पॉलीगर का युद्ध

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पॉलीगर का युद्ध या पल्लियाकर का युद्ध, तमिलनाडु, भारत के पूर्व तिरूनेलवेली साम्राज्य के पॉलीगर्स (पल्लियाकर) और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी बलों के बीच, 17 मार्च से मई 1802 या जुलाई 1805 के बीच लडे गये युद्ध थे। अंग्रेजों ने अंततः पॉलीगर सेनाओं के खिलाफ चले लंबे भीषण जंगल अभियान के बाद उन्हें हरा दिया। दोनों पक्षों को काफी क्षति उठानी पड़ी और पॉलीगर्स पर जीत के साथ ही तमिलनाडु के क्षेत्रों के बड़ा हिस्सा ब्रिटिश नियंत्रण के तहत आ गया, जिससे उन्हें दक्षिणी भारत में मजबूत पकड़ मिल सकी।

पॉलीगर का पहला युद्ध[संपादित करें]

तत्कालीन तिरूनेलवेली क्षेत्र के पंचलंकुरिची पलायम के कट्टाबोमन नायक और ब्रिटिश के बीच हुए युद्ध को अक्सर पहला पॉलीगर युद्ध के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। 1799 में, कट्टाबोमैन और अंग्रेजों के बीच एक संक्षिप्त बैठक (लंबित करों पर), एक खूनी मुठभेड़ में बदल गई जिसमें सेना के ब्रिटिश कमांडर को किसानों के हाथ मारा गया। कट्टाबोमैन के सिर पर इनाम रखा गया, जिससे कारण कई पॉलीगर्स खुले विद्रोह के लिए प्रेरित हो गये।

पंचचंकुरिची किले में कई लड़ाई की श्रृंखला के बाद, तिरुचिरापल्ली से अतिरिक्त राहतसेना आई और कट्टाबोमैन पराजित हो गया, लेकिन वह बच गया और पुदुकोट्टाई देश के जंगलों में भाग निकला। पुदुकोट्टाई राजा के साथ हुए एक बैकरूम समझौते के बाद, अंग्रेजों ने एटप्पन की मदद से से कट्टाबोमैन को पकड़ लिया। संक्षिप्त विचारण के बाद, कयाथारू में, जनता को डराने के लिए उन्हीं के सामने कट्टाबोमैन को फांसी दे दी गई।

कट्टाबोमैन के करीबी सहयोगी सुब्रमण्यिया पिल्लई को भी सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई थी और सार्वजनिक दृश्य के लिए पंचलंकुरिची में उनके सिर को एक सूली पर लटका दिया गया। एक अन्य विद्रोही नेता साउंड्रा पांडियन को गांव की दीवार से उसका सिर पटककर क्रूरता से मार दिया गया था। कट्टाबोमैन के भाई ओमायदाराई को पलायमकोट्टई जेल में कैद कर लिया गया, जबकि किले को सैनिकों द्वारा लूटकर धराशायी कर दिया गया।

परिणाम[संपादित करें]

1799 और 1800-1805 के पॉलीगर विद्रोहों के दमन के परिणामस्वरूप सरदारों के प्रभाव की परिसमापन हुई। कर्नाटक संधि (31 जुलाई 1801) की शर्तों के तहत, अंग्रेजों ने तमिलनाडु पर प्रत्यक्ष नियंत्रण संभाला। पॉलीगर प्रणाली जो ढ़ाई सदियों से चली आ रही थी, का हिंसक अंत हुआ और कंपनी ने उसकी जगह पर ज़मीनदार व्यवस्था शुरू की।

बाद में लोकगीत[संपादित करें]

बाद के वर्षों में, इससे जुड़ी पौराणिक और लोक कथाऐं ने धीरान चिन्नामालाई, कट्टाबोमैन और मारुथु पांडियार के आसपास विकसित हुई।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  • डिर्क, निकोलस डिर्कस (1988), The Hollow Crown: Ethnohistory of an Indian Kingdom, पपृ॰ 19–24, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-05372-3
  • Francis, W. (1989), दक्षिण भारत के राजपत्रक, 1, मित्तल प्रकाशन, पृ॰ 261