बाल गंगाधर तिलक

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Lokmanya Tilak Biography

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के जनक कहे जाने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अपने इस क्रान्तिकारी नारे के लिए काफी मशहूर हैं

“स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर ही रहूंगा

इस नारे ने राष्ट्रीय आंदोलन के वक्त युवाओं के मन में अपने स्वराज पाने के लिए एक नया जोश भर दिया था। महान क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक ने न सिर्फ एक सच्चे देश प्रेमी की तरह स्वतंत्रता संग्राम में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बल्कि उन्होंने समाज में फैली तमाम बुराईयों को दूर करने के भी प्रयास किए।

आपको बता दें कि वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी, बेहतर समाज सुधारक, एक आदर्शवादी राष्ट्रीय नेता, प्रख्यात वकील, प्रसिद्ध लेखक और महान विचारक होने के साथ-साथ  भारतीय इतिहास, हिन्दू धर्म, संस्कृत, खगोल विज्ञान, गणित आदि विषयों के ज्ञाता भी थे। अर्थात लोकमान्य तिलक (Lokmanya Tilak) एक बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति थे और कांग्रेस की उग्र विचारधारा के प्रवर्तक थे। उन्हें आधुनिक भारत का वास्तुकार भी कहा जाता है।

अनुक्रम

Lokmanya Tilak Biography – लोकमान्य तिलक का जीवन परिचय[संपादित करें]

पूरा नाम (Name) बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak)
जन्मतिथि (Birthday) 23 जुलाई, 1856, रत्नागिरी, महाराष्ट्र
पिता का नाम (Father Name) गंगाधर तिलक
माता का नाम (Mother Name) पार्वती बाई
पत्नी का नाम (Wife Name) तापिबाई (सत्यभामा बाई)
बच्चों के नाम (Children Name) रमा बाई वैद्य, पार्वती बाई केलकर,

विश्वनाथ बलवंत तिलक, रामभाऊ बलवंत तिलक, श्रीधर बलवंत तिलक और रमाबाई साणे

शिक्षा (Education) बी.ए. एल.एल. बी
पुरस्कार –उपाधि (Awards) ‘लोकमान्य’
मृत्यु (Death) 1 अगस्त, 1920, मुंबई , महाराष्ट्र

बाल गंगाधर तिलक का जन्म, परिवार एवं शुरुआती जीवन – Lokmanya Tilak Information in Hindi[संपादित करें]

बाल गंगाधर तिलक, 23 जुलाई, 1856 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी में एक ब्राह्मण परिवार में जन्में थे। इनके पिता का नाम गंगाधर तिलक था, जो कि रत्नागिरी में एक संस्कृत के प्रख्यात शिक्षक थे।

जबकि उनकी माता का नाम पार्वती बाई गंगाधर था, उनके पिता के ट्रांसफर के बाद, उनका परिवार पूणे में आकर बस गया। वहीं साल 1871 में उनकी शादी तपिबाई से हुई जो कि बाद में सत्यभामा बाई के रुप में जानी गईं।

बाल गंगाधर तिलक की शिक्षा – Lokmanya Tilak Education[संपादित करें]

बाल गंगाधर तिलक बचपन से ही बेहद तेज बुद्धि के एक प्रतिभावान छात्र थे, गणित, उनका शुरुआत से ही पसंदीदा विषय था। आपको बता दें कि उन्होंने अपनी शुरुआती शिक्षा अपने पिता जी से घर पर ही हासिल की थी।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा पुणे के एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल से प्राप्त की। वहीं जब वे बहुत कम्र के थे, तभी उनके सिर से मां-बाप दोनों का साया उठ गया। लेकिन वे निराश नहीं हुए और अपने जीवन में आगे बढ़ते रहे रहे।

इसके बाद उन्होंने साल 1877 में पुणे के डेक्कन कॉलेज से संस्कृत और गणित विषय से बी.ए. की डिग्री हासिल की। इसके बाद तिलक ने मुंबई के सरकारी लॉ कॉलेज से एलएलबी की पढ़ाई की और फिर साल 1879 में उन्होंने लॉ की डिग्री हासिल की।

बाल गंगाधर तिलक का करियर – Lokmanya Tilak Career[संपादित करें]

शिक्षक के रुप में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका:

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद बाल गंगाधर तिलक, पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और इंग्लिश के शिक्षक बन गए।

वहीं स्कूल के अन्य शिक्षकों और अधिकारियों साथ उनके विचार मेल नहीं खाते थे और असहमति के चलते उन्होंने साल 1880 में स्कूल में पढ़ाना छोड़ दिया था, आपको बता दें कि बाल गंगाधर तिलक (Bal Gangadhar Tilak) ने अंग्रेजों की शिक्षा प्रणाली की काफी आलोचना भी की थी, उन्होंने ब्रिटिश विद्यार्थियों की तुलना में भारतीय विद्यार्थियों के साथ दोगुला व्यवहार का जमकर विरोध किया और भारतीय संस्कृति और आदर्शों के प्रति जागरुकता फैलाई।

डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की स्थापना – Deccan Education Society

भारतीय छात्रों के बीच राष्ट्रवादी शिक्षा को प्रेरित करने, देश के युवाओं को उच्च स्तर की शिक्षा प्रदान करने और शिक्षा में गुणवत्ता लाने के उद्देश्य से बाल गंगाधर तिलक ने अपने कॉलेज के बैचमेट्स और महान समाज सुधारक गोपाल गणेश आगरकर और विष्णु शास्त्री चिपुलंकर के साथ मिलकर ‘डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी’ की स्थापना की।

आपको बता दें कि इस सोसायटी ने साल 1885 में माध्यमिक शिक्षा के लिए एक न्यू इंग्लिश स्कूल और उच्च शिक्षा के लिए फर्ग्युसन कॉलेज की भी स्थापना की थी।

‘केसरी’ और ‘मराठा’ का प्रकाशन – Publication of ‘Kesari’ and ‘Maratha’

साल 1881 में  भारतीय संघर्षों और परेशानियों को लोगों से अवगत करवाने और लोगों के अंदर स्वशासन की भावना जागृत करने और अपने हक के लिए लड़ाई लड़ने की भावना विकसित करने केउद्देश्य से लोकमान्य तिलक ने दो साप्ताहिक पत्रिकाओं, ‘केसरी’ और ‘मराठा’ की शुरुआत की। यह दोनों ही समाचार पत्र लोगों के बीच काफी मशहूर हुए।

बाल गंगाधर तिलक का राजनैतिक सफर – Political Career of Lokmanya Bal Gangadhar Tilak[संपादित करें]

इंडियन नेशनल कांग्रेस – Indian National Congress

बाल गंगाधर तिलक साल 1890 में इंडियन नेशनल कांग्रेस में शामिल हुए, इसके बाद उन्होंने जल्द ही स्वशासन पर पार्टी के उदारवादी विचारों के खिलाफ कड़ा विरोध करना शुरु कर दिया।

इस दौरान बाल गंगाधर तिलक ने कहा कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ अपने आप में सरल संवैधानिक आंदोलन करना व्यर्थ था, इसके बाद पार्टी ने उन्हें उस वक्त कांग्रेस के प्रमुख नेता गोपाल कृष्ण गोखले के खिलाफ खड़ा कर दिया।

हालांकि, लोकमान्य तिलक स्वराज हासिल करने के लिए और अंग्रेजों को भगाने के लिए एक सशक्त विद्रोह चाहते थे। वहीं उन्होंने बंगाल के बंटवारे के दौरान स्वदेशी आंदोलन और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार का भी समर्थन किया था।

कांग्रेस पार्टी और लोकमान्य तिलक की विचारधारा में अंतर होने की वजह से उन्हें कांग्रेस के चरमपंथी विंग के रुप में पहचाने जाने लगा। हालांकि इस दौरान तिलक को  बंगाल के राष्ट्रवादी बिपिन चन्द्र पाल और पंजाब के लाला लाजपत राय ने अपना समर्थन दिया था। वहीं बाद में इन तीनों की तिकड़ी ‘लाल – बाल – पाल’ के रूप में मशहूर हुई।

साल 1907 के कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में, कांग्रेस पार्टी के उदारवादी और चरमपंथी वर्गों के बीच एक विवाद खड़ा हो गया। जिसके चलते कांग्रेस 2 अलग-अलग गुटों में  बंट गई।

बाल गंगाधर तिलक की जेल यात्रा –

लोकमान्य तिलक ने ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति का जमकर विरोध किया और अपने अखबारों के माध्यम में अंग्रेजों के खिलाफ उत्तेजक लेख लिखे, वहीं उन्होंने इस लेख में चापेकर बंधुओं को प्रेरित किया, जिसके चलते उन्होंने 22 जून, 1897 में कमिश्चनर रैंड औरो लेफ्टडिनेंट आयर्स्ट की हत्या कर दी, जिसके बाद लोकमान्य तिलक पर इस हत्या के लिए उकसाने के आरोप में राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चला और 6 साल के लिए ‘देश निकाला’ का दंड दिया गया, और साल 1908 से 1914 की बीच उन्हें बर्मा की मांडले जेल में भेज दिया गया। हालांकि जेल के दौरान भी उन्होंने लिखना जारी रखा, उन्होंने जेल में गीता रहस्य’ किताब लिखी।

वहीं  तिलक के क्रांतिकारी कदमों से अंग्रेज बौखला गए थे और उनके समाचार पत्रों के प्रकाशन को रोकने की भी कोशिश की थी। लेकिन उस समय तक तिलक की लोकप्रियता काफी बढ़ गई थी,और लोगों में स्वशासन पाने की इच्छा जागृत हो उठी थी।

इसलिए अंग्रेजों को भी इस महान क्रांतिकारी बाल गंगाधर तिलक के आगे झुकने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

होम रुल लीग की स्थापना – Home Rule League

साल 1915 में जेल की सजा काटने के बाद, जब लोकमान्य तिलक भारत वापस लौटे, तो उस दौरान उन्होंने नोटिस किया कि, प्रथम विश्व युद्द के चलते राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल रही थी, वहीं उनकी रिहाई से लोकमान्य तिलक के प्रशंसकों में खुशी की लहर दौड़ गई, और लोगों ने मिलकर उनके रिहाई का उत्सव मनाया।

इसके बाद बाल गंगाधर तिलक फिर से कांग्रेस में शामिल हुए, और अपने  साथियों के साथ फिर से एकजुट होने का फैसला करते हुए उन्होंने एनी बेसेंट, मुहम्मद अली जिन्नहा, युसूफ बैप्टिस्टा के साथ मिलकर 28 अप्रैल, साल 1916 में पूरे भारत में होम रुल लीग की स्थापना की, जिसमें उन्होंने स्वराज और प्रशासकीय सुधार समेत भाषीय प्रांतों की स्थापना की मांग की।

समाज सुधारक के रुप में बाल गंगाधर तिलक के काम

बाल गंगाधर तिलक जी ने एक महान समाज सुधारक के रुप में भी कई काम किए, उन्होंने अपने जीवन में समाज में फैली जाति प्रथा, बाल विवाह जैसे तमाम बुराईयों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और महिलाओं की शिक्षा और उनके विकास पर जोर दिया।

बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु – Bal Gangadhar Tilak Death[संपादित करें]

जलियांवाला बाग हत्याकांड की घटना का बाल गंगाधर तिलक जी पर गहरा असर पड़ा था, इसके बाद उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा, और बाद में वे मधुमेह की बीमारी की चपेट में आ गए जिससे, उनकी हालत बेहद खराब होती चली गई।

जिसके बाद 1 अगस्त साल 1920 में लोकमान्य तिलक ने अपनी अंतिम सांस ली, वहीं उनकी मृत्यु से पूरे देश में भारी शोक की लहर दौड़ गई, उनके अंतिम दर्शन पाने के लिए उनकी शव यात्रा में लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी थी।

लोकमान्य तिलक जी के सम्मान में स्मारक –

पुणे में तिलक म्यूजियम, ‘तिलक रंगा मंदिर’ नाम का थिएटर ऑडिटोरियम भी उनके सम्मान में उनके नाम पर स्मारक के तौर पर बनवाए गए हैं, इसके अलावा भारत सरकार ने साल 2007 में उनकी स्मारक में एक सिक्का भी जारी किया था।

इसके साथ ही ‘लोकमान्य: एक युग पुरुष’ के नाम से उन पर एक फिल्म भी बनाई जा चुकी है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक एक महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी नेता थे,जिन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों के माध्यम से न सिर्फ लोगों में स्वशासन की इच्छा जागृत की थी, बल्कि समाज में फैली तमाम बुराइयों को दूर कर लोंगो को एकता के सूत्र में बांधने के लिए गणेशोत्सव और शिवाजी समारोह समेत तमाम कार्यक्रमों को शुरु भी किया था।

लोकमान्य तिलक जी के देश के लिए किए गए त्याग और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। यह राष्ट्र हमेशा उनके कृतज्ञों का ऋणी रहेगा। ऐसे महान युग पुरुष का भारत में जन्म लेना गौरव की बात है।

एक नजर में लोकमान्य तिलक के मुख्य कार्य – Bal Gangadhar Tilak Information[संपादित करें]

  • 1880 में पुणे में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना।
  • 1881 में जनजागरण के लिए ‘केसरी’ मराठी और ‘मराठा’ इंग्रेजी ऐसे दो अखबारों की शुरुवात की। आगरकर केसरी के और तिलक मराठा के संपादक बने।
  • 1884 में पुणे में डेक्कन एज्युकेशन सोसायटी की स्थापना।
  • 1885 में पुणे में फर्ग्युसन कॉलेज शुरू किया गया।
  • 1893 में ‘ओरायन’ नाम के किताब का प्रकाशन।
  • लोकमान्य तिलक ने लोगों मे एकता की भावना निर्माण करने के लिए ‘सार्वजानिक गणेश उत्सव’ और ‘शिव जयंती उत्सव’ शुरू किया।
  • 1895 में मुम्बई प्रांतीय विनियमन बोर्ड के सभासद इसलिए चुना गया।
  • 1897 में लोकमान्य तिलक पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें डेढ़ साल की सजा सुनाई गयी। उस समय तिलक ने अपने बचाव में जो भाषण दिया था वह4 दिन और 21 घंटे चला था।
  • 1903 में ‘दि आर्क्टिक होम इन द वेदाज’ नाम के किताब का प्रकाशन।
  • 1907 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सूरत के अधिवेशन में जहाल और मवाल इन दो समूह का संघर्ष बहोत बढ़ गया था। इसका परिणाम मवाल समूह ने जहाल समूह को कांग्रेस संघटने से निकाल दिया। जहाल का नेतृत्व लोकमान्य तिलक इनके पास था।
  • 1908 में तिलक इनपर राजद्रोह का मामला दर्ज हुआ। उसमे उनको छः साल की सजा सुनाई गई और उन्हें ब्रम्हदेश के मंडाले के जेल में भेज दिया गया। मंडाले के जेल में उन्होंने ‘गीतारहस्य’ नाम का अमर ग्रन्थ लिखा।
  • 1916 में उन्होंने डॉ. एनी बेसेंट इनके सहकार्य से ‘होमरूल लीग’ संघटना की स्थापना की। होमरूल यानि अपने राज्य का प्रशासक हम करे। जिसे ‘स्वशासन’ भी कहते है।
  • हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिलना चाहियें इस बात को सबसे पहले तिलक ने ही रखा था।

बाल गंगाधर तिलक की किताबें – Bal Gangadhar Tilak Books[संपादित करें]

भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के जनक कहे जाने वाले बाल गंगाधर तिलक ने भारतीय इतिहास, हिन्दू धर्म और संस्कृति पर कई किताबें लिखीं। आपको बता दें कि उन्होंने साल 1893 में वेदों के ओरियन एवं शोध के बारे में एक पुस्तक लिखी, वहीं उन्होंने जेल के दौरान उन्होंने श्रीमदभगवत गीता रहस्य नामक किताब भी लिखी।

बाल गंगाधर तिलक
२३ जुलाई १८५६ से १ अगस्त १९२० तक
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की एक दुर्लभ तस्वीर

उपनाम : बाल,लोकमान्य
जन्मस्थल : रत्नागिरी जिला, महाराष्ट्र
मृत्युस्थल: मुंबई, महाराष्ट्र
आन्दोलन: भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम
प्रमुख संगठन: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस

बाल गंगाधर तिलक (अथवा लोकमान्य तिलक, ; ३ जुलाई १८५६ - १ अगस्त १९२०), जन्म से केशव गंगाधर तिलक, एक भारतीय राष्ट्रवादी, शिक्षक, समाज सुधारक, वकील और एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। ये भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के पहले लोकप्रिय नेता हुए; ब्रिटिश औपनिवेशिक प्राधिकारी उन्हें "भारतीय अशान्ति के पिता" कहते थे। उन्हें, "लोकमान्य" का आदरणीय शीर्षक भी प्राप्त हुआ, जिसका अर्थ हैं लोगों द्वारा स्वीकृत (उनके नायक के रूप में)।[1] इन्हें हिन्दू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है।[2]

तिलक ब्रिटिश राज के दौरान स्वराज के सबसे पहले और मजबूत अधिवक्ताओं में से एक थे, तथा भारतीय अन्तःकरण में एक प्रबल आमूल परिवर्तनवादी थे। उनका मराठी भाषा में दिया गया नारा "स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच" (स्वराज यह मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर ही रहूँगा) बहुत प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई नेताओं से एक क़रीबी सन्धि बनाई, जिनमें बिपिन चन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, अरविन्द घोष, वी० ओ० चिदम्बरम पिल्लै और मुहम्मद अली जिन्नाह शामिल थे।

प्रारम्भिक जीवन[संपादित करें]

तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को ब्रिटिश भारत में वर्तमान महाराष्ट्र स्थित रत्नागिरी जिले के एक गाँव चिखली में हुआ था। ये आधुनिक कालेज शिक्षा पाने वाली पहली भारतीय पीढ़ी में थे। इन्होंने कुछ समय तक स्कूल और कालेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्कन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की ताकि भारत में शिक्षा का स्तर सुधरे।

राजनीतिक यात्रा[संपादित करें]

लाल-बाल-पाल की त्रिमूर्ति का एक दुर्लभ चित्र जिसमें बायें से लाला लाजपतराय, बीच में तिलक जी और सबसे दायें बिपिनचन्द्र पाल बैठे हैं

तिलक ने इंग्लिश मेमराठा दर्पण व मराठी में केसरी नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।

तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। 1907 में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। 1908 में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गये और 1916 में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस[संपादित करें]

तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से 1890 में जुड़े। हालांकि, उसकी मध्य अभिवृत्ति, खासकर जो स्वराज्य हेतु लड़ाई के प्रति थी, वे उसके ख़िलाफ़ थे। वे अपने समय के सबसे प्रख्यात आमूल परिवर्तनवादियों में से एक थे।[3]

जल्दी शादी करने के व्यक्तिगत रूप से विरोधी होने के बावजूद, तिलक 1891 एज ऑफ़ कंसेन्ट विधेयक के खिलाफ थे, क्योंकि वे उसे हिन्दू धर्म में दख़लअन्दाज़ी और एक ख़तरनाक नज़ीर के रूप में देख रहे थे। इस अधिनियम ने लड़की के विवाह करने की न्यूनतम आयु को 10 से बढ़ाकर 12 वर्ष कर दिया था।

राजद्रोह के आरोप[संपादित करें]

माण्डले में कारावास[संपादित करें]

ब्रिटिश सरकार ने तिलक को 6वर्ष के करावास की सजा सुनाई, दौरान करावास तिलक ने कुछ किताबो की मांग की लेकिन ब्रिटिश सरकार ने उन्हे ऐसे किसी पत्र को लिखने पर रोक लगायी थी जिसमे राजनैतिक गतिविधियां हो।तिलक करावास मे एक किताब भी लिखी करावास की पूर्ण होने के कुछ समय पूर्व ही बाल गंगाधर तिलक की पत्नी का स्वर्गवास हो गया इस ढुखद खबर की जानकारी उन्हे जेल मे प्राप्त हुए एक खत से हुई। और तिलक को इस बात का बेहद अफसोस था की वे अपनी म्रतक पत्नी के अंतिम दर्शन भी नहीं कर सकते।

मण्डले के बाद का जीवन[संपादित करें]

आल इण्डिया होम रूल लीग[संपादित करें]

लाला लाजपत राय ने एनी बेसेंट की मदद से होम रुल लीग की स्थापना की यह कोई सत्याग्रह आंदोलन जैसा नहीं था इसमें चार या पांच लोगों की टुकड़ियां बनाई जाती थी जो पूरे भारत में बड़े बड़े राजनेताओं और वकीलों से मिलकर होम रूल लीग का मतलब समझाया करते थे एनी बेसेंट जो कि आयरलैंड से भारत आई हुई थी उन्होंने वहां पर होमरूल लीग जैसा प्रयोग देखा था उसी तरह का प्रयोग उन्होंने भारत में करने का सोचा

सामाजिक योगदान और विरासत[संपादित करें]

तिलक ने मराठी में केसरी और अंग्रेजी में मराठा नाम से दो दैनिक समाचार पत्र शुरू किये जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। इन्होंने माँग की कि ब्रिटिश सरकार तुरन्त भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया।

तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुए लेकिन जल्द ही वे कांग्रेस के नरमपंथी रवैये के विरुद्ध बोलने लगे। १९०७ में कांग्रेस गरम दल और नरम दल में विभाजित हो गयी। गरम दल में तिलक के साथ लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल शामिल थे। इन तीनों को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाने लगा। १९०८ में तिलक ने क्रान्तिकारी प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस के बम हमले का समर्थन किया जिसकी वजह से उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) स्थित मांडले की जेल भेज दिया गया। जेल से छूटकर वे फिर कांग्रेस में शामिल हो गये और १९१६ में एनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रूल लीग की स्थापना की।

मृत्यु[संपादित करें]

सन १९१९ ई. में कांग्रेस की अमृतसर बैठक में हिस्सा लेने के लिये स्वदेश लौटने के समय तक तिलक इतने नरम हो गये थे कि उन्होंने मॉन्टेग्यू-चेम्सफ़ोर्ड सुधारों के ज़रिये स्थापित लेजिस्लेटिव कौंसिल (विधायी परिषद) के चुनाव के बहिष्कार की गान्धी की नीति का विरोध ही नहीं किया। इसके बजाय तिलक ने क्षेत्रीय सरकारों में कुछ हद तक भारतीयों की भागीदारी की शुरुआत करने वाले सुधारों को लागू करने के लिये प्रतिनिधियों को यह सलाह अवश्य दी कि वे उनके प्रत्युत्तरपूर्ण सहयोग की नीति का पालन करें। लेकिन नये सुधारों को निर्णायक दिशा देने से पहले ही १ अगस्त,१९२० ई. को बम्बई में उनकी मृत्यु हो गयी। मरणोपरान्त श्रद्धांजलि देते हुए गान्धी जी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता कहा और जवाहरलाल नेहरू ने भारतीय क्रान्ति का जनक बतलाया।

पुस्तकें[संपादित करें]

तिलक ने यूँ तो अनेक पुस्तकें लिखीं किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या को लेकर मांडले जेल में लिखी गयी गीता-रहस्य सर्वोत्कृष्ट है जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है।

उनकी लिखी हुई सभी पुस्तकों का विवरण इस प्रकार है[4]-

  • वेद काल का निर्णय (The Orion)
  • आर्यों का मूल निवास स्थान (The Arctic Home in the Vedas)
  • श्रीमद्भागवतगीता रहस्य अथवा कर्मयोग शास्त्र
  • वेदों का काल-निर्णय और वेदांग ज्योतिष (Vedic Chronology & Vedang Jyotish)
  • हिन्दुत्व
  • श्यामजीकृष्ण वर्मा को लिखे तिलक के पत्र

उनकी समस्त पुस्तकें मराठी अँग्रेजी और हिन्दी में लोकमान्य तिलक मन्दिर, नारायण पैठ, पुणे से सर्वप्रथम प्रकाशित हुईं। बाद में उन्हें अन्य प्रकाशकों ने भी छापा।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. D. V. Tahmankar (1956). Lokamany Tilak: Father of Indian Unrest and Maker of Modern India. John Murray; 1st Edition (1956). अभिगमन तिथि 5 February 2013.
  2. लोकमान्य तिलक ने ही गणेश उत्सव की शुरुआत की।"पूर्ण स्वराज के लिए लड़ने वाले लोकमान्य तिलक का जन्म दिन है आज". पत्रिका समाचार समूह. १ अगस्त २०१४. अभिगमन तिथि १ अगस्त २०१४.
  3. Donald Mackenzie Brown"The Congress." The Nationalist Movement: Indian Political Thought from Ranade to Bhave (1961): 34
  4. क्रान्त (2006). स्वाधीनता संग्राम के क्रान्तिकारी साहित्य का इतिहास. 2 (1 संस्करण). नई दिल्ली: प्रवीण प्रकाशन. पृ॰ 369-375. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7783-119-4.

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]