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श्रीमद्भगवद्गीता

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श्रीमद्भगवद्गीता
१९वीं शताब्दी की चित्रित संस्कृत भगवद्गीता पाण्डुलिपि
१९वीं शताब्दी की चित्रित संस्कृत पाण्डुलिपि से भगवद्गीता, अध्याय १.२०–२१
जानकारी
धर्मसनातन धर्म
लेखकवेदव्यास (परम्परागत)
भाषासंस्कृत
कालपरम्परागत: द्वापर युग / महाभारत काल; ऐतिहासिक: प्रायः ईसा पूर्व उत्तरार्ध से ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियाँ
अध्याय१८
श्लोक७००

श्रीमद्भगवद्गीता (संस्कृत: श्रीमद्भगवद्गीता) या केवल गीता, महाभारत महाकाव्य के भीष्मपर्व के भीतर आने वाला एक दार्शनिक-आध्यात्मिक संवाद है।[1] इसमें कृष्ण और अर्जुन के बीच युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले का संवाद है। परम्परा के अनुसार इसमें १८ अध्याय और ७०० श्लोक हैं।[2] गीता को उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र के साथ प्रस्थानत्रयी में गिना जाता है।[3]

गीता केवल युद्ध-विषयक उपदेश नहीं है; इसमें कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यान, स्वधर्म, आत्मा की अमरता, निष्काम कर्म, समत्व और मोक्ष जैसे विषयों पर चर्चा है।[4] परम्परा में इसे “उपनिषदों का दुग्ध” कहा गया है। गीता के १८ अध्यायों में ७०० श्लोक हैं, जिनमें श्रीकृष्ण ने ५७४, अर्जुन ने ८५, संजय ने ४० और धृतराष्ट्र ने १ श्लोक कहा है।[5]

नामकरण और व्युत्पत्ति

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‘गीता’ शब्द संस्कृत धातु ‘गै’ (गाना) से बना है, जिसका अर्थ है—गाई गई या कही गई। ‘भगवद्गीता’ का अर्थ है—भगवान का गीत। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में ‘श्रीमत्’ आदरसूचक शब्द है। इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता का शाब्दिक अर्थ है—श्री भगवान का पवित्र गीत।[6]

गीता को ‘गीतोपनिषद’ भी कहा जाता है, क्योंकि यह उपनिषदों के सार का प्रतिपादन करती है। इसके अतिरिक्त इसे ‘ब्रह्मविद्या’, ‘योगशास्त्र’, ‘अध्यात्म विद्या’ और ‘मोक्षशास्त्र’ जैसे नामों से भी जाना जाता है।[7]

गीता विश्व का एकमात्र धार्मिक ग्रन्थ है जिसकी जयंती मनाई जाती है -गीता जयंती।

महाभारत में स्थान और पृष्ठभूमि

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महाभारत में जब कौरव और पांडव सेनाएँ युद्ध के लिए आमने-सामने होती हैं, तब अर्जुन रथ पर सवार होकर दोनों सेनाओं को देखते हैं। अपने संबंधियों, गुरुओं और मित्रों को युद्धभूमि में देखकर अर्जुन मोह और विषाद से भर जाते हैं। वे धनुष रख देते हैं और युद्ध न करने का निर्णय लेते हैं।[8]

इसी स्थिति में कृष्ण अर्जुन को कर्तव्य, धर्म, आत्मा, कर्म और भक्ति का उपदेश देते हैं। यही उपदेश भगवद्गीता के रूप में प्रसिद्ध है। गीता का आरम्भ अर्जुन के विषाद से होता है और अंत आत्मज्ञान तथा शरणागति के संदेश पर।

परम्परा के अनुसार यह संवाद मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में दोनों सेनाओं के मध्य हुआ था। इस तिथि को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है।[9]

संवाद की संरचना

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गीता का संवाद तीन स्तरों पर चलता है:

  1. धृतराष्ट्र और संजय का संवाद — धृतराष्ट्र का एकमात्र श्लोक और संजय का ४० श्लोकों में वर्णन।
  2. अर्जुन और कृष्ण का संवाद — मुख्य संवाद जिसमें ५७४ श्लोक कृष्ण के और ८५ अर्जुन के हैं।
  3. भगवान का उपदेश — जो कर्म, ज्ञान, भक्ति और ध्यान के रूप में प्रकट होता है।

रचनाकाल, भाषा और पाठ-परम्परा

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  • भाषा: संस्कृत; महाभारत की प्राचीन भारतीय संस्कृत के निकट।
  • रचनाकाल: परम्परा इसे महाभारत काल या द्वापर युग से जोड़ती है। आधुनिक विद्वानों में मतभेद है; अधिकांश इसे महाभारत की परवर्ती परत के रूप में ईसा पूर्व उत्तरार्ध से ईसा की प्रारम्भिक शताब्दियों के बीच रखते हैं।[1]
  • रचनाकार: परम्परा के अनुसार वेदव्यास। आधुनिक शोध में इसे कई परतों में संकलित और विस्तृत हुआ ग्रंथ माना जाता है।
  • श्लोक-संख्या: सामान्यतः ७००; कुछ पाण्डुलिपियों में ७४५ श्लोक भी मिलते हैं।[5]
  • छन्द: अधिकांश श्लोक अनुष्टुप छन्द में हैं; कुछ श्लोक त्रिष्टुप में भी हैं।

गीता के १८ अध्याय

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श्रीमद्भगवद्गीता के सभी १८ अध्यायों का संक्षिप्त परिचय क्रमशः निम्नलिखित है:

अध्यायनामश्लोक संख्याविषय
१अर्जुनविषादयोग४७अर्जुन का विषाद
२सांख्ययोग७२गीता का सार, आत्मा और देह का विवेक
३कर्मयोग४३निष्काम कर्म
४ज्ञानकर्मसंन्यासयोग४२ज्ञान, कर्म और अवतार
५कर्मसंन्यासयोग२९कर्म और संन्यास का समन्वय
६आत्मसंयमयोग४७ध्यान और मनोनिग्रह
७ज्ञानविज्ञानयोग३०परा और अपरा प्रकृति
८अक्षरब्रह्मयोग२८अक्षर ब्रह्म और प्रयाणकाल
९राजविद्याराजगुह्ययोग३४परम गुह्य ज्ञान
१०विभूतियोग४२भगवान की विभूतियाँ
११विश्वरूपदर्शनयोग५५विराट रूप का दर्शन
१२भक्तियोग२०भक्ति का मार्ग
१३क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग३४क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ
१४गुणत्रयविभागयोग२७सत्व, रज, तम
१५पुरुषोत्तमयोग२०अश्वत्थ रूप संसार और पुरुषोत्तम
१६दैवासुरसम्पद्विभागयोग२४दैवी और आसुरी स्वभाव
१७श्रद्धात्रयविभागयोग२८श्रद्धा के तीन प्रकार
१८मोक्षसंन्यासयोग७८उपसंहार और मोक्ष

प्रथम अध्याय: अर्जुनविषादयोग

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प्रथम अध्याय का नाम अर्जुनविषादयोग है। यह गीता के उपदेश का विलक्षण रंगमंच प्रस्तुत करता है, जिसमें श्रोता और वक्ता दोनों ही कुतूहल या शांति के लिए नहीं, वरन् जीवन की प्रगाढ़ समस्या के समाधान के लिए प्रवृत्त होते हैं। शौर्य, धैर्य, साहस और बल—इन चारों गुणों की प्रभूत मात्रा से अर्जुन का व्यक्तित्व बना था, और इन चारों के ऊपर दो गुण और थे—एक क्षमा, दूसरी प्रज्ञा।[10]

बलप्रधान क्षात्रधर्म से प्राप्त होने वाली स्थिति में पहुँचकर सहसा अर्जुन के चित्त पर एक दूसरे ही प्रकार के मनोभाव का आक्रमण हुआ—कार्पण्य का। एक विचित्र प्रकार की करुणा उसके मन में भर गई और उसका क्षात्र स्वभाव लुप्त हो गया। जिस कर्तव्य के लिए वह कटिबद्ध हुआ था, उससे वह विमुख हो गया। ऊपर से देखने पर इस स्थिति के पक्ष में उसके तर्क धर्मयुक्त जान पड़ते हैं, किंतु उसने स्वयं ही उसे कार्पण्य दोष कहा है और यही माना है कि मन की इस कायरता के कारण उसका जन्मसिद्ध स्वभाव उपहत या नष्ट हो गया था। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि युद्ध करे अथवा वैराग्य ले ले। इस मनोभाव की चरम स्थिति में पहुँचकर उसने धनुष-बाण एक ओर डाल दिया।

कृष्ण ने अर्जुन की वह स्थिति देखकर जान लिया कि अर्जुन का शरीर ठीक है, किंतु युद्ध आरम्भ होने से पहले ही उस अद्भुत क्षत्रिय का मनोबल टूट चुका है। बिना मन के यह शरीर खड़ा नहीं रह सकता। अतः कृष्ण के सामने एक गुरु का कर्तव्य आ गया। अतः तर्क से, बुद्धि से, ज्ञान से, कर्म की चर्चा से, विश्व के स्वभाव से, उसमें जीवन की स्थिति से, दोनों के नियामक अव्यय पुरुष के परिचय से और उस सर्वोपरि परम सत्तावान ब्रह्म के साक्षात दर्शन से अर्जुन के मन का उद्धार करना—यही उनका लक्ष्य हुआ। इसी तत्वचर्चा का विषय गीता है।

प्रमुख बिंदु:

  • प्रथम अध्याय में दोनों सेनाओं का वर्णन किया जाता है।
  • शंख बजाने के पश्चात अर्जुन सेना को देखने के लिए रथ को सेनाओं के मध्य ले जाने के लिए कृष्ण से कहते हैं।
  • तब मोहयुक्त होकर अर्जुन कायरता तथा शोकयुक्त वचन कहते हैं।

द्वितीय अध्याय: सांख्ययोग

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दूसरे अध्याय का नाम सांख्ययोग है। इसमें जीवन की दो प्राचीन सम्मानित परम्पराओं का तर्कों द्वारा वर्णन आया है। अर्जुन को उस कृपण स्थिति में रोते देखकर कृष्ण ने उनका ध्यान दिलाया कि इस प्रकार का क्लैव्य और हृदय की क्षुद्र दुर्बलता अर्जुन जैसे वीर के लिए उचित नहीं।

कृष्ण ने अर्जुन की अब तक दी हुई सब युक्तियों को प्रज्ञावाद का झूठा रूप कहा। उनकी युक्ति यह है कि प्रज्ञादर्शन काल, कर्म और स्वभाव से होने वाले संसार की सब घटनाओं और स्थितियों को अनिवार्य रूप से स्वीकार करता है। जीना और मरना, जन्म लेना और बढ़ना, विषयों का आना और जाना, सुख और दुःख का अनुभव—ये तो संसार में होते ही हैं।[11]

ऊपर के दृष्टिकोण का एक आवश्यक अंग जीवन की नित्यता और शरीर की अनित्यता था। नित्य जीव के लिए शोक करना उतना ही व्यर्थ है जितना अनित्य शरीर को बचाने की चिंता। ये दोनों अपरिहार्य हैं। जन्म और मृत्यु बारी-बारी से होते ही हैं; ऐसा समझकर शोक करना उचित नहीं है।

फिर एक दूसरा दृष्टिकोण स्वधर्म का है। जन्म से ही प्रकृति ने सबके लिए एक धर्म नियत कर दिया है। उसमें जीवन का मार्ग, इच्छाओं की परिधि, कर्म की शक्ति—सभी कुछ आ जाता है। इससे निकलकर नहीं भागा जा सकता।

इस प्रकार काल का परिवर्तन या परिमाण, जीव की नित्यता और अपना स्वधर्म या स्वभाव—जिन युक्तियों से भगवान ने अर्जुन को समझाया है, उसे उन्होंने सांख्य की बुद्धि कहा है। इससे आगे अर्जुन के प्रश्न न करने पर भी उन्होंने योगमार्ग की बुद्धि का भी वर्णन किया। यह बुद्धि कर्म या प्रवृत्ति मार्ग के आग्रह की बुद्धि है; इसमें कर्म करते हुए कर्म के फल की आसक्ति से अपने को बचाना आवश्यक है।

अर्जुन को संदेह हुआ कि क्या इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त करना संभव है। उसने पूछा कि इस प्रकार का दृढ़ प्रज्ञावाला व्यक्ति जीवन का व्यवहार कैसे करता है? कृष्ण ने कितने ही प्रकार के बाह्य इंद्रियों की अपेक्षा मन के संयम की व्याख्या की है। काम, क्रोध, भय, राग, द्वेष के द्वारा मन का सौम्यभाव बिगड़ जाता है और इंद्रियाँ वश में नहीं रहतीं। इंद्रियजय ही सबसे बड़ी आत्मजय है।

प्रमुख बिंदु:

  • अर्जुन की कायरता के विषय में अर्जुन-कृष्ण संवाद
  • सांख्य योग
  • कर्मयोग
  • स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के गुण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ २.४७॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। फल की आसक्ति छोड़ो, पर कर्म से विमुख मत हो।

तृतीय अध्याय: कर्मयोग

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इस प्रकार सांख्य की व्याख्या का उत्तर सुनकर कर्मयोग नामक तीसरे अध्याय में अर्जुन ने इस विषय में और गहरा उतरने के लिए स्पष्ट प्रश्न किया कि सांख्य और योग—इन दोनों मार्गों में आप किसे अच्छा समझते हैं? इस पर कृष्ण ने उत्तर दिया कि लोक में दो निष्ठाएँ हैं—सांख्यवादियों के लिए ज्ञानयोग और कर्ममार्गियों के लिए कर्मयोग। यहाँ कोई व्यक्ति कर्म छोड़ ही नहीं सकता। प्रकृति तीनों गुणों के प्रभाव से व्यक्ति को कर्म करने के लिए बाध्य करती है।[12]

कर्म से बचने वालों के प्रति एक बड़ी शंका है—वह यह कि वे ऊपर से तो कर्म छोड़ बैठते हैं, पर मन ही मन उसमें डूबे रहते हैं। यह स्थिति असह्य है और इसे कृष्ण ने गीता में मिथ्याचार कहा है। मन में कर्मेंद्रियों को रोककर कर्म करना ही सरल मानवीय मार्ग है। कृष्ण ने चुनौती के रूप में यहाँ तक कह दिया कि कर्म के बिना तो खाने के लिए अन्न भी नहीं मिल सकता।

फिर कृष्ण ने कर्म के विधान को चक्र के रूप में उपस्थित किया। न केवल सामाजिक धरातल पर भिन्न व्यक्तियों के कर्मचक्र अरों की तरह आपस में पिरोए हुए हैं, बल्कि पृथ्वी के मनुष्य और स्वर्ग के देवता—दोनों का संबंध भी कर्मचक्र पर आश्रित है। अन्न और पर्जन्य—दोनों कर्म से उत्पन्न होते हैं।[7]

फिर कर्म के पक्ष में लोकसंग्रह की युक्ति दी गई है। जो लोक के नेता हैं, जनक जैसे ज्ञानी हैं, वे भी कर्म में प्रवृत्ति रखते हैं। कृष्ण ने स्वयं अपना ही दृष्टांत देकर कहा कि मैं नारायण का रूप हूँ, मेरे लिए कुछ कर्म शेष नहीं है; फिर भी तंद्रारहित होकर कर्म करता हूँ और अन्य लोग मेरे मार्ग पर चलते हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • नित्य कर्म करने वाले की श्रेष्ठता
  • यज्ञादि कर्मों की आवश्यकता
  • अज्ञानी और ज्ञानी के लक्षण
  • काम के निरोध का विषय

चतुर्थ अध्याय: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

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चौथे अध्याय में, जिसका नाम ज्ञानकर्मसंन्यासयोग है, यह बताया गया है कि ज्ञान प्राप्त करके कर्म करते हुए भी कर्मसंन्यास का फल किस उपाय से प्राप्त किया जा सकता है। यहीं गीता का वह प्रसिद्ध आश्वासन है कि जब-जब धर्म की ग्लानि होती है, तब-तब मनुष्यों के बीच भगवान का अवतार होता है।[13]

यहीं पर एक वाक्य विशेष ध्यान देने योग्य है—क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा (४.१२)। ‘कर्म से सिद्धि’—इससे बड़ा प्रभावशाली जयसूत्र गीतादर्शन में नहीं है। किंतु गीतातत्व इस सूत्र में इतना सुधार और करता है कि वह कर्म असंग भाव से, अर्थात् फलासक्ति से बचकर करना चाहिए।

भगवान बताते हैं कि सबसे पहले मैंने यह ज्ञान भगवान सूर्य को दिया था। सूर्य के पश्चात गुरु परंपरा द्वारा यह आगे बढ़ा। किंतु अब यह लुप्तप्राय हो गया है। अब वही ज्ञान मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ। अर्जुन कहते हैं कि आपका तो जन्म हाल में ही हुआ है, तो आपने यह सूर्य से कैसे कहा? तब श्रीभगवान ने कहा कि तुम्हारे और मेरे अनेक जन्म हुए हैं, लेकिन तुम्हें याद नहीं, पर मुझे याद है।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ४.७॥

श्रीकृष्ण कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने स्वरूप की रचना करता हूँ। (४.७)

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ४.८॥

साधुओं की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों का विनाश करने के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में मानव के रूप में अवतार लेता हूँ। (४.८)

प्रमुख बिंदु:

  • कर्म, अकर्म और विकर्म का वर्णन
  • यज्ञों के स्वरूप
  • ज्ञानयज्ञ का वर्णन

पाँचवाँ अध्याय: कर्मसंन्यासयोग

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पाँचवें अध्याय में, जिसका नाम कर्मसंन्यासयोग है, फिर वे ही युक्तियाँ और दृढ़ रूप में कही गई हैं। इसमें कर्म के साथ जो मन का संबंध है, उसके संस्कार पर या उसे विशुद्ध करने पर विशेष ध्यान दिलाया गया है। यह भी कहा गया है कि ऊँचे धरातल पर पहुँचकर सांख्य और योग में कोई भेद नहीं रह जाता।[14]

जीवन के जितने कर्म हैं, सबको समर्पण कर देने से व्यक्ति एकदम शांति के ध्रुव बिंदु पर पहुँच जाता है और जल में खिले कमल के समान कर्म रूपी जल से लिप्त नहीं होता। भगवान श्रीकृष्ण इस अध्याय में कर्मयोग और साधु पुरुष का वर्णन करते हैं तथा बताते हैं कि मैं सृष्टि के हर जीव में समान रूप से रहता हूँ, अतः प्राणी को समदर्शी होना चाहिए।

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः॥ ५.१८॥

“ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण में और चाण्डाल में तथा गाय, हाथी एवं कुत्ते में भी समरूप परमात्मा को देखने वाले होते हैं।”

इस पद का अर्थ है कि ज्ञानी भक्त को सभी जीवों में समानता देखनी चाहिए। ईश्वर केवल मनुष्य में ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के भीतर भी एक ही चेतना के रूप में विद्यमान है।

छठा अध्याय: आत्मसंयमयोग

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छठा अध्याय आत्मसंयमयोग है, जिसका विषय नाम से ही प्रकट है। जितने विषय हैं, उन सबसे इंद्रियों का संयम—यही कर्म और ज्ञान का निचोड़ है। सुख में और दुःख में मन की समान स्थिति—इसे ही योग कहते हैं।[15]

इस अध्याय में ध्यान की विधि, मन की चंचलता और उसके नियंत्रण का विस्तृत वर्णन है। कृष्ण कहते हैं कि योगी वह है जो मन को वश में करके आत्मा में स्थित होता है। इस अध्याय में यह भी कहा गया है कि योग न तो अधिक खाने वाले का सिद्ध होता है और न ही बिल्कुल न खाने वाले का।

सातवाँ अध्याय: ज्ञानविज्ञानयोग

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सातवें अध्याय की संज्ञा ज्ञानविज्ञानयोग है। ये प्राचीन भारतीय दर्शन की दो परिभाषाएँ हैं। उनमें भी ‘विज्ञान’ शब्द वैदिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। सृष्टि के नानात्व का ज्ञान विज्ञान है और नानात्व से एकत्व की ओर प्रगति ज्ञान है।[4]

इस प्रसंग में विज्ञान की दृष्टि से अपरा और परा प्रकृति के इन दो रूपों की जो सुनिश्चित व्याख्या यहाँ गीता ने दी है, वह अवश्य ध्यान देने योग्य है। अपरा प्रकृति में आठ तत्व हैं—पंचभूत, मन, बुद्धि और अहंकार। इसमें ईश्वर की चेष्टा के संपर्क से जो चेतना आती है, उसे परा प्रकृति कहते हैं; वही जीव है। आठ तत्वों के साथ मिलकर जीवन नवाँ तत्व हो जाता है।

इस अध्याय में भगवान के अनेक रूपों का उल्लेख किया गया है, जिनका और विस्तार विभूतियोग नामक दसवें अध्याय में आता है। यहीं विशेष भगवती दृष्टि का भी उल्लेख है, जिसका सूत्र है—वासुदेवः सर्वम्।

पंचतत्व, मन, बुद्धि भी मैं हूँ। मैं ही संसार की उत्पत्ति करता हूँ और विनाश भी मैं ही करता हूँ। मेरे भक्त चाहे जिस प्रकार भजें, परन्तु अंततः मुझे ही प्राप्त होते हैं। मैं योगमाया से अप्रकट रहता हूँ और मूर्ख मुझे केवल साधारण मनुष्य ही समझते हैं।

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥ ७.२१॥

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ ७.२६॥

आठवाँ अध्याय: अक्षरब्रह्मयोग

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आठवें अध्याय की संज्ञा अक्षरब्रह्मयोग है। उपनिषदों में अक्षर विद्या का विस्तार हुआ। गीता में उस अक्षरविद्या का सार कह दिया गया है—अक्षर ब्रह्म परमम्, अर्थात् परब्रह्म की संज्ञा अक्षर है।[7]

मनुष्य, अर्थात् जीव और शरीर की संयुक्त रचना का ही नाम अध्यात्म है। जीवसंयुक्त भौतिक देह की संज्ञा क्षर है और केवल शक्तितत्व की संज्ञा आधिदैविक है। देह के भीतर जीव, ईश्वर तथा भूत—ये तीन शक्तियाँ मिलकर जिस प्रकार कार्य करती हैं, उसे अधियज्ञ कहते हैं। गीताकार ने दो श्लोकों में (८.३–४) इन छह पारिभाषाओं का स्वरूप बाँध दिया है। गीता के शब्दों में ॐ एकाक्षर ब्रह्म है (८.१३)।

नवम अध्याय: राजविद्याराजगुह्ययोग

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नवें अध्याय को राजगुह्ययोग कहा गया है, अर्थात् यह अध्यात्म विद्या विद्याराज्ञी है और यह गुह्य ज्ञान सबमें श्रेष्ठ है। ‘राजा’ शब्द का एक अर्थ मन भी था। अतः मन की दिव्य शक्तियों को किस प्रकार ब्रह्ममय बनाया जाए, इसकी युक्ति ही राजविद्या है।[10]

इस क्षेत्र में ब्रह्मतत्व का निरूपण ही प्रधान है; उसी से व्यक्त जगत का बारंबार निर्माण होता है। वेद का समस्त कर्मकांड, यज्ञ, अमृत और मृत्यु, संत और असंत, और जितने भी देवी-देवता हैं—सबका पर्यवसान ब्रह्म में है। लोक में जो अनेक प्रकार की देवपूजा प्रचलित है, वह भी अपने-अपने स्थान में ठीक है; समन्वय की यह दृष्टि भागवत आचार्यों को मान्य थी। इसी दृष्टिकोण का विचार या व्याख्या दसवें अध्याय में पाई जाती है।

दसवाँ अध्याय: विभूतियोग

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दसवें अध्याय का नाम विभूतियोग है। इसका सार यह है कि लोक में जितने देवता हैं, सब एक ही भगवान की विभूतियाँ हैं; मनुष्य के समस्त गुण और अवगुण भगवान की शक्ति के ही रूप हैं।[13]

बुद्धि से इन छुटभैये देवताओं की व्याख्या चाहे न हो सके, किंतु लोक में तो वे हैं ही। कोई पीपल को पूज रहा है, कोई पहाड़ को, कोई नदी या समुद्र को। यों कितने देवता हैं, इसका कोई अंत नहीं। विश्व के इतिहास में देवताओं की यह भरमार सर्वत्र पाई जाती है। भागवतों ने इनकी सत्ता को स्वीकारते हुए सबको विष्णु का रूप मानकर समन्वय की एक नई दृष्टि प्रदान की। इसी का नाम विभूतियोग है। जो सत्व जीव बलयुक्त अथवा चमत्कारयुक्त है, वह सब भगवान का रूप है। इतना मान लेने से चित्त निर्विरोध स्थिति में पहुँच जाता है।

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥ १०.७॥

ग्यारहवाँ अध्याय: विश्वरूपदर्शनयोग

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ग्यारहवें अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है। इसमें अर्जुन ने भगवान का विश्वरूप देखा। विराट रूप का अर्थ है—मानवीय धरातल और परिधि के ऊपर जो अनंत विश्व का प्राणवंत रचनाविधान है, उसका साक्षात दर्शन। विष्णु का जो चतुर्भुज रूप है, वह मानवीय धरातल पर सौम्य रूप है।[2]

जब अर्जुन ने भगवान का विराट रूप देखा, तो उसके मस्तक का विस्फोटन होने लगा। ‘दिशो न जाने न लभे च शर्म’—ये ही घबराहट के वाक्य उनके मुख से निकले और उसने प्रार्थना की कि मानव के लिए जो स्वाभाविक स्थिति ईश्वर ने रखी है, वही पर्याप्त है।

बारहवाँ अध्याय: भक्तियोग

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बारहवें अध्याय का नाम भक्तियोग है।

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ १२.१॥

अर्जुन ने पूछा—जो आपकी सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं, अथवा जो अव्यक्त निर्विशेष ब्रह्म की पूजा करते हैं, इन दोनों में से किसे अधिक पूर्ण (सिद्ध) माना जाए?

तात्पर्य: अब तक कृष्ण साकार, निराकार एवं सर्वव्यापकत्व को समझा चुके हैं और सभी प्रकार के भक्तों तथा योगियों का भी वर्णन कर चुके हैं। सामान्यतः अध्यात्मवादियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है—निर्विशेषवादी तथा सगुणवादी। सगुणवादी भक्त अपनी सारी शक्ति से परमेश्वर की सेवा करता है।

तात्पर्य: जो लोग भगवान कृष्ण की प्रत्यक्ष पूजा न करके अप्रत्यक्ष विधि से उसी उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, वे भी अंततः श्रीकृष्ण को प्राप्त होते हैं। “अनेक जन्मों के बाद बुद्धिमान व्यक्ति वासुदेव को ही सब कुछ जानते हुए मेरी शरण में आता है।”

तेरहवाँ अध्याय: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

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तेरहवें अध्याय में एक सीधा विषय क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विचार है। यह शरीर क्षेत्र है, उसका जाननेवाला जीवात्मा क्षेत्रज्ञ है। इस अध्याय में प्रकृति और पुरुष के विवेक का विस्तृत वर्णन है।[3]

चौदहवाँ अध्याय: गुणत्रयविभागयोग

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चौदहवें अध्याय का नाम गुणत्रयविभागयोग है। यह विषय समस्त वैदिक, दार्शनिक और पौराणिक तत्वचिंतन का निचोड़ है—सत्व, रज, तम नामक तीन गुण। त्रिको की अनेक व्याख्याएँ हैं। गुणों की साम्यावस्था का नाम प्रधान या प्रकृति है। गुणों के वैषम्य से ही वैकृत सृष्टि का जन्म होता है।[11]

अकेला सत्व शांत स्वभाव से निर्मल प्रकाश की तरह स्थिर रहता है और अकेला तम भी जड़वत निश्चेष्ट रहता है। किंतु दोनों के बीच में छाया हुआ रजोगुण उन्हें चेष्टा के धरातल पर खींच लाता है। गति तत्व का नाम ही रजस है।

पन्द्रहवाँ अध्याय: पुरुषोत्तमयोग

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पन्द्रहवें अध्याय का नाम पुरुषोत्तमयोग है। इसमें विश्व का अश्वत्थ के रूप में वर्णन किया गया है। यह अश्वत्थ रूपी संसार महान विस्तारवाला है। देश और काल में इसका कोई अंत नहीं है। किंतु इसका जो मूल या केंद्र है, जिसे ऊर्ध्व कहते हैं, वह ब्रह्म ही है।[7]

नर या पुरुष तीन हैं—क्षर, अक्षर और अव्यय। पंचभूतों का नाम क्षर है, प्राण का नाम अक्षर है और मनस्तत्व या चेतना की संज्ञा अव्यय है। इन्हीं तीन नरों की एकत्र स्थिति से मानवी चेतना का जन्म होता है; उसे ही ऋषियों ने वैश्वानर अग्नि कहा है।

सोलहवाँ अध्याय: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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सोलहवें अध्याय में देवासुर संपत्ति का विभाग बताया गया है। आरंभ से ही ऋग्वेद में सृष्टि की कल्पना दैवी और आसुरी शक्तियों के रूप में की गई है। यह सृष्टि के द्विविरुद्ध रूप की कल्पना है—एक अच्छा और दूसरा बुरा; एक प्रकाश में, दूसरा अंधकार में; एक अमृत, दूसरा मर्त्य; एक सत्य, दूसरा अनृत।[4]

सत्रहवाँ अध्याय: श्रद्धात्रयविभागयोग

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सत्रहवें अध्याय की संज्ञा श्रद्धात्रयविभागयोग है। इसका संबंध सत, रज और तम—इन तीन गुणों से ही है, अर्थात् जिसमें जिस गुण का प्रादुर्भाव होता है, उसकी श्रद्धा या जीवन की निष्ठा वैसी ही बन जाती है। यज्ञ, तप, दान, कर्म—ये सब तीन प्रकार की श्रद्धा से संचालित होते हैं। यहाँ तक कि आहार भी तीन प्रकार का है। उनके भेद और लक्षण गीता ने यहाँ बताए हैं।

अट्ठारहवाँ अध्याय: मोक्षसंन्यासयोग

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अट्ठारहवें अध्याय की संज्ञा मोक्षसंन्यासयोग है। इसमें गीता के समस्त उपदेशों का सार एवं उपसंहार है। यहाँ पुनः बलपूर्वक मानव जीवन के लिए तीन गुणों का महत्व कहा गया है। पृथ्वी के मनुष्यों में और स्वर्ग के देवताओं में कोई भी ऐसा नहीं, जो प्रकृति के चलाए हुए इन तीन गुणों से बचा हो।[10]

मनुष्य को बहुत देख-भालकर चलना आवश्यक है, जिससे वह अपनी बुद्धि और वृत्ति को बुराई से बचा सके और यह पहचान सके कि क्या कार्य है और क्या अकार्य। धर्म और अधर्म को, बंध और मोक्ष को, वृत्ति और निवृत्ति को जो बुद्धि ठीक से पहचानती है, वही सात्विकी बुद्धि है और वही मानव की सच्ची उपलब्धि है।

इस प्रकार भगवान ने जीवन के लिए व्यावहारिक मार्ग का उपदेश देकर अंत में यह कहा है कि मनुष्य को चाहिए कि संसार के सब व्यवहारों का सच्चाई से पालन करते हुए, जो अखंड चैतन्य तत्व है, जिसे ईश्वर कहते हैं, जो प्रत्येक प्राणी के हृदयदेश या केंद्र में विराजमान है, उसमें विश्वास रखे, उसका अनुभव करे। वही जीव की सत्ता है, वही चेतना है और वही सर्वोपरि आनन्द का स्रोत है।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ १८.६६॥

अर्थ: सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

मुख्य दार्शनिक विषय

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गीता में अनेक दार्शनिक विषयों का समन्वय किया गया है। इसे ‘समन्वय शास्त्र’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसमें ज्ञान, कर्म, भक्ति और ध्यान—चारों योगों का समावेश है।[4]

कर्मयोग

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कर्मयोग गीता का केंद्रीय संदेश है। इसके अनुसार कर्म करने में अधिकार है, फल में नहीं। फल की आसक्ति छोड़कर कर्तव्य करना ही कर्मयोग है। कर्मयोगी को फल की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि कर्म को यज्ञ भावना से करना चाहिए।[10]

ज्ञानयोग

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ज्ञानयोग आत्मा और ब्रह्म के ज्ञान पर आधारित है। इसके अनुसार आत्मा अजर, अमर और नित्य है। शरीर नश्वर है। इस विवेक से मनुष्य मोह से मुक्त होता है। ज्ञानयोग में ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ का विवेक महत्वपूर्ण है।[11]

भक्तियोग

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भक्तियोग भगवान की शरणागति, प्रेम और समर्पण पर आधारित है। गीता में कहा गया है कि जो भक्त अनन्य भाव से भगवान को भजता है, वह उन्हें प्राप्त होता है। भक्तियोग को गीता में सर्वश्रेष्ठ योग बताया गया है।[12]

ध्यानयोग

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ध्यानयोग मन के नियंत्रण और आत्मसाक्षात्कार पर आधारित है। गीता के छठे अध्याय में ध्यान की विधि का विस्तृत वर्णन है। ध्यानयोगी मन को वश में करके आत्मा में स्थित होता है।[15]

समत्व योग

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समत्व योग गीता का मूल आदर्श है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान, शत्रु-मित्र में सम रहना ही समत्व है। कृष्ण कहते हैं—समत्वं योग उच्यते (२.४८)।[7]

अवतारवाद

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गीता में अवतारवाद का प्रसिद्ध सिद्धांत दिया गया है—यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्। धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए भगवान का अवतरण होता है।[13]

स्वधर्म

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स्वधर्म का अर्थ है—अपने स्वभाव और कर्तव्य के अनुसार धर्म का पालन। गीता में कहा गया है कि श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् (३.३५)—दूसरे के धर्म का अच्छी तरह पालन करने से अपने धर्म का अल्प पालन श्रेयस्कर है।

आत्मा की अमरता

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गीता में आत्मा को अजर, अमर और नित्य बताया गया है। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः (२.२३)—आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, अग्नि नहीं जला सकती। आत्मा का नाश नहीं होता, केवल शरीर का परिवर्तन होता है।[2]

प्रमुख श्लोक

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गीता में अनेक प्रसिद्ध श्लोक हैं, जिनका उल्लेख विद्वानों और संतों ने बार-बार किया है। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक दिए गए हैं:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ २.४७॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। फल की आसक्ति छोड़ो, पर कर्म से विमुख मत हो।

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ ४.७॥

अर्थ: जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ ४.८॥

अर्थ: साधुओं की रक्षा, दुष्कर्मियों का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः॥ ५.१८॥

अर्थ: ज्ञानी महापुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में समान दृष्टि रखते हैं।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ १८.६६॥

अर्थ: सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

गीता जयंती

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ब्रह्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसीलिए यह तिथि गीता जयंती के नाम से भी प्रसिद्ध है और इस एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं।[9]

भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर विश्व के मानवमात्र को गीता के ज्ञान द्वारा जीवनाभिमुख बनाने का चिरन्तन प्रयास किया है। गीता जयंती पर देशभर में गीता पाठ, प्रवचन और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। कुरुक्षेत्र में तो विशेष आयोजन होते हैं।

गीता पर भाष्य

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संस्कृत साहित्य की परम्परा में उन ग्रन्थों को भाष्य (शाब्दिक अर्थ—व्याख्या के योग्य) कहते हैं, जो दूसरे ग्रन्थों के अर्थ की वृहद् व्याख्या या टीका प्रस्तुत करते हैं। भारतीय दार्शनिक परंपरा में किसी भी नए दर्शन को या किसी दर्शन के नए स्वरूप को जड़ जमाने के लिए जिन तीन ग्रन्थों पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना पड़ता था (अर्थात् भाष्य लिखकर), उनमें भगवद्गीता भी एक है (अन्य दो हैं—उपनिषद् तथा ब्रह्मसूत्र)।[15]

गीता पर अनेक आचार्यों एवं विद्वानों ने टीकाएँ की हैं। संप्रदायों के अनुसार उनकी संक्षिप्त सूची इस प्रकार है:

  • (अ) अद्वैत — शांकरभाष्य, श्रीधरकृत सुबोधिनी, मधुसूदन सरस्वतीकृत गूढ़ार्थदीपिका।
  • (आ) विशिष्टाद्वैत —
  • (इ) द्वैत — मध्वाचार्य कृत गीताभाष्य, जिसपर जयतीर्थ कृत प्रमेयदीपिका टीका है; मध्वाचार्य कृत गीतातात्पर्यनिर्णय।
  • (ई) शुद्धाद्वैत — वल्लभाचार्य कृत तत्वदीपिका, जिसपर पुरुषोत्तम कृत अमृततरंगिणी टीका है।
  • (उ) कश्मीरी टीकाएँ — १. अभिनवगुप्त कृत गीतार्थसंग्रह। २. आनंदवर्धन कृत ज्ञानकर्मसमुच्चय।

इनके अतिरिक्त महाराष्ट्र संत ज्ञानदेव या ज्ञानेश्वर कृत भावार्थदीपिका नाम की टीका (१२९०) प्रसिद्ध है, जो गीता के ज्ञान को भावात्मक काव्यशैली में प्रकट करती है। महाराष्ट्र में महानुभाव संप्रदाय के संस्थापक चक्रधर स्वामी के महानुभाव तत्वज्ञान पर आधारित मुरलीधर शास्त्री आराध्ये ने ‘रहस्यार्थचंद्रिका’ नाम की गीता टीका लिखी है।[5]

वर्तमान युग में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक कृत गीतारहस्य टीका, जो अत्यंत विस्तृत भूमिका तथा विवेचन के साथ पहली बार १९१५ ई. में पूना से प्रकाशित हुई थी, गीता साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।[10] उसने गीता के मूल अर्थों को विद्वानों तक पहुँचाने में ऐसा मोड़ दिया है, जो शंकराचार्य के बाद आज तक संभव नहीं हुआ था। वस्तुतः शंकराचार्य का भाष्य गीता का मुख्य अर्थ ज्ञानपरक करता है, जबकि तिलक ने गीता को कर्म का प्रतिपादक शस्त्र सिद्ध किया है।

प्रमुख भाष्यों की सूची

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भगवद्गीता पर उपलब्ध सभी भाष्यों में श्री जयदयाल गोयन्दका की तत्वविवेचनी सर्वाधिक लोकप्रिय तथा जनसुलभ है। इसका प्रकाशन गीताप्रेस द्वारा किया जाता है। आजतक इसकी १० करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं।[7]

गीता नाम के अन्य ग्रन्थ

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गीता के नाम पर अनेक अन्य ग्रन्थ भी प्रचलित हैं, जो विभिन्न विषयों पर आधारित हैं:

आधुनिक जनजीवन में

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अर्जुन को गीता उपदेश देते हुए श्रीकृष्ण की कांस्य प्रतिमा

श्रीमद्भगवद्गीता बदलते सामाजिक परिदृश्यों में अपनी महत्ता को बनाए हुए है और इसी कारण तकनीकी विकास ने इसकी उपलब्धता को बढ़ाया है तथा अधिक बोधगम्य बनाने का प्रयास किया है। दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक महाभारत में भगवद्गीता विशेष आकर्षण रही, वहीं धारावाहिक कृष्णा में भगवद्गीता पर अत्यधिक विशद शोध करके उसे कई कड़ियों की एक शृंखला के रूप में दिखाया गया।[17]

इसके अलावा नीतीश भारद्वाज कृत धारावाहिक गीता-रहस्य तो पूर्णतया गीता के ही विभिन्न आयामों पर केंद्रित रहा। इंटरनेट पर भी आज अनेकानेक वेबसाइटें इस विषय पर बहुमाध्यमों के द्वारा विशद जानकारी देती हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान में धर्म से ज्यादा जीवन के प्रति अपने दार्शनिक दृष्टिकोण को लेकर भारत में ही नहीं, विदेशों में भी लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है। निष्काम कर्म का गीता का संदेश प्रबंधन गुरुओं को भी लुभा रहा है। यह विश्व के सभी धर्मों की सबसे प्रसिद्ध पुस्तकों में शामिल है।[3]

गीता प्रेस गोरखपुर जैसे धार्मिक साहित्य की पुस्तकों को काफी कम मूल्य पर उपलब्ध कराने वाले प्रकाशन ने भी कई आकारों में अर्थ और भाष्य के साथ श्रीमद्भगवद्गीता के प्रकाशन द्वारा इसे आम जनता तक पहुँचाने में काफी योगदान दिया है।

पाश्चात्य विद्वानों की दृष्टि

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पाश्चात्य विद्वानों ने भी गीता की प्रशंसा की है। अमेरिका के प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी अल्बर्ट आइंस्टीन ने गीता के बारे में कहा था कि यह जीवन के बारे में एक महान दार्शनिक ग्रंथ है। हेनरी डेविड थोरो ने गीता की तुलना विश्व के सर्वश्रेष्ठ ग्रंथों से की थी।[18]

राल्फ वाल्डो इमर्सन ने गीता को ‘विश्व साहित्य का सर्वोच्च ग्रंथ’ कहा था। १७८५ में चार्ल्स विल्किंस द्वारा इसका पहला अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ, जिसने पश्चिमी दुनिया में गीता की लोकप्रियता को बढ़ाया।[19]

विवाद और विद्वानों की दृष्टि

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कुछ विद्वान गीता को महाभारत की मूल परत का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ इसे बाद में जोड़ा गया दार्शनिक प्रक्षेप मानते हैं। गीता की व्याख्या में कर्म, अहिंसा, युद्ध, वर्ण और स्वधर्म को लेकर भी अलग-अलग दृष्टिकोण रहे हैं।[1]

इसलिए गीता को एक ही अर्थ में सीमित न करके उसकी बहुविध भाष्य-परम्परा के साथ समझना उचित है। शंकराचार्य से लेकर तिलक तक, और गांधी से लेकर अरविन्द तक—सबने गीता को अपने-अपने ढंग से समझा और उसका प्रचार किया।

गीता का सार

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गीता का सार यह है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए फल की आसक्ति छोड़ देनी चाहिए। इससे वह कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है। गीता यह भी सिखाती है कि संसार में रहते हुए भी संसार से अनासक्त रहा जा सकता है—जैसे कमल जल में रहता है, पर जल से लिप्त नहीं होता।

गीता का निचोड़ है—बुद्धि को हमेशा सूक्ष्म करते हुए महाबुद्धि आत्मा में लगाए रखो तथा संसार के कर्म अपने स्वभाव के अनुसार सरल रूप से करते रहो।[7]

समत्वं योग उच्यते। — गीता २.४८

अर्थ: समत्व ही योग है। सुख-दुःख में सम रहना ही योग है।

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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  1. 1 2 3 John Brockington, The Sanskrit Epics, Brill, 1998, पृ॰ १५६.
  2. 1 2 3 R. C. Zaehner, The Bhagavad-Gita, Oxford University Press, 1969, पृ॰ १.
  3. 1 2 3 Gavin Flood, An Introduction to Hinduism, Cambridge University Press, 1996, पृ॰ १२४.
  4. 1 2 3 4 S. Radhakrishnan, The Bhagavadgita, HarperCollins, 1948, पृ॰ १२.
  5. 1 2 3 गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी, गीता प्रवचन भाष्य, पृ॰ २३.
  6. ↑ V. S. Apte, The Practical Sanskrit-English Dictionary, 1890.
  7. 1 2 3 4 5 6 7 जयदयाल गोयन्दका, श्रीमद्भगवद्गीता तत्वविवेचनी, गीताप्रेस, गोरखपुर, पृ॰ १५.
  8. ↑ महाभारत, भीष्मपर्व, अध्याय २५–४२.
  9. 1 2 अमर उजाला, गीता जयंती विशेष
  10. 1 2 3 4 5 बाल गंगाधर तिलक, गीता रहस्य, १९१५, पृ॰ ४५.
  11. 1 2 3 आदि शंकराचार्य, गीताभाष्य, अध्याय २.
  12. 1 2 रामानुजाचार्य, गीताभाष्य, अध्याय ३.
  13. 1 2 3 श्री अरविन्द, Essays on the Gita, १९२२, पृ॰ १८९.
  14. ↑ मध्वाचार्य, गीताभाष्य, अध्याय ५.
  15. 1 2 3 स्वामी विवेकानन्द, वेदान्त, रामकृष्ण मठ, नागपुर.
  16. ↑ श्री भूपेंद्रनाथ, सान्याल (2005). श्रीमद्भगवद्गीता (प्रथम ed.). भागलपुर, बिहार: गुरुधाम प्रकाशन समिति.
  17. ↑ दूरदर्शन धारावाहिक 'कृष्णा', १९९३.
  18. ↑ Eric Sharpe, The Universal Gita, Open Court, 1985.
  19. ↑ Charles Wilkins, The Bhagvat-Geeta, 1785.

संदर्भ ग्रन्थ

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  • शंकराचार्य: गीताभाष्य
  • लोकमान्य तिलक: गीता रहस्य
  • मधुसूदन ओझा: श्रीमद्भगवद्गीतायाः विज्ञानभाष्यम्, कांडचतुष्टयात्मकम्
  • मोतीलाल शास्त्री: गीताभाष्य भूमिका
  • गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी: गीता प्रवचन भाष्य
  • S. Radhakrishnan, The Bhagavadgita, HarperCollins, 1948
  • R. C. Zaehner, The Bhagavad-Gita, Oxford University Press, 1969
  • Gavin Flood, An Introduction to Hinduism, Cambridge University Press, 1996
  • John Brockington, The Sanskrit Epics, Brill, 1998
  • श्री अरविन्द, Essays on the Gita, 1922

बाहरी कड़ियाँ

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