ब्रिटिश साम्राज्य

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ब्रिटिश साम्राज्य
British Empire
ध्वज
वो सारे भूक्षेत्र जो किसी न किसी समय ब्रिटिश साम्राज्य का भाग रहे हैं।
वो सारे भूक्षेत्र जो किसी न किसी समय ब्रिटिश साम्राज्य का भाग रहे हैं।

ब्रिटिश साम्राज्य, ग्रेट ब्रिटेन द्वारा शासित साम्राज्य था जो मानव इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य था।[1] एक सदी से भी अधिक समय तक यह दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य और आर्थिक महाशक्ति थी। यह साम्राज्य यूरोप में खोज युग का परिणाम था जो 15 वीं शताब्दी के ज्ञानोदय यात्राओं के साथ शुरू हुआ, जिसके कारण यूरोपीय औपनिवेशिक साम्राज्यों का निर्माण हुआ। 1921 तक, ब्रिटिश साम्राज्य की आबादी 45 करोड़ थी। यह उस समय विश्व की कुल आबादी का चौथाई हिस्सा था जो केवल ब्रिटेन की सरपरस्ती के अंतर्गत था। 3.3 करोड़ वर्ग किलोमीटर पर फैला यह साम्राज्य न केवल इतिहास का सबसे बड़ा साम्राज्य था, बल्कि दुनिया के सभी महाद्वीपों पर फैले होने के साथ-साथ यह साम्राज्य अपने वृहदतम रूप में धरती के एक-तिहाई भूभाग को नियंत्रित करता था। इस प्रकार इसकी भाषा और सांस्कृतिक प्रसार दुनिया भर में थी, और मौजूद समय में अंग्रेज़ी भाषा, संस्कृति तथा अंग्रेजी शासन शैली एवं वेस्टमिंस्टर शैली से प्रभावित सरकारी प्रणालियों में देखि जा सकती है। दुनिया के सभी महाद्वीपों, क्षेत्रों और लगभग हर भूभाग पर इसकी मौजूदगी होने के कारण, इस प्रचलित कथन का जन्म हुआ: "ब्रिटिश साम्राज्य पर कभी सूरज नहीं डूबता है।"

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पांच दशकों में, साम्राज्य के भीतर के कई देश आजाद हुए। तथा उनमें से कई स्वतंत्र होकर ब्रिटिश साम्राज्य के राष्ट्रकुल में शामिल हो गए हैं। कुछ देशों ने ब्रिटिश संसद से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भी ब्रिटिश संप्रभु को अपने संप्रभु के रूप में स्वीकार कर लिया, जिन्हें आज राष्ट्रमंडल प्रजाभूमि कहते हैं।[2]

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

मूल (1497-1583)[संपादित करें]

इसकी स्थापना इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के अलग साम्राज्य होने के पश्चात रखी गयी। १४९६ मे राजा हेनरी सप्तम ने विदेशों मे स्पेन और पुर्तगालियों को हराकर पूर्वी एशिया की तरफ बढ़ना शुरू किया। पूर्वी एशिया में वे पूर्वी अंतर्टिका के रास्ते पहुँचे। ये लोग चोर थे

"पहला" साम्राज्य[संपादित करें]

अमरीका के तेरह उपनिवेश[संपादित करें]

तेरह उपनिवेश (इस नक़्शे में गाढ़े गुलाबी रंग वाले क्षेत्र)

तेरह ब्रिटिश उपनिवेश पूर्वी उत्तर अमेरिका के आंध्र महासागर के तट पर सन् 1607 से 1733 तक स्थापित किये गए। इन उपनिवेशों ने 1776 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता का ऐलान किया और केवल उपनिवेश न रहकर संयुक्त राज्य अमेरिका के राज्य बन गए। यही वजह है के आधुनिक अमेरिकी ध्वज में 13 लाल और सफ़ेद धारियाँ हैं और मूल अमेरिकी झंडे में 13 तारे थे।

यह तेरह उपनिवेश थे: डेलावेयर, पॅनसिल्वेनिया, न्यू जर्ज़ी, जोर्जिया, कनेक्टिकट, मैसाच्यूसॅट्स बे, मॅरिलैंड, दक्षिण कैरोलाइना, न्यू हैम्शर, वर्जीनिया, न्यूयॉर्क, उत्तर कैरोलाइना और रोड आयलॅन्ड व प्रॉविडॅन्स। प्रत्येक उपनिवेश ने स्वशासन की अपनी प्रणाली विकसित की। किसान स्वयं ही की स्थानीय और प्रांतीय सरकार का चुनाव करते और स्थानीय निर्णायक मंडल में सेवा प्रदान करते। वर्जीनिया, कैरोलाइना और जॉर्जिया जैसे कुछ उपनिवेशों में अफ्रीकी गुलामों की संख्या भी अधिक थी। 1760 और 1770 के दशकों में कर (टैक्स) पर हुए विरोध के दौर के बाद सभी उपनिवेश राजनीतिक और सैन्य तौर पर ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एकजुट हो गए और मिलकर अमेरिकी क्रांतिकारी युद्ध (1775-1783) लड़ा। सन् 1776 में, उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की और पेरिस संधि (1783) पर हस्ताक्षर कर उस लक्ष्य को प्राप्त किया। स्वतंत्रता से पहले, यह तेरह उपनिवेश ब्रिटिश अमेरिका के दो दर्जन अलग-अलग कालोनियों में बटे थे। ब्रिटिश वेस्ट इंडीज, न्यूफाउंडलैंड, क्युबेक, नोवा स्कॉटिया और पूर्व और पश्चिम फ्लोरिडा के प्रांत समूचे युद्ध के दौरान राजशाही के प्रति वफादार रहे।

अफ़्रीका और दास व्यापार[संपादित करें]

नेदरलैंड के साथ स्पर्धा[संपादित करें]

फ़्रांस के संग वैश्विक संघर्ष[संपादित करें]

भारतीय उपमहाद्वीप पर ईस्ट इंडिया कंपनी की पकड़[संपादित करें]

शाह आलम दीवानी के अनुदान लॉर्ड क्लाइव को दिया।

अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी (इसके बाद, कंपनी) 1600 में कंपनी व्यापारियों की लंदन के ईस्ट इंडीज में व्यापार के रूप में स्थापित किया गया था यह 1612 में भारत में एक पैर जमाने बाद मुगल सम्राट जहांगीर द्वारा दिए गए अधिकारों के एक कारखाने, या सूरत के पश्चिमी तट पर बंदरगाह में व्यापारिक पोस्ट 1640 में स्थापित की। विजयनगर शासक से इसी तरह की अनुमति प्राप्त करने के बाद आगे दक्षिण, एक दूसरे कारखाने के दक्षिणी तट पर मद्रास में स्थापित किया गया था। बंबई द्वीप, सूरत से अधिक दूर नहीं था, एक पूर्व पुर्तगाली चौकी ब्रागणसा की कैथरीन के चार्ल्स द्वितीय शादी में दहेज के रूप में इंग्लैंड के लिए भेंट की चौकी, 1668 में कंपनी द्वारा पट्टे पर दे दिया गया था। दो दशक बाद, कंपनी पूर्वी तट पर एक उपस्थिति के रूप में अच्छी तरह से स्थापित हुई और, गंगा नदी डेल्टा में एक कारखाने को कोलकाता में स्थापित किया गया था। के बाद से, इस समय के दौरान अन्य कंपनियों पुर्तगाली, डच, फ्रेंच और डेनिश थे इसी तरह इस क्षेत्र में विस्तार की स्थापना की, तटीय भारत पर अंग्रेजी कंपनी की शुरुआत भारतीय उपमहाद्वीप पर एक लंबी उपस्थिति निर्माण करे ईस का कोई सुराग पेशकश नहीं की।

प्लासी का पहला युद्ध 1757 में कंपनी ने रॉबर्ट क्लाइव के तहत जीत और 1764 बक्सर की लड़ाई (बिहार में) में एक और जीत,[3] कंपनी की शक्ति मजबूत हुई और सम्राट शाह आलम यह दीवान की नियुक्ति द्वितीय और बंगाल का राजस्व कलेक्टर, बिहार और उड़ीसा। कंपनी इस तरह 1773 से नीचा गंगा के मैदान के बड़े क्षेत्र के वास्तविक शासक बन गए। यह भी डिग्री से रवाना करने के लिए बम्बई और मद्रास के आसपास अपने उपनिवेश का विस्तार। एंग्लो - मैसूर युद्धों(1766-1799) और आंग्ल-मराठा युद्ध (1772-1818) के सतलुज नदी के दक्षिण भारत के बड़े क्षेत्रों के नियंत्रण स्थापित कर लिया।

कंपनी की शक्ति का प्रसार मुख्यतः दो रूपों लिया। इनमें से पहला भारतीय राज्यों के एकमुश्त राज्य-हरण और अंतर्निहित क्षेत्रों, जो सामूहिक रूप से ब्रिटिश भारत समावेश आया के बाद प्रत्यक्ष शासन था। पर कब्जा कर लिया क्षेत्रों उत्तरी प्रांतों (रोहिलखंड, गोरखपुर और दोआब शामिल) (1801), दिल्ली (1803) और सिंध (1843) शामिल हैं। पंजाब, उत्तर - पश्चिम सीमांत प्रांत और कश्मीर, 1849 में एंग्लो - सिख युद्धों के बाद कब्जा कर लिया गया है, तथापि, कश्मीर तुरंत जम्मू के डोगरा राजवंश अमृतसर (1850) की संधि के तहत बेच दिया है और इस तरह एक राजसी राज्य बन गया। बरार में 1854 पर कब्जा कर लिया गया था और दो ​​साल बाद अवध के राज्य।[4]

अमेरिकी उपनिवेशों का खोना[संपादित करें]

अमेरिका के स्वतंत्रता युद्ध ने यूरोपीय उपनिवेशवाद के इतिहास में एक नया मोड़ ला दिया। उसने अफ्रीका, एशिया एवं लैटिन अमेरिका के राज्यों की भावी स्वतंत्रता के लिए एक पद्धति तैयार कर दी। इस प्रकार अमेरिका के युद्ध का परिणाम केवल इतना ही नहीं हुआ कि 13 उपनिवेश मातृदेश ब्रिटेन से अलग हो गए बल्कि वे उपनिवेश एक तरह से नए राजनीतिक विचारों तथा संस्थाओं की प्रयोगशाला बन गए। पहली बार 16वीं 17वीं शताब्दी के यूरोपीय उपनिवेशवाद और वाणिज्यवाद को चुनौती देकर विजय प्राप्त की। अमेेरिकी उपनिवेशों का इंग्लैंड के आधिपत्य से मुक्ति के लिए संघर्ष, इतिहास के अन्य संघर्षों से भिन्न था। यह संघर्ष न तो गरीबी से उत्पन्न असंतोष का परिणाम था और न यहां कि जनता सामंतवादी व्यवस्था से पीडि़त थी। अमेरिकी उपनिवेशों ने अपनी स्वच्छंदता और व्यवहार में स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए इंग्लैंड सरकार की कठोर औपनिवेशिक नीति के विरूद्ध संघर्ष किया था। अमेरिका का स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है।

यॉर्कटाउन में कॉर्नवॉलिस का आत्मसमर्पण: अमेरिकी उपनिवेशों के नुकसान को "पहले ब्रिटिश साम्राज्य" के अंत का चिह्नक माना जाता है।

अमेरिकी क्रन्तिकारी युद्ध ग्रेट ब्रिटेन और उसके तेरह उत्तर अमेरिकी उपनिवेशों के बीच एक सैन्य संघर्ष था, जिससे वे उपनिवेश स्वतन्त्र संयुक्त राज्य अमेरिका बने। शुरूआती लड़ाई उत्तर अमेरिकी महाद्वीप पर हुई। सप्तवर्षीय युद्ध में पराजय के बाद, बदले के लिए आतुर फ़्रान्स ने 1778 में इस नए राष्ट्र से एक सन्धि की, जो अंततः विजय के लिए निर्णायक साबित हुई।

इसकी शुरुआत लॉड नार्थ की चाय नीति-1773 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी को वित्तीय संकट से उबारने के लिए ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लॉर्ड नार्थ ने यह कानून बनाया कि कम्पनी सीधे ही अमेरिका में चाय बेच सकती है। अब पहले की भांति कम्पनी के जहाजों को इंग्लैंड के बंदरगाहों पर आने और चुंगी देने की आवश्यकता नहीं थी। इस कदम का लक्ष्य था कम्पनी को घाटे से बचाना तथा अमेरिकी लोगों को चाय उपलब्ध कराना। परन्तु अमेरिकी उपनिवेश के लोग कम्पनी के इस एकाधिकार से अप्रसन्न थे क्योंकि उपनिवेश बस्तियों की सहमति के बिना ही ऐसा नियम बनाया गया था। अतः उपनिवेश में इस चाय नीति का जमकर विरोध हुआ और कहा गया कि “सस्ती चाय” के माध्यम से इंग्लैंड बाहरी कर लगाने के अपने अधिकार को बनाए रखना चाहता था। अतः पूरे देश में चाय योजना के विरूद्ध आंदोलन शुरू हो गया। 16 दिसम्बर 73 को सैमुअल एडम्स के नेतृत्व में बॉस्टन बंदरगाह पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के जहाज में भरी हुई चाय की पेटियों को समुद्र में फेंक दिया गया। अमेरिकी इतिहास में इस घटना को बोस्टन टी पार्टी कहा जाता है। इस घटना में ब्रिटिश संसद के सामने एक कड़ी चुनौती उत्पन्न की। अतः ब्रिटिश सरकार ने अमेरिकी उपनिवेशवासियों को सजा देने के लिए कठोर एवं दमनकारी कानून बनाए। बोस्टन बंदरगाह को बंद कर दिया गया। मेसाचुसेट्स की सरकार को पुनर्गठित किया गया और गवर्नर की शक्ति को बढ़ा दिया गया तथा सैनिकों को नगर में रहने का नियम बनाया गया और हत्या संबंधी मुकदमें अमेरिकी न्यायालयों से इंग्लैंड तथा अन्य उपनिवेशों में स्थानांतरित कर दिए गए।

"दूसरा" साम्राज्य[संपादित करें]

प्रशांत अन्वेषण[संपादित करें]

नेपोलियन-शासित फ़्रांस के साथ युद्ध[संपादित करें]

दास प्रथा का अंत[संपादित करें]

भारत पर कंपनी राज और ब्रिटिश राज[संपादित करें]

रूस के संग संघर्ष[संपादित करें]

अफ्रीका पर पकड़[संपादित करें]

श्वेत उपनिवेशों में स्वशासन[संपादित करें]

साम्राज्ञ शताब्दी[संपादित करें]

विश्वयुद्ध[संपादित करें]

प्रथम विश्वयुद्ध[संपादित करें]

अन्तरयुद्ध काल[संपादित करें]

द्वितीय विश्वयुद्ध[संपादित करें]

विउपनिवेशीकरण और पतन[संपादित करें]

इन्हें भी देखें: विउपनिवेशीकरण

विरासत[संपादित करें]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Ferguson, Niall (2004). Empire, The rise and demise of the British world order and the lessons for global power. Basic Books. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 0-465-02328-2.
  2. ब्रिटिश राजशाही: महारानी और राष्ट्रमंडल
  3. "ब्रिटेन भारत से कितनी दौलत लूट कर ले गया?".
  4. Ludden 2002, पृष्ठ 135

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]