मिथुबेन पेटिट

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5 अप्रैल 1930 में दांडी में महात्मा गांधी। उनके पीछे खड़े उनका दूसरा पुत्र मणिलाल गांधी और मिथुबेन पेटिट।
महात्मा गांधी, मिथुबेन पेटिट, और सरोजिनी नायडू 1930

मिथुबेन होर्मसजी पेटिट (11 अप्रैल 1892 - 16 जुलाई 1973) भारतीय महिला स्वतंत्रता कार्यकर्ताओं की एक अग्रणी सैनानी थी[1][2], जिन्होंने महात्मा गांधी के दांडी मार्च में भी भाग लिया था।[1][2]

जीवन[संपादित करें]

मिथुबेन पेटिट का जन्म 11 अप्रैल 1892 को बॉम्बे (मुंबई) के एक समृद्ध पारसी परिवार में हुआ था, उनके पिता सर दीनशॉ मानेजी पेटिट थे जो एक प्रसिद्ध उद्योगपति और बैरोनेट थे।[3][4]

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन[संपादित करें]

युवा पेटीट अपनी मौसी से प्रभावित थी जो गांधी की अनुयायी, और राष्ट्रीय स्त्री सभा की सचिव थी।[5] कस्तूरबा गांधी और सरोजिनी नायडू[6] के साथ पेटीट ने दांडी मार्च में एक प्रमुख भूमिका निभाई थी, कस्तूरबा गांधी के साथ साबरमती से मार्च शुरू होने के बाद, 6 अप्रैल 1930 को सरोजिनी नायडू के साथ मिलकर उन्होंने दांडी में पहली बार नमक उठाकर कानून तोड़ा और उन्होंने 9 अप्रैल 1930 को भीमराद में पुन: उल्लंघन दोहराया। यात्रा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण घटना में से एक है। उस समय जब महिलाओं को पीछे रखा जाता था (भारत में उस समय पितृसत्तात्मक संस्कृति के कारण), पेटिट उन तीन महिलाओं में से एक थी जिन्होंने यात्रा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और नमक पर कर के खिलाफ नागरिक अवज्ञा की।[6] पेटिट ने 1928 के बारडोली सत्याग्रह में भाग लिया जो ब्रिटिश राज के खिलाफ "कोई कर नहीं" अभियान था, जहां उन्होंने सरदार पटेल के मार्गदर्शन में काम किया था।[7] पेटिट भारत में शराब विरोधी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और महात्मा गांधी के साथ समय बिताते हुए उन्हें गुजरात में अनुसूचित जनजातियों के साथ शराब के मुद्दे की व्याख्या करती थी।[8]

सामाजिक कार्य[संपादित करें]

पेटीट ने मारोली में एक आश्रम स्थापित किया जिसे कस्तूरबा वनात शाला कहा जाता है, जिसमें परिवारों से वंचित आदिवासी, हरिजन बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए फिशर लोक कताई, कार्डिंग, बुनाई, डेयरी खेती, चमड़े के काम और सिलाई में डिप्लोमा कोर्स पढ़ाया जाता है।[9] उन्होंने मानसिक रूप से बीमार मरीजों के इलाज के लिए उसी नाम का एक अस्पताल भी खोला था।[10]

16 जुलाई 1973 को उनकी मृत्यु हो गई।[4]

सम्मान[संपादित करें]

पेटीत को 1961 में उनके सामाजिक कार्य के लिए पद्मश्री से सम्मनित किया गया था।[11]<ref>"Mithuben Petit Padma Shri" (PDF). pib.nic.in/archive/docs. मूल (PDF) से 28 जुलाई 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 6 जुलाई 2017.</ref

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Nawaz B. Mody (2000). Women in India's freedom struggle. Allied Publishers. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788177640700. मूल से 28 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2018.
  2. Kamla Mankekar (2002). Women pioneers in India's renaissance, as I remember her: contributions from eminent women of present-day India. National Book Trust, India. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-237-3766-9. मूल से 28 अक्तूबर 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2018.
  3. Marzban J. Giara (2000). Parsi statues. Marzban J. Giara. मूल से 19 अक्तूबर 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2018.
  4. Gawalkar, Rohini (2013-09-28). "पद्मश्री 'दीनभगिनी'". Loksatta (मराठी में). मूल से 2017-07-28 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2017-07-28.
  5. Suruchi Thapar-Björkert (2006). Women in the Indian national movement : unseen faces and unheard voices, 1930-42. SAGE Publications India Pvt Ltd. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9789351502869. मूल से 21 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2018.
  6. "The Great Dandi March – eighty years after". thehindu.com. मूल से 21 मार्च 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2017-07-02.
  7. "Encyclopaedia of Indian Women Through the Ages: Period of freedom struggle". मूल से 21 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 अगस्त 2018.[Full citation needed]
  8. "anti-liquor movement". mkgandhi.org. मूल से 21 अगस्त 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2017-07-03.
  9. "Trustees". Kasturbasevashram.org. मूल से 3 जनवरी 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 20 July 2017.
  10. "Kasturba Sevashram". kasturbasevashram.org. मूल से 12 जून 2018 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2017-07-20.
  11. "Padma Shri in 1965 for social work". padmaawards.gov.in. मूल से 28 जुलाई 2017 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 2 जुलाई 2017.