मंगल पांडे

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मंगल पाण्डेय
Mangal pandey gimp.jpg
जन्म 30 जनवरी 1831
नगवां तहसील बलिया सदर जिला गाजीपुर (वर्तमान बलिया जनपद) उत्तर प्रदेश, भारत
मृत्यु 8 अप्रैल १८५७
बैरकपुर, भारत
व्यवसाय बैरकपुर छावनी में बंगाल नेटिव इन्फैण्ट्री की ३४वीं रेजीमेण्ट में सिपाही
प्रसिद्धि कारण भारतीय स्वतन्त्रता सेनानी
धार्मिक मान्यता हिन्दू
मंगल पाण्डेय ने इसी एन्फील्ड राइफल का प्रयोग २९ मार्च १८५७ को बैरकपुर छावनी में किया था

मंगल पाण्डेय (बांग्ला: মঙ্গল পান্ডে; 30 जनवरी १८२७ - ८ अप्रैल १८५७) सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रदूत थे। यह संग्राम पूरे हिन्दुस्तान के जवानों व किसानों ने एक साथ मिलकर लडा था। इसे ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा दबा दिया गया। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में बरतानिया हुकूमत का आगाज हुआ।

संक्षिप्त जीवन वृत्त[संपादित करें]

वीरवर मंगल पाण्डेय का जन्म 30 अक्टूबर 1831 को वर्तमान उत्तर प्रदेश, जो जिले में स्थित ग्राम नगवा के एक सामान्य परंतु प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राम्हण परिवार में हुआ था। स्वाधिनता की वेदी पर पहला बलिदान ब्रितानी साम्राज्य के वफादार, चतुर व्यापारी, जो भारत में आए तो व्यापार करने थें, लेकिन इस देश में चल रही फूट ने उन्हे इस पर राज करने की जिप्सा जगा दिया। सन् 1757 ई0 से ब्रिटिशों के गुलाम बने भारत में सौ वर्षों बाद इस दासता से मुक्ति के लिए सामूहिक संघर्ष करने की स्थितियंा बन पायी। 1857 ई0 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को जन-जन का मुक्ति संग्राम बनाने लिए हमारे रणनीतिकारों ने बड़े ही व्यापक पैमाने पर तैयारी भी किया था। इस समवेत मुक्ति संग्राम को आरम्भ करने की तिथि भी इसके नायकों द्वारा 31 मई 1857 निर्धारित की गयी थी। लेकिन इस तिथि से दो माह पूर्व ही गंगा की उर्वर मिट्टी में पड़ा क्रान्ति बीज फूट पड़ा। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी (कलकत्ता) में इस संग्राम के अगुआ फौज की 34 नम्बर देशी सेना की 39वीं पलटन के 1446 नम्बर सिपाही श्री मंगल पाण्डे ने सेना के दो अधिकारियों मि बाॅफ और मि. ह्यूसन को मौत के घाट उतार कर, स्वाधिनता की बलिवेदी पर अपना स्थान आरक्षित कर लिया। यद्यपि की ब्रिटिश एवं ब्रिटिश साम्राज्य के आश्रित इतिहासकारों ने श्री मंगल पाण्डे के बलिदान को मामूली सैनिक विद्रोह बताकर और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से अलग ब्रिटिश फौज की आन्तरिक बगावत बताने का असफल प्रयास किया गया है। मंगल पाण्डेय की बगावत अगर मात्र एक सिपाही का विद्रोह था, तो इस एक बागी को नियंत्रण में करने के लिए फौजी अधिकारियों को बैरकपुर छावनी में बाहर से फौज क्यों मंगानी पड़ी? अगर यह सैनिक ही विद्रोह था तो हजारों किलोमीटर दूर मेरठ छावनी में 10 मई 1857 को कैसे सैनिकों ने विद्रोह कर दिया? उससे भी बड़ा इस शहादत का सबूत तो ब्रिटिश संसद के 9 सितम्बर 1857 के अभिलेखों में दर्ज है, जिसमें तत्कालीन वरिष्ठ सांसदों जो भारत की ब्रिटिश फौज में हुई इस विद्रोह पर संसद में अपनी चिन्ता जताते हुए कहते हैं कि ‘‘ भारत में सेना में हुई बगावत गम्भीर घटना है। ब्रिटिश साम्राज्य पर जो सबसे बड़ी विपत्ती आ सकती थी, वह हमारे सिर पर घहरा पड़ी है’’। यह तथ्य इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि बलिया के मंगल पाण्डेय सन् 1857 ई. के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम बलिदानी तो है ही, इस प्रथम समवेत मुक्ति संग्राम के अग्रदूत भी है। मंगल पाण्डे ब्रिटिश सेना के वह पहले सिपाही भी हैं, जिन्होने किसी अंग्रेज अधिकारी पर गोली चलाने का साहस किया और दो सशस्त्र अंग्रेज अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया। मंगल पाण्डे के इस दुघष पौरूष का अंाकलन इस बात से किया जा सकता है कि उस घटना के बाद अंग्रेजों के दिलों दिमाग पर मंगल पाण्डे का खौफ इस कद हावी था, कि उनकी पत्नियां बैरकपुर से कलकत्ता भाग गयी। अंग्रेज अफसरों को हर भारतीय सिपाही (पाण्डी,ज) पाण्डे के जमात का ही दिखता था। इसका एक बड़ा कारण यह भी था, कि उस समय अंग्रेजों ने केवल ब्राम्हणों और मुसलमानों को ही सेना में रखने लायक विश्वास पात्र समझा था। राजपूत जाति पर वह बहुत कम विश्वास करते थें। क्योंकि राजपूतों से बागी राजा रक्त सम्बन्ध जोड़कर अपने साथ मिला लेते थें। वैेसे भी राजपूत अंग्रेजी राज को अच्छा कानते थें। सन् 1857 में उत्तर भारत और बंगाल की अंग्रेजी फौज में पचहत्तर प्रतिशत ब्राम्हण सिपाही ही थे। अंग्रेजों को ब्राम्हण सिपाहियों पर पूरा विश्वास था, कि वह उनके प्रति निष्ठावान रहेंगे। तथा शेष छोटी जातियों के इनका आसानी से अनुसरण करेगी। कमोबेस ऐसा था भी लेकिन जब राष्ट्र और धर्म की रक्षा की आन पर बात आयी तो ब्राम्हण सिपाही मंगल पाण्डे ने ब्रितानियों के इस विश्वास को चकनाचूर कर दिया। विद्रोह का बीज मंगल पाण्डेय की 34 वीं नेटिव इन्फ्रेन्टरी बंगाल के बैरकपुर छावनी में थी। 31 जनवरी 1857 की घटना है, मंगल पाण्डे अपने लोटे (पानी पीने का बर्तन) में पानी भरकर भोजन करने रसोई घर की ओर जा रहे थें। उसी समय रामटहल नाम का एक जमादार जो भंगी जाति का था। वहंा से गुजर रहा था। उसे प्यास लगी थी। उसने मंगल पाण्डे से कहा - पण्डित जी, बहुत प्यास लगी है, मुझे अपने लोटे से पानी पिला दीजिए। उस समय जातिय भेदभाव चरम पर था, जमादार अछूत जाति का था। मंगल पाण्डे ने उसे दुत्कार दिया। झुझलाते हुए व्यंग में बोला - पण्डित जी आपको अपनी जाति का बहुत गुमान है न। देखते हैं अब आप कैसे उसे बचा लेते है? जब अंग्रेज आपको गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस दंातों से नोचने के लिए देते हैं। श्री रामटहल उसी दमदम छावनी (कलकत्ता) में खलासी जमादार था जहंा अंग्रेजी फौज के लिए कारतूस बनाये जाते थें। इसलिए उनकी बात पर अविश्वास करने का कोई कारण ही नहीं था। मंगल पाण्डे को यह बात समझ में आ गयी कि अंग्रेज हमारा धर्मभ्रष्ट करना चाहते है। (साभार- ए कम्प्रीहेन्सिल हिस्ट्री आॅफ इण्डिया- हेनरी बैवरीज ) सुरेन्द्र नाथ सन् 1857 वैसे यह बात अफवाहों में काफी पहले से तैर रही थी, कि अंग्रेजी फौज के लिए चर्बी वाले कारतूस तैयार कराये जा रहें है। बिलियम केय के हिस्ट्री आॅफ स्पयवार 1857 से प्राप्त वर्णन के अनुसार कलकत्ता स्थित तत्कालीन इन्सपेक्टर जनरल आॅफिसर के रिकार्डों से यह बात सिद्ध होती है कि 16 अगस्त 1856 को कलकत्ता के ही गंगाधर बनर्जी एण्ड कम्पनी को 12 पैसा प्रति सेर (750 ग्राम) की दर से पशुओं की चर्बी आपूर्ति का ठेका दिया गया था। इस बात की जानकारी होेने पर हिन्दू और मुसलमान दोनों सैनिकों ने विरोध भी किया और चर्बी के स्थान पर मोम या तेल का उपयोग करने की सलाह भी दिया था। किन्तु किसी ध्यान नहीं दिया था, जबकि तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग ने भी 7 फरवरी 1857 को ईस्ट इण्डिया कम्पनी के संचालकों से बात किया। यह बताया भी कि इससे कम्पनी के सैनिक भड़क जाएंगे। लेकिन उनकी बात पर भी कम्पनी ने ध्यान नहीं दिया। इस घटना के बाद मंगल पाण्डेय के सीने में अपने धर्म को बचाने और अंग्रेजों से इस नापाक षडयंत्र का बदला लेने की आग धधकने लगी। उन्हाने इस बात की चर्चा अपने साथियों से किया तो वह भी सुलगने लगे। हिन्दू गाय को पवित्र मानकर उसे मंा मानते हैं, मुसलमान सुअर को नापाक जानवर मानते हैं, इस कारण दोनों कौम के सिपाही भड़क उठे थे। 24 फरवरी 1857 को मंगल पाण्डे की 34वीं रेजीमेन्ट ने गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग की इस पहल का स्वागत किया। जिसमें उन्होने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की चर्बी का प्रयाग नहीं करने की सलाह दिया था। सभी सिपाही गवर्नर को रेजीमेन्ट की ओर धन्यवाद ज्ञापित किये। ल्ेकिन ब्रिटिश सेना के अधिकारियों पर इस घटना की बिल्कुल उल्टी प्रतिक्रिया हुई। चाल्र्स वाल की पुस्तक ‘हिस्ट्र आॅफ इण्डियन म्यूटिनी’ के अनुसार 25 फरवरी 1857 को 19वीं पलटन के कमाण्डर माइकल ने अपने सैनिकों को अगले दिन (26 फरवरी) को निःशस्त्र (बिना बन्दूक के) परेड में आने का आदेश दिया। वह अपने सैनिकों की निष्ठा को परखना चाहता था। अगले दिन कमाण्डर माइकल के होश उड़ गये। जब उन्होने देखा कि किसी सैनिकों ने उनके आदेश का पालन नहीं किया है? पूरी पलटन अपनी बन्दूकों के साथ परेड ग्राउण्ड पर पंहुची थी। उसने सैनिकों को फटकारना शुरू किया तो सैनिक और भी उग्र हो उठें। विप्लव का यह बीज पूरी पलटन में अंकुरण की प्रक्रिया में सभी के अन्दर पलने लगा। मंगल पाण्डे का विद्रोह इस घटना के लगभग 1 माह बाद 29 मार्च 1857 को राष्ट्र-धर्म की रक्षा के लिए अन्दर ही अन्दर सुलग रहे, मंगल पाण्डे अपनी आत्मरात्मा की आवाज पर विद्रोह का विगुल बजाने निकल पड़े। 26 साल के युवा मंगल आज सुबह बड़े प्रसन्न मुद्रा जागे, नहा धोकर पूजा पाठ किये। बड़े सलीके पूरी वर्दी सफेद टोपी, लाल रंग का बन्द गले का कोट पहने, लेकिन आज ब्रितानी पैन्ट की जगह उन्होने अपनी भारतीय धोती को दो चोंछिटा बांधकर पहना। नये संकल्प, असीम आत्मबल और उत्साह से लबरेज परेड मैदान में आ पंहुचे, यह मैदान बैरकपुर छावनी से मात्र 50 मीटर की दूरी पर था। सशस्त्र मंगल पाण्डे मैदान पर पंहुच कर अपने साथियों को आवाज लगाने लगे - भाइयों! बैरकों से बाहर निकलों मेरे पास आवो, अंग्रेजों को मार भगावो और उनका इस पर से कब्जा खत्म कर दो। मंगल पाण्डे की इस बगावती दहाड़ से पूरी छावनी दहल उठी, भारतीय सैनिकों में आजादी की तरंग कौंधने लगी। ब्रितानी लेखक मैलेसन ने अपनी पुस्तक ‘इण्डिया म्यूटिनी में लिखा है कि मैदान में खड़े होकर अपने साथियों को आवाज लगा रहे बागी सिपाही मंगल पाण्डे पर लेफ्टिनेण्ट जनरल ह्यूसन की निगाह सबसे पहले पड़ी। उन्होने एक जमादार को आदेश दिया कि पाण्डेय को गिरफ्तार कर लो, जमादार इण्डियन था, उसने ह्यूसन की बात अनसूनी कर दिया। तभी एक ओर से लेफ्टिनेन्ट बाफ घोड़े पर सवार हो मैदान में आ पंहुचे, वह पाण्डे की ओर ही बढ़ रहे थें। मि. ह्यूसन ने मि. बाफ को चेतावनी दिया कि आगे मत बढ़ो, दाहिने धूम जाओ, क्योंकि मि. ह्यूसन ने बागी सिपाही मंगल पाण्डे को अपनी रायफल में गोली भरते हुए देख लिया था। आजादी की पहली गोली गरजीं मंगल पाण्डे को पकड़ने बढ़ रहे लेफ्टिनेन्ट बाफ को मंगल पाण्डे ही देख चुके थें। उनकी रायफल गरज उठी। धंाय-धंाय की आवाज से बैरकपुर छावनी दहल उठी, मि. बाफ अपने घोड़े सहित जमीन पर आ गिरा। लेकिन गोली लगने के बाद भी मि. बाफ सम्भलकर उठा और मंगल पाण्डे पर अपनी रिवाल्वर से फायर किया। किन्तु उसका निशाना चूक गया। तभी मि. ह्यूसन घात लगाकर आगे बढ़ा, लेकिन मंगल पाण्डे चैकन्ने थे। उन्होने ललकारते हुए ह्यूसन को गोली मार दी। चन्द मिनट छटपटा कर ह्यूसन का शरीर वहीं पर शान्त हो गया। अब मंगल पाण्डे के पास बाफ से निपटने के लिए गोली भरने का समय नहीं बचा था। वह अपनी कटार (रायफल के आगे लगा खंजर) लेकर बाफ पर टूट पड़े। मंगल को ब्रितानी गुलामी के जितने जुल्म याद आये, उतने बार उन्होने अपने कटार से मि. बाफ पर किये। आखिर अपने घोड़े के साथ बाफ भी मौत की नींद सो गये। गुलाम भारत की ओर से किसी ब्रितानी सेना के ही गुलाम भारतीय सिपाही द्वारा दो ओहदें के अंग्रेज अधिकारियों का बध पूरी दुनिया को स्तब्ध कर देने वाली घटना थी। हिस्ट्री ऑफ इण्डियन म्यूटनी में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार दुनिया का दिल दहला देने वाली इस घटना को जमादार और लगभग 30 सिपाही खड़े होकर देख रहे थें। लेकिन कोई भी अपनी जगह से हिला तक नहीं, सभी तमाशबीन बने रहें। घटना की खबर जब कमाण्डिंग आॅफिसर जनरल हियर्सी को मिली तो वह दौड़ते हुए, मैदान पर पंहुचे, उन्होने भी जमादार को पाण्डे को पकड़ने का आदेश दिया। परन्तु जमादार ने उनके आदेश को अनसुना कर दिया। मि. हियर्सी बौखला उठे। उन्होने वहीं जमादार के कोर्ट मार्शल का आदेश दे दिया। बाद में अनुशासनहीनता के आरोप में उस जमादार को जो छोटी जाति का था, 6 अप्रैल 1857 को फंासी दे दी गयी। अंग्रेज इतिहासकार मि. चाल्र्स वाल ने लिखा है कि एक बार चार सिपाहियों ने मंगल पाण्डे को पकड़ने का प्रयास किया। लेकिन इसी जमादार ने उन्हे डंाटकर मना कर दिया। इससे उत्तेजित वहंा उपस्थित अंग्रेज कर्नल ह्वेलर ने जमादार को पकड़ने का आदेश दिया। लेकिन मि. ह्वेलर की बात को वहंा खड़े फौजियों ने ठुकरा दिया। यद्यपि शेख पलटू नाम के एक मुसलमान सिपाही ने पीछे से बागी मंगल पाण्डे को जरूर पकड़ लिया था, लेकिन वहंा उपस्थित हिन्दू मुसलमान सभी सिपाही शेख पलटू पर पत्थरों और जूतों की बौछार करने लगें, और अगर पलटू, पाण्डे को छोड़कर भागा नहीं होता तो ये सभी उसे मार डालते। ये सभी सैनिक काफी गुस्से में थें। (दी ग्रेट म्यूटिनी, क्रिस्टोफार हिबर्ट) बैरकपुर छावनी इस मैदान पर लोमहर्षक संघर्ष चल रहा था, एक तरफ फौज के ब्रिटिश अधिकारी खड़े थें, दूसरी ओर अभिमन्यू की तरह से अकेले सिंह की तरह मंगल पाण्डे दहाड़ रहें थे। इस संघर्ष को देख रहे सिपाही अपने अंग्रेज अधिकारियों का आदेश भी नहीं सुन रहें थें, और मंगल पाण्डे की ओर से इस जंग में भी नहीं उतर रहें थें। इसको उस काल खण्ड की मन स्थिति से परिभाषित करें तो ये तमाशबीन अंग्रेजी सेना के भारतीय सिपाही अंग्रेज अफसरों को इस बात का अहसास करा रहें थें, कि देखा हमारा एक भाई तुम्हारे पूरे ब्रिटिश अफसरों पर भारी हैं, उससे नैतिकता के साथ तुम एक एक कर लड़कर अपनी औकात देख लो। इसीलिए वह किसी ओर से नहीं बोल रहें थे। अलबत्ता शेख पलटू को सबक सिखा दिया। अपने सिपाहियों द्वारा किये जा रहे इस मौन व्यवहार से बौखलाए कर्नल हियर्सी ने सिपाहियों पर लालच का पाशा फेंका। उसने ब्रितानी साम्राज्य के स्वामी भक्त सिपाही शेख पलटू का वहीं खड़े-खड़े प्रमोशन कर उसे हवलदार बना दिया। लेकिन जब उसकी इस चाल का भी प्रभाव सैनिकों पर नहीं पड़ा तो वह विक्षिप्त सा होकर वहंा मौजूद अपने दोनों बच्चों से बोला, बेटे यदि यह बागी सिपाही मुझे मार डाले तो तुम लोग इसे जरूर मार देना। अब हिन्दू सिपाही अंग्रेजों के प्रति वफादार नहीं रहें। इधर कर्नल हियर्स बड़बड़ा रहा था। उधर मंगल पाण्डे अपने साथियों को अंग्रेजों के सफाये के लिए आवाज लगा रहे थें, लेकिन जब कोई भी उनका साथ देने आगे नहीं बढ़ा तो, सबको धिक्कारते हुए श्री मंगल पाण्डे ने खुद को गोली मार लिया। लेकिन उनकी मौत नहीं हुई, गम्भीर रूप से घायल अवस्था मंे मंगल पाण्डे को कुछ मुसलमान सिपाहियों मदद से गिरफ्तार कर लिया गया। (एडवर्ड जिलिएट: डेयरिंग डीडस आॅफ इण्डियन हिस्ट्र) न्याय का नाटक कमाण्डिंग आॅफिसर कर्नल हियर्सी के सैनिक न्यायालय में श्री मंगल पाण्डे पर मुकदमा चला। इस कोर्ट मार्शल की कार्यवाही में श्री पाण्डे ने बड़ी ही बेबाकी से ब्रिटिश सेना के अनुशासन को तोड़ने और दो सैनिक अधिकारियों मि. बाफ और मि. ह्यूसन को मौत के घाट उतारने का अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि अंग्रेजों से मेरी कोई जाति दुश्मनी नहीं थी। मैने जो कुछ भ्ीा किया अपने धर्म और राष्ट्र की रक्षा के लिए किया। जिसका मुझे कोई अफशोस नहीं है। इस स्वीकारोक्ति के बाद कर्नल हियर्सी ने श्री मंगल पाण्डे को फंासी की सजा सुनाया। मंगल पाण्डेय को 7 अप्रैल 1857 को फंासी दी जानी थी, लेकिन बैरकपुर छावनी का कोई भी जल्लाद धर्म की आन पर मर मिटने वाले इस बहादुर ब्राम्हण सैनिक फंासी पर लटकाने के लिए तैयार नहीं हुआ। तब कलकत्ता से जल्लाद बुलाये गये, जिन्हे यह नहीं बताया गया था, कि किसे फंासी देनी है, इन्हे जल्लादों ने 8 अप्रैल 1857 ई. को श्री मंगल पाण्डे को फंासी पर लटकाकर मार डाला। अमर शहीद मंगल पाण्डे को फंासी दिए जाने के सम्बन्ध में एक सनसनी खेज तथ्य प्रकाश में आया है। जबलपुर के संग्रहालय में सुरक्षित ब्रिटिश फौज के जनरल आर्डर बुक्स से प्राप्त विवरण के अनुसार कर्नल हियर्सी ने बागी फौजी मंगल पाण्डे को फंासी की सजा 18 अपै्रल 1857 ई. को सुनाई थी। लेकिन उसके दस दिन पहले ही 8 अप्रैल 1857 को उन्हे फंासी दे दी गयी। इस बात को ब्रिटिश फौज ने गोपनीय रखा। इसका सीधा मतलब है कि श्री मंगल पाण्डे को जीवित रखना ब्रिटिश फौज पर भारी पड़रहा है। उन्हे फंासी पर लटका देने के बाद कोर्ट मार्शल की कार्यवाही की खानापूर्ति की गयी। ब्रिटिश सेना द्वारा की गयी इस अनैतिक कार्यवाही की विस्तृत जानकारी हिन्दू दैनिक अमृत प्रभात ने 9 अप्रैल 1981 को प्रकाशित किया था।

विद्रोह का परिणाम[संपादित करें]

सन् १८५७ के सैनिक विद्रोह की एक झलक

मंगल पांडे द्वारा लगायी गयी विद्रोह की यह चिन्गारी बुझी नहीं। एक महीने बाद ही १० मई सन् १८५७ को मेरठ की छावनी में बगावत हो गयी। यह विप्लव देखते ही देखते पूरे उत्तरी भारत में फैल गया जिससे अंग्रेजों को स्पष्ट संदेश मिल गया कि अब भारत पर राज्य करना उतना आसान नहीं है जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद ही हिन्दुस्तान में चौंतीस हजार सात सौ पैंतीस अंग्रेजी कानून यहाँ की जनता पर लागू किये गये ताकि मंगल पाण्डेय सरीखा कोई सैनिक दोबारा भारतीय शासकों के विरुद्ध बगावत न कर सके।[कृपया उद्धरण जोड़ें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

शिवकुमार सिंह कौशिकेय "क्रांति का प्रथम नायक मंगल पांडे" कोसल पब्लिशिंग हाउस फ़ैजाबाद 2014 ISBN 978-93-81799-20-8