मराठा साम्राज्य

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मराठा हिंदू पत पातशाही
मराठा साम्राज्य

1645–1818

ध्वज

1760 में मराठा साम्राज्य (पीले रंग में) एवं अन्य राज्य
राजधानी राजगड(1645-1674)

रायगड(1674-1689) पन्हाला(1689-1691) जिंजी (1691-1699) सातारा(1699-1818) पुणे(उपराधानी-१७४९-१८१८)

भाषाएँ मराठी, संस्कृत[1]
धार्मिक समूह हिंदू धर्म
शासन स्वराज तथा हिंदू पत पातशाही
छत्रपति
 -  1664–1680 छत्रपती शिवाजी महाराज (प्रथम)
 -  1808–1818 छत्रपती प्रतापसिंह महाराज
पेशवा
 -  1674–1689 मोरोपंत त्र्यंबक पिंगले (प्रथम)
 -  1795–1818 बाजीराव द्वितीय (अंतिम)
विधायिका अष्टप्रधान
इतिहास
 -  तोरणा का युद्ध १६४५ 1645
 -  तीसरा एंग्लो मराठा युद्ध १८१८ 1818
क्षेत्रफल
28,00,000 किमी ² (10,81,086 वर्ग मील)
जनसंख्या
 -  1700 est. 15,00,00,000 
मुद्रा रुपया, पैसा, मोहर, शिवराई, होन
आज इन देशों का हिस्सा है:  भारत
 पाकिस्तान
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मराठा साम्राज्य या मराठा संघराज्य 18 वीं शताब्दी में दक्षिण एशिया के एक बड़े भाग पर प्रभुत्व था। साम्राज्य औपचारिक रूप से 1674 से छत्रपति शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक के साथ अस्तित्व में आया और 1818 में पेशवा बाजीराव द्वितीय की हार के साथ समाप्त हुआ। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय उपमहाद्वीप पर नियंत्रण पाने से पहले, अधिकांश भारतीय उपमहाद्वीप में मुग़ल शासन को समाप्त करने के लिए पुरा श्रेय मराठों को दिया जाता है।[2][3][4][note 1]

मराठे एक मराठी - पश्चिमी दख्खन पठार (वर्तमान महाराष्ट्र) से एक योद्धा समूह है, जो हिंदवी स्वराज्य की स्थापना कर के, प्रमुखता से उठे थे [6][7] 17 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मराठे प्रमुख हो गए, जिन्होंने आदिल शाही वंश के खिलाफ विद्रोह किया और अपनी राजधानी के रूप में रायगड के साथ एक हिंदवी स्वराज्य का निर्माण किया। उनके पिता, महाबली शहाजी राजे ने उस से पहले तंजावुर पर विजय प्राप्त की थी, जिसे छत्रपती शिवाजी महाराज के सौतेले भाई, वेंकोजीराव उर्फ ​​एकोजीराजे को विरासत में मिला था और उस राज्य को तंजावुर मराठा राज्य के रूप में जाना जाता था। बैंगलोर जो 1537 में विजयनगर साम्राज्य के एक जागीरदार, केम्पे गौड़ा 1 द्वारा स्थापित किया गया था, जिसने विजयनगर साम्राज्य से स्वतंत्रता की घोषणा की थी, उसे 1638 में उनके उपसेनापति, शाहजीराजे भोंसले के साथ, रानादुल्ला खान, के नेतृत्व में एक बड़ी आदिल शाही बीजापुर सेना द्वारा, बैंगलोर पर कब्जा कर लिया गया था, जिन्होंने केम्पे गौड़ा 3 को हराया था और बैंगलोर शहाजीराजे को जागीर (सामंती संपत्ति) के रूप में दिया गया था। मराठे अपने गतिशीलता के लिए जाने जाते थे और मुगल-मराठा युद्धों के दौरान अपने क्षेत्र को मजबूत करने में सक्षम थे और बाद में मराठा साम्राज्य पूरे भारत में फैल गया।

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद, शाहू महाराज, छत्रपती शिवाजी महाराज के पोते, मुगलों द्वारा कैद से रिहा किया गया था।[8] अपनी चाची छत्रपती महाराणी ताराबाई के साथ थोड़े संघर्ष के बाद, बाळाजी विश्वनाथ और धनाजी जाधव के साथ छत्रपती शाहू महाराज शासक बने। उनकी मदद से प्रसन्न होकर, छत्रपती शाहू महाराज ने बाळाजी विश्वनाथ और बाद में, उनके वंशजों को पेशवा यानी साम्राज्य के प्रधान मंत्री के रूप में नियुक्त करते रहे।[9] मराठा शासन के विस्तार में बाळाजी विश्वनाथ और उनके वंशजों की अहम भूमिका थी। अपने चरम पर मराठा साम्राज्य उत्तर के अटक से कटक तक ओर गुजरात से बंगाल तक फैला हुआ था - इतिहासकार अटक को मराठा साम्राज्य का अंतिम मोर्चा मानते हैं हालाकी उन्होने पेशावर पर कब्जा किया था [10],[11] बालाजी बाजीराव पेशवे ने मुग़ल सिंहासन को समाप्त करने के लिए सदाशिव राव भाव को दिल्ली भेजा [12] 1761 में, मराठा सेना ने अफगान दुर्रानी साम्राज्य के अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत का तीसरा युद्ध हार गए, जिससे उनका अफगानिस्तान में साम्राज्य विस्तार नहीं हो पाया।

बड़े साम्राज्य को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए, माधवराव ने शूरवीरों को सबसे मजबूत करने के लिए अर्ध-स्वायत्तता दी, और मराठा संघराज्य बनाया। ये सरदार, बड़ौदा के गायकवाड़, इंदौर और मालवा के होल्कर ग्वालियर और उज्जैन के सिंधिया के रूप में जाने जाते हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुणे में पेशवा पद के उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप करनेका प्रयास किया, जिसके कारण, पहला एंग्लो-मराठा युद्ध हुआ, जिसमें मराठे विजयी हुए।[13] दूसरा और तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1805 से 1818 तक) में उनकी पराजय होने तक, मराठे भारत में पूर्व-प्रख्यात केंद्र शक्ति बने रहे।

मराठा साम्राज्य का एक बड़ा हिस्सा समुद्र तट था, जिसे कान्होजी आंग्रे जैसे नौसेनाप्रमुख के अधीन शक्तिशाली मराठा नौसेना द्वारा सुरक्षित किया गया था। वह विदेशी नौसैनिक जहाजों को खाड़ी में रखने में बहुत सफल रहा - विशेष रूप से पुर्तगाली और ब्रिटिश लोगों के।[14] तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा और भूमि आधारित किलेबंदी करना मराठों की रक्षात्मक रणनीति और क्षेत्रीय सैन्य इतिहास के महत्वपूर्ण पहलू थे।

छत्रपती[संपादित करें]

मराठा साम्राज्य के छत्रपती[संपादित करें]

Footnotes[संपादित करें]

  1. Some historians[5] may consider 1645 as the founding of the empire because that was the year when the teenaged Shivaji captured a fort from the Adilshahi sultanate.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Pearson (1976), पृ॰प॰ 221–235.
  2. Capper (1997):This source establishes the Maratha control of Delhi before the British
  3. Sen (2010), पृ॰प॰ 1941–:The victory at Bhopal in 1738 established Maratha dominance at the Mughal court
  4. Schmidt (2015).
  5. Pagdi (1993), पृ॰ 98: Shivaji Maharaj's coronation and setting himself up as a sovereign prince symbolises the rise of the Indian people in all parts of the country. It was a bid for Hindawi Swarajya (Indian rule), a term in use in Marathi sources of history.
  6. Jackson (2005), पृ॰ 38.
  7. Manohar (1959), पृ॰ 63.
  8. Ahmad & Krishnamurti (1962).
  9. Majumdar (1951b).
  10. P. J. Marshall (2006). Bengal: The British Bridgehead: Eastern India 1740–1828. Cambridge University Press. पृ॰ 72. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-521-02822-6.
  11. Ghazi (2002), पृ॰ 130.
  12. Naravane (2006), पृ॰ 63.
  13. Pagdi (1993), पृ॰ 21.

Bibliography/स्त्रोत[संपादित करें]

Serfoji, Tanjore Maharaja (1979). Journal of the Tanjore Maharaja Serfoji's Sarasvati Mahal Library.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]