पालखेड़ की लड़ाई

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

पालखेड की लड़ाई 1728 ईस्वी में बाजीराव प्रथम और निजाम हैदराबाद के आसिफ जा प्रथम के बीच में हुई थी अशीफ झा प्रथम ने जो कि मुगल वजीर थे। उन्होंने छत्रपति शाहू की जगह कोल्हापुर राज्य के राजा संभाजी को सतारा की गद्दी पर बैठने का निमंत्रण भेजा जिसमें उन्होंने कहा कि अगर पेशवा को पराजित कर देते हैं तो उन्हें मराठा साम्राज्य की गददी मिल जाएगी शाहू को बात पता पता चली तो उन्होंने पहले इसका कोर्ट में जाने का फैसला किया परंतु बाजीराव ने इसे करने से मना कर दिया और युद्ध छोड़ने के लिए तैयार हो गए उन्होंने अपनी सारी फौजी कर्नाटक से बुला ली और 1727 ईस्वी में मानसून के मौसम में यह बहुत ही जबरदस्त युद्ध के लिए बाजीराव निकल पड़े और निजाम के खिलाफ युद्ध की तैयारी करने लगे बाजीराव अपनी सेना को लेकर गुजरात की ओर निकल गए इस मौके का फायदा उठाते हुए निजाम ने नीति के तहत निजाम की सेनाओं को पूरी तरह से निजाम पुणे जाकर संभाजी को छत्रपति बना दिया बाजीराव गुजरात छोड़कर औरंगाबाद की ओर चले गए इस सब से निजाम ने सोचा और निजाम वहां से चल पड़े बाजीराव ने अपने दिमाग की चाल को चलते हुए और रणनीति के तहत निजाम की सेनाओं को वापस हैदराबाद से जाने से पहले ही और पालखेड के निकट दलदली जगह पर बाजीराव की सेना ने निजाम की सेनाओं को पकड़ लिया और उन्हें एक दलदल नदी के किनारे ला खड़ा किया जिससे उनकी सेनाओं को आत्मसमर्पण करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा निजाम ने संभाजी द्वितीय से मदद मांगी परंतु संभाजी द्वितीय ने निजाम की मदद करने से इंकार कर दिया क्योंकि वह बाजीराव पेशवा से दुश्मनी मोल नहीं लेना चाहता था अंततः 6 मार्च को मुंगी शेगाव नामक स्थान पर निजाम और बाजीराव प्रथम ने संधि के लिए जिसके तहत ने सामने छत्रपति शाहू को मराठा साम्राज्य का छत्रपति घोषित कर दिया और संभाजी को कोल्हापुर का छत्रपति बनाया। और दक्कन में सरदेशमुखी और चौथ वसूल करने की भी अनुमति निजाम ने बाजीराव को दे दी। बाजीराव कि यह जीत एक बहुत ही बड़ी जीत थी और इससे उन्होंने संपूर्ण मराठा साम्राज्य को एक बार फिर से बढ़ाना शुरू कर दिया और उनका प्रभाव संपूर्ण दक्षिण भारत में फैल गया मराठों के लिए एक बहुत बड़ी थी और कई विदेशियों ने भी इस जीत का वर्णन किया है और बाजीराव प्रथम को 18 वीं सदी का सबसे महानतम सेनापति बताया है। बाजीराव ने सिर्फ अपने दिमाग की और रणनीति के तहत ही बिना युद्ध लड़े ही निजाम को पराजित कर दिया यह बाजीराव के महान मस्तिष्क और एक महान सेनापति होने को दर्शाता है।