के. कामराज

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के. कामराज या कुमारास्वामी कामराज (1903 - 1975) भारत के तमिलनाडु राज्य के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं राजनेता थे। जो तत्कालीन मद्रास राज्य वर्तमान (तमिलनाडु) से भारतीय संविधान सभा के सदस्य चुने गए थे। स्वतंत्रता के बाद उन्होंने तत्कालीन मद्रास राज्य वर्तमान (तमिलनाडु) के दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में नेतृत्व किया।

देश के दो प्रधानमंत्री चुनने में महत्वूपर्ण भूमिका निभाने के कारण 'किंगमेकर' कहे जाने वाले के कामराज 1960 के दशक में ‘कांग्रेस संगठन’ में सुधार के लिए कामराज योजना प्रस्तुत करने के कारण विख्यात हुए।

परिचय[संपादित करें]

कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरूधुनगर में हुआ था। उनका मूल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था लेकिन बाद में वह के कामराज के नाम से ही जाने गये।

कामराज का पहली बार 1907 में एक पारंपरिक स्कूल में दाखिला हुआ था और 1909 में कामराज को विरुदुपट्टी हाई स्कूल में भर्ती कराया गया। कामराज के पिता की मृत्यु हो गई जब वह छह साल के थे, 1914 में कामराज ने अपनी मां की मदद के लिए स्कूल छोड़ दिया, और कामराज अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए

एक युवा लड़के के रूप में, कामराज ने अपने चाचा की राशन की दुकान में काम किया और उस दौरान उन्होंने होम रूल आंदोलन के बारे में सार्वजनिक सभाओं और जुलूसों में भाग लेना शुरू किया। कामराज ने दैनिक समाचार पत्र पढ़कर प्रचलित राजनीतिक परिस्थितियों में रुचि विकसित की। जलियांवाला बाग हत्याकांड उनके जीवन का निर्णायक मोड़ था - उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए लड़ने और विदेशी शासन को समाप्त करने का फैसला किया।

स्वतंत्रता से पूर्व राजनैतिक सफर[संपादित करें]

1920 में, जब वे 18 वर्ष के थे, तब वे राजनीति में सक्रिय हो गए। वह एक पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में कांग्रेस में शामिल हुए।

1921 में कामराज ने कांग्रेस नेताओं के लिए विरुधुनगर में जनसभाएं आयोजित कीं। वह गांधी से मिलने के लिए उत्सुक थे, और जब गांधी 21 सितंबर 1921 को मदुरै गए तो कामराज ने सार्वजनिक सभा में भाग लिया और गांधी से पहली बार मिले। उन्होंने कांग्रेस का प्रचार करने वाले गांवों का दौरा किया।

1922 में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन के तहत प्रिंस ऑफ वेल्स की यात्रा का बहिष्कार किया, तो उन्होंने मद्रास राज्य में होने वाले कार्यक्रम में भाग लिया। (1923-25) में कामराज ने नागपुर ध्वज सत्याग्रह में भाग लिया।

1927 में, कामराज ने मद्रास में तलवार सत्याग्रह शुरू किया और उन्हें नील प्रतिमा सत्याग्रह का नेतृत्व करने के लिए चुना गया, लेकिन बाद में साइमन कमीशन के बहिष्कार को देखते हुए इसे छोड़ दिया गया।

कामराज जून 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के लिए दो साल के लिए जेल गए। राजगोपालाचारी के नेतृत्व में; 1931 के गांधी-इरविन समझौते के परिणामस्वरूप दो साल की सजा काटने से पहले उन्हें रिहा कर दिया गया था।

1932 में, मद्रास में धारा 144 लगाई गई थी, जिसमें बॉम्बे में गांधी की गिरफ्तारी के खिलाफ बैठकों और जुलूसों के आयोजन पर रोक लगाई गई थी। . विर्धुनगर में कामराज के नेतृत्व में आए दिन जुलूस और प्रदर्शन होते रहते थे, कामराज को जनवरी 1932 में फिर से गिरफ्तार किया गया और एक साल के कारावास की सजा सुनाई गई।

1933 में कामराज पर विरुधुनगर बम मामले में झूठा आरोप लगाया गया था। कामराज की ओर से वरदराजुलु नायडू और जॉर्ज जोसेफ ने तर्क दिया और आरोपों को निराधार साबित किया। कामराज ने 34 साल की उम्र में 1937 प्रांतीय चुनावों मे मद्रास राज्य की सत्तूर सीट जीतकर विधानसभा में प्रवेश किया।

कामराज ने पूरे राज्य में एक जोरदार अभियान चलाया और लोगों से युद्ध निधि में योगदान न करने के लिए कहा, जब मद्रास के गवर्नर सर आर्थर होप द्वितीय विश्व युद्ध के लिए निधि के लिए योगदान एकत्र कर रहे थे।

दिसंबर 1940 में उन्हें फिर से गुंटूर में गिरफ्तार कर लिया गया, भारत के रक्षा नियमों के तहत भाषणों के लिए, जो युद्ध निधि में योगदान का विरोध करते थे, और वेल्लोर केंद्रीय जेल भेज दिया गया था, जब वे सत्याग्रहियों की सूची के लिए गांधी की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए वर्धा जा रहे थे।

जेल में रहते हुए वे विरुधुनगर के नगर पार्षद चुने गए। नौ महीने बाद नवंबर 1941 में उन्हें रिहा कर दिया गया और उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनके पास राष्ट्र के लिए अधिक जिम्मेदारी है। उनका सिद्धांत था "किसी भी पद को स्वीकार नहीं करना चाहिए जिसके लिए कोई पूर्ण न्याय नहीं कर सकता"।

1942 में, कामराज ने बॉम्बे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में भाग लिया और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें अगस्त 1942 में गिरफ्तार किया गया और तीन साल के लिए नजरबंद रखे गए और जून 1945 में रिहा हुए। उनकी स्वतंत्रता-समर्थक गतिविधियों के लिए अंग्रेजों ने छह बार कैद किया था, जिसमें 3,000 से अधिक दिन जेल में थे।

1946 के प्रांतीय चुनावों मे मद्रास राज्य की सत्तूर सीट जीतकर दूसरी बार विधानसभा में प्रवेश किया, बाद में वह भारतीय संविधान सभा के लिए चुने गए

स्वतंत्रता के बाद राजनैतिक सफर[संपादित करें]

स्वतंत्रता के बाद कामराज 1952 के संसदीय चुनावों में श्रीविल्लीपुतुर संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के सदस्य चुने गए।

12 अप्रैल 1954 को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कामराज ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। (13 अप्रैल 1954 से 2 अक्टूबर 1963 तक) उन्होंने मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप कार्य किया। सीएम बनने के बाद उन्हें संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने पड़ा।

1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद, कामराज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष बने। नेहरू की मृत्यु के बाद अशांत समय में पार्टी को सफलतापूर्वक संचालित किया। कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने खुद अगला प्रधान मंत्री बनने से इनकार कर दिया और दो प्रधानमंत्रियों, 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और 1966 में नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए, उन्हें 1960 के दशक के दौरान "किंगमेकर" के रूप में व्यापक रूप से सराहा गया।

(1964 से 67) तक उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। 1969 में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव लड़ा, और संसद पहुंचने में कामयाब रहे।

1969 के अंत में कुछ कांग्रेसी नेताओं की इंदिरा गांधी से मतभेद हो गए। मोरारजी देसाई, कुमारस्वामी कामराज, एस निजलिगंप्पा तथा अन्य नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। असंतुष्ट धड़े ने कामराज के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के नाम से राजनीतिक दल का गठन किया।

1971 के संसदीय चुनावों में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा पहुंचे।

1971 के चुनावों में विपक्षी दलों द्वारा धोखाधड़ी के आरोपों के बीच पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा। वह 2 अक्टूबर 1975 में अपनी मृत्यु तक कांग्रेस (ओ) के नेता बने रहे।

उन्हे वर्ष 1976 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया, तथा उनकी स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया।

महत्वपूर्ण योगदान[संपादित करें]

कामराज ने साठ के दशक की शुरुआत में महसूस किया कि कांग्रेस की पकड़ कमजोर होती जा रही है। उन्होंने सुझाया कि पार्टी के बड़े नेता सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दे दें और अपनी ऊर्जा कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए लगाएं। उनकी इस योजना के तहत उन्होंने खुद भी इस्तीफा दिया और लाल बहादुर शास्त्री, जगजीवन राम, मोरारजी देसाई तथा एस. के. पाटिल जैसे नेताओं ने भी सरकारी पद त्याग दिए। यही योजना कामराज प्लान के नाम से विख्यात हुई। कहा जाता है कि कामराज प्लान की बदौलत वह केंद्र की राजनीति में इतने मजबूत हो गए कि नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने में उनकी भूमिका किंगमेकर की रही।

उस योजना के अंतर्गत करीब आधे दर्जन केंद्रीय मंत्री और करीब इतने ही मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दिया था। उस योजना का उद्देश्य था, बतौर पार्टी कांग्रेस को मजबूत करना। पर वास्तव में उसने नेहरू को अपनी नई टीम बनाने के लिए स्वतंत्र कर दिया था, जिसकी छवि 1962 के चीनी युद्ध के कारण धूमिल हुई थी।

दक्षिण भारत की राजनीति में कामराज एक ऐसे नेता भी रहे जिन्हें शिक्षा जैसे क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। आजादी मिलने के बाद 13 अप्रैल 1954 को कामराज ने अनिच्छा में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद स्वीकार किया लेकिन प्रदेश को एक ऐसा नेता मिल गया जो उनके लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था। उन्होंने प्रदेश की साक्षरता दर, जो कभी सात फीसद हुआ करती थी, को बढ़ाकर 37 फीसद तक पहुंचा दिया।

कामराज ने आजादी के बाद तमिलनाडु में जन्मी पीढ़ी के लिए बुनियादी संरचना पुख्ता की थी। कामराज ने शिक्षा क्षेत्र के लिए कई अहम फैसले किए। मसलन उन्होंने यह व्यवस्था की कि कोई भी गांव बिना प्राथमिक स्कूल के न रहे। उन्होंने निरक्षरता हटाने का प्रण किया और कक्षा 11वीं तक निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी। वह स्कूलों में गरीब बच्चों को मध्याह्न भोजन देने की योजना लेकर आए। उन्हीं के कार्यकाल के बाद से तमिलनाडु में बच्चे तमिल में शिक्षा हासिल कर सके।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]