बलिया

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बलिया_(उत्तर_प्रदेश)
—  शहर  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य उत्तर प्रदेश

district = बलिया

निर्देशांक: 25°50′51″N 84°06′16″E / 25.847623°N 84.104463°E / 25.847623; 84.104463

बलिया (भोजपुरी: बलिया या बलिंयाँ) भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में एक नगर निगम वाला शहर है। यह अपने ही नाम के जिले का मुख्यालय भी है। इस शहर की पूर्वी सीमा गंगा और सरयू के संगम द्वारा बनायी जाती है। यह शहर वाराणसी से 155 किलोमीटर स्थित है।

भोजपुरी यहाँ की प्राथमिक स्थानीय भाषा है।

यह क्षेत्र गंगा और घाघरा के बीच के जलोढ़ मैदानों में स्थित है। अक्सर बाढ़ग्रस्त रहने वाले इस उपजाऊ क्षेत्र में चावल, जौ, मटर, ज्वार-बाजरा, दालें, तिलहन और गन्ना उगाया जाता है।

इतिहास[संपादित करें]

बलिया एक प्राचीन शहर है। भारत के कई महान संत और साधु जैसे जमदग्नि, वाल्मीकि, भृगु, दुर्वासा आदि के आश्रम बलिया में थे। बलिया प्राचीन समय में कोसल साम्राज्य का एक भाग था। यह भी कुछ समय के लिए बौद्ध प्रभाव में आया था। पहले यह् गाजीपुर जिले का एक हिस्सा था, लेकिन बाद में यह जिला हो गया।

आजादी का आंदोलन:सौरभ सिंह अगस्त का महीना हो, गंगा एवं घाघरा दोनों नदियां अपनी सीमाएं तोड़ने को आतुर हों और ऐसे मौके पर बलिया की बगावत की चर्चा न हो तो यह बलिया के साथ अन्याय होगा। और बलिया ने न तो कभी अन्याय बर्दास्त किया है और न ही आगे करेगा। ऐसा हो भी क्यों नहीं, आखिर इसी ऋषि मुनियों की धरती बलिया ने महर्षि बाल्मीकि को रामायण की रचना के लिए प्रेरित किया तो दर्दर ऋषि एवं भृगु मुनि ने इस धरती को अपने तपोबल से सींचा है। रही बात बलिया के बगावत की है तो उसे 19 अगस्त 1942 को पूरे देश ने देखा। जी हां, बलिया के इसी बगावत ने आजादी के आंदोलन की कई तारीखें लिखी, देश वासियों को जुल्म एवं अन्याय के खिलाफ बगावत सिखाया और खुद बागी बलिया बन गया। गंगा एवं घाघरा के बीच बसी बलिया हजारों साल पुरानी सभ्यता एवं संस्कृतियों को समेटे हुए हैं। कौशल राज से शुरू हुए बलिया के इतिहास के विवरण कई पौराणिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथों में मिलते हैं। तीखे तेवर, फौलादी इरादे एवं मातृभूमि पर मर मिटने का जज्बा बलिया वासियों को विरासत में मिली है और इसे ही समूचे देश ने बगावत का नाम दिया है। 1857 की मेरठ क्रांति तो आप सभी को याद ही होगी। बलिया के ही बीर सपूत मंगल पांडे ने इस क्रांति का आगाज कर अंग्रेजों की चूलें हिला दी थी। आजादी का पहला शंखनाद मेरठ में हुआ ही था कि पूरा देश आजादी को जोश में उबलने लगा। बलिया में बाबू जगन्नाथ सिंह ने ब्रिटेन के प्रिंस का ताज अपने जूते के फीते में बांध कर बगावत की मशाल उठा ली। इसके बाद चाहे असहयोग आंदोलन हो या झंडा सत्याग्रह या फिर सविनय अवज्ञा आंदोलन और नमक सत्याग्रह हर जगह बलिया के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। अगस्त 1942 में महात्मा गांधी, पंडित नेहरु एंव सरदार पटेल आदि बंबई में थे। वहां गांधी जी ने करो या मरो का नारा दिया, लेकिन साथ में यह अपील भी कर दी कि अहिंसा सर्वोपरि है। लेकिन इस बात को बलिया के लोग नहीं समझ पाए कि आखिर अहिंसा के साथ करो या मरो कैसे संभव है। इसे बलिया वालों की नासमझी कह सकते हैं, लेकिन इसी ने बलिया की बागी बना दिया। कब क्या हुआ 9 अगस्त 1942: बलिया के लोग गांधी जी का मंतव्य का अर्थ ढूंढने के लिए बेचैन थे। इसी बीच बंबई में गांधी, नेहरु एवं पटेल समेत पचास से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हो गई। यह खबर जंगल की आग की तरह बलिया पहुंच गई, लोग आर पार की लड़ाई की तैयारी में लग गए। 10 अगस्त: सुबह होने से पहले ही पूरा बलिया जाग गया। सूर्य की पहली किरण के साथ ही भारत माता की जय के नारों से पूरा बलिया गूंज उठा और इसी के साथ बलिया में जनांदोलन शुरू हो गया। 11 अगस्त: लोग जुलूश लेकर मुख्यालय पहुंच गए। लोगों का हुजूम एवं उनके आक्रोश को देखते हुए बलिया के तत्कालीन कलेक्टर जगदीश्वर निगम डर गए और उन्होंने बरतानिया हुकुमत को बलिया की आजादी की सिफारिश कर दी। इस बीच पुलिस ने आजादी के कई दिवानों को गिरफ्तार कर लिया। 12 अगस्त: पूरे जिले में बगावत चरम पर थी। कोई नेता नहीं था, लेकिन सभी बागी थे। जुलूश निकल रहा था, इसमें कलेक्टर जगदीश्वर निगम के बेटे शैलेश निगम भी शामिल थे। इसी बीच पुलिस ने एक बार फिर जुलूश में से 30 छात्रों को उठा लिया और नंगा कर यातानाएं दी। 13 अगस्त: बलिया वासियों ने रेलवे स्टेशन पर कब्जा कर लिया, वहीं महिलाओं ने कचहरी पर कब्जा करते हुए कचहरी की मुंडेर पर तिरंगा फहरा दिया। उधर, क्रांतिबीरों ने टाउन हाल पर कब्जा करते हुए अंग्रेजी झंडे को उखाड़ फेंका। 14 अगस्त: क्रांतिबीरों ने डाकघर पर कब्जा कर सारा खजाना एवं कागजात लूट लिए। इसके बाद शहर कोतवाल ने भीड़ पर घोड़े दौड़ाए तो लोगों ने इस कदर मुकाबला किया भारी फोर्स के बीच वह खुद अपनी जान की भीख मांगता नजर आया। 15 अगस्त: आंदोलन के लिए बलिया आ रहे छात्रों के समूह को पुलिस ने स्टेशन पर ही गिरफ्तार कर लिया। ऐसे में आक्रोशित छात्रों ने पुलिस स्टेशन पर ही कब्जा कर उसे आग के हवाले कर दिया। 16 अगस्त: छात्रों ने रेलवे स्टेशन में आग लगा दी और एक ट्रेन को अगवा कर उसे आजाद ट्रेन के नाम से चला दिया। 17 अगस्त: जिले भर में चरम पर पहुंचे बगावत ने तहसीलों को अपने कब्जे में ले लिया। आज के आंदोलन में बच्चों से लेकर बुजुर्गो तक एवं मजदूरों से लेकर व्यापारियों तक सभी ने अपनी अहम भूमिका निभाई। 18 अगस्त: लोगों का जोश उफान पर था। प्रशासन एवं पुलिस के लोग खुद अपने बचाव की जगह तलाश रहे थे। इसी बीच बैरिया में खून संघर्ष हुआ और 20 क्रांतिबीर पुलिस की गोली से शहीद हो गए। फिर क्या था, लाठी, डंडे, लेकर थाने पर पहुंचे लोगों ने बैरिया थाने पर कब्जा करते हुए थानेदार समेत सभी को हवालात में बंद कर दिया और थाने पर तिरंगा फहरा दिया। 19 अगस्त: बलिया के लोग आखिरी एवं निर्णायक जंग के लिए तैयार थे। सुबह होने से पहले जिले भर से लोग आजादी की सांस लेने के लिए बेचैन हो उठे। देखते ही देखते चारो ओर से लोग बलिया को आजाद करने के लिए निकल पड़े। इसकी भनक कलेक्टर जगदीश्वर निगम को लगी तो लोगों के पहुंचने से पहले वह खुद ही जेल पहुंच कर क्रांतिबीरों के लिए दरवाजे खोल दिया। उन्होंने चित्तूपांडे से आग्रह किया कि वह बलिया की बगावत के सामने घुटने टेक रहे हैं। इसी के साथ उन्होंने अपना पद छोड़ दिया और बलिया 19 अगस्त 1942 को देश में सबसे पहले आजाद हो गया।

भूगोल[संपादित करें]

बलिया 25°27′N 84°06′E / 25.45°N 84.10°E / 25.45; 84.10पर स्थित है[1] शहर की पूर्वी सीमा गंगा और घाघरा के संगम में निहित है। वहाँ पर एक बहुत प्रसिद्ध भगवती जी का मन्दिर है जो रेवती के बगल में एक छोटे गाँव सोभनाथपुर में स्थित है।

जनसांख्यिकी[संपादित करें]

2001 की भारतीय जनगणना में,[2] बलिया की आबादी 102,226 थी। जनसंख्या में पुरुषों और महिलाओं का प्रतिशत 46% एव 54% है। यहाँ 55% महिलाओं एव 65% पुरुष साक्षरता के साथ 77% की औसत साक्षरता दर जो 75.5% के राष्ट्रीय औसत से अधिक था। जनसंख्या के ग्यारह प्रतिशत उम्र के छह वर्षों के तहत किया गया।

शिक्षा[संपादित करें]

बलिया में जननायक चन्द्रशेखर विश्वविद्यालय स्थित है, जिसकी स्थापना उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2016 में कई गयी थी।[3] विश्वविद्यालय से बलिया तथा आस-पास के क्षेत्रों के 122 कॉलेज सम्बद्ध हैं।[4]

आसपास के स्थल[संपादित करें]

एक वार्षिक मेले के ददरी मेला, एक मैदान पर शहर की पूर्वी सीमा पर गंगा और सरयू नदियों के संगम पर मनाया जाता है। मऊ, आजमगढ़, देवरिया, गाजीपुर और वाराणसी के रूप में पास के जिलों के साथ नियमित संपर्क में रेल और सड़क के माध्यम से मौजूद है।

रसड़ा - यहाँ से ३५ किलोमीटर पश्चिम में स्थित एक क़स्बा है। यहाँ नाथ बाबा का मंदिर है जो स्थानीय सेंगर राजपूतों के देवता हैं। इसके अलावा यहाँ दरगाह हज़रत रोशन शाह बाबा, दरगाह हज़रत सैयद बाबा और लखनेसर डीह के प्राचीन अवशेष दर्शनीय स्थल हैं।

उल्लेखनीय व्यक्तित्व[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

Facebook/saurabhsinghvisen@gmail.com

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  1. [3] ^ गिरने वर्षा जीनोमिक्स, इंक - बलिया
  2. "भारत की जनगणना २००१: २००१ की जनगणना के आँकड़े, महानगर, नगर और ग्राम सहित (अनंतिम)". भारतीय जनगणना आयोग. http://web.archive.org/web/20040616075334/www.censusindia.net/results/town.php?stad=A&state5=999. अभिगमन तिथि: 2007-09-03. 
  3. "Raj Bhavan Uttar Pradesh- List of State Universities". upgovernor.nic.in. Raj Bhavan Uttar Pradesh. http://upgovernor.nic.in/upgovernor.gov.in/listvniv_E.html. 
  4. "विद्यापीठ से अलग होंगे बलिया के 122 कॉलेज - Varanasi City News". http://inextlive.jagran.com/balia-colleges-affiliation-disconnct-kvp-146253.