दांडी मार्च

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सविनय अवज्ञा आंदोलन पर संक्षिप्त निबंध।

स्वतंत्र आंदोलन के इतिहास में 1930 का सविनय अवज्ञा आंदोलन एक महत्वपूर्ण अध्ययाय है। ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध यह महान ऐतिहासिक संघर्ष मार्च 1930 में प्रारंभ हुआ जिसका नेतृत्व महात्मा गाँधी ने किया नमक सत्याग्रह के द्वारा जिस सविनय अवज्ञा आंदोलन का श्रीगणेश हुआ उसकी परिमति एक ऐसे जन आंदोलन के रुप में हुई जिसमें ब्रिटिश सरकार की नैतिक सत्ता बिलकुल ध्वस्त हो गई इस आन्दोलन के अनेक कारण थे जो इस प्रकार है-

राजनीतिक स्थिति-

ब्रिटिश सरकार ने नेहरु रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया भारतीयों को कुद्ध कर दिया फलत: उनके पास संघर्ष के अतिरिक्त कोई दूसरा चारा नहीं था।

विश्व व्यापि आर्थिक मंदी का प्रभाव-

1929-30 की विश्व व्यापि आर्थीक मंदी का प्रभाव भारतीय अर्थ व्यवस्था पर पड़ी मजदूर एवं पुजीपति परेशान हो उठे फलत: सरकार विरोधि वातावरण तैयार हुआ महात्मा गाँधी ने इस मौके का लाभ उठाकर इस विरोध को सविनय आंदोलन की तरफ मोड़ दिया।

भारत की विलयकारी की स्थिति-

इस समय भारत की स्थिति विस्फोटक थी आतंकवादी गति विधियाँ बढ़ती जा रही थी भारत के क्रांतिकारी नेता आतंक मचा कर सरकार को परेशान करना चाहते थे अत: गाँधी जी ने इस विचारधारा को शांतिमय उपयोग की ओर मोड़ा और सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए आतंकवादीयों को प्रेरित किया। सरकारी दमन चक्र के प्रति आक्रोश- सरकारी दमनचक्र के चलते भारत के लोग काफी रंज थे जनवरी 1929 में सरका ने पब्लिक सेफ्टी बिल पास किया जिससे जनता में काफी असंतोष फैला

लार्ड इरविन की घोषणा-

1929 में लार्ड इरविन ने भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य देने की घोषणा की लेकिन बाद में वे अपने वादे से मुकर गए इससे भी काँग्रेस नेताओं में निराशा व्याप्त हुई।

लाहौर अधिवेशन-

गाँधी इरविन वारता की असफलता के बाद काँग्रेस का अधिवेशन दिसम्बर 1929 में लाहौर में हुआ जिसमें पंडीत जवाहर लाल नेहरु की अध्यक्षता में पूर्ण स्वराज्य की घोषणा की गई और यह निश्चय किया गया कि प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वधिनता दिवस मनाया जाए इसी सम्मेलन में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का भी निर्णय लिया गया।

गाँधी का ग्यारह सुत्री मांग-

आंदोलन प्रारंभ करने के पूर्व महात्मा गाँधी ने लार्ड इरविन के समक्ष ग्यरह सुत्री माग पेश किया और यह अस्वशन दिया गया कि अगर सरकार इसे मान ले तो सविनय अवज्ञा को स्थगित कर दिया जाएगा लेकिन इरविन ने इसपर कोई ध्यान नहीं दिया फलत: गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निश्चय किया उपर्युक्त सभी कारणों के चलते 1930 में महात्मा गाँधी ने दुसरा महान संघर्ष सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने की घोषणा कि इस आंदोलन का प्रारंभ नमक सत्याग्रह के द्वारा किया गया।

नमक सत्याग्रह-

महात्मा गाँधी ने समुद्र के किनारे अवस्थित दाण्डी नामक स्थान से नमक कानून भंग करने का निश्चय किया 12 मार्च 1930 ई. को उन्होंने सावरमती आश्रम से अपने साथीयों के साथ दाण्डी यात्रा प्रारंभ की उनके आश्रम से दाण्डी की दूरी 200 मील की थी। 24 दिनों में उन्होंने अपनी यात्रा पूरी की और दाण्डी पहुँचे 6 अप्रैल 1930 ई. को उन्होने अपने हाथों से समुद्र के जल से नमक बनाकर नमक कानून का उल्लंघन किया। महात्मा गाँधी की दाण्डी यात्रा स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महान घटना का आरंभ था। संपूर्ण देश की जनता पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। संपूर्ण देश में नमक बनाने का कार्यक्रम तेजी से फैल गया। छोटे-छोटे कस्बों से लेकर बड़े बड़े शहरों में भी नमक बनाया जाने लगा समुद्र के किनारे अवस्थीत शहरों एवं गाँवों में नमक बनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई लेकिन समुद्र से काफी दूर शहरों एवं गाँवों में नमक निर्माण में अनेक कठिनाइयाँ थी। वहाँ सामुद्रिक जल उपलब्ध नहीं होने के कारण आसानी से नमक नहीं बनाया जा सकता था इसलिए ऐसे जगहों में नोनियाँ मिट्टी को जमाकर उससे बड़ी मुस्किल से नमक तैयार किया जाता था देखते ही देखते सविनय अवज्ञा आंदोलन का स्वरुप आंदोलन जैसा हो गया। नमक कानून के उलंलघन के अतिरिक्त विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया गया जगह- 2 धरणा देने का कार्य प्रारंभ किया गया। महात्मा गाँधी ने महिलाओं को भी आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। इस आंदोलन से सरकार घबरा गई उसने आंदोलन को कुचलने के लिए दमन चक्र प्रारंभ किया काँग्रेस को अवैध संस्था घोषित कर दिया गया। आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया जाने लगा सभाओं और जूलुसों पर लाठी चार्ज किए गए। 60 हजार लोगों को जेल में बंद कर दिया गया हजारों लोग गोली के शिकार हुए स्त्रियों और बच्चों की हत्याएं की गई 16 अप्रैल को जवाहर लाल नेहरु गिरफ्तार किए गए 4 मई को महात्मा गाँधी को गिरफ्तार किया गया परन्तु दमन चक्र की कठोरता के बावजूद आंदोलन में स्थीलता नहीं आई । इस आंदोलन ने भारत में ब्रिटिश सरकार की जड़ हिला दी अत: सरकार ने काँग्रेस के प्रति उदारता की नीति दिखानी शुरु की। गाँधी जी को जेल से रिहा कर दिया गया पण्डित जवाहर लाल नेहरु को भी छोड़ दिया गया 17 फरवरी 1931 को गाँधी इरविन वार्ता प्रारंभ हुई जिसके द्वारा निम्नलिखित बातों पर समझौता किया गया। समुद्र के किनारे अवस्थित गाँव वाले नमक निर्माण कर सकते है। इस आंदोलन के दौरान जिनकी सम्पत्ती जप्त की गई थी उसे वापस कर दिया गया। यह निर्णय किया गया कि राजनीतिक कैदीयों को रिहा कर दिया जाएगा शराब एवं विदेशी वस्त्रों को टुकराने पर शांतिपूर्ण ढंग से धरणा दिया जा सकता है। सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया जाएगा। इस तरह समजौते के आधार पर आंदोलन को बंद कर दिया गया। लेकिन लार्ड इरविन के बदले जब लार्ड विलिगडन भारत के नये वायसराय नियुक्त किए गए तो वे स्वतंत्रता आदोलन को कुचल देना चाहते थे। इस लिए महात्मा गाँधी तथा काँग्रेस ने जनवरी 1932 को पुन: आंदोलन प्रारंभ करने का निश्चय किया। फलत: सरकार द्वारा आंदोलन को कुचलने की तैयारी की गई पुन: सभी बड़े-2 नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया नये- नये अध्यादेश जारी किए गए। लगभग 80 हजार लोगों को गिरफ्तार किया गया साम्प्रतायिग दंगे कराए गए अंत में मई 1934 ई. में काँग्रेस कार्यकरणी समीति ने इस आंदोलन को बंद करने की घोषणा की। इस प्रका 1930 में जिन आन्दोलन को शान के साथ प्रारंभ किया गया था उसे बिना किसी शर्त के बंद कर दिया गया। हलांकि महात्मा गाँधी ने आंदोलन स्थगित कर दिया था फिर फी यह पूर्ण रुप से असफल नहीं कहा जा सकता है इस आंदोलन के चलते जनता में नवीन अध्याय का संचार हुआ। यह आंदोलन जन – जन का आंदोलन बन गया। इसने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के दाँत खट्टे कर दिए इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसने जनता में निडरता की भावना पैदा की और वे सरकारी कुषाशन चक्र का विरोध शांतिपूर्ण संघर्ष का सामना कैसे किया जाए। अंत में उसने यह महसूस किया कि काँग्रेस से समझौता किए बिना काम नहीं चल सकता है। इसी के चलते गाँधी इरवीन समझौता सम्पन्न हुआ इस समझौता से काँग्रेस की प्रतिष्ठा में काफी वृद्धि हुई और इसे सविनय अवज्ञा आंदोलन की महान उपलब्धि मानी गई । सबसे बड़ी बात यह थी कि इस समझौता ने गाँधी और काँग्रेस को ब्रिटिश सरकार के समक्ष ला दिया। गाँधी द्वारा इस आंदोलन के स्थगन की काफी आलोचना हुई। परन्तु आंदोलन स्थगन का मतलब पराजय नहीं था। यह आंदोलन कितना प्रभावशाली ता इसका पता तब चला जब 1934 ई. में राजनीतिक बंदी जेल से मुक्त किए गए और प्रांतों में उत्तरदायी सरकार की स्थापना की गई। इस आंदोलन के चलते काँग्रेस एक लोकप्रिय संस्था बन गई। 133 के चुनाव में अधिकांश राज्यों में काँग्रेस का मंत्री मंडल बना अत: यह आंदोलन बिलकुल निरार्थक नहीं था।

By- Mohammad Shahid (https://www.facebook.com/shahid.sta)

Date- 04/09/2016