पहला आंग्ल-मराठा युद्ध

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पहला आंग्ल-मराठा युद्ध
आंग्ल-मराठा युद्ध का भाग
Maratha British Treaty.JPG
पहले आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान ब्रिटिश आत्मसमर्पण को दर्शाते हुए एक भित्तिचित्र। भित्तिचित्र वाडगांव मावल (एनएच -4, मालिनागर, वडगांव मावल, पुणे में स्थित विजय मेमोरियल (विजय स्तम्भ) का हिस्सा है।)
तिथि 1775–1782
स्थान पुणे
परिणाम मराठो की विजय [1][2]
योद्धा
Flag of the United Kingdom.svgब्रिटिश साम्राज्य

Flag of the British East India Company (1707).svg ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी

Flag of the Maratha Empire.svg मराठा साम्राज्य
सेनानायक
Flag of the United Kingdom.svg वारेन हेस्टिंग्स[2]

Flag of the British East India Company (1707).svg कर्नल कीटिंग

Flag of the British East India Company (1707).svg थॉमस वाईंडम गोडार्ड[2]

Flag of the Maratha Empire.svg महादजी शिंदे[2]

Flag of the Maratha Empire.svg नाना फडणवीस

Flag of the Maratha Empire.svg माधवराव[2]

Flag of the Maratha Empire.svg हरिपंत फडके

शक्ति/क्षमता
93,000 सैनिक कुल [4][2]

23 जहाज[2]

लगभग 146,000 सैनिक[5][2]

14 जहाज[2]

मृत्यु एवं हानि
~34,000 मृत या घायल[6][2] ~26,000 मृत या घायल[7][2]

पहला आंग्ल-मराठा युद्ध (1775-1782) भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के बीच लड़े गये तीन आंग्ल-मराठा युद्धों में से पहला था। युद्ध सूरत संधि के साथ शुरू हुआ और साल्बाई की संधि के साथ समाप्त हुआ।

पृष्ठभूमि[संपादित करें]

1772 में माधवराव पेशवा की मौत के बाद, उनके भाई नारायणराव मराठा साम्राज्य के पेशवा बनाये गए। नारायण राव (10 अगस्त 1755 - 30 अगस्त 1773), 1772 नवंबर को मराठा साम्राज्य के पांचवें पेशवा बने, और अगस्त 1773 में महल में उनके रक्षकों ने हत्या कर दी। नारायणराव की विधवा पत्नी, गंगाबाई ने उनके मरणोपरांत एक पुत्र को जन्म दिया, जो कानूनी तौर पर सिंहासन का उत्तराधिकारी था। नवजात शिशु को 'सवाई' माधवराव नाम (सवाई का अर्थ है "एक चौथाई") दिया गया था। नाना फडणवीस के नेतृत्व में बारह मराठा प्रमुखों ने शिशु को नए पेशवा के रूप में नामित करने और उनके राज्याधिकारी के रूप में शासन करने का प्रयास निर्देशित किया।

रघुनाथराव, अपनी पेशवाई छोड़ने के इच्छुक नहीं थे, उन्होंने ब्रिटिशों से बॉम्बे में मदद मांगी और 6 मार्च 1775 को सूरत की संधि पर हस्ताक्षर किए।[8] संधि के अनुसार, रघुनाथराव ने साल्सेट और बेसिन के क्षेत्रों को ब्रिटिशों के साथ सौंप दिया और सूरत और भरूच जिलों से मिले राजस्व में कुछ हिस्सा भी दे दिया। बदले में, अंग्रेजों ने रघुनाथराव को 2,500 सैनिक प्रदान करने का वादा किया।

ब्रिटिश कलकत्ता परिषद ने सूरत की संधि की निंदा की, और कर्नल अप्टॉन को पुणे भेज कर रीजेंसी के साथ एक नई संधि बनाने का निर्देश दिया गया। सूरत की संधि को बर्खास्त कर पुरन्दर की संधि[8] (1 मार्च 1776) की घोषणा की गई, जिसमें रघुनाथराव को पेशवा का दावा छोड़ कर पेंशन देने का वादा किया गया, लेकिन साल्सेट और भरूच जिलों के राजस्व पर ब्रिटिशों का कब्जा बनाए रखा गया। बॉम्बे सरकार ने इस नई संधि को खारिज कर दिया और रघुनाथराव को शरण दी। 1777 में, नाना फडणवीस ने भी पुरन्दर की संधि को नकार दिया और पश्चिमी तट पर फ्रांसीसियों को एक बंदरगाह प्रदान कर कलकत्ता परिषद के साथ अपनी संधि का उल्लंघन किया। अंग्रेजों ने दबाव बनाने के लिये पुणे की ओर सैनिकों का एक बल भेज दिया।[8]

प्रारम्भिक स्थिति और पुरन्दर की संधि (1775-1776)[संपादित करें]

कर्नल कीटिंग के आदेश में ब्रिटिश सैनिकों ने 15 मार्च 1775 को सूरत से पुणे के लिए कूच किया। लेकिन उन्हें अदास में हरिपंत फडके द्वारा रोक दिया गया, और 18 मई, 1775 को हुई झड़प में फडके पूरी तरह से पराजित हुआ।[9] केटिंग के सैनिकों, रघुनाथराव के सैनिकों सहित, मे से 96 मारे गए। अदास (गुजरात) की लड़ाई में 150 मराठों की मौत हुई।[10]

वारेन हेस्टिंग्स ने अनुमान लगाया कि पुणे के खिलाफ सीधी कार्रवाई हानिकारक होगी। इसलिए, बंगाल की सुप्रीम काउंसिल ने सूरत की संधि की निंदा की, और कर्नल अप्टॉन को पुणे भेज कर, उसकी जगह एक नई संधि बनाने का आदेश दिया। अप्टॉन और पुणे के मंत्रियों के बीच 1 मार्च 1776 को पुरन्दर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए।

पुरन्दर की संधि (1 मार्च 1776) ने सूरत की संधि को बर्खास्त कर दिया, और रघुनाथराव को पेशवा का दावा छोड़ कर पेंशन देने का वादा किया गया, लेकिन साल्सेट और भरूच जिलों के राजस्व पर ब्रिटिशों का कब्जा बनाए रखा गया।[8]

बड़गाँव[संपादित करें]

1776 में फ्रांस और पुणे के बीच एक संधि के बाद, बॉम्बे सरकार ने पुणे पर आक्रमण कर रघुनाथराव को बहाल करने का फैसला किया। उन्होंने कर्नल एगर्टन के नेतृत्व में एक बल भेजा जो खोपोली होते हुए पश्चिमी घाटों के माध्यम से भोरघाट तक पहुंचा, वहां से वह आगे करला की ओर बढ़े, जहां 4 जनवरी 1779 को उन्हें मराठा हमलों का सामना करना पड़ा। आखिरकार अंग्रेजों को बड़गाँव वापस लौटना पड़ा, लेकिन जल्द ही वे चारों ओर से घिर गये। 16 जनवरी 1779 को मराठों की जीत के रूप में अंग्रेजों को बड़गाँव की संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े।[11]

बॉम्बे सैन्यदल को बचाने के लिए, कर्नल (बाद में जनरल) थॉमस विंधम गोडार्ड के नेतृत्व में उत्तरी भारत से आने वाली राहत सेना आने मे देर कर दी। बंगाल में ब्रिटिश गवर्नर जनरल, वारेन हेस्टिंग्स ने बड़गाँव की संधि को खारिज कर दिया और कहा कि बॉम्बे के अधिकारियों के पास इस पर हस्ताक्षर करने की कोई कानूनी शक्ति नहीं थी, और उन्होंने गोदार्ड को इस क्षेत्र में ब्रिटिश हितों को सुरक्षित करने का आदेश दिया।

गोदार्ड ने 6,000 सैनिकों के साथ भद्र किला पर हमला किया और 15 फरवरी 1779 को अहमदाबाद पर कब्जा कर लिया। वहाँ पर 6,000 अरब और सिंधी पैदल सेना और 2,000 घोड़ों की एक गढ़सेना मौजुद थी। लड़ाई में, २ ब्रिटिश समैत 108 लोग हताहत हुए।[12][13][14] गोदार्ड ने 11 दिसंबर, 1780 को वसई पर भी कब्जा कर लिया। बंगाल से एक अन्य सैन्यदल ने कप्तान पोपम के नेतृत्व में ग्वालियर पर कब्जा करने के लिये कूच किया, जिस पर गोहाद के राणा द्वारा सहायता प्रदान की गई, और इससे पहले की महादजी सिंधिया युद्ध की तैयारी कर सकते, 4 अगस्त, 1780 को ग्वालियर पर कब्जा कर लिया गया। गुजरात में महादजी सिंधिया और जनरल गोदार्ड के बीच झड़प हुईं, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। हेस्टिंग्स ने महादजी शिंदे को घेरने के लिए मेजर कैमैक के नेतृत्व में एक और सैन्य दल भेजा।[15]

मध्य भारत और दक्कन[संपादित करें]

बेसीन पर कब्ज़ा करने के बाद, गोडार्ड पुणे की ओर बढ़ा। लेकिन अप्रैल 1781 में बोरघाट - परशुराम के पास हरिपंत फडके और तुकोजी होलकर ने उनका रास्ता रोक लिया।

मध्य भारत में, महादजी ने कैमका को चुनौती देने के लिए मालवा में खुद को तैनात किया। प्रारंभ में, महादजी का पलड़ा भारी था और कैमाक के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना को बहुत क्षति उठानी पड़ी, और उन्हें हदूर में वापस लौटना पड़ा।[16]

फरवरी 1781 में सिपरी शहर में महादजी को अंग्रेजों से हरा का सामना करना पड़ा,[17] लेकिन उसके बाद अंग्रेजों ने जो भी कदम उठाया, शिंदे ने अपनी बड़ी सेना के साथ उसका प्रतिकार किया, उन्होंने अंग्रेजों की आपूर्ति भी काट दी। मार्च के अंत में अंग्रेजों ने एक रात को अचानक महादजी के शिविर पर आक्रमण कर न केवल आपूर्ति, बल्कि बंदूकें और हाथी भी लूट कर ले गये।[18] उसके बाद, शिंदे की सेनाओं से अंग्रेजों को सैन्य खतरा बहुत कम हो गया।

अब दोनों का पलड़ा समान रूप से संतुलित हो गया था। जहां महादजी ने सिरोंज[19] में कैमैक पर एक महत्वपूर्ण जीत हासिल की, वही बाद में 24 मार्च, 1781 को दुर्दाह की लड़ाई[20] के माध्यम से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा।

पोफम और कैमैक की सहायता के लिए अप्रैल, 1781 में कर्नल मुर्रे, नये सैन्य बल के साथ पहुंचा। सिपरी में अपनी हार के बाद, महादजी शिंदे चिंतित हो गए। आखिरकार, उन्होंने 1 जुलाई 1781 को मुर्रे की सेनाओं को निर्णायक रूप से कुचल दिया।

सालबाई की संधि[संपादित करें]

17 मई 1782 को शिंदे और एण्डरसन के बीच संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसे सालबाई की संधि[8] के रूप में भी जाना जाता है। जून 1782 में हेस्टिंग्स द्वारा और फरवरी 1783 में नाना फडणवीस द्वारा संधि को अनुमोदित किया गया। संधि के साथ ही पहला आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया।[21]

(सालबाई, मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर से 32 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है)

लोकप्रिय संस्कृति में[संपादित करें]

2013 के एक हॉलीवुड फिल्म द लवर्स, इस युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है।[22]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Encyclopedia of the Peoples of Asia and Oceania: M to Z, Barbara A. West, 509
  2. M. R., Kantak. "The First Anglo-Maratha War, 1774-1783: A Military Study of Major Battles". google books. अभिगमन तिथि 11 अगस्त 2018.
  3. Thorpe, Edgar; Thorpe, Showick. Concise General Knowledge Manual. Pearson Education India. पृ॰ 49. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-81-317-5512-9. अभिगमन तिथि 3 November 2012.
  4. Encyclopedia of the Peoples of Asia and Oceania: M to Z
  5. Encyclopedia of the Peoples of Asia and Oceania: M to Z
  6. Encyclopedia of the Peoples of Asia and Oceania: M to Z
  7. Encyclopedia of the Peoples of Asia and Oceania: M to Z
  8. प्रवक्ता भर्ती इतिहास. उपकार प्रकाशन. पृ॰ ३७४. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-93-5013-140-4. अभिगमन तिथि 13 अगस्त 2018.
  9. The Great Maratha by N.G.Rahod p.11
  10. Naravane, M.S. (2014). Battles of the Honorourable East India Company. A.P.H. Publishing Corporation. पपृ॰ 53–56. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788131300343.
  11. Naravane, M.S. (2014). Battles of the Honorourable East India Company. A.P.H. Publishing Corporation. पपृ॰ 56–58. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788131300343.
  12. "Bhadra Fort to turn into heritage hangout!". The Times of India. Ahmedabad. TNN. June 12, 2009. अभिगमन तिथि January 17, 2013.
  13. Duff, James Grant (1826) [Oxford University]. A History of the Mahrattas. 2. London: Longman, Rees, Orme, Brown, and Green.
  14. Beveridge, Henry (1862) [New York Public Library]. A comprehensive history of India, civil, military and social. Blackie. पपृ॰ 456–466.
  15. Camac (not to be confused with Carnac!) received his promotion to Lieutenant-Colonel while on this mission
  16. The Great Maratha by N.G.Rathod p.20
  17. Duff, James Grant A History of the Mahrattas London, Longman (1826), via Google Books, accessed 2008-01-27
  18. Mill, James option=com_staticxt&staticfile=show.php%3Ftitle=843&chapter=79955&layout=html&Itemid=27 The History of British India, vol. 4, chapter 6, London, Baldwin (1826), via oll.libertyfund.org, accessed 2008-01-27
  19. Battles of the Honourable East India Company: Making of the Raj by M.S.Naravane p.62
  20. Dictionary of Battles and Sieges by Tony Jaques p.320
  21. Naravane, M.S. (2014). Battles of the Honorourable East India Company. A.P.H. Publishing Corporation. पृ॰ 63. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 9788131300343.
  22. http://timesofindia.indiatimes.com/entertainment/marathi/movies/news/Atul-Kulkarni-Milind-Gunaji-Roland-Joffe-Singularity-The-Lovers-Bipasha-Basu-Abhay-Deol-Ajay-Zankar-Aishwarya-Rai-Vivek-Oberoi/articleshow/34926960.cms?

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  • बेक, सैंडर्सन. India & Southeast Asia to 1800 (2006) "Marathas and the English Company 1701-1818" online. Retrieved Oct. 1, 2004.
  • गॉर्डन, स्टीवर्ट. Marathas, marauders, and state formation in eighteenth-century India (ऑक्सफोर्ड यूनिवरसिटि प्रेस, 1994).
  • गॉर्डन, स्टीवर्ट. "The Marathas," in New Cambridge History of India, II.4, (कैम्ब्रिज यू प्रेस, 1993).
  • सेशन, राधािका. "The Maratha State: Some Preliminary Considerations." Indian Historical Review 41.1 (2014): 35-46. online