असहयोग आन्दोलन

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असहयोग आंदोलन पर संक्षिप्त निबंध।

स्वतंत्रता आंदोल के इतिहास में असहयोग आन्दोलन का एक विशिष्ट महत्व है। 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद महात्मा गाँधी ने भारतीय राजनीतिक परिस्थिति का अध्ययन किया और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब तक भारतीय राजनीतिक बागडोर को मुट्ठी भर अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त लोगों के चंगुल से मुक्त कराकर उसे जन आंदोलन का रुप नहीं दिया जाएगा। तब तक स्वतंत्रता की प्राप्ति असंभव है। अत: उन्होने स्वतंत्रता आंदोलन को जन आंदोलन बनाने पर जोर दिया प्रथ्म विश्व युद्ध में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार को अपनी सहायता प्रदान की थी और सरकार ने यह आश्वसन दिया था कि युद्ध समाप्त होने के बाद भारत को औपनिवेशिक स्वराज्य दिया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं किया गया इसी समय रालेक्ट एक्ट का सृजन किया गया इसी के फलस्वरुप जालिया वाला बाग की दूर्घटना घटी इन सब कारणों के चलते महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार के साथ असहयोग की नीति अखतियार की और 1920 में असहयोग आंदोलन प्रारम्भ किया गया।

असहयोग आंदोलन के कारण-

असहयोग आंदोलन के अनेक कारण थे जिनका अध्ययन हम निम्नलिखित शिर्षकों के द्वारा कर सकते है।

प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव –

प्रथम विश्व युद्ध में भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की भरपूर सहायता की सके बदले में ब्रिटिश सरकार ने औपनिवेशिक स्वराज देने का अश्वसन दिया लेकिन इस युद्ध की समाप्ति के पश्चात ब्रिटिश सरकार ने जनता को धोखा दिया अत: महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ करने का निश्चय किया।

रौलेक्ट एक्ट-

1918 में ब्रिटिश सरकार ने रौलेक्ट एक्ट पास किया इस कानून का प्रमुख उद्देश्य भारतीय क्रांति कारियों का पता लगाना एवं उन्हे कठोर दंड देना था फलत: इससे देश भक्तों में काफी उत्तेजना फैल गई महात्मा गाँधी ने इस कानून की कड़ी आलोचना की और देश वासियों को सत्य एवं अहिंसा के आधार पर कानून के विरोध करने का निर्देश दिया फलत: संपूर्ण देश में हड़ताल एवं प्रदर्शन किए गए दुकाने बंद रही और मजदूरों ने काम करना बंद कर दिया।

जालिया वाला बाग की घटना-

इसी कानून के विरोध में 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के जलियावाला बाग में एक सार्वजनिक सभा का आयोजन किया गया ब्रिटिश सरकार ने इस सभा के दमन के लिए अपनी वास्तविकता का परिचय दिया भारत वासियों पर गोलीयों की वर्षा की गई जिसमें असंख्य लोग मारे गए काफी संख्या में लोग घायल हुए, गोली चलाने की आज्ञा देने वाले जेनरल डायर को सरकार ने पुरस्कार दिया इससे भारतीयों को हार्दिक कष्ट हुआ इससे दूसरे दिन संपूर्ण पंजाब में सैनिक कानून लागू कर दिया गया और लोगों को विभिन्न तरह के कष्ट पहुँचाया गया फौजी कानून एवं उसके आतंक से उब कर गाँधी ने असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया।

अंतर कमीटि और उसकी रिपोर्ट-

जलिया वाला बाग की दुर्घटना की जाँच के लिए हन्टर के नेतृत्व में एक कमीटी बनाई गई थी इसमें अंग्रेज के अतिरिक्त दो भारतीय सदस्य भी इस कमीटी के जाँच के आधार पर जेनरल डायर को नौकरी से हटा दिया गया लेकिन लार्ड सभा में उसके अपराध को माफ करने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया गया इससे भारतीयों को काफी कष्ट हुई।

खिलाफत आंदोलन-

तुर्की का खलीफा संपूर्ण मुस्लिम जगत का धार्मिक नेता माना जाता था प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की ने इंगलैण्ड के खिलाफ जर्मनी का साध दिया था इसलिए भारतीय मुस्लमानों को डर था की युद्ध के बाद अंग्रेज तुर्की से अवश्य बदला लेगें वास्तव में युद्ध के बाद अंग्रेजों ने तुर्की साम्राज्य का अंत कर दिया इसी के चलते भारतीय मुस्लमानों ने अंग्रेजों के खिलाफ खिलाफत आंदोलन शुरु किया जिसका उद्देश्य तुर्की के खलीफा की शक्ति का पुर्णस्थापना था महात्मा गाँधी ने भी इसका समर्थन किया उन्होने संपूर्ण देश का दौरा किया इस आंदोलन से असहयोग की पृष्ठभूमि तैयार करने में काफी मदद किया।

आर्थिक संकट-

विश्व युद्ध के दौरान भारत की आर्थीक स्थिति काफी गंभीर हो गई जनता पर टैक्सो का भार बढ़ गया किसान और मजदूरों का शोषन होने लगा महँगाई बढ़ गई जनता इनसे तंग हो गई थी और अंत में उसे विरोध करना पड़ा।

1919 ई. के सुधार अधिनियम से असंतोष-

1919 ई. में एक सुधार अधिनियम पास किया गया इस अधिनियम के चलते भारतीयों में असंतोष की वृद्ध हुई उनको यह विश्वास था कि युद्ध समाप्त होने के बाद सरकार प्रशासन में क्रांतिकारी सुधार लाएगी परंतु सरकार ऐसा कुछ भी नहीं किया काँग्रेस की दृष्टि में उसका सुधार असंतोष जनक निराशापूर्ण था ऐसी स्थिति में काग्रेस को गाँधी की असहयोग नीति में स्वीकृति देनी पड़ी। उपर्युक्त सभी कारणों से प्रेरित होकर महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निश्चय किया असहयोग आंदोलन पर विचार करने के लिए सितम्बर 1920 में काँग्रेस में एक विशेष अधिवेशन कलकत्ता में आयोजित किया गया जिसमें असहयोग के प्रस्ताव को बहुमत से स्वीकार कर लिया पुन: दिसम्बर 1920 ई. को नागपुर अधिवेशन में भी कांग्रेस ने इस आंदोलन की अंतिम स्वीकृति प्रदान की।

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम-

कलकत्ता और नागपुर में असहयोग आंदोलन के प्रस्ताव अनुसार उसके निम्नलिखित कार्यक्रम निर्धारित किए गए थे। सरकारी उपाधियों, पदो और अवेतनीक पदों का परित्याग। सरकारी स्कूलों एवं कॉलेजों का बहिष्कार, वकील एवं वेरिस्टरों द्वारा अदालतों का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्थानीय संस्थाओं से मनोनित सदस्यों को अपने पदों से त्याग, सरकारी दरबारों उत्सवों तथा स्वागत समारोह का बहिष्कार।

असहयोग आंदोलन की प्रगति-

महात्मा गाँधी ने असहयोग आंदोलन के प्रभार के लिए संपूर्ण देश का दौरा किया और उसमें भाग लेने के लिए जनता को प्रत्साहित किया संपूर्ण देश में असहयोग की चिंगारी फूट पड़ी हजारों लोगों ने अपनी उपाधियों का परित्याग किया वकिलों ने अदालत का बहिष्कार किया और अपना सारा समय असहयोग में लगा दिया छात्रों ने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों का बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया और उसी समय छात्रों की पढ़ाई की समस्या के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्कूल की स्थापना की गई जिनमें काशी विद्यापीठ, गुजारात विद्यापीठ, जामिया मिलया विश्वविद्यालय दिल्ली और नेशनल कॉलेज लाहौर की स्थापना की गई। वृहत पैमाने पर विदेशी वस्तुओं का विस्तार किया गया दुकानों से विदेशी वस्त्र को निकालकर जला दिया गया स्वदेशी वस्त्रों का प्रचार बढ़ा हिन्दु मुस्लिम एकता में वृद्धि हुई इस समय देश में चालीस लाख स्वंय सेवक तैयार किए गए लाखों चरखे बाँटे गए घर- 2 में सूत काटने की प्रथा चलाई गई जुलाई 1921 ई. तक संपूर्ण देश में असहयोग आंदोलन का विकास हो चुका था। असहयोग की लोकप्रियता ने ब्रिटिश सरकार की नींद हराम कर दी उसने कठोर दमन चक्र प्रारंभ किया काग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया व्यापक पैमाने पर नेताओं की गिरफतारी प्रारंभ कर दी 1921 में राजनितिक कैदीयों की संख्या 30 हजार तक पहुँच गई सभा प्रर्दशन जुलूस आदि को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया महात्मा गाँधी ने सरकार की राजनीतिक का विरोध किया और वार देली सत्याग्रह प्रारम्भ कर दिया।

चौरि चौरा कांड और असहयोग का स्थगण-

4 फरवरी 1922 ई. को एक हिंसात्मक घटना के फलस्वरुप महात्मा गाँधी को काफी दुख पहुँचा और इस आंदोलन को स्थगित कर दिया इस दिन गोरखपुर चौरी चौरा नामक स्थान पर आंदोलनकारियों ने थाना पर आक्रमण कर दिया तथा दरोगा समेत 19 सिपाही को जिंदा जलाकर मार दिया इस घटना से महात्मा गाँधी को गहरा दुख हुआ चुकि आंदोलन हिंसात्मक होता जा रहा था इसलिए उसने आंदोलन स्थगण की घोषणा कर दी इस घोषणा के चलते जनता में काफी असंतोष फैला सभी बड़े नेताओं ने गाँधी की काफी आलोचना की आंदोलन स्थगण के बाद महात्मा गाँधी को गिरफ्तार कर लिया गया तथा उनपर राजविद्रोह का अभियोग लगाकर से छ: वर्षों तक के लिए जेल मे कैद की सजा दी गई। यद्धपि चौरी चौरा कांड के अन्तर्गत असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया गया और उसे अपने उद्देश्य की प्राप्ती में सफलता नहीं मिली फिर फी कहा जा सकता है कि आंदोलन पूर्णरुप से असफल नहीं थी। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में इसे महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। सुभाष चन्द्र बोस ने भी कहा था ‘ महात्मा गाँधी ने इस आंदोलन के द्वारा कॉग्रेस को एक नया विधान ही नहीं दिया बल्कि उसे क्रांतिकारी संगठन के रुप में परिवर्तित कर दिया’ वस्तुत: इस आंदोलन के असफलता के बावजूद इसका प्रभाव संपूर्ण देश में पड़ा और विभिन्न प्रांतों के निवासी अपने को एक समझने लगा इस तरह भारत में एकता की भावना का श्रृजन हुआ। इसके द्वारा कॉग्रेस के उद्देश्य में भी काफी परिवर्तन हुआ इस आंदोलन के द्वारा सरकार की जड़े हिल गई भारतीयों में स्वदेशी वस्तुओं के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ फलत: भारत के आर्थीक जीवन में नव जीवन का संचार हुआ इस आंदोलन के द्वारा अंग्रेजी भाषा को गहरा धक्का लगा क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षण संस्था के खुलने से हिन्दी भाषा का प्रचार प्रारंभ हुआ और इन्हें राष्ट्रीय भाषा स्वीकार किया जाने लगा ब्रिटिश शासन को अपनी नीति में परिवर्तन लाना पड़ा और उत्तरदायी सरकार की दिशा में कदम उठाने के लिए बाध्य होना पड़ा।

By- Mohammad Shahid (https://www.facebook.com/shahid.sta)

प्रेस पर प्रतिबंध[संपादित करें]

1914-18 के महान युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था और बिना जाँच के कारावास की अनुमति दे दी थी। अब सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति की संस्तुतियों के आधार पर इन कठोर उपायों को जारी रखा गया। इसके जवाब में गाँधी जी ने देशभर में ‘रॉलेट एक्ट’ के खिलाफ़ एक अभियान चलाया। उत्तरी और पश्चिमी भारत के कस्बों में चारों तरफ़ बंद के समर्थन में दुकानों और स्कूलों के बंद होने के कारण जीवन लगभग ठहर सा गया था। पंजाब में, विशेष रूप से कड़ा विरोध हुआ, जहाँ के बहुत से लोगों ने युद्ध में अंग्रेजों के पक्ष में सेवा की थी और अब अपनी सेवा के बदले वे ईनाम की अपेक्षा कर रहे थे। लेकिन इसकी जगह उन्हें रॉलेट एक्ट दिया गया। पंजाब जाते समय गाँधी जी को कैद कर लिया गया। स्थानीय कांग्रेसजनों को गिरफ़तार कर लिया गया था। प्रांत की यह स्थिति धीरे-धीरे और तनावपूर्ण हो गई तथा अप्रैल 1919 में अमृतसर में यह खूनखराबे के चरमोत्कर्ष पर ही पहुँच गई। जब एक अंग्रेज ब्रिगेडियर ने एक राष्ट्रवादी सभा पर गोली चलाने का हुक्म दिया तब जालियाँवाला बाग हत्याकांड‎ के नाम से जाने गए इस हत्याकांड में चार सौ से अधिक लोग मारे गए। == असहयोग का आरंभ == रॉलेट सत्याग्रह से ही गाँधी जी एक सच्चे राष्ट्रीय नेता बन गए। इसकी सफ़लता से उत्साहित होकर गाँधी जी ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ़ असहयोग आंदोलन की माँग कर दी। जो भारतीय उपनिवेशवाद का ख्त्म़ करना चाहते थे उनसे आग्रह किया गया कि वे स्कूलो, कॉलेजो और न्यायालय न जाएँ तथा कर न चुकाएँ। संक्षेप में सभी को अंग्रेजी सरकार के साथ ;सभी ऐच्छिक संबंधो के परित्याग का पालन करने को कहा गया। गाँधी जी ने कहा कि यदि असहयोग का ठीक ढंग से पालन किया जाए तो भारत एक वर्ष के भीतर स्वराज प्राप्त कर लेगा। अपने संघर्ष का और विस्तार करते हुए उन्होंने खिलाफत आन्दोलन‎ के साथ हाथ मिला लिए जो हाल ही में तुर्की शासक कमाल अतातुर्क द्वारा समाप्त किए गए सर्व-इस्लामवाद के प्रतीक खलीफ़ा की पुनर्स्थापना की माँग कर रहा था।

आंदोलन की तैयारी[संपादित करें]

गाँधी जी ने यह आशा की थी कि असहयोग को खिलाफ़त के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख समुदाय- हिन्दू और मुसलमान मिलकर औपनिवेशिक शासन का अंत कर देंगे। इन आंदोलनों ने निश्चय ही एक लोकप्रिय कार्रवाही के बहाव को उन्मुक्त कर दिया था और ये चीजें औपनिवेशिक भारत में बिलकुल ही अभूतपूर्व थीं। विद्यार्थियों ने सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालत में जाने से मना कर दिया। कई कस्बों और नगरों में श्रमिक-वर्ग हड़ताल पर चला गया। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक 1921 में 396 हड़तालें हुई जिनमें 6 लाख श्रमिक शामिल थे और इससे 70 लाख कार्यदिवसों का नुकसान हुआ था। देहात भी असंतोष से आंदोलित हो रहा था। पहाड़ी जनजातियों ने वन्य कानूनों की अवहेलना कर दी। अवधि के किसानों ने कर नहीं चुकाए। कुमाउँ के किसानों ने औपनिवेशिक अधिकारियों का सामान ढोने से मना कर दिया। इन विरोधि आंदोलनों को कभी-कभी स्थानीय राष्ट्रवादी नेतृत्व की अवज्ञा करते हुए कार्यान्वयित किया गया। किसानों, श्रमिकों और अन्य ने इसकी अपने ढंग से व्याख्या की तथा औपनिवेशिक शासन के साथ ‘असहयोग’ के लिए उन्होंने उपर से प्राप्त निर्देशों पर टिके रहने के बजाय अपने हितों से मेल खाते तरीकों का इस्तेमाल कर कार्रवाही की। महात्मा गाँधी के अमरीकी जीवनी-लेखक लुई फ़िशर ने लिखा है कि ‘असहयोग भारत और गाँधी जी के जीवन के एक युग का ही नाम हो गया। असहयोग शांति की दृष्टि से नकारात्मक किन्तु प्रभाव की दृष्टि से बहुत सकारात्मक था। इसके लिए प्रतिवाद, परित्याग और स्व-अनुशासन आवश्यक थे। यह स्वशासन के लिए एक प्रशिक्षण था।’ 1857 के विद्रोह के बाद पहली बार असहयोग आंदोलन के परिणामस्वरूप अंग्रेजी राज की नींव हिल गई।

चौरी-चौरा काण्ड

फ़रवरी 1922 में किसानों के एक समूह ने संयुक्त प्रांत के चौरी-चौरा पुरवा में एक पुलिस स्टेशन पर आक्रमण कर उसमें आग लगा दी। इस अग्निकांड में कई पुलिस वालों की जान चली गई। हिंसा की इस कार्यवाही से गाँधी जी को यह आंदोलन तत्काल वापस लेना पड़ा। उन्होंने जोर दिया कि, ‘किसी भी तरह की उत्तेजना को निहत्थे और एक तरह से भीड़ की दया पर निर्भर व्यक्तियों की घृणित हत्या के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है’। परन्तु गन्धी जी यहा यह भूल गये कि सन १९१९ मे बैसखी के दिन जलियान्वाला बाग मे हजारो निहत्थे भारतीयो को इन्ही पुलिस वालो ने घेर कर मशीनगन से निर्ममता से भून दिय था फिर भी असहयोग आंदोलन के दौरान हजारों भारतीयों को जेल में डाल दिया गया। स्वयं गाँधी जी को मार्च 1922 में राजद्रोह के आरोप में गिरफ़तार कर लिया गया। उन पर जाँच की कार्रवाही की अध्यक्षता करने वाले जज जस्टिस सी- एन- ब्रूमफ़ील्ड ने उन्हें सजा सुनाते समय एक महत्वपूर्ण भाषण दिया। जज ने टिप्पणी की कि, इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि मैने आज तक जिनकी जाँच की है अथवा करूँगा आप उनसे भिन्न श्रेणी के हैं। इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि आपके लाखों देशवासियों की दृष्टि में आप एक महान देशभक्त और नेता हैं। यहाँ तक कि राजनीति में जो लोग आपसे भिन्न मत रखते हैं वे भी आपको उच्च आदशो और पवित्र जीवन वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। चूँकि गाँधी जी ने कानून की अवहेलना की थी अत: उस न्याय पीठ के लिए गाँधी जी को 6 वर्षों की जेल की सजा सुनाया जाना आवश्यक था। लेकिन जज ब्रूमफ़ील्ड ने कहा कि ‘यदि भारत में घट रही घटनाओं की वजह से सरकार के लिए सजा के इन वर्षों में कमी और आपको मुक्त करना संभव हुआ तो इससे मुझसे ज्यादा कोई प्रसन्न नहीं होगा।

प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का बहिष्कार[संपादित करें]

अप्रैल, 1921 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन पर उनका सर्वत्र काला झण्डा दिखाकर स्वागत किया गया। गांधी जी ने अली बन्धुओं की रिहाई न किये जाने के कारण प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के भारत आगमन का बहिष्कार किया। 17 नवम्बर 1921 को जब प्रिन्स ऑफ़ वेल्स का बम्बई, वर्तमान मुम्बई आगमन हुआ, तो उनका स्वागत राष्ट्रव्यापी हड़ताल से हुआ। इसी बीच दिसम्बर, 1921 में अहमदाबाद में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। यहाँ पर असहयोग आन्दोलन को तेज़ करने एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने की योजना बनी।

आन्दोलन समाप्ति का निर्णय[संपादित करें]

इसी बीच 5 फ़रवरी 1922 को देवरिया ज़िले के चौरी चौरा नामक स्थान पर पुलिस ने जबरन एक जुलूस को रोकना चाहा, इसके फलस्वरूप जनता ने क्रोध में आकर थाने में आग लगा दी, जिसमें एक थानेदार एवं 21 सिपाहियों की मृत्यु हो गई। इस घटना से गांधी जी स्तब्ध रह गए। 12 फ़रवरी 1922 को बारदोली में हुई कांग्रेस की बैठक में असहयोग आन्दोलन को समाप्त करने के निर्णय के बारे में गांधी जी ने यंग इण्डिया में लिखा था कि, "आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर एक अपमान, हर एक यातनापूर्ण बहिष्कार, यहाँ तक की मौत भी सहने को तैयार हूँ।" अब गांधी जी ने रचनात्मक कार्यों पर ज़ोर दिया।

नेताओं के विचार[संपादित करें]

असहयोग आन्दोलन के स्थगन पर मोतीलाल नेहरू ने कहा कि, "यदि कन्याकुमारी के एक गाँव ने अहिंसा का पालन नहीं किया, तो इसकी सज़ा हिमालय के एक गाँव को क्यों मिलनी चाहिए।" अपनी प्रतिक्रिया में सुभाषचन्द्र बोस ने कहा, "ठीक इस समय, जबकि जनता का उत्साह चरमोत्कर्ष पर था, वापस लौटने का आदेश देना राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं"। आन्दोलन के स्थगित करने का प्रभाव गांधी जी की लोकप्रियता पर पड़ा। 13 मार्च 1922 को गांधी जी को गिरफ़्तार किया गया तथा न्यायाधीश ब्रूम फ़ील्ड ने गांधी जी को असंतोष भड़काने के अपराध में 6 वर्ष की क़ैद की सज़ा सुनाई। स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से उन्हें 5 फ़रवरी 1924 को रिहा कर दिया गया।


सन्दर्भ[संपादित करें]