तानाजी मालुसरे

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तानाजी की प्रतिमा

तानाजी मालुसरे छत्रपती शिवाजी महाराज के घनिष्ठ मित्र और वीर निष्ठावान मराठा सरदार थे। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ मराठा साम्राज्य, हिंदवी स्वराज्य स्थापना के लिए सुभेदार (किल्लेदार) की भूमिका निभाते थे । तानाजी छत्रपती शिवाजी महाराज के बचपन के मित्र थे वे बचपन मे एक साथ खेले थे [1] वें १६७० ई. में सिंहगढ़ की लड़ाई में अपनी महती भूमिका के लिए प्रसिद्ध हैं। ऊस दिन सुभेदार तानाजी मालुसरेजी के पुत्र रायबा के विवाह की तैयारी ही रही थी, तानाजी मालुसरेजी छत्रपती शिवाजी महाराज जी को आमंत्रित करणे पहुचे तब उन्हे ज्ञात हूआ की कोंढाणा पर छत्रपती शिवाजी महाराज चढाई करणे वाले है. तब तानाजी मालुसरे जी ने कहा राजे मे कोंढाणा पर आक्रमण करुंगा. अपने पुत्र रायबा के विवाह [2] जैसे महत्वपूर्ण कार्य को महत्व न देते हुए उन्होने शिवाजी महाराज की इच्छा का मान रखते हुए कोंढाणा किला जीतना ज़्यादा जरुरी समझा। छत्रपती शिवाजी महाराज जी की सेना मे कई सरदार थे परंतु छत्ररपती शिवाजी महाराज जी ने विर तानाजी मालुसरे जी को कोढाना आक्ररमन के लिए चुना[3] और कोंढणा "स्वराज्य" में शामिल हो गया लेकिन तानाजी मारे गए थे। छत्रपति शिवाजी ने जब यह ख़बर सुनी तो वो बोल पड़े "गढ़ तो जीता, लेकिन मेरा "सिंह" नहीं रहा (मराठी - गड आला पण सिंह गेला)।

तानाजीराव का जन्म १७वीं शताब्दी में महाराष्ट्र के कोंकण प्रान्त में महाड के पास 'उमरथे' में हुआ था। वे बचपन से छत्रपति शिवाजी के साथी थे। ताना और शिवा एक-दूसरे को बहुत अछी तरह से जानते थे। तानाजीराव, शिवाजी के साथ हर लड़ाई में शामिल होते थे। वे शिवाजी के साथ औरंगजेब से मिलने दिल्ली गये थे तब औरंगजेब ने शिवाजी और तानाजी को कपट से बंदी बना लिया था। तब शिवाजी और तानाजीराव ने एक योजना बनाई और मिठाई के पिटारे में छिपकर वहाँ से बाहर निकल गए। ऐसे ही एक बार शिवाजी महाराज की माताजी लाल महल से कोंडाना किले की ओर देख रहीं थीं। तब शिवाजी ने उनके मन की बात पूछी तो जिजाऊ माता ने कहा कि इस किले पर लगा हरा झण्डा हमारे मन को उद्विग्न कर रहा है। उसके दूसरे दिन शिवाजी महाराज ने अपने राजसभा में सभी सैनिको को बुलाया और पूछा कि कोंडाना किला जीतने के लिए कौन जायेगा। किसी भी अन्य सरदार और किलेदार को यह कार्य कर पाने का साहस नहीं हुआ किन्तु तानाजी ने चुनौती स्वीकार की और बोले, "मैं जीतकर लाऊंगा कोंडाना किला"।

तानाजीराव के साथ उनके भाई सूर्याजी मालुसरे और मामा ( शेलार मामा) थे। वह पूरे ३४२ सैनिको के साथ निकले थे। तानाजीराव मालुसरे शरीर से हट्टे-कट्टे और शक्तिपूर्ण थे। कोंडाणा का किला रणनीतिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित था और शिवाजी को इसे कब्जा करना के लिए बहुत महत्वपूर्ण था।

कोंडाणा तक पहुंचने पर, तानाजी और ३४२ सैनिकों की उनकी टुकड़ी ने पश्चिमी भाग से किले को एक घनी अंधेरी रात को घोरपड़ नामक एक सरीसृप की मदद से खड़ी चट्टान को मापने का फैसला किया। घोरपड़ को किसी भी ऊर्ध्व सतह पर खड़ी कर सकते हैं और कई पुरुषों का भार इसके साथ बंधी रस्सी ले सकती है। इसी योजना से तानाजी और उनके बहुत से साथी चुपचाप किले पर चढ़ गए। कोंडाणा का कल्याण दरवाजा खोलने के बाद मुग़लों पर हमला किया।

किला उदयभान राठोड द्वारा नियंत्रित किया जाता था, जो राजकुमार जय सिंह-१ द्वारा नियुक्त किया गया था। उदय भान के नेतृत्व में ५००० मुगल सैनिकों के साथ तानाजी का भयंकर भयंकर युद्ध हुआ। तानाजी एक बहादुर शेर की तरह लड़े। इस किले को अन्ततः जीत लिया गया,लेकिन इस प्रक्रिया में, तानाजी गंभीर रूप से घायल हो गए थे और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। जब छत्रपती शिवाजी महाराज जी को यह दुःखद वार्ता मिली तो वे बहोत दुःखी, आहात हुये. छत्रपती शिवाजी महाराज ने काहा - मराठी - "गड आला, पण सिंह गेला".अर्थ -"हमने गड तो जीत लिया, लेकीन मेने मेरा सिंह मैने खो दिया"


स्मारक[संपादित करें]

तानाजी मालुसरे की स्मृति में कोंढाणा दुर्ग का नाम बदलकर सिंहगढ़ कर दिया गया है। पुणे नगर के 'वाकडेवाडी' नामक भाग का नाम बदलकर 'नरबीर तानाजी वाडी' कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त तानाजी के अनेकों स्मारक हैं।

कोंढाणा किले का युद्ध[संपादित करें]

छत्रपती शिवाजी महाराज जी के परममित्र सुभेदार तानाजी मालुसरे जी ने बडे वीरता का परिचय देते हूये कोंढाणा किले को, उसके पास के क्षेत्र को मुघलो के कब्जे से स्वतंत्र कराया.इस उद्धा के समय जब उनकी ढाल तूट गई तो तानाजी मालुसरे जी ने अपने सिर के फेटे को अपने हातपर बांधा और तलवार के वार अपने हातोपर लिये एक हात से वे वायु की तेज गती से तलवार चलातें रहे. कोंढाणा कीले के कीलेदार उदयभान राठोड से तानाजी मालुसरे जी ने युद्ध किया और उदयभान राठोड का वध किया.

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. भास्कर, दैनिक (०५ जुलै २०१७). "किला जितने के बाद हुए थे मराठा सरदार वीरगति को प्राप्त, तिलक से यही मिले थे नेताजी औेर महात्मा गांधीजी". दैनिक भास्कर (हिंदी में). दैनिक भास्कर. [www.bhaskar.com मूल] जाँचें |url= मान (मदद) से ०५ जुलै २०१७ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २४ ऑक्टोबर २०१९. |access-date=, |date=, |archive-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  2. भास्कर, दैनिक (०५ जुलै २०१७). "कीला जित्नेके के बाद हूये थे मराठा सरदार विर्गतिको प्रापत, याही मुले थे तिलक नेताजी एवं महात्मा गांधी जी से". www.dainikBhaskar.com. दैनिक भास्कर. मूल से ०५ जुलै २०१७ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २४ ऑक्टोबर २०१९. |access-date=, |date=, |archive-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)
  3. भास्कर, दैनिक (०५ जुलै २०१७). "छत्रपती शिवाजी महाराज ने तानाजी मालुसरे जी को कोंढाणा किल्ला पर आक्रमण के लिये चुना". दैनिक भास्कर. Dainik Bhaskar. [www.dainikbhaskar.com मूल] जाँचें |url= मान (मदद) से ०५ जुलै २०१७ को पुरालेखित. अभिगमन तिथि २४ ऑक्टोबर २०१९. |access-date=, |date=, |archive-date= में तिथि प्राचल का मान जाँचें (मदद)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

स्रोत[संपादित करें]

१. https://www.bhaskar.com/news/MH-PUN-HMU-infog-unknown-facts-of-punes-sinhagad-fort-5638564-NOR.html