कांग्रेस

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कांग्रेस या अंतरराष्ट्रीय महासभा (इंटरनैशनल कांनफरेन्स) का अभिप्राय अंतर्देशीय प्रतिनिधियों की उस सभा से है जो अंतरराष्ट्रीय प्रश्नों पर विचार, परामर्श तथा समाधान के हेतु बुलाई गई हो।

परिचय[संपादित करें]

इन सभाओं के उद्देश्य कई प्रकार के हो सकते हैं। पारस्पारिक मतविरोध, समाधान अथवा अंतरराष्ट्रीय विधि में नवीन नियम की योजना या संशोधन, और कभी किसी विशेष भूप्रदेश की वस्तुस्थिति संबंधी निश्चय– इन सभी प्रश्नों के स्पष्टीकरण के लिए ऐसी महासभाएँ नियोजित होती हैं। उदाहरणार्थ १९१४ ई. की शिमला कांग्रेस भारत-चीन-सीमा निश्चित करने, १८९९ ई. एवं १९०७ ई. की हेग कांग्रेस स्थल संबंधी युद्धकालीन विधिनियम अनुबद्ध करने तथा १८१५ ई. में वियना कांग्रेस स्विट्ज़रलैड को तटस्थता प्रदान करने के लिए बुलाई गई थी।

सभा में भाग लेनेवाले देश अपने नियुक्त प्रतिनिधियों द्वारा सभा के अधिवेशन में भाग लेते हैं। सभा में एक राज्य की ओर से गणना में एकल मत प्रदान की ही व्यवस्था मानी जाती है चाहे उस राज्य के प्रतिनिधियों की संख्या कितनी ही हो। कुछ समय से कुछ व्यक्ति पर्यवेक्षक के रूप में भी सभा में बैठते हैं, किंतु उन्हें मताधिकार नहीं प्राप्त होता। १९४५ ई. में संयुक्त राष्ट्रसंघ अधिकारपत्र स्वीकरण के लिए सैन फ़्रांसिस्को में जो महासभा नियोजित हुई थी उसमें ५० राज्यों के प्रतिनिधियों के अतिरिक्त अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पर्यवेक्षक रूप में आमंत्रित किया गया था।

यदि कोई राज्य किसी प्रश्न के लिए ऐसी महासभा नियोजित करना चाहता है तो वह कुछ अन्य राज्यों को आमंत्रित करता है। वे राज्य इसकी स्वीकृति तभी देते हैं जब यह स्पष्ट कर लेते हैं कि कौन अन्य राज्य सभा में सम्मिलित किए जाएँगे और कौन नहीं। तदुपरांत राज्यों के प्रतिनिधि पूर्वनिश्चित समय तथा स्थान पर एकत्र हो प्रत्ययपत्रों का परस्पर विनियम करते हैं। अधिकतर पोषित देश के वैदेशिक विभाग के सचिव को ही सभा का प्रधान निर्वाचित कर लिया जाता है। सैन फ़्रांसिस्को की महत्वपूर्ण महासभा में चार मुख्य राज्यप्रतिभू शक्तियाँ थीं। इन चारों के प्रतिनिधियों ने क्रमश: महासभा का प्रधानत्व ग्रहण किया था। सभा की कार्यसुगमता के लिए कुछ प्रारंभिक समितियाँ बनाई जाती हैं जो वादविवाद की विषयसामग्री पहले से व्यवस्थित कर लेती हैं। वादविवाद के उपरांत मतदान होता है जिसमें सर्वसंमति से विषय का समर्थन अनिवार्य होता है, अन्यथा बहुमतप्राप्त प्रस्ताव उन देशों को आबद्ध नहीं करते, जो अपना मत प्रस्ताव के विरुद्ध देते हैं। यदि प्रस्ताव का सर्वसम्मति से समर्थन हो जाता है तो वह लिखित रूप में सबके हस्ताक्षरों सहित सभा का फ़ाइनल ऐक्ट (सर्वात्य कृत्य) अथावा जेनरल ऐक्ट (सामान्य कृत्य) कहलाता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • ओपनहाइम : इंटरनैशनल ला;
  • यूइन-ली-लिऐंग : ह्वाट इज़ ऐन इंटरनैशनल कफ्रोंस (अमेरिकन जर्नल ऑव इंटरनैशनल ला; १९५०; पृष्ठ ३३३)।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]