे केवल अपने मुख्यालय और तोपखाने की सुरक्षा ही कर सके। ११ मई की सुबह को जब वे लड़ने को तैयार हुए तब तक विद्रोही सिपाही दिल्ली की ओर जा चुके थे।

उसी सुबह ३ बंगाल लाइट कैवलरी दिल्ली पंहुची। उन्होने बहादुर शाह ज़फ़र से उनका नेतृत्व करने को कहा। बहादुर शाह ने उस समय कुछ नहीं कहा पर किले में उपस्थित अन्य लोगो ने विद्रोहीयों का साथ दिया। दिन में विद्रोह दिल्ली में फ़ैल गया। बहुत से यूरोपिय अधिकारी, उनके परिवार, भारतीय धर्मांतरित ईसाई और व्यापारियों पर सिपाहियों और दंगाईयों द्वारा भी हमले हुए। लगभग ५० लोगों को बहादुर शाह के नौकरों द्वारा महल के बाहर मार दाला गया।[9]

दिल्ली के पास ही बंगाल नेटिव ईन्फ़ैंट्री की तीन बटालियन उपस्थित थी, बटालियन के कुछ दस्ते तुरन्त ही विद्रोहियों के साथ मिल गये और बाकियों ने विद्रोहियो पर वार करने से मना कर दिया। दोपहर में नगर में एक भयानक धमाका सुनायी पडा। नगर में बने हुए शस्त्रागार को बचाने में तैनात ९ ब्रितानी अधिकारियों ने विद्रोही सिपाहियों और अपनी ही सुरक्षा में लगे सिपाहियों पर गोलीबारी की। परंतु असफ़ल होने पर उन्होने शस्त्रागार को उडा दिया। ९ में से ६ अधिकारी बच गये पर उस धमाके से उस सड़क पर रहने वाले कई लोगो की मृत्यु हो गयी।[10] दिल्ली में हो रही इन घटनाओं का समाचार सुन कर नगर के बाहर तैनात सिपाहियों ने भी खुला विद्रोह कर दिया।

भाग रहे यूरोपिय अधिकारी और असैनिक उत्तरी दिल्ली के निकट फ़्लैग स्टाफ़ बुर्ज के पास एकत्रित हुए। यहां बहुत से तार संचालक ब्रितानी मुख्यालय को हो रही घटनाओं का समाचार दे रहे थे। जब ये स्पष्ट हो गया कि कोई सहायता नहीं मिलेगी तो वे करनाल की ओर बढे़। रास्ते में कुछ लोगो की सहायता ग्रामीणों ने की और कुछ यूरोपियों को लूटा औरा मारा भी गया।

अगले दिन बहादुर शाह ने कई वर्षों बाद अपना पहला अधिकारिक दरबार लगाया। बहुत से सिपाही इसमें सम्मिलित हुए। बहादुर शाह इन घटनाओं से चिन्तित थे पर अन्तत: उन्होने सिपाहियों को अपना समर्थन और नेतृत्व देने की घोषणा कर दी।

समर्थन तथा विरोध[संपादित करें]

दिल्ली में हुयी घटनाओं का समाचार तेजी से फ़ैला और इसने विभिन्न जिलों में सिपाहियों के बीच असन्तोष को और फ़ैला दिया। इन में बहुत सी घटनाओं का कारण ब्रितानी अधिकारियों का व्यवहार था जिसने अव्यवस्था को फ़ैलाया। दिल्ली पर हुए अधिकार की बात तार से जानने के बाद बहुत से कंपनी अधिकारी शीघ्रता में अपने परिवार और नौकरों के साथ सुरक्षित स्थानों पर चले गये। दिल्ली से १६० कि॰मी॰ दूर आगरा में लगभग ६००० असैनिक किले पर इकठ्ठा हो गये।[11] जिस शीघ्रता में असैनिक अपना पद छोड़ कर भागे उससे विद्रोही सैनिकों उन क्षेत्रों को बहुत बल मिला। यद्यपि बाकी अधिकारी अपने पदों पर तैनात थे पर इतने कम लोगों के कारण किसी प्रकार की व्यवस्था बनाना असम्भव था। बहुत से अधिकारी विद्रोहियों और अपराधियों द्वारा मारे गये।

सैनिक अधिकारीयों ने भी संयोजित तरीके से कार्य नहीं किया। कुछ अधिकारीयों ने सिपाहियों पर विश्वास किया परन्तु कुछ ने भविष्य के विद्रोह से बचने के लिये सिपाहियों को निशस्त्र करना चाहा। बनारस और इलाहाबाद में निशस्त्रीकरण में गड़बड़ होने के कारण वहां भी स्थानीय विद्रोह प्रारम्भ हो गया।[12]

यद्यपि आन्दोलन बहुत व्यापक था परन्तु विद्रोहियों में एकता का अभाव था। जबकि बहादुर शाह ज़फ़र दिल्ली के तखत पर बिठा दिये गये थे, विद्रोहियों का एक भाग मराठों को भी सिन्हासन पर बिठाना चाहता था। अवध निवासी भी नवाब की रियासत को बनाये रखना चाहते थे।

मौलाना फ़ज़ल-ए-हक़ खैराबादी और अहमदुल्लाह शाह जैसे मुस्लिम नेताओं द्वारा जिहाद[13] का आह्वान किया गया। इसका विशेषरुप से मुसलिम कारीगरों द्वारा समर्थन किया गया। इस के कारण अधिकारीयों को लगा कि विद्रोह के मुखिया मुसलिमों के बीच हैं। अवध में सुन्नी मुसलिमों ने इस जिहाद का अधिक समर्थन नहीं किया क्योंकि वो इसे मुख्य रूप से शिया आन्दोलन के रूप में देखते थे। कुछ मुस्लिम नेता जैसे आगा खान ने इस विद्रोह का विरोध किया जिसके लिये ब्रितानी सरकार ने उनका सम्मान भी किया। मुजफ़्फ़र नगर जिले के पास स्थित थाना नगर में सुन्नियों ने हाजी इमादुल्लाह को अपना अमीर घोषित कर दिया। मई १८५७ में हाजी इमादुल्लाह की सेना और ब्रितानी सैनिकों के बीच शामली की लड़ाई हुयी।

पंजाब और उत्तरी-पश्चिमी प्रोविंस (नौर्थ-वेस्ट प्रोविंस) से सिख और पठान सिपाहियों ने ब्रितानी शासन का समर्थन किया और दिल्ली पर अधिकार करने में सहायता की।[14][15] कई इतिहासकारों का ये मत है कि सिख सिपाही आठ वर्ष पहले हुई हार का बदला लेना चाहते थे जिसमें बंगाल और मराठा सिपाहियों ने ब्रितानी सैनिकों की सहायता की थी।[16]

१८५७ में बंगाल सेना में कुल ८६,००० सैनिक थे, जिसमें १२,००० य़ूरोपिय, १६,००० पंजाबी और १,५०० गुरखा सैनिक थे। जबकी भारत की तीनो सेनाओं में कुल ३,११,००० स्थानिय सैनिक, ४०,१६० य़ूरोपिय सैनिक और ५,३६२ अफ़सर थे। बंगाल सेना की ७५ में से ५४ रेजिमेण्ट ने विद्रोह कर दिया।[17] इनमे से कुछ को नष्ट कर दिया गया और कुछ अपने सिपाहियों के साथ अपने घरों की ओर चली गयी। सभी बची हुयीं रेजिमेण्ट को समाप्त कर दिया गया और निशस्त्र कर दिया गया। बंगाल सेना की दसों घुड़सवार रेजिमेण्टों ने विद्रोह कर दिया।

बंगाल सेना में २९ अनियमित घुड़सवार रेजिमेण्ट और ४२ अनियमित पैदल रेजिमेण्ट भी थीं। इनमे मुख्य रूप से अवध के सिपाही थे जिन्होने संयुक्त रूप से विद्रोह कर दिया। दूसरा मुख्य भाग ग्वालियर के सैनिको का था जिसने विद्रोह किया परन्तु ग्वालियर के राजा ब्रितानी शासन के साथ थे। बाकी अनियमित सेना विभिन्न स्रोतों से ली गयी थी और वह उस समय के समाज की मुख्यधारा से अलग थी। मुख्य रूप से तीन धड़ों क्षे ने कंपनी का साथ दिया, इनमे तीन गुरखा, छः में से पांच सिख पैदल रेजिमेण्टों और हाल ही में बनायी गयी पंजाब अनियमित सेना की छः पैदल तथा छः घुड़सवार दस्ते शामिल थे।[18][19]

१ अप्रैल १८५८ को बंगाल सेना में कंपनी के वफ़ादार भारतीय सैनिकों की संख्या ८०,०५३ थी।[20][21] ईसमें बहुत संख्या में वो सैनिक थे जिनको विद्रोह के बाद भारी मात्रा में पंजाब और उत्तरी-पश्चिमी प्रोविंस (नौर्थ-वेस्ट प्रोविंस) से सेना में भरती किया गया था।

बम्बई सेना (बांबे आर्मी) की २९ रेजिमेण्ट में से ३ रेजिमेण्ट ने विद्रोह किया और मद्रास सेना की किसी रेजिमेण्ट ने विद्रोह नहीं किया यद्यपि ५२ रेजिमेण्ट के कुछ सैनिकों ने बंगाल में काम कर्ने से मना कर दिया।[22] कुछ क्षेत्रों को छोड़ कर अधिकतर दक्षिण भारत शान्त रहा। अधिकतर राज्यों ने इस विद्रोह में भाग नहीं लिया क्योंकि इस क्षेत्र का अधिकतर भाग निज़ाम और मैसूर रजवाडे द्वारा शासित था और वो ब्रितानी शासन के अन्तर्गत नहीं आते थे।

विद्रोह[संपादित करें]

प्रारम्भिक अवस्था[संपादित करें]

बहादुर शाह ज़फ़र ने अपने आप को भारत का शहंशाह घोषित कर दिया। बहुत से इतिहासकारों का ये मत है कि उनको सिपाहियों एवं दरबारियों द्वारा इस के लिये बाध्य किया गया। बहुत से असैनिक, शाही तथा प्रमुख व्यकित्यों ने शहंशाह के प्रति राजभक्ति की शपथ ली। शहंशाह ने अपने नाम के सिक्के जारी किये जो कि अपने को राजा घोषित करने की एक प्राचीन परम्परा थी। परन्तु इस घोषणा ने पंजाब के सिखों को विद्रोह से अलग कर दिया। सिख नहीं चाहते थे की मुगल शासकों से इतनी लडाईयां लडने के बाद शासन मुगलों के हाथ में चला जाये।

बंगाल इस पूरी अवधि के दौरान शांत रहा। विद्रोही सैनिकों ने कंपनी की सेना को महत्वपूर्ण रूप से पीछे धकेल दिया और हरियाणा, बिहार, मध्य भारत और उत्तर भारत में महत्वपूर्ण शहरों पर कब्जा कर लिया। जब कंपनी की सेना ने संगठित हो कर वापस हमला किया तो केन्द्रिय कमान एवं नियंत्रण के अभाव में विद्रोही सैनिक मुकाबला कर्ने में अक्षम हो गये। अधिकतर लडायियों में सैनिकों को निर्देश के लिये राजाओं और रजवाडों की तरफ़ देखना पडा। यद्यपि ईनमे से कई स्वाभाविक नेता साबित हुए पर बहुत से स्वार्थी और अयोग्य साबित हुए।

दिल्ली[संपादित करें]

कैप्टन हडसन के द्वारा दिल्ली के राजा को बंदी बनाया जाना
  • मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फर।
  • बख्त खान की महत्वपू़र्ण भुमिका।

लखनऊ[संपादित करें]

३० जुलाई १८५७ को विद्रिहियों का रेडन बैटरी लखनऊ पर आक्रमण।
३० जुलाई १८५७ को विद्रिहियों का रेडन बैटरी लखनऊ पर आक्रमण।

मेरठ में घटनाओं के बाद बहुत जल्द, अवध (अवध के रूप में भी जाना जाता है, आधुनिक दिन उत्तर प्रदेश में), जो बमुश्किल एक साल पहले कब्जा कर लिया था की राज्य में विद्रोह भड़क उठी. लखनऊ में ब्रिटिश आयुक्त निवासी सर हेनरी लॉरेंस, रेजीडेंसी परिसर के अंदर अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए पर्याप्त समय था। कंपनी बलों वफादार सिपाही सहित कुछ 1700 पुरुषों, गिने. 'विद्रोहियों के हमले असफल रहे थे और इसलिए वे परिसर में तोपखाने और बंदूक आग की बौछार शुरू कर दिया। लॉरेंस पहली हताहतों की थी। विद्रोहियों ने विस्फोटकों से दीवारों को भंग करने और उन्हें भूमिगत सुरंगों कि भूमिगत करीबी मुकाबला करने के लिए नेतृत्व के माध्यम से बाईपास की कोशिश की। घेराबंदी के 90 दिनों के बाद, कंपनी बलों की संख्या 300 वफादार सिपाहियों, 350 ब्रिटिश सैनिकों और 550 गैर - लड़ाकों के लिए कम हो गई थी।

25 सितंबर कानपुर से सर हेनरी हैवलॉक के आदेश के तहत राहत स्तंभ और सर जेम्स आउटराम (जो सिद्धांत में अपने बेहतर था) के साथ एक संक्षिप्त अभियान में जो संख्यानुसार छोटे स्तंभ एक श्रृंखला में विद्रोही सेनाओं को हराया में अपनी तरह से लखनऊ लड़े तेजी से बड़ी लड़ाई की। यह लखनऊ के पहले राहत के रूप में जाना बन गया है, के रूप में इस बल को मजबूत करने के लिए घेराबंदी को तोड़ने के लिए या खुद को मुक्त कर देना पर्याप्त नहीं था और इतना करने के लिए चौकी में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया था। अक्टूबर में एक और बड़ा है, के तहत सेना के नए कमांडर इन चीफ, सर कॉलिन कैम्पबेल, अंत में चौकी को राहत देने में सक्षम था और 18 नवम्बर को, वे शहर के भीतर बचाव एन्क्लेव खाली, महिलाओं और बच्चों को पहले छोड़ने. वे तो कानपुर, जहां वे तांत्या टोपे द्वारा एक प्रयास कानपुर की दूसरी लड़ाई में शहर हटा देना पराजित करने के लिए एक व्यवस्थित वापसी का आयोजन किया।

बरेली[संपादित करें]

मेरठ में १० मई १८५७ को -२१ दिन पहले- क्रान्ति का बिगुल बज गया। बरेली में तब ८ न० देशी सवार, १८ और ६८ न० की पैदल सेना थी। इस सेना ने ३१ मई को विद्रोह कर दिया। यह रविवार क दिन था।सुबह दस बजे एक तोप दगी। यह क्रान्ति का संकेत था। सेना बैरकों से बाहर निकल आई।

बिहार[संपादित करें]

कुंवर सिह की भूमिका[संपादित करें]

मेरठ[संपादित करें]

ब्रितानी दमन[संपादित करें]

१८५७ का विद्रोह करने वाले सेनानियों को अत्यन्त क्रूर सजाएँ दी गयीं।

फिल्मो और अन्य मिडिया पर[संपादित करें]

अब सारे समाचारपत्रों में भी अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध आरंभ हो गया था। उनके विरोध में बहुत कुछ छापा जा रहा था।

परिणाम[संपादित करें]

1857 ई. का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (म्यूटिनी) ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एक महान घटना थी। यह संग्राम आकस्मिक नहीं बल्कि पूरी शताब्दी के भारतीय असंतोष का परिणाम था। इसके लिये एक महान योजना बनी और क्रियान्वित की गयी थी।

ब्रायन हाफ्टन हाँजसन, रेज़िडेंट नेपाल, ने हिमालय में कॉलोनाइज़ेशन की योजना प्रस्तुत की थी कि आयरलैण्ड और स्कॉटलैण्ड के किसानों को भारत में बसने के लिए मुफ्त जमीन देकर प्रोत्साहित किया जाय। ब्रिटिश सत्ता ने भी अपने देशवासियों को, विशेषकर पूँजीपतियों को, इस संबंध में प्रोत्साहित किया। उनकी स्थिति को मज़बूत करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने भारतीय मजदूरों के लिए ऐसा कानून पास किया जिससे हज़ारों की संख्या में वे कानूनी तौर पर गुलाम हो गए।

गदर के बाद ब्रिटिश नीतिज्ञों की बड़ी तकरार हुई। मार्च, 1858 ई. के ‘कलकत्ता रिव्यू’ में इसका उल्लेख मिलता है। तदनुसार ‘‘चारों तरफ से हमें इस तरह की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं जिससे परामर्श मिलते हैं कि भारतीयों को अवश्य ईसाई बना लेना चाहिए, हिन्दुस्तानी ज़बान को खत्म कर देना चाहिए और उसकी जगह अपनी मातृभाषा अंग्रेजी प्रचलित कर देनी चाहिए।’’

चित्रदीर्घा[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

टीका-टिप्पणी[संपादित करें]

  1. File:Indian revolt of 1857 states map.svg
  2. The Gurkhas by W. Brook Northey, John Morris. ISBN 81-206-1577-8. Page 58
  3. http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/2007142.cms
  4. Eric Stokes “The First Century of British Colonial Rule in India: Social Revolution or Social Stagnation?” Past and Present №.58 (Feb. 1973) pp136-160
  5. Seema Alavi The Sepoys and the Company (Delhi: Oxford University Press) 1998 p5
  6. Hibbert, The Great Mutiny, pp. 80-85
  7. Sir John Kaye & G.B. Malleson.: The Indian Mutiny of 1857, (Delhi: Rupa & Co.) reprint 2005 p49
  8. “the Indian Mutiny”, Saul David, Viking, 2002, page 93
  9. Hibbert, The Great Mutiny, pp. 93-95
  10. Hibbert, The Great Mutiny, pp. 98-101
  11. Hibbert, The Great Mutiny, pp. 152-163
  12. Michael Edwardes, Battles of the Indian Mutiny, pp 52-53
  13. Indian mutiny was 'war of religion' - BBC
  14. The Story of the Storm — 1857
  15. Zachary Nunn. The British Raj
  16. The Indian Mutiny, John Harris, Page57, Granada 1973
  17. Harris John, The Indian Mutiny, Wordsworth editions, 2001
  18. A.H. Amin, Pakistan Army Defence Journal
  19. A.H. Amin, Orbat.com
  20. Lessons from 1857
  21. The Indian Army: 1765 - 1914
  22. David Saul The Indian Mutiny Page 19, Viking, 2002

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]