पानीपत का तृतीय युद्ध

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पानीपत का तृतीय युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच हुआ। पानीपत की तीसरी लड़ाई मराठा साम्राज्य (सदाशिवा राव भाउ)और अफगानिस्तान के अहमद शाह अब्दाली, जिसे अहमद शाह दुर्रानी भी कहा जाता है के बीच 14 जनवरी 1761को वर्तमान हरियाणा मे स्थित पानीपत के मैदान मे हुआ। इस युद्ध मे दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया।

मुग़ल राज का अंत (1680 - 1770) में शुरु हो गया था, जब मुगलों के ज्यादातर भू भागों पर मराठाओं का आधिपत्य हो गया था। गुजरात और मालवा के बाद बाजीराव ने 1737 में मुगलों को हराकर दिल्ली को अपने अधीन कर लिया लिया। 1739 में नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली को पूरी तरीके से नष्ट कर दिया उस दिन से मुगलों की सत्ता बस दिल्ली तक ही सीमित रह गई और बात की मुगल सम्राटों में कुछ ताकत नहीं रह गई उस वक्त 1755 के बाद इमाद उल मुल्क नामक वजीर की तानाशाही पूरे दिल्ली में फेल हो गई। 1757 ईस्वी में रघुनाथ राव ने दिल्ली पर आक्रमण कर दिल्ली को वापस अपने कब्जे में कर लिया और दुर्रानी को वापस अफ़गानिस्तान लौटने के लिए मजबूर कर दिया उसके बाद उन्होंने अटक और पेशावर पर भी अपने थाने लगा दिए। जिससे अब अहमद शाह दुर्रानी को मराठो से खतरा पैदा हो गया और अहमद शाह दुर्रानी को ही नहीं बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत की शक्तियों को मराठों से खतरा पैदा हो गया जिसमें अवध के नवाब सुजाउद्दौला और रोहिल्ला सरदार नजीब उददोला भी शामिल थे। मराठों ने अपना जाल राजपूताना मे जाना शुरू कर दिया जिससे राजस्थान के सभी राजपूत राजा जैसे जयपुर के राजा माधो सिंह जी इनसे नाराज हो गए और इन सब ने मिलकर ठाना कि मराठों को सबक सिखाया जाए उनकी नजरों में मराठों को उस वक्त एक इंसान था जो सबक सिखा सकता था और वह अहमद शाह दुर्रानी जो कि दुर्रानी साम्राज्य का संस्थापक था और 1747 में राज्य का सुल्तान बना था और उसकी शक्ति बहुत ही ताकतवर थी सब ने अहमदशाह को भारत में आने का न्योता दिया यह खबर पहुंची तो 1757 पेशावर में दत्ता जी सिंधिया जिनको पेशवा बालाजी बाजीराव ने वहां पर नियुक्त किया था उनको परास्त कर भारत में घुसा था। उस वक्त सदाशिव राव भाऊ की पानीपत के युद्ध के नायक थे वह उदगीर में थे जहां पर उन्होंने 1759 निजाम की सेनाओं को हराया हुआ था सेना को हराने के बाद उनके मन में काफी वृद्धि हुई और वह मराठा साम्राज्य की सबसे ताकतवर सेनापति में गिने जाने लगे इसलिए बालाजी बाजी राव ने अहमदशाह से लड़ने के लिए भी उनको ही चुना जबकि उन्हें उत्तर में लड़ने का कोई ज्ञान नहीं था कि उस वक्त भारत में सबसे ज्यादा ज्ञान प्राप्त एक रघुनाथ राव और महादजी सिंधिया थे। परंतु इन दोनों पर विश्वास ना करके शायद बालाजी बाजीराव की सबसे बड़ी भूल की या फिर समय मराठों के साथ नहीं था। सदाशिवराव भाऊ अपनी समस्त सेना को उदगीर से सीधे दिल्ली की ओर रवाना हो गए जहां वे लोग 1760 में दिल्ली पहुंचे। उस वक्त अहमद शाह अबदाली दिल्ली पार करके अनूप शहर यानी दोवाब में पहुच चुका था और वहां पर उसने अवध के नवाब सुजाउदोला और रोहिल्ला सरदार नजीब उदोला के साथ एक युद्ध और मराठों के खिलाफ रसद भी मिलने का पूरा काम भारतीयों ने ही किया यानी अवध के नवाब ने उसको रसद पहुंचाने का काम किया। मराठे दिल्ली में पहुंचे और उन्होंने कुंजपुरा पर हमला कर दिया जो कि एक जहां पर एक अफगान सेना की कम से कम 15000 थी में उसको तबाह कर दिया और कुंजपुरा में अफगान को पूरी तरह तबाह करके उनसे सभी सामान और खाने-पीने की आपूर्ति मराठों को हो गई मराठों ने लाल किले की चांदी की चादर को भी पिघला कर उससे भी धन अर्जित कर लिया और उस वक्त मराठों के पास उत्तर भारत में रह सकता एक मात्र साधन दिल्ली था परंतु बाद में अब्दाली को रोकने के लिए यमुना नदी पहले उन्होंने एक सेना तैयार की थी परंतु अहमदशाह ने नदी पार कर ली अक्टूबर के महीने में और वह दिल्ली से आगे आकर पानीपत में पहुंच गया जहां उसने दिल्ली और पुणे मराठों का संपर्क काट दिया मराठों ने काबुल से संपर्क काट दिया इस तरीके से अब आमने सामने की लड़ाई हो गई। जिस भी सेना की सप्लाई लाइन चलती रहेगी वह युद्ध जीत जाएगी करीब डेढ़ महीने की मोर्चा बंदी के बाद 14 जनवरी सन 1761 को बुधवार के दिन सुबह 8:00 बजे यह दोनों सेनाएं आमने-सामने युद्ध के लिए आ गई कि मराठों को रसद की आमद हो नहीं रही थी और उनकी सेना में भुखमरी फैलती जा रही थी उस वक्त तक हो सकती थी परंतु अहमदशाह को अवध और रूहेलखंड से हो रही थी युद्ध का फैसला किया इस युद्ध में मराठों की अच्छी साबित हुई ऐसा हुआ नहीं विश्वासराव को करीब 1:00 से 2:30 के बीच एक गोली शरीर पर लगी और वह गोली इतिहास को परिवर्तित करने वाली साबित हुई और सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी से उतर कर विश्वास राव को देखने के लिए मैदान में पहुंचे जहां पर उन्होंने उसको मृत पाया बाकी मराठा सरदारों ने देखा कि सदाशिवराव भाऊ अपने हाथी पर नहीं है और सदाशिव राव भाऊ से उतर कर अकेले दम पर अपनी तलवार लेकर युद्ध से लड़ने के लिए चले गए और अंतिम दिन तक वहीं लड़ाई लड़ी अपने हाथी पर नहीं है तो पूरी सेना में हड़कंप मच गया जिसे सेना का कमान ना होने के कारण पूरी सेना में अफरा तफरी मच गई और इसी कारण कई सैनिक मारे गए इसलिए कुछ छोड़ कर भाग गए परंतु सदाशिव राव भाऊ अंतिम दिन तक उस युद्ध में लड़ते रहे इस युद्ध में अंतर शाम तक आते-आते पूरी मराठा सेना खत्म हो गई और कई सैनिक भाग गए अब्दाली ने इस मौके को एक सबसे अच्छा मौका समझा और 15000 सैनिक जो कि रिजव थे उनको युद्ध के लिए भेज दिया और उन 15000 सैनिकों ने बचे कुचे मराठा सैनिक जो सदाशिवराव भाऊ के नेतृत्व में थे उनको खत्म कर दिया और मराठों के सभी फ्रेंड्स तबाह हो गए मल्हार राव होलकर महादजी सिंधिया और नाना फडणवीस इस से भाग निकले उनके अलावा और कई महान सरदार जैसे विश्वासराव पेशवा सदाशिवराव भाऊ जानकोजी सिंधिया यह सभी इस युद्ध में मारे गए और इब्राहिम खान गदी जो कि मराठा तोपखाने की कमान संभाले हुए थे उनकी भी इस युद्ध में बहुत बुरी तरीके से मौत हो गई सदाशिव राव भाऊ का गला काटकर और अफगान सैनिक लिए गए और कई दिनों बाद विश्वासराव का शरीर मिला इसके साथ 40000 तीर्थयात्रियों जो मराठा सेना के साथ उत्तर भारत यात्रा करने के लिए गये थे उनको पकड़ कर उनका कत्लेआम करवा दिया। पानी पिला पिला कर उनका वध कर दिया गया। एक लाख से ज्यादा लोगों को हमेशा के लिए युद्ध मे मारे गए यह बात जब पुणे पहुंची तब बालाजी बाजीराव को गुस्से का ठिकाना नहीं रहा वह बहुत बड़ी सेना लेकर वापस पानीपत की ओर चल पड़े जब अहमद शाह दुर्रानी को यह खबर लगी तो उसने खुद को रोक लेना ही सही समझा को कि उसकी सेना में भी हजारों का नुकसान हो चुका था और वह सेना वापस अभी जो भी नहीं लग सकती थी इसलिए उसने 10 फरवरी,1761 को पेशवा को पत्र लिखा कि "मैं जीत गया हूं परंतु मैं यह नहीं लड़ना चाहता था सदाशिवराव भाऊ जी के लिए प्रेरित किया और मैं दिल्ली की गद्दी नहीं लूगा आप ही दिल्ली पर राज करें मैं वापस जा रहा हूं" बाजीराव को भेजा बालाजी बाजीराव ने पत्र पढ़ा और वापस पुणे लौट गए परंतु थोड़े में ही 23 जून 1761 को उनकी मौत हो गई डिप्रेशन के कारण क्योंकि इस युद्ध में उन्होंने अपना पुत्र और अपने कई सारे मराठा सरदारों को महान सरदारों को खो दिया था पानीपत के साथ एक बार आता साम्राज्य की सबसे बड़ा दर्द दर्द हुआ और 18 वीं सदी का सबसे भयानक युद हुआ और अंत में यह भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन रहा सभी को मार दिया गया वापस लौटने भारत का सबसे बड़ा कई सारी विदेशी ताकतें भारत में आने लगी परंतु 1761 में माधवराव पेशवा पेशवा बने और उन्होंने महादाजी सिंधिया और नाना फडणवीस की सहायता से उत्तर भारत में अपना प्रभाव से से से लाया 1761 से 1772 तक उन्होंने वापस रोहिलखंड पर आक्रमण किया और रोहिलखंड में नजीर दुला के पुत्र को भयानक पूरी तरीके से पराजित किया और पूरे रोहिल्ला को ध्वस्त कर दिया नजीबुदोला की कब्र को भी तोड़ दिया और संपूर्णता भारत में फिर अपना आतंक फैला दिया और उनके सामने झुक गया और दिल्ली को वापस उन्होंने मुगल सम्राट शाह आलम को वापस दिल्ली की गद्दी पर बैठाया और पूरे भारत पर शासन करना फिर से प्रारंभ कर दिया महादाजी सिंधिया और नाना फडणवीस का मराठा पुनरुत्थान में बहुत बड़ा योगदान है और माधवराव पेशवा की वजह से ही यह सब हो सका वापस मराठा साम्राज्य बना बाद में मराठों ने बिटिश को भी पराजित किया और सालाबाई की संधि की। पानीपत के युद्ध में भारत का इतिहास का सबसे काला दिन रहा। और इसमें कई सारे महान सरदार मारे गए जिस देश के लिए लड़ रहे थे और अपने देश के लिए लड़ते हुए सभी श्रद्धालुओं की मौत हो गई इसमें सदाशिवराव भाऊ इब्राहिम खान गदी, विश्वासराव, जानकोजी सिंधिया, बालाजी बाजीराव की भी मौत हो गई।इस युद्ध के बाद खुद अहमद शाह दुर्रानी ने मराठों की वीरता को लेकर उनकी काफी तारीफ की और मराठों को सच्चा देशभक्त भी बताया।

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