होम रूल आन्दोलन

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अखिल भारतीय होम रूल लीग का ध्वज

होम रूल आन्दोलन अखिल भारतीय होम रूल लीग, एक राष्ट्रीय राजनीतिक संगठन था जिसकी स्थापना 1916 में बाल गंगाधर तिलक द्वारा भारत में स्वशासन के लिए राष्ट्रीय मांग का नेतृत्व करने के लिए "होम रूल" के नाम के साथ की गई थी। भारत को ब्रिटिश राज में एक डोमिनियन का दर्जा प्राप्त करने के लिए ऐसा किया गया था। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड और न्यूफ़ाउंडलैंड डोमिनियन के रूप में स्थापित थे।[1]

प्रथम विश्वयुद्ध की आरम्भ होने पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरमपंथियों ने ब्रिटेन की सहायता करने का निश्चय किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस निर्णय के पीछे संभवतः ये कारण था कि यदि भारत ब्रिटेन की सहायता करेगा तो युद्ध के पश्चात ब्रिटेन भारत को स्वतंत्र कर देगा। परन्तु शीघ्र ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को ये अनुमान हो गया कि ब्रिटेन ऐसा कदापि नहीं करेगा और इसलिए भारतीय नेता असंतुष्ट होकर कोई दूसरा मार्ग खोजने लगे। यही असंतुष्टता ही होम रूल आन्दोलन के जन्म का कारण बनी। 1915 ई. से 1916 ई. के मध्य दो होम रूल लीगों की स्थापना हुई। 'पुणे होम रूल लीग' की स्थापना बाल गंगाधर तिलक ने और 'मद्रास होम रूल लीग' की स्थापना एनी बेसेंट ने की। होम रूल लीग भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सहायक संस्था की भांति कार्यरत हो गयी। इस आन्दोलन का उद्देश्य स्व-राज्य की प्राप्ति था परन्तु इस आन्दोलन में शस्त्रों के प्रयोग की अनुमति नहीं थी।

होम रूल आन्दोलन के दौरान बाल गंगाधर तिलक और एनी बेसेंट ने 1917 में एक ध्वज बनाया। इस ध्वज पर पांच लाल और चार हरी तिरक्षी पट्टियाँ बनीं थी। सात तारों को भी इस पर अंकित किया गया था, किन्तु यह ध्वज लोगों के बीच ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हुआ।[2]

1920 में, अखिल भारतीय होम रूल लीग ने महात्मा गांधी को इसके अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया। एक वर्ष में ये संगठन एक संयुक्त भारतीय राजनीतिक मोर्चे के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में विलय हो गया और इसका स्वयं का अस्तित्व खत्म हो गया।

परिचय[संपादित करें]

श्रीमती ऐनी बेसेन्ट आयरलैंड की रहनेवाली थी। वे भारत में थियोसोफिकल सोसायटी की संचालिका थी। वे भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति से बहुत प्रभावित थी। इसलिए आयरलैंड को छोड़कर वह भारत में बस गई थीं और भारत को अपनी मातृभूमि मानने लग गई थी। इस समय आयरलैंड में आयरिस नेता रेडमाण्ड के नेतृत्व में होमरूल लीग की स्थापना हुई थी जो वैधानिक तथा शांतिमय उपायों से आयरलैंड के लिए होमरूल तथा स्वशासन प्राप्त करना चाहती थी। 1913 में जब ऐनी बेसेन्ट इंग्लैण्ड गईं तो आयरलैंड की होमरूल लीग ने उनको सुझाव दिया कि भारत को स्वतंत्र कराने के लिए होमरूल आन्दोलन प्रारम्भ करें। श्रीमती ऐनी बेसेन्ट भारत को उसी तरह का स्वराज दिलाना चाहती थी, जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के दूसरे उपनिवेशों में था अर्थात् भारत को अधिराज्य स्थिति (डोमिनियन स्टैटस) दिलाने की इच्छुक थी। इसी उद्देश्य से भारत लौटने पर कांग्रेस में शामिल हुईं और उदारवादियों तथा उग्रवादियों को एकताबद्ध कर होमरूल आन्दोलन चलाया।

होमरूल आन्दोलन के उद्देश्य[संपादित करें]

होमरूल आन्दोलन एक वैधानिक आन्दोलन था। इस आन्दोलन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  • (१) इसका सर्वप्रथम उद्देश्य भारत के लिए स्वशासन प्राप्त करना था। ऐनी बेसेन्ट भारत को उसी तरह का स्वराज्य दिलाना चाहती थी जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य के दूसरे उपनिवेशों में था। श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने होमरूल आन्दोलन का आशय स्पष्ट करते हुए अपने साप्ताहिक पत्र ‘कामन वील’ के प्रथम अंक में लिखा था कि, ‘‘राजनीतिक सुधारों से हमारा अभिप्राय ग्राम पंचायतों से लेकर जिला बोर्डों और नगरपालिकाओं, प्रान्तीय विधान सभाओं, राष्ट्रीय संसद के रूप में स्वशासन की स्थापना करना है। इस राष्ट्रीय संसद के अधिकार स्वशासित उपनिवेशों की धारा सभाओं में समान ही होंगे। उन्हें नाम चाहे जो भी दिया जाए और जब ब्रिटिश साम्राज्य की संसद में स्वशासित राज्यों के प्रतिनिधि लिए जाएँ तो भारत का प्रतिनिधि भी उस संसद में पहुँचे।’’
  • (२) इस आन्दोलन का उद्देश्य न तो अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना था और न ही उनके युद्ध के प्रयत्नों में बाधा डालना था। इसके विपरीत उनका कहना था कि स्वशासित भारत अंग्रेजों के लिए युद्ध से अधिक सहायक सिद्ध होगा। भारतीय युद्ध में अंग्रेजों को इसलिए सहायता दे रहे थे क्योंकि उन्हें यह उम्मीद थी कि युद्ध की समाप्ति के बाद अंग्रेज उन्हें स्वशासन देंगे। ऐनी बेसेन्ट का मानना था कि यदि ब्रिटिश सरकार युद्ध के दौरान ही स्वशासन देकर उसे संतुष्ट कर दे तो भारतीय अधिक तन्मयता तथा साधन से अंग्रेजों की युद्ध में सहायता करेंगे।
    ऐनी बेसेन्ट का विचार था कि एक पराधीन भारत ब्रिटिश साम्राज्य के लिए उतना सहायक नहीं हो सकता जितना कि स्वतन्त्र भारत। इस प्रकार इस आन्दोलन का उद्देश्य युद्ध में परोक्ष रूप से ब्रिटेन को सहायता देना था।
  • (३) होमरूल का एक उद्देश्य भारतीय राजनीति को उग्रधारा की ओर जाने से रोकना था। श्रीमती ऐनी बेसेन्ट ने भारतीय राजनीतिक प्रवृत्ति का ध्यानपूर्वक अध्ययन किया वे इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि यदि शांतिपूर्वक तथा वैधानिक तरीकों से आन्दोलन नहीं चलाया गया तो भारतीय राजनीति पर क्रांतिकारियों तथा आतंकवादियों का आधिपत्य हो जाएगा। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने शांतिपूर्ण तथा वैधानिक आन्दोलन का प्रारम्भ श्रेयकर समझा। डॉ0 जकारिया के अनुसार, ‘‘उनकी योजना उग्र राष्ट्रीय व्यक्तियों को क्रांतिकारियों के साथ इकट्ठा होने से रोकने की थी। वे भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत स्वराज्य दिलवाकर संतुष्ट रखना चाहती थी।’’ इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने होमरूल आन्दोलन चलाया जिससे कि भारतीय राजनीति में क्रांतिकारियों के प्रभाव को रोका जा सके।
  • (४) युद्ध काल में भारतीय राजनीति शिथिल पड़ गई थी और सक्रिय कार्यक्रम तथा प्रभावशाली नेतृत्व के अभाव में राष्ट्रीय आन्दोलन की प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया था। अतः भारतीय जनता की सुषुप्तावस्था से जागना आवश्यक था। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु ऐनी बेसेन्ट ने होमरूल आन्दोलन प्रारम्भ किया। श्रीमती ऐनी बेसेन्ट का कहना था, ‘‘मैं एक भारतीय टॉम-टॉम हूं जिसका कार्य सोए हुए भारतीयों को जगाना है, ताकि वे उठें और अपनी मातृभूमि के लिए कुछ कार्य करें। होमरूल आन्दोलन उदारवादी आन्दोलन से भिन्न था। वह भारत के लिए स्वशासन की याचना नहीं, अपितु अधिकारपूर्ण माँग की अभिव्यक्ति था अर्थात् स्वशासन की प्राप्ति भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार था। तिलक ने कहा था कि, ‘‘होमरूल मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, मैं इसे लेकर ही रहूँगा।’’ श्रीमती ऐनी बेसेन्ट का कहना था कि- होमरूल भारत का अधिकार है और राजभक्ति के पुरस्कार के रूप में उसे प्राप्त करने की बात कहना मूर्खतापूर्ण है। भारत राष्ट्र के रूप में अपना न्यायिक अधिकार ब्रिटिश साम्राज्य से माँगता है। भारत इसे युद्ध से पूर्व माँगता था, भारत इसे युद्ध के बीच माँग रहा है और युद्ध के बाद माँगेगा। परन्तु यह इस न्याय को पुरस्कार के रूप में नहीं वरन् अधिकार के रूप में माँगता है, इस बारे में किसी को कोई गलत धारणा नहीं होनी चाहिए।

आन्दोलन की पृष्ठभूमि, प्रारम्भ एवं प्रगति[संपादित करें]

बाल गंगाधर तिलक छः वर्ष की लम्बी सजा काटने के बाद 16 जून 1914 को जेल से छूटे। कैद का अधिकांश समय माण्डले (बर्मा) में बीता था। भारत लौटे तो उन्हें लगा कि वह जिस देश को छोड़कर गए थे, वह काफी बदल गया है। स्वदेशी आन्दोलन के क्रांतिकारी नेता अरविन्द घोष ने सन्यास ले लिया तथा पांडिचेरी में रहने लगे थे। लाला लाजपत राय अमेरिका में थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सूरत के विभाजन, आन्दोलनकारियों पर अंग्रेजों के दमनकारी प्रहारों और 1909के संवैधानिक सुधारों के कारण नरमपंथी राष्ट्रवादियों की निराशा के सम्मिलित सदमे से अभी उबर नहीं पाई थी।

तिलक ने सोचा कि सबसे पहले तो कांग्रेस होकर बाकी गरमपंथियों को भी इसमें शामिल करवाया जाए। तिलक को यह विश्वास हो चला था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का पर्याय बन चुकी है और बिना इसकी इजाजत के कोई भी राष्ट्रीय आन्दोलन सफल नहीं हो सकता। नरमपंथियों को समझाने-बुझाने, उनका विश्वास जीतने तथा भविष्य में अंग्रेजी हुकूमत दमन का रास्ता न अख्तियार करे, इस उद्देश्य से उसने घोषणा की ‘‘मैं साफ-साफ कहता हूँ कि हम लोग हिन्दुस्तान में प्रशासन व्यवस्था का सुधार चाहते हैं जैसा कि आयरलैंड में वहाँ के आन्दोलनकारी मांग कर रहे हैं। अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इस बात को कहने में मुझे कोई हिचक नहीं कि भारत के विभिन्न भागों में जो हिंसात्मक घटनाएँ हुई हैं, न केवल मेरी विचारधारा के विपरीत है, बल्कि उनके कारण हमारे राजनीतिक विकास की प्रक्रिया भी धीमी हुई है।’’ उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के प्रति अपनी निष्ठा दोहराई और भारतीय जनता से अपील की कि वह संकट की घड़ी में अंग्रेजी हुकूमत का साथ दे।

नरमपंथी खेमे के तमाम नेता अब महसूस करने लगे थे कि 1907 में सूरत में जो कुछ उन्होंने किया, वह गलत था। ये कांग्रेस की अकर्मण्यता से भी क्षुब्ध थे। इन्हें तिलक की अपील बहुत भायी। इसके अलावा इन पर ऐनी बेसेन्ट का लगातार दबाव पड़ रहा था कि देश में राष्ट्रवादी राजनीतिक आन्दोलन को फिर से तेज करो। ऐनी बेसेन्ट अभी हाल ही में कांग्रेस में शामिल हुई थी। 1914 में वह 66 वर्ष की थी, उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत इंग्लैण्ड में हुई थी जहाँ उन्होंने स्वतंत्रा चिन्तन (फ्री थॉट) उग्र सुधारवाद (रेडिकलिज्म) फैबियनवाद और ब्रह्मविद्या (थियोसॉफी) के प्रचार में हिस्सा लिया। 1893 में वे भारत आई, उद्देश्य था थियोसाफीकल सोसाइटी के लिए काम करना। उन्होंने मद्रास के एक उपनगर आडियार में अपना दफ्तर खोला और 1907 में थियोसाफी का प्रचार करने लगी। थोड़े समय में ही उन्होंने समर्थकों की एक बड़ी संख्या कर ली। जिनमें ज्यादातर उन समुदायों के शिक्षित व्यक्ति शामिल हुए थे, जिनमें अभी तक सांस्कृतिक पुनर्जागरण नहीं हुआ था। 1914 में ऐनी बेसेन्ट ने अपनी गतिविधियों का दायरा बढ़ाने का निर्णय किया और आयरलैंड की होमरूल लीग की तरह भारत में भी स्वशासन की माँग को लेकर आन्दोलन चलाने की योजना बनाई। उन्हें लगा कि इसके लिए कांग्रेस की अनुमति और गरमपंथी आन्दोलनकारियों का सहयोग लेना जरूरी है। गरमपंथियों का सहयोग पाने के लिए उन्हें कांग्रेस में शामिल करना जरूरी था। ऐनी बेसेन्ट कांग्रेस के गरमपंथी नेताओं को समझने लगी कि वे तिलक व उसके गरमपंथी सहयोगियों को कांग्रेस में शामिल होने की इजाजत दे दे। लेकिन 1914 के कांग्रेस अधिवेशन ने उसकी कोशिशों पर पानी फेर दिया। फिरोजशाह मेहता और बम्बई के उनके नरमपंथी समर्थकों ने गोखले और बंगाल के नरमपंथियों को, गरमपंथियों को बाहर रखने के लिए मना लिया। इसके बाद तिलक और ऐनी बेसेन्ट खुद अपने बूते पर राजनीतिक आन्दोलन चलाने का फैसला किया और साथ-ही-साथ वे कांग्रेस पर दबाव भी डालती रही कि गरमपंथियों को पुनः अपना सदस्य बना ले।

1915 के शुरू में ऐनी बेसेन्ट ने दो अखबारों ‘न्यू इंडिया’ और ‘कामन वील’ के माध्यम से आन्दोलन छेड़ दिया। जनसभाएँ तथा सम्मेलन आयोजित किए। उनकी माँग थी कि जिस तरह से गोरे उपनिवेशों में वहाँ की जनता को अपनी सरकार बनाने का अधिकार दिया गया है, भारतीया जनता को भी स्वशासन का अधिकार मिले। अप्रैल 1915 के बाद ऐनी बेसेन्ट ने और भी कड़ा और जुझारू रुख अख्तियार किया।

इसी बीच लोकमान्य तिलक ने अपनी राजनीतिक गतिविधियाँ शुरू कर दी। लेकिन वे काफी सतर्क थे कि कांग्रेस का नरमपंथी खेमा नाराज न हो या कांग्रेस को यह न लगे कि तिलक की गतिविधियाँ कांग्रेस की नीति से मेल नहीं खाती। उनकी दिली ख्वाहिश कांग्रेस में किसी तरह शामिल होने की थी। तिलक ने 1915 में पूना में अपने समर्थकों का एक सम्मेलन बुलाया, जिसमें यह फैसला किया कि ग्रामीण जनता को कांग्रेस के उद्देश्यों और उसकी गतिविधियों से परिचित कराने के लिए एक संस्थान का गठन किया जाए। इस फैसले के बाद उसी वर्ष अगस्त और सितम्बर में महाराष्ट्र के विभिन्न नगरों में जो स्थानीय संगठन बने, वे राजनीतिक गतिविधियों को तेज करने के बजाय सारी ऊर्जा कांग्रेस में एकता स्थापित करने के लिए खर्च करते रहे। वे बराबर जोर देते रहे कि किसी भी राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए कांग्रेस में एकता बहुत जरूरी है। नरमपंथी कांग्रेस के कुछ रूढ़िवादियों पर दबाव डालने के लिए तिलक ने कभी-कभी धमकी का भी सहारा लिया, पर उन्हें विश्वास था कि अधिकतर नरमपंथी नेताओं को वह समझा-बुझाकर मना लेंगे।

दिसम्बर 1915 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ और तिलक तथा ऐनी बेसेन्ट के प्रयासों को सफलता मिली। गरमपंथियों को कांग्रेस में वापस लेने का फैसला किया गया। फिरोजशाह मेहता के निधन के बाद बम्बई के नरमपंथियों का विरोध बेअसर साबित हुआ। गोखले का निधन हो चुका था। गरमपंथियों को कांग्रेस में लाने में तो ऐनी बेसेन्ट सफल रही पर होमरूल लीग के गठन के अपने प्रस्ताव पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग की मंजूरी नहीं ले सकी। लेकिन स्थानीय स्तर पर कांग्रेस समितियों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रचार कार्यों के उनके प्रस्तावों को कांग्रेस ने मान लिया लेकिन उन्हें उस समय की कांग्रेस का चरित्रा और उसकी ताकत का पता था। वे जानती थी कि कांग्रेस ने इन कार्यक्रमों को मंजूरी तो दे दी है, लेकिन वह इस पर अमल नहीं करेगी। इसलिए उन्होंने अपने प्रस्ताव के साथ यह शर्त भी रखी थी कि यदि सितम्बर 1916 तक कांग्रेस इन कार्यक्रमों पर अमल नहीं करेगी तो वह खुद अपना संगठन बना लेगी।

तिलक को काग्रेंस में वापस आने का अधिकार मिल गया था और उन्होनें काग्रेंस से किसी तरह का वादा भी नहीं किया था, इसलिए उन्होनें अप्रैल 1916 में बेलगाव में हुए प्रान्तीय सम्मेलन में ‘होमरूल लीग’ के गठन की घोषणा की। एनी बेसेन्ट के समर्थक भी अब कसमसाने लगे। वे सितम्बर तक इन्तजार करने को तैयार नहीं थे। उन्होंने एनी बेसेन्ट पर दबाव डालकर होमरूल ग्रुप की स्थापना करने की इजाजत ले ली। जमनादास द्वारकादास, शंकरलाल बेकर और इन्दुलाल याज्ञनिक ने बम्बई में एक अखबार ‘यंग इन्डिया’ का प्रचलन शुरू किया और अंग्रेजी तथा क्षेत्राय भाषा में परचे निकालने के लिए देश के कोने-कोने से चन्दा इकट्ठा करने लगे। एनी बेसेन्ट ने सितम्बर तक इन्तजार किया। कांग्रेस पूरी तरह निष्क्रिय थी। उन्होनें भी होमरूल लीग की स्थापना की घोषणा कर दी और अपने समर्थक जार्ज अरुंडेल को संगठन सचिव नियुक्त किया। तिलक और एनी बेसेन्ट ने अपनी-अपनी लीग के लिए कार्यक्षेत्रों का बँटवारा भी कर दिया, जिससे कहीं कोई गड़बडी न हो। तिलक की लीग कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्यप्रान्त और बरार की जिम्मेवारी थी। देश के बाकी हिस्से एनी बेसेन्ट की लीग के जिम्मे थी। इन दोनों ने अपना विलय नहीं किया। कारण था एनी बेसेन्ट के कुछ समर्थक तिलक को पसंद नहीं करते थे तथा तिलक के कुछ समर्थक एनी बेसेन्ट को, लेकिन उन दोनों के बीच किसी प्रकार का झगड़ा नहीं था।

तिलक ने महाराष्ट्र का दौरा किया। होमरूल आन्दोलन का खूब प्रचार किया। जनता को समझाया कि इसकी जरूरत क्यों है, इसके उद्देश्य क्या हैं। उन्हीं के शब्दों में, ‘‘भारत उस बेटे की तरह है, जो जवान हो चुका है। समय का तकाजा है कि बाप या पालक इस बेटे को उसका वाजिब हक दे दे। भारतीय जनता को अब हक लेना ही होगा। उन्हें इसका पूरा अधिकार है।’’ तिलक ने क्षेत्राय भाषा में शिक्षा और भाषाई राज्यों की माँग को ‘स्वराज’ की माँग से जोड़ दिया। उन्होनें कहा ‘‘मराठी, तेलगू, कन्नड़ तथा अन्य भाषाओं के आधार पर प्रान्तों के गठन की माँग का अर्थ ही है शिक्षा का माध्यम क्षेत्राय भाषा हो। क्या अंग्रेज अपने यहाँ लोगो को फ्रांसीसी की शिक्षा देते है। क्या जर्मन अपने लोगों की अंग्रेजी में शिक्षा देते है या तुर्क फ्रेंच में शिक्षा देते है।’’ 1915 में बम्बई के प्रान्तीय सम्मेलन मे तिलक ने गोखले के निधन पर शोक प्रस्ताव रखा। बी.बी. अलूर इसका समर्थन करने के लिए जैसे ही खड़े हुए तिलक ने कहा ‘‘कन्नड़ भाषा का अधिकार जताने के लिए कन्नड़ में बोलिए।’’ इससे पता चलता है कि तिलक क्षेत्राय मराठी संकीर्णता नहीं थी।

छुआछूत और गैर ब्राह्मणों के मामलों मे तिलक जातिवादी नहीं थे। महाराष्ट्र के गैर ब्राह्मणों ने एक-एक बार सरकार को अलग से ज्ञापन भेजा कि उच्च वर्गों की माँगों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। तो कई लोगों ने इसका विरोध किया। लेकिन तिलक ने इन विरोध करनेवालो को समझाया, आप लोग धैर्य से काम लीजिए। यदि हम उन्हें यह समझा सकें कि हम उनके साथ हैं और उनकी माँग तथा हमारी माँगों मे कोई फर्क नहीं है, तो मुझे पक्का विश्वास है कि असमानता मिटाने के लिए छिड़ा उनका आन्दोलन हमारे संघर्ष से जुड़ जाएगा’’ उन्होंने गैर ब्राह्मणों को समझाया कि झगड़ा ब्राह्मणों और गैर-ब्राह्मणों का नहीं है भेद शिक्षित और अशिक्षित के बीच है। ब्राह्मण और गैर-ब्राह्मणों की तुलना में ज्यादा शिक्षित है। इसलिए गैर-ब्राह्मणों की वकालत करनेवाली सरकार भी मजबूर होकर सरकारी नौकरियों में ब्राह्मणों को ही भरती करती है। सरकार ब्राह्मणों के प्रति अपने निरंकुश रवैये के बावजूद, उन्हें प्रशासन में जगह दे रही है क्योंकि वह मानती है कि पढ़े लिखे लोग ही प्रशासन चला सकते है। छुआछूत उन्मूलन के लिए आयोजित एक सम्मेलन में तिलक ने कहा था, ‘‘यदि भगवान भी छुआछूत को बरदाश्त करें, तो मैं भगवान को नहीं मानूँगा।’’

तिलक के उस समय दिए गए भाषणों में कहीं से भी धार्मिक अपील नहीं झलकती। होमरूल की माँग पूरी तरह धर्मनिरपेक्षता पर आधारित थी। तिलक का कहना था कि अंग्रेजों से विरोध का कारण यह नहीं है कि वह किसी दूसरे धर्म के अनुयायी है, उनका विरोध तो हम इसलिए करते है क्योंकि वे भारतीय जनता के हित में कोई काम नहीं कर रहे हैं। तिलक के शब्दों में, ‘‘अंग्रेज हो या मुसलमान यदि वह इस देश की जनता के हित के लिए काम करता है, तो वह हमारे लिए पराया नहीं है। इस पराएपन का धर्म या व्यवसाय से कोई रिश्ता नहीं है। यह सीधे-सीधे हितों से जुड़़ा प्रश्न है।

तिलक ने छः मराठी तथा दो अंग्रेजी परचे निकाल कर अपने प्रचार कार्य को और तेज कर दिया। इन पर्चो की 47 हजार पर्चियाँ बेची गईं। बाद मे इन पर्चों को गुजराती और कन्नड भाषा मे छापा गया। लीग की छः शाखाएँ बनाई गई। मध्य महाराष्ट्र बम्बई नगर, कर्नाटक और मध्यप्रान्त में एक-एक तथा बरार में दो।

होमरूल आन्दोलन ने जैसे-जैसे जोर पकड़ना शुरू किया सरकार ने दमनात्मक कार्यवाही तेज कर दी। इस आन्दोलन पर वार करने के लिए सरकार ने एक विशेष दिन चुना। 23 जुलाई 1916 तिलक का 60 वॉ जन्मदिन था। एक बड़े सभा का आयोजन किया गया और तिलक को एक लाख रुपए की थैली भेंट की गई। सरकार ने इस अवसर पर उन्हें दूसरा इनाम दिया। उन्हें एक कारण बताओ नोटिस दिया गया। जिसमें लिखा था कि आपकी गतिविधियों के चलते आप पर प्रतिबन्ध क्यों न लगा दिया जाए। उन्हें साठ हजार रुपए का मुचलका भरने को कहा गया। तिलक के लिए शायद सबसे महत्त्वपूर्ण उपहार था। उन्होनें कहा, ‘‘अब होमरूल आन्दोलन जंगल में आग की तरह फैलेगा। सरकारी दमन विद्रोह की आग को और भड़काएगा।’’

तिलक की ओर से मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में वकीलों की एक पूरी टीम ने मुकद्दमा लड़ा। मजिस्ट्रेट की अदालत में तो तिलक मुकद्दमा हार गए पर नवम्बर में उन्हें हाईकोर्ट ने निर्दाष करार दिय। इस जीत की सभी ओर सराहना हुई। गांधी ने ‘यंग-इंडिया’ अखबार में लिखा, ‘‘यह अभिव्यक्ति की आजादी की बहुत बड़ी जीत है। होमरूल आन्दोलन के लिए एक बहुत बड़ी सफलता है।’’ इस अवसर का तिलक ने फायदा उठाया और अपने सार्वजनिक भाषणों में कहने लगे कि होमरूल या स्वशासन की माँग व्यक्त करने के लिए सरकार ने अनुमति दे दी है। तिलक और उनके सहयोगियों ने प्रचार कार्य तेज कर दिया और अप्रैल 1917 तक उन्होनें 14 हजार सदस्य बना लिए।

एनी बेसेन्ट की लीग ने भी सितम्बर 1916 से काम करना शुरू कर दिया पर उनका संगठन बहुत ढीला था। कोई भी तीन व्यक्ति मिलकर कहीं भी शाखा खोल सकते थे जबकि तिलक की लीग का संगठन बहुत मजबूत था, सभी छः शाखाओं के काम तथा कार्य लेना निर्धारित थे। एनी बेसेन्ट की लीग की दो सौ शाखाएँ थीं। बहुत शाखाएँ कस्बे और नगरों में थीं, बाकी गाँवों में, एक शाखा के तहत कुछेक गाँव आते थे। हालांकि कार्यकारी परिषद् का चुनाव किया जाता था लेकिन सारा काम एनी बेसेन्ट और उनके सहयोगी अरुडेल, सी. डी. रामास्वामी अय्यर तथा बी.पी.वाडिया देखते थे। सदस्यों को निर्देश देने का कोई संगठित तरीका नहीं था। या तो व्यक्तिगत रूप से सदस्यों को निर्देश दिए जाते थे या फिर न्यू इण्डिया में अरुडेल के लेखों का पढ़कर लोग जानते थे कि उन्हें क्या करना है। एनी बेसेन्ट की लीग तिलक की लीग की तुलना में सदस्य बनाने में पीछे रहे। मार्च 1917 तक उनकी लीग के सदस्यों की संख्या केवल 7000 थी। जवाहर लाल नेहरू, बी.चक्रवर्ती तथा जे. बनर्जी भी इससे शामिल हो गए।

फिलहाल शाखाओं की गिनती से लीग की ताकत का अनुमान लगाना कठिन है, क्योंकि इनमें से कुछ तो काफी सक्रिय भी और कुछ निष्क्रिय, क्योंकि वे ज्यादातर ‘थियोसॉफिकल सोसायटी’ की गतिविधियों तक सीमित थी। बतौर उदाहरण, मद्रास नगर में शाखाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी, लेकिन बम्बई, उत्तर प्रदेश के नगरों और गुजरात के ग्रामीण इलाकों की शाखाएँ काफी सक्रिय थी। हालांकि इनकी संख्या काफी कम थी।

इन सारी गतिविधियों का एक मात्रा लक्ष्य होमरूल की माँग के लिए बड़े पैमाने पर आन्दोलन छेड़ना था। इसके लिए राजनीतिक शिक्षा देना और राजनीतिक बहस छेड़ना बहुत जरूरी था। अरुडेल ने ‘न्यूइण्डिया’ के माध्यम से अपने समर्थको को राजनीतिक बहस छेड़ने, राष्ट्रीय राजनीति के बारे में जानकारी देने वाले पुस्तकालयों की स्थापना, छात्रों को राजनीतिक शिक्षा देने के लिए कक्षाओं का आयोजन, दोस्तों के बीच ‘होमरूल’ के समर्थन में तर्क देने तथा उन्होंने आन्दोलन में भागीदारी बनाने के लिए कार्य करने को कहा। कई शाखाओं ने इन पर अमल किया। राजनीतिक बहस चलाने पर विशेषरूप से ध्यान दिया।

होमरूल का प्रचार कितना तेज हुआ इसका अंदाज इसी तथ्य से लगा सकते हैं कि सितम्बर 1916 तक प्रचार फण्ड से छापे जानेवाले तीन लाख पर्चे बाँटे जा चुके थे। यह प्रचार फण्ड कुछ महीने पहले ही स्थापित किया था। इन परचों में तत्कालीन सरकार का कच्चा चिट्ठा होता था और स्वराज के समर्थन में तर्क दिए जाते थे। एनी बेसेन्ट की लीग की स्थापना के बाद इन पर्चो को फिर छापा गया। कई क्षेत्राय भाषाओं में भी इनका प्रकाशन हुआ। साथ-साथ जनसभाओं का आयोजन और भाषणों का क्रम भी जारी रहा। जब भी किसी मुद्दे को लेकर देशव्यापी प्रतिरोध का आह्वान किया जाता था, लीग की सारी शाखाएँ इसका समर्थन करती। नवम्बर 1916 में, जब एनी बेसेन्ट पर बरार व मध्य प्रान्त में जाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो अरुडेल की अपील पर लीग की तमाम शाखाओं ने विरोध बैठकें आयोजित की और वायसराय तथा गृह सचिव को विरोध प्रस्ताव भेजे। इसी तरह 1917 में जब तिलक पर पंजाब और दिल्ली जाने पर प्रतिबन्ध लगाया गया तो पूरे देश में विरोध बैठकें हुईं। लीग की तमाम शाखाओं ने इसका डटकर विरोध किया। कां ग्रेस की अकर्मण्यता से क्षुब्ध अनेक नरमपंथी कां ग्रेसी भी होमरूल आन्दोलन में शामिल हो गए। गोखले की ‘सर्वें ट ऑफ इण्डिया सोसायटी’ को लीग का सदस्य बनने की इजाजत नहीं थी, लेकिन उन्हां ेने जनता के बीच भाषण देकर और परचे बाँ टकर ‘होमरूल आन्दोलन’ का समर्थन किया। उत्तरप्रदेश में अनेक नरमपंथी राष्ट्रवादियों ने कांग्रेस सम्मेलन की तैयारी के सिलसिले में होमरूल लीग के कार्यकर्त्ताओं के साथ गाँ वो, कस्बों का दौरा किया। इनकी ज्यादातर बैठक स्थानीय अदालतों के पुस्तकालयों में होती, जहाँ छात्रा, व्यवसायी तथा अन्य पेशो से जुड़े हुए लोग इकट्ठा होते। और अगर बैठक किसी बाजार के दिन होती तो इसमें गाँ वों से आए किसान भी शरीक होते। इन बैठकों में हिन्दुस्तान की गरीबी और बेहाली का मुद्दा उठाया जाता। अतीत की समृठ्ठि की याद दिलाई जाती और यू रोप के स्वतंत्राता आन्दोलन पर प्रकाश डाला जाता, उससे प्रेरणा लेने की अपील की जाती। इन बैठकों में हिन्दी भाषा का इस्तेमाल किया जाता था। नरमपंथियों का होम रूल लीग को समर्थन देना कोई अचरज की बात नहीं थीं क्यों कि लीग नरमपंथियों के राजनीतिक प्रचार व शैक्ष णिक कार्यक्रमों को ही अमली जामा पहना रही थी।

1916 में कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन होमरूल लीग के सदस्यों के लिए अपनी ताकत दिखाने का अच्छा मौका था। तिलक के समर्थकों ने तो एक परम्परा ही बना दी जिस पर कांग्रेस बहुत साल तक टिकी रही। उनके समर्थको ने लखनऊ पहुँचने के लिए एक ट्रेन आरक्षित की जिसे कुछ लोगों ने ‘काग्रेंस स्पेशल’ का नाम दिया, तो कुछ ने ‘होमरूल स्पेशल’ कहा। अरुडेल ने लीग के हर सदस्य से कहा था कि वह लखनऊ अधिवेशन का सदस्य बनने की हर सम्भव कोशिश करें।

कांग्रेस लीग समझौता[संपादित करें]

लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में तिलक को पुनः कांग्रेस में शामिल कर लिया गया। अध्यक्ष अंबिकाचरण मजूमदार ने कहा-

‘‘10 वर्षों के सुखद अलगाव तथा गलतफहमी के कारण बेवजह के विवादों में भटकने के बाद भारतीय राष्ट्रीय दल के दोनों खेमों ने अब यह महसूस किया है कि अलगाव उनकी पराजय है और एकता उनकी जीत। अब भाई-भाई फिर मिल गए हैं।’’

इसी अधिवेशन में महत्त्वपूर्ण ‘कां ग्रेस लीग’ समझौता हुआ, जो ‘‘लखनऊ पैक्ट’’ के नाम से जाना जाता है। इस समझौते मे एनी बेसेन्ट और तिलक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मदनमोहन मालवीय समेत कई वरिष्ट नेता इसके बिल्कुल खिलाफ थे। उनका आरोप था कि यह समझौता मुस्लिम लीग को बहुत तवज्जो देता है। तिलक ने इस आरोप पर कहा, ‘‘कुछ महानुभावों का यह आरोप है कि हिन्दू अपने मुसलमान भाईयों को ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। मैं कहता हूँ कि यदि स्वशासन का अधिकार केवल मुस्लिम समुदाय को दिया जाए तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा, राजदूतों को यह अधिकार मिले तो परवाह नहीं, हिन्दुस्तान ने किसी भी समुदाय को यह अधिकार दे दिया जाए हमें कोई ऐतराज नही। मेरा यह बयान समू ची भारतीय राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करता है। जब भी आप किसी तीसरी पार्टी से लड़ रहे होते हैं, तो सबसे जरूरी होती है, आपसी एकता, जातीय एकता, धार्मिक एकता और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं की एकता।’’

तिलक को बहुत अधिक रूढ़िवादी हिन्दू माना जाता था। वह भारतीय प्राच्य विद्या के प्रकाण्ड विद्वान थे। जब उन्होंने इस तरह का बयान दिया, तो किसी और का विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई। हालाँकि मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्रों के सिठ्ठान्त को स्वीकारना, विवादास्पद था। लेकिन यह इसलिए स्वीकार किया गया कि यही अल्पसंख्यकों को यह न लगे कि बहुसंख्यक उन पर प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं।

लखनऊ अधिवेशन में संवैधानिक सुधारों की माँग फिर उठाई। सदस्यों का मानना था कि स्वराज्य के लक्ष्य की प्राप्ति में यह माँग सहायक होगी। हालांकि इस माँग में वे सारी चीजें शामिल नहीं थी, जैसा कि होमरूल लीग के सदस्य चाहते थे, लेकिन उन्होनें इस पर कोई विवाद खड़ा नहीं किया। वे हर हाल में कांग्रेस में एकता बनाए रखना चाहते थे। तिलक ने एक और प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस अधिवेशन के निर्णयों तथा कार्यक्रमों को असलीरूप देने के लिए एक कार्यकारिणी का गठन किया जाए। पर नरमपंथियों के विरोध के कारण यह प्रस्ताव मंजूर न हो सका। वास्तव में तिलक चाहते थे कि कांग्रेस अकर्मण्य न रहे, थोड़ा और काम करें।

तिलक का प्रस्ताव तो मंजूर न हो पाया, पर चार साल बाद जब 1920 में महात्मा गांधी ने कांगेस संविधान को संशोधित कर उसे नया रूप दिया-एक ऐसा स्वरूप जो किसी आन्दोलन को लम्बे समय तक चलाने के लिए जरूरी था-तो उन्होनें भी तिलक के इसी प्रस्ताव को मानना जरूरी समझा।

कांग्रेस अधिवेशन की समाप्ति के तुरन्त बाद उसी पंडाल में दोनों होमरूल लीगों की बैठक हुई। जिसमें लगभग एक हजार प्रतिनिधियों ने भाग लिया। कांग्रेस लीग समझौते की सराहना की गई और तिलक तथा एनी बेसेन्ट ने बैठक को सम्बोधित किया। लखनऊ से लौटते समय इन दोनों नेताओं ने उत्तर, मध्य और पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों का दौरा किया।

सरकारी दमन[संपादित करें]

होमरूल आन्दोलन के बढ़ते प्रभाव को देखकर सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक था। मद्रास सरकार जरा ज्यादा ही कठोर हो गई। उसने छात्रों के राजनीतिक बैठकों में भाग लेने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। पूरे प्रदेश में इसका विरोध हुआ। तिलक ने कहा, ‘‘सरकार को मालूम है कि देश प्रेम की भावना छात्रों को ज्यादा उत्तेजित करती है। वैसे भी कोई भी देश युवा वर्ग की ताकत से ही उन्नति कर सकता है।

मद्रास सरकार ने जून 1917 में एनी बेसेन्ट, जार्ज अरुडेल तथा वी.पी. वाडिया को गिरफतार कर लिया। इसके खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन हुए। सर सुब्रहमण्यम अय्यर ने सरकारी उपाधि (नाईटहुड) अस्वीकार कर दी। मदनमोहन मालवीय, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी और मुहम्मद अली जिन्ना जैसे तमाम नरमपंथी नेता, जो अब तक लीग में शामिल नहीं थे, इसमें शामिल हो गए और उन्होने एनी बेसेन्ट तथा अन्य नेताओं की गिरफ्तारी के खिलाफ आवाज उठाई? 26 जुलाई 1917 को काग्रेंस को एक बैठक में तिलक ने कहा कि यदि सरकार इन लोगों को तुरन्त रिहा नहीं करती है, तो शान्तिपूर्ण असहयोग आन्दोलन चलाया जाए। इस प्रस्ताव को सभी प्रान्तीय कांग्रेस समितियों के पास मंजूरी के लिए भेजा गया। बरार व मद्रास की कांग्रेस समितियाँ तो इस पर तुरन्त कार्यवाही के पक्ष में थीं, लेकिन बाकी समितियाँ कोई निर्णय करने से पहले थोड़ा इन्तजार करने के पक्ष में थीं। गांधीजी के कहने पर शंकरलाल बैकर और जमनादास द्वारकाप्रसाद ने ऐेसे एक हजार लोगों के दस्तखत इकट्ठे किए जो सरकारी आदेशों की अवहेलना करके जुलूस की शक्ल में जाकर एनी बेसेन्ट से मिलना चाहते थे। इन लोगों ने स्वराज के समर्थन में किसानों और मजदूरों के हस्ताक्षर कराना शुरू किया। गुजरात के कस्बों और गावों का दौरा किया और वहाँ लीग की शाखाएँ स्थापित करने में मदद की। होमरूल लीग के सदस्यों की संख्या में अप्रत्याशित वृठ्ठि हुई। इस प्रकार सरकारी दमन ने आन्दोलन को और बढ़ावा दिया, आन्दोलनकारियों को और जुझारू बनाया। माण्टेग्यू ने अपनी डायरी में लिखा है, ‘‘शिव ने अपनी पत्नी को 52 टुकड़ों में काटा, भारत सरकार ने जब एनी बेसेन्ट को गिरफ्तार किया, तो उसके साथ ठीक ऐसा ही हुआ।’’

इन घटनाओं के बाद इंग्लैण्ड की सरकार ने अपनी नीतियाँ बदली। अब उसका रूख समझौतावादी हो गया। नये गृह सचिव माण्टेग्यू ने हाउस ऑफ कॉमन्स में ऐतिहासिक घोषणा की, ‘‘ब्रिटिश शासन की नीति है कि भारत के प्रशासन में भारतीय जनता को भागीदार बनाया जाए और स्वशासन के लिए विभिन्न संस्थानों का क्रमिक विकास किया जाए जिससे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य से जुड़ी कोई उत्तरदायी सरकार स्थापित की जा सके।’’ यह बयान मार्ले के बयान से एकदम विपरीत था। 1909 में संवैधानिक सुधारों को पार्लियामेन्ट में रखते समय मार्ले ने साफ-साफ कहा था कि इन सुधारों का उद्देश्य देश में स्वराज्य की स्थापना कतई नहीं है। माण्टेग्यू की घोषणा का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि अब होमरूल या स्वराज की माँग को देशद्रोही नहीं कहा जा सकता था। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं था कि ब्रिटिश हुकूमत स्वराज की माँग मानने जा रही थी। माण्टेग्यू की घोषणा में यह बात भी थी कि स्वशासन की स्थापना तभी होगी, जब उसका उचित समय आएगा और समय आया है या नहीं इसका फैसला हुकूमत करेगी। अंग्रेजी हुकूमत के लिए इतनी छुट काफी थी। इससे साफ जाहिर था कि वह भारतीयों के हाथ निकट भविष्य में सत्ता सौंपने नहीं जा रही थी।

फिलहाल माण्टेग्यू की घोषणा के चलते सितम्बर 1917 में एनी बेसेन्ट को रिहा कर दिया गया। इस समय एनी बेसेन्ट की लोकप्रियता चरम सीमा पर थी। दिसम्बर 1917 में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में तिलक के प्रस्ताव पर उन्हें अध्यक्ष चुन लिया गया।

लेकिन 1918 में अनेक कारणों से होमरूल कमजोर पड़ गया, 1917 में भारी सफलता मिलने के बावजूद यह आन्दोलन मृतप्राय हो गया। एनी बेसेन्ट की गिरफ्तारी से उत्तेजित होकर नरमपंथी इस आन्दोलन में शामिल हुए थे, उनकी रिहाई के बाद निष्क्रिय हो गए। सरकार ने सुधारों का आश्वासन दिया था। इन नेताओं को लगा कि इस आन्दोलन की जरूरत नहीं है। इसके अलावा कानून निषेध आन्दोलन चलाने की चर्चा से भी वे नाराज थे। इसलिए उन्हें सितम्बर 1918 के बाद से कांग्रेस की बैठकों में हिस्सा लेना छोड़ दिया। 1918 में सुधार योजनाओं की घोषणा से राष्ट्रव्यापी खेमे में एक और दरार पड़ गई। कुछ लोग इसे ज्यों-का-त्यों स्वीकार करने के पक्ष में थे तो कुछ इसे पूरी तरह नामंजूर करना चाहते थे। कुछ लोगों का मानना था कि इसमें कई कमियाँ तो हैं पर इसमें आजमाना चाहिए। इन सुधारों और शान्तिप्रिय असहयोग आन्दोलन के मुद्दे पर खुद एनी बेसेन्ट दुविधा में थी। कभी तो वह इसे गलत कहती और कभी अपने समर्थकों के दबाव के कारण ठीक कहती। शुरू में तिलक के साथ एनी बेसेन्ट ने कहा कि इन सुधार योजनाओं को भारतीय जनता मंजूर न करे, यह उसका अपमान है, पर बाद में उन्होंने इसे मान लेने की अपील की। तिलक काफी समय तक अपने निर्णय पर अडिग रहे। लेकिन एनी बेसेन्ट की ढुलमुल नीतियों और नरमपंथियों के रुख में बदलाव के कारण वह अकेले अपने बूते पर सुधारों का विरोध करते हुए आन्दोलन की गाड़ी को आगे खींचने में असमर्थ हो गए और साल के अन्त में इंग्लैण्ड चले गए। वहाँ उन्होंने इण्डियन अनरेस्ट के लेखक चिराव पर मानहानि का मुकदमा दायर कर रखा था। इस मुकदमे की पैरवी के चक्कर में वह कई महीनों तक इंग्लैण्ड में रहे। एनी बेसेन्ट एक सशक्त नेतृत्व देने में असमर्थ थी और तिलक विदेश में थे। नतीजन होमरूल आन्दोलन नेतृत्व विहीन हो गया।

होमरूल की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि इसने भावी राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए जुझारू योद्धा तैयार किए। महात्मा गांधी के नेतृत्व में ये जुझारू आन्दोलनकारी आजादी की मशाल लेकर आगे बढ़े। होमरूल आन्दोलन ने, उत्तरप्रदेश, गुजरात, सिन्ध, मद्रास, मध्यप्रान्त तथा बरार जैसे अनेक नए क्षेत्रों को राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल किया। इस प्रकार होमरूल आन्दोलन व्यर्थ नहीं गया। उसका भारतीय स्वतन्त्राता संग्राम पर गहरा प्रभाव पड़ा। इस आन्दोलन ने सोते हुए भारतीयों को जगाया और उनमें पूर्ण जागृति का संचार किया। इसने राष्ट्रीय आन्दोलन को नई गति प्रदान की और सरकार को नई सुधार योजना लागू करने के लिए विवश किया।

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सन्दर्भ[संपादित करें]