होलकर

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होलकर राजवंश मल्हार राव से प्रारंभ हुआ जो १७२१ में पेशवा की सेवा में शामिल हुए और जल्दी ही सूबेदार बने। होल्कर वंश के लोग 'होलगाँव' के निवासी होने से 'होलकर' कहलाए। अतः पूरे भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में इस जाती को अलग अलग नाम से जाना जाता है परंतु यह एक ही जाती है इनके नाम अलग अलग है पूरे भारत में इनकी एक ही पहचान हैधनगर नाम से यह सब जातियां जानी जाती है जैसे(1) पाल (2)बघेल(3) गाडरी(4) गडरिया (5)होलकर (6)गायरी उन्होने और उनके वंशजों ने मराठा राजा और बाद में १८१८ तक मराठा महासंघ के एक स्वतंत्र सदस्य के रूप में मध्य भारत में इंदौर पर शासन किया और बाद में भारत की स्वतंत्रता तक ब्रीटिश भारत की एक रियासत रहे।

होलकर वंश उन प्रतिष्ठित राजवंशों मे से एक था जिनका नाम शासक के शीर्षक से जुडा, जो आम तौर पर महाराजा होल्कर या 'होलकर महाराजा' के रूप में जाना जाता था, जबकि पूरा शीर्षक 'महाराजाधिराज राज राजेश्वर सवाई श्री (व्यक्तिगत नाम) होलकर बहादुर, महाराजा ऑफ़ इंदौर' था।

परिचय[संपादित करें]

सर्वप्रथम मल्हाराव होल्कर ने इस वंश की कीर्ति बढ़ाई। मालवाविजय में पेशवा बाजीराव की सहायता करने पर उन्हें मालवा की सूबेदारी मिली। उत्तर के सभी अभियानों में उन्होंने में पेशवा को विशेष सहयोग दिया। वे मराठा संघ के सबल स्तंभ थे। उन्होंने इंदौर राज्य की स्थापना की। उनके सहयोग से मराठा साम्राज्य पंजाब में अटक तक फैला। सदाशिवराव भाऊ के अनुचित व्यवहार के कारण उन्होंने पानीपत के युद्ध में उसे पूरा सहयोग न दिया पर उसके विनाशकारी परिणामों से मराठा साम्राज्य की रक्षा की।

मल्हारराव के देहांत के पश्चात् उसकी विधवा पुत्रवधू अहल्या बाई ने तीस वर्ष तक बड़ी योग्यता से शासन चलया। सुव्यवस्थित शासन, राजनीतिक सूझबूझ, सहिष्णु धार्मिकता, प्रजा के हितचिंतन, दान पुण्य तथा तीर्थस्थानों में भवननिर्माण के लिए ने विख्यात हैं। उन्होंने महेश्वर को नवीन भवनों से अलंकृत किया। सन् १७९५ में उनके देहांत के पश्चात् तुकोजी होल्कर ने तीन वर्ष तक शासन किया। तदुपरांत उत्तराधिकार के लिए संघर्ष होने पर, अमीरखाँ तथा पिंडारियों की सहायता से यशवंतराव होल्कर इंदौर के शासक बने। पूना पर प्रभाव स्थापित करने की महत्वाकांक्षा के कारण उनके और दोलतराव सिंधिया के बीच प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न हो गई, जिसके भयंकर परिणाम हुए। मालवा की सुरक्षा जाती रही। मराठा संघ निर्बल तथा असंगठित हो गया। अंत में होल्कर ने सिंधिया और पेशवा को हराकर पूना पर अधिकार कर लिया। भयभीत होकर बाजीराव द्वितीय ने १८०२ में बेसीन में अंग्रेजों से अपमानजनक संधि कर ली जो द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध का कारण बनी। प्रारंभ में होल्कर ने अंग्रेजों को हराया और परेशान किया पर अंत में परास्त होकर राजपुरघाट में संधि कर ली, जिससे उन्हें विशेष हानि न हुई। १८११ में यशवंतराव की मृत्यु हो गई।

अंतिम आंग्ल-मराठा युद्ध में परास्त होकर मल्हारराव द्वितीय को १८१८ में मंदसौर की अपमानजनक संधि स्वीकार करनी पड़ी। इस संधि से इंदौर राज्य सदा के लिए पंगु बन गया। गदर में तुकोजी द्वितीय अंग्रेजी के प्रति वफादार रहे। उन्होंने तथा उनके उत्तराधिकारियों ने अंग्रेजों की डाक, तार, सड़क, रेल, व्यापारकर आदि योजनाओं को सफल बनाने में पूर्ण सहयोग दिया। १९०२ से अंग्रेजों के सिक्के होल्कर राज्य में चलने लगे। १९४८ में अन्य देशी राज्यों की भाँति इंदौर भी स्वतंत्र भारत का अभिन्न अंग बन गया और महाराज होल्कर को निजी कोष प्राप्त हुआ।

होलकर साम्राज्य की स्थापना[संपादित करें]

मल्हारराव होलकर (जन्म १६९४, मृत्यु १७६६) ने इन्दौर मे परिवार के शासन कि स्थापना की। उन्होने १७२० के दशक मे मालवा क्षेत्र में मराठा सेनाओं की संभाली और १७३३ में पेशवा ने इंदौर के आसपास के क्षेत्र में ९ परगना क्षेत्र दिये। इंदौर शहर मुगल साम्राज्य द्वारा मंजूर, 3 मार्च १७१६ दिनांक से कंपेल के नंदलाल मंडलोई द्वारा स्थापित एक स्वतंत्र रियासत के रूप में पहले से ही अस्तित्व में था। वे नंदलाल मंडलोई ही थे जिन्होने इस क्षेत्र में मराठों को आवागमन की अनुमती दी और खान नदी के पार शिविर के लिए अनुमति दी। मल्हार राव ने १७३४ में ही एक शिविर की स्थापना की, जो अब में मल्हारगंज के नाम से जाना जात है। १७४७ मे उन्होने अपने राजमहल, राजवाडा का निर्माण शुरू किया। उनकी मृत्यु के समय वह मालवा के ज्यादातर क्षेत्र मे शासन किया और मराठा महासंघ के लगभग स्वतंत्र पाँच शासकों में से एक के रूप में स्वीकार किया गया।

उनके बाद उनकी बहू अहिल्याबाई होलकर (१७६७-१७९५ तक शासन किया) ने शासन की कमान संभाली। उनका जन्म महाराष्ट्र में चौंडी गाँव में हुआ था। उन्होने राजधानी को इंदौर के दक्षिण मे नर्मदा नदी पर स्थित महेश्वर पर स्थानांतरित किया। रानी अहिल्याबाई कई हिंदू मंदिरों की संरक्षक थी। उन्होने अपने राज्य के बाहर पवित्र स्थलों में मंदिरों का निर्माण किया।

मल्हार राव होलकर के दत्तक पुत्र तुकोजीराव होलकर (शासन: १७९५-१७९७) ने कुछ समय के लिये रानी अहिल्याबाई की मृत्यु के बाद शासन संभाला। हालांकि तुकोजी राव ने अहिल्याबाई कए सेनापती के रूप मे मंडलोई द्वरा इंदौर की स्थापना के बाद मार्च १७६७ में अपना अभियान शुरु कर दिया था। होलकर १८१८ से पहले इन्दौर मे नही बसे।

यशवंतराव होलकर[संपादित करें]

उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र यशवंतराव होलकर (शासन: १७९७-१८११) ने शासन की बागडोर संभाली। उन्होने अंग्रेजों की कैद से दिल्ली के मुगल सम्राट शाह आलम को मुक्त कराने का फैसला किया, लेकिन असफल रहे। अपनी बहादुरी की प्रशंसा में शाह आलम ने उन्हे "महाराजाधिराज राजराजेश्वर आलीजा बहादुर" उपाधि से सम्मानित किया।

यशवंतराव होलकर ने १८०२ में पुणे के निकट हादसपुर में सिंधिया और पेशवा बाजीराव द्वितीय की संयुक्त सेनाओं को हराया। पेशवा अपनी जान बचाकर पुणे से बेसिन भाग निकले, जहां अंग्रेजों ने सिंहासन के लालच के बदले में सहायक संधि पर हस्ताक्षर की पेशकश की। इस बीच, यशवंतराव ने पुणे में अमृतराव को अगले पेशवा के रूप में स्थापित किया। एक महीने से अधिक के विचार - विमर्श के बाद उनके भाई को पेशवा के रूप मे मान्यता मिलने के खतरे को देखते हुए, बाजीराव द्वितीय ने संधि पर हस्ताक्षर किए और अपनी अवशिष्ट संप्रभुता का आत्मसमर्पण किया और जिससे अंग्रेज उसे पूना में सिंहासन पर पुनः स्थापित करें।

महाराजा यशवंतराव होलकर ने जब देखा कि अन्य राजा अपने व्यक्तिगत स्वार्थों के चलते एकजुट होने के लिए तैयार नहीं थे, तब अंततः २४ दिसम्बर १८०५ को राजघाट नामक स्थान पर अंग्रेजों के साथ संधि (राजघाट संधि) पर हस्ताक्षर कर दिये। वे भारत के एक्मात्र ऐसे राजा थे जिन्हे अंग्रेजों ने शांति संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए संपर्क किया था। उन्होने ऐसी किसी भी शर्त को स्वीकार नही किया जिससे उनका आत्म सम्मान प्रभावित होता। अंग्रेजों ने उन्हे एक संप्रभु राजा के रूप में मान्यता प्रदान की और उसके सभी प्रदेश लौटाए। उन्होने जयपुर, उदयपुर, कोटा, बूंदी और कुछ अन्य राजपूत राजाओं पर उनके प्रभुत्व को भी स्वीकार किया। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे होलकर के मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यशवंतराव होलकर एक प्रतिभाशाली सैन्य नेता था, जिन्होने दूसरे आंग्ला-मराठा युद्ध में अंग्रेजों से लोहा लिया था। कुछ शुरुआती जीतों के बाद, वह उन्होंने के साथ शांति संधि की।

माहिदपुर का युद्ध[संपादित करें]

१८११ में, महाराजा मल्हारराव तृतीय, ४ वर्ष की उम्र में शासक बने। महारानी तुलसाबाई होलकर ने प्रशासन का कार्यभाल संभाला। हालांकि, धरम कुंवर और बलराम सेठ ने पठानो और पिंढरियों की मदद से अंग्रेजो के साथ मिलकर तुलसाबाई और मल्हारराव को बंदी बनाने का षढयन्त्र रचा। जब तुलसाबाई को इसके बारे में पता चला तो उन्होने १८१५ में उन दोनों को मौत की सजा दी और तांतिया जोग को नियुक्त किया। इस कारण, गफ़्फूर खान पिंडारी ने चुपके से ९ नवम्बर १८१७ को अंग्रेजो के साथ एक संधि की और १९ दिसम्बर १८१७ को तुलसाबाई की हत्या कर दी। अंग्रेजो ने सर थॉमस हिस्लोप के नेतृत्व में, २० दिसम्बर १८१७ को पर हमला कर माहिदपुर की लड़ाई में ११ वर्ष के महाराजा मल्हारराव तृतीय, २० वर्ष के हरिराव होलकर और २० वर्ष की भीमाबाई होलकर की सेना को परास्त किया। होलकर सेना ने युद्ध लगभग जीत ही लिया था लेकिन अंत समय में नवाब अब्दुल गफ़्फूर खान ने उन्हे धोखा दिया और अपनी सेना के साथ युद्ध का मैदान छोड़ दिया। अंग्रेजो ने उसके इस कृत्य के लिये गफ़्फूर खान को जावरा की जागीर दी। ६ जनवरी १८१८ को मंदसौर में संधि पर हस्ताक्षर किए गए। भीमाबाई होलकर ने इस संधि को नहीं स्वीकार किया और गुरिल्ला विधियों द्वारा अंग्रेजो पर हमला जारी रखा। बाद में झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भीमाबाई होलकर से प्रेरणा लेते हुये अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़े। इस तीसरे एंग्लो - मराठा युद्ध के समापन पर, होलकर ने अपने अधिकांशतः क्षेत्रों अंग्रेजों को खो दिए और ब्रिटिश राज मे एक रियासत के तौर पर शामिल हुआ। राजधानी को भानपुरा से इंदौर स्थानांतरित कर दिया गया।

रियासत[संपादित करें]

मल्हारराव होलकर तृतीय ने २ नवम्बर को इंदौर में प्रवेश किया। क्योंकि वे अवयस्क थे, इसलिये तांतिया जोग को दीवान नियुक्त किया गया। पुराना महल दौलत राव सिंधिया की सेना के द्वारा नष्ट कर दिया गया था अतः एक नए महल का निर्माण किया गया। मल्हारराव होलकर तृतीय के बाद मार्तंडराव ने औपचारिक रूप से १७ जनवरी १८३४ को सिंहासन संभाला। लेकिन वह यशवंतराव के भतीजे हरिराव होलकर से १७ अप्रैल १८३४ को बदल दिये गये। उन्होने २ जुलाई १८४१ को खांडेराव होलकर को गोद लिया और २४ अक्टूबर १८४३ को निधन हो गया। खांडेराव १३ नवम्बर १८४३ को शासक बने पर १७ फ़रवरी १८४४ को अचानक उनकी मृत्यु हो गई। तुकोजीराव होलकर द्वितीय (१८३५-१८८६) को २७ जून १८४४ को सिंहासन पर स्थापित किया गया। १८५७ के भारतीय विद्रोह के दौरान, वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रति वफादार थे। अक्टूबर 1872 में, उन्होने टी. माधव राव को इंदौर के दीवान के रूप में नियुक्त किया। उनकी मृत्यु १७ जून १८८६ को हुई और उनके ज्येष्ठ पुत्र, शिवाजीराव शासक बने।

यशवंतराव द्वितीय (शासन: १९२६-१९४८) ने १९४७ में भारत की आजादी तक इंदौर राज्य पर शासन किया। इंदौर को मध्य प्रदेश में 1956 में विलय कर दिया गया।

वंशज[संपादित करें]

  • रिचर्ड होलकर
  • सबरीना होलकर
  • यशवंतराव होलकर
  • ऊषादेवी महाराज साहिबा होलकर १५ बहादुर
  • रंजीत मल्होत्रा
  • दिलीप मल्होत्रा
  • विजयेन्द्र घाटगे
  • सागरिका घाटगे

इंदौर के होलकर महाराजा[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]