मन

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

मन मस्तिष्क की उस क्षमता को कहते हैं जो मनुष्य को चिंतन शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान (अंतर्दृष्टि), इत्यादि में सक्षम बनाती है।[1][2][3] सामान्य भाषा में मन शरीर का वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क का एक प्रकार्य है।

मन और इसके कार्य करने के विविध पहलुओं का मनोविज्ञान नामक ज्ञान की शाखा द्वारा अध्ययन किया जाता है। मानसिक स्वास्थ्य और मनोरोग किसी व्यक्ति के मन के सही ढंग से कार्य करने का विश्लेषण करते हैं। मनोविश्लेषण नामक शाखा मन के अन्दर छुपी उन जटिलताओं का उद्घाटन करने की विधा है जो मनोरोग अथवा मानसिक स्वास्थ्य में व्यवधान का कारण बनते हैं। वहीं मनोरोग चिकित्सा मानसिक स्वास्थ्य को पुनर्स्थापित करने की विधा है।

सामाजिक मनोविज्ञान किसी व्यक्ति द्वारा विभिन्न सामाजिक परिस्थितयों में उसके मानसिक व्यवहार का अध्ययन करती है। शिक्षा मनोविज्ञान उन सारे पहलुओं का अध्ययन करता है जो किसी व्यक्ति की शिक्षा में उसके मानसिक प्रकार्यों के द्वारा प्रभावित होते हैं।

जिसके द्वारा सब क्रियाकलापो को क्रियानवृत किया जाता है। उसे साधारण भाषा में मन कहते है।। अंतर्मन और मन अंतर्मन == जो प्रमुख विघुत तरंग उत्पन्न करने वाला बिन्दु है यही से स्वयं के जीवन के उचित मार्गदर्शन होता है । मन दूसरा विघुत तरंग बिन्दु यही मन किसी के भी बातों में आ जाता है यही अनेक प्रेम प्रसंग में आकर्षित होता है यही क्रोध यही छोटे बातों में गुस्सा करता है यही मन लालची होती है यही यही मन देश दुनिया परिवार से प्यार करता है यही मन धन दौलत नाम प्रसिध्दी प्राप्त कर घमण्डी या अहंकारी बनना देता है मनुष्य को इसलिए इसको हराकर इसके भीतर जो अंतर्मन है जो सदैव मनुष्य को सत्य मार्ग दिखता है परमात्मा से जुड़ता है जो सुख शांति आनंद देता है उस तक पहुंचना है पहुंचाने वाला स्वयं की मस्तिष्क की चेतना है ।

ह्रदय या दिल में मन रहता है उसके भीतर अंतर्मन रहता है जो मन के चक्कर में रहता है वह दुखी रहता है संसारिक जीवन के कर्तव्य उत्तरदायित्व व उद्देश्य की पूर्ति के लिए उलझे रहता है परन्तु इसके भीतर अंतर्मन होता है उस तक पहुंच जाने पर सारे दुखो का नाश हो जाता है सही मायने में यही भगवान है । मन अंतर्मन तक पहुचने से रोकता है इसलिए मन को धार्मिक ज्ञान से स्वयं के वश में करना पड़ता है स्वयं अर्थात मस्तिष्क में जो चेतना है वही जागते समय खुद है ।

अंतर्मन में पहुंच जाना मुक्ति है मोक्ष है देश दुनिया परिवार समाज के दुख सुख से कोई फर्क नहीं पड़ता स्वयं की दुख सुख से भी कोई फर्क नहीं पड़ता हमेशा इंसान खुश व आनंदित रहता है । इसलिए तो कहते है मन का नाटक है दुख सुख असली में आत्मा चिर आनंदित रहता है इसलिए स्वयं के दिमाग को दिल के अंतर्मन से जुड़ देना चाहिए।

अंतर्मन में स्वयं चेतना की चेतना को स्थापित कर देने पर संसारिक दुख से कोई फर्क नहीं पड़ता ना गरीबी ना बदसूरती का ना अपमान का ना परिवारक के सदस्य मित्र प्रियजन की मृत्यु का दुख होता है प्रेमिका पत्नी धोखा दे भी तो कोई दुख नहीं होता देश दुनिया मानव समाज में अशांति हो युध्द हो अराजकता हो तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता हर चीज में असफल हो जाऐ तो भी दुख नहीं होता वही अमीरी प्रसिध्द ज्ञानी सौन्दर्य युक्त होने पर भी अहंकार नही होता पत्नी परिवार अच्छे हो सुखी होतो भी उनके सुख व अच्छाई से कोई महत्व नहीं होता है यही स्थिति परमानंद को प्राप्त करना है अर्थात परमात्मा को प्राप्त करना है ।

मन के भाग[संपादित करें]

फ्रायड नामक मनोवैज्ञानिक ने बनावट के अनुसार मन को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया था :

  • सचेतन: यह मन का लगभग दसवां हिस्सा होता है, जिसमें स्वयं तथा वातावरण के बारे में जानकारी (चेतना) रहती है। दैनिक कार्यों में व्यक्ति मन के इसी भाग को व्यवहार में लाता है।
  • अचेतन: यह मन का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा है, जिसके कार्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी नहीं रहती। यह मन की स्वस्थ एवं अस्वस्थ क्रियाओं पर प्रभाव डालता है। इसका बोध व्यक्ति को आने वाले सपनों से हो सकता है। इसमें व्यक्ति की मूल-प्रवृत्ति से जुड़ी इच्छाएं जैसे कि भूख, प्यास, यौन इच्छाएं दबी रहती हैं। मनुष्य मन के इस भाग का सचेतन इस्तेमाल नहीं कर सकता। यदि इस भाग में दबी इच्छाएं नियंत्रण-शक्ति से बचकर प्रकट हो जाएं तो कई लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं जो बाद में किसी मनोरोग का रूप ले लेते हैं।
  • अर्धचेतन या पूर्वचेतन: यह मन के सचेतन तथा अचेतन के बीच का हिस्सा है, जिसे मनुष्य चाहने पर इस्तेमाल कर सकता है, जैसे स्मरण-शक्ति का वह हिस्सा जिसे व्यक्ति प्रयास करके किसी घटना को याद करने में प्रयोग कर सकता है।

फ्रायड ने कार्य के अनुसार भी मन को तीन मुख्य भागों में वर्गीकृत किया है।

  • इड (मूल-प्रवृत्ति): यह मन का वह भाग है, जिसमें मूल-प्रवृत्ति की इच्छाएं (जैसे कि उत्तरजीवित यौनता, आक्रामकता, भोजन आदि संबंधी इच्छाएं) रहती हैं, जो जल्दी ही संतुष्टि चाहती हैं तथा खुशी-गम के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। ये इच्छाएं अतार्किक तथा अमौखिक होती हैं और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं।
  • ईगो (अहम्): यह मन का सचेतन भाग है जो मूल-प्रवृत्ति की इच्छाओं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रित करता है। इस पर सुपर-ईगो (परम अहम् या विवेक) का प्रभाव पड़ता है। इसका आधा भाग सचेतन तथा अचेतन रहता है। इसका प्रमुख कार्य मनुष्य को तनाव या चिंता से बचाना है। फ्रायड की मनोवैज्ञानिक पुत्री एना फ्रायड के अनुसार यह भाग डेढ़ वर्ष की आयु में उत्पन्न हो जाता है जिसका प्रमाण यह है कि इस आयु के बाद बच्चा अपने अंगों को पहचानने लगता है तथा उसमें अहम् भाव (स्वार्थीपन) उत्पन्न हो जाता है।
  • सुपर-ईगो (विवेक; परम अहम्): सामाजिक, नैतिक जरूरतों के अनुसार उत्पन्न होता है तथा अनुभव का हिस्सा बन जाता है। इसके अचेतन भाग को अहम्-आदर्श (ईगो-आइडियल) तथा सचेतन भाग को विवेक कहते हैं।

ईगो (अहम्) का मुख्य कार्य वास्तविकता, बुद्धि, चेतना, तर्क-शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय-शक्ति, इच्छा-शक्ति, अनुकूलन, समाकलन, भेद करने की प्रवृत्ति को विकसित करना है।


मन मनुष्यों का सबसे तीव्र गति करता है वास्तव में मन से सम्पूर्ण विश्व के स्थानो भूत भविष्य वर्तमान में जाया जा सकता है । कुछ लोग अत्याधिक व्याकुल दुखी हो जाते है किसी के लिए तो उनका मन UFO के रूप में नजर आता है अपने प्रियजन परिवारिक सदस्य या मित्रगण को खोजने के लिए कुछ अन्य कारण भी होते है क्योंकि UFO अभौतिक नियम से गति करता है जो मन को दर्शाता है अपने मन को नियंत्रित करने पर सम्पूर्ण विश्व के आधुनिक तकनीक या मशीन भी उसके बराबरी नहीं कर सकता है ।

प्रायः स्त्री व पुरूषों के मध्य प्रेम की शुरूवाती समय में उनका मन एक दूसरे के पास जाते रहता है जिसके कारण उन्हें अपने प्रेमी के होने का एहसास होता है ।

यहाँ मन कभी स्वयं के प्रतिबिम्ब के रूप में किसी को नजर आता है अत्याधिक व्याकुल से मन गति करता है तो UFO के रूप में कभी यही मन भूत प्रेत आत्मा के रूप में भटकता रहता है ।

इसी मन के कारण कोई स्त्री व पुरुष हर जन्म में एक दूसरे के पति पत्नी बनाते है क्योंकि उनका मन उन्हें खोज ही लेता है और हम सब मनुष्यों का अवचेतन मन एक दूसरे से जुड़ा है इसलिए जिस मनुष्य को जिसके साथ जैसा करना है वैसा करता है कहा जाऐ तो अंतर्मन हमारा विधि के विधान के अनुसार चलाता है जैसे कोई स्त्री को हर जन्म में पतिव्रता रहना है तो उस स्त्री के प्रति कोई भी पुरूष आकर्षित नहीं होगा मात्र उसका हर जन्म का पति ही आकर्षित होगा और उसका पति को भी पवित्र रहना है तो विश्व में ऐसा महौल ही नहीं बनेगा जिसके कारण वह किसी से भी प्रेम प्रसंग या विवाह कर ले यही अवचेतन मन सम्पूर्ण मन समाज को स्वतः चला रहा है और स्वयं का मन से किसको मित्र बनना है किसको शत्रु बनना है किसे प्रेम प्रसंग करना है ये सब इच्छा उत्पन्न करता है विश्व के सभी मनुष्यों के अंतर्मन को ज्ञात है की कौन कैसा है कौन दुष्ट सज्जन व सामान्य मनोस्थित वाला है इसलिए अत्याधिक चिंतन मनन करने पर स्वयं का अंतर्मन पूरी तरहां से जागृत हो जाता है जिसे ज्ञात हो जाता है की कौन मनुष्य की जिन्दगी कैसे घटित हो रही है होगी हुई थी इसके जन्म कैसे कैसे है इस जन्म में ज्ञान का स्तर इसका कैसा है ये कईयों से प्रेम प्रसंग वाला है की सिर्फ अपने जीवनसाथी से प्रेम करता है । मनुष्य का अवचेतन मन पृथ्वी से जुड़ा हुआ है इसलिए प्रकृति भी स्वतः मानवीय जीवन को संचालित करती है इसमें जीव जन्तु पशु पक्षी वनस्पति व सूक्ष्म जीव नदी पहाड़ बादल आदि है जैसे किसी को मृत्यु देना है तो जीव जन्तु सूक्ष्म जीव भी उस पर हमला कर देते है या आकाशीय बिजली गिर जाती है और किसी को नहीं मारना है तो समुद्र की लहरे भी उसे किराने छोड़ देते है कुछ स्त्री व पुरुष के मध्य प्रेम की शुरुआत बारिश होने पर होती है क्योंकि प्रकृति ही ने स्त्री व पुरुष का रूप लेकर जीवन आनंद ले रहा है ऐसे तो उस बारिश सम्पूर्ण मनुष्यों के कुछ ना कुछ कारण से होते है । सभी मनुष्यों के अंतर्मन को ज्ञात है जैसे दुष्टों के अंतर्मन को ज्ञात है कहा जाऐ दोषी को किसकी हत्या करना है किसका बलात्कार करना है किसको आर्थिक मानसिक शारीरिक व भवानात्म हानि पहुंचना है और उसी प्रकार पीड़ित व शोषण होने वाले के अंतर्मन को भी ज्ञात है की किसे मृत्यु प्राप्त करना है किसे बलात्कार होना है अन्य प्रकार के शोषण आते है फिर लोग का अंतर्मन विरोध दुख प्रगट करता है इसी प्रकार सज्जन को अंतर्मन को ज्ञात है की किस पर परोपकार दया करना है किसको दान दक्षिणा देना है ।

सभी मनुष्यों को अपना भविष्य ज्ञात रहता है जैसे वे जन्म लिये है तो मरेगे वे उम्र के अनुसार जिन्दगी जियेगे जैसे बचपन में खेलना किशोरावस्था में विपरीत लिंग की ओर आकर्षण युवावस्था में धन नाम कमाना पौढ़ व वृध्द अवस्था में परिवारिक देश दुनिया के सुख शांति के लिए जीकर मर जाऐगे या फिर किसी भी उम्र में मर सकते है वे अच्छे कर्म करेगे तो अच्छे परिवार व शांत स्थान में जन्म लेंगे वही स्वर्ग है बुरे कर्म करेगे तो बुरे परिवार अशांत स्थान में जन्म लेंगे वही नरक है सामान्य कर्म कर्म रहे तो सामान्य परिवार व स्थान में जन्म लेंगे इसे अपने पीछले जन्म का बौद्ध भी हो जाता है जो कई लोगो से प्रेम प्रसंग करता उसके जीवनसाथी बदलाते रहते है जो पतिव्रता रहती है उसका वही पति रहता है हर जन्म का जो आज दुखी है शरीर से परिवार से जन्म स्थान से वे उसके पीछले जन्म की कर्मो के फल है जो शरीर परिवार व जन्म स्थान से सुखी है वहां उसके पीछले जन्म के कर्मो का फल है ।

परन्तु वर्तमान जन्म में सुख शांति प्राप्त करने के लिए बुध्दिमान होकर विवेकशील होकर शारीरिक व मानसिक परिश्रम करना ही पड़ता है तभी मनुष्य अपने कर्तव्य उत्तरदायित्व व उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है जिसे मन शांत होगा जिसे जीवन सुखमय होगा अगर अपूर्ति होगी तो मन अशांत होगा जिसे जीवन दुखमय होगा ।

मन के प्रकार्य[संपादित करें]

मनोरोग चिकित्सा[संपादित करें]

चिकित्सा विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा जो कि मनोरोगों के उपचार, निदान एवं निवारण से संबंध रखती है।पर यह कार्य नही करती हर प्राणी पर |

मनोविज्ञान[संपादित करें]

विज्ञान की वह शाखा जिसमें मन की सामान्य क्रिया का अध्ययन किया जाता है। मनोवैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के लिए चिकित्सा का ज्ञान जरूरी नहीं है, इसलिए मनोवैज्ञानिक अक्सर केवल मनोरोगों की जांच-पड़ताल (न कि उपचार) में सहयोग देते हैं

मनोविश्लेषण[संपादित करें]

मनोरोगों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने की एक विधि जो कुछ प्रकार के मनोरोगों, जैसे हिस्टीरिया आदि के उपचार में भी सहायक होती है। इसके लिए मनोरोग चिकित्सा या मनोविज्ञान की जानकारी होनी चाहिए।

आध्यात्मिक[संपादित करें]

मन एक भूमि मानी जाती है, जिसमें संकल्प और विकल्प निरंतर उठते रहते हैं। विवेक शक्ति का प्रयोग कर के अच्छे और बुरे का अंतर किया जाता है। विवेकमार्ग अथवा ज्ञानमार्ग में मन का निरोध किया जाता है, इसकी पराकाष्ठा शून्य में होती है। भक्तिमार्ग में मन को परिणत किया जाता है, इसकी पराकाष्ठा भगवान के दर्शन में होती है।

जीवात्मा और इन्द्रियों के मध्य ज्ञान मन कहा जाता है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Dictionary.com, "mind": "1. (in a human or other conscious being) the element, part, substance, or process that reasons, thinks, feels, wills, perceives, judges, etc.: the processes of the human mind. 2. Psychology. the totality of conscious and unconscious mental processes and activities. 3. intellect or understanding, as distinguished from the faculties of feeling and willing; intelligence."
  2. Google definition, "mind": "The element of a person that enables them to be aware of the world and their experiences, to think, and to feel; the faculty of consciousness." [1]
  3. "Mind, in the Western tradition, the complex of faculties involved in perceiving, remembering, considering, evaluating, and deciding. Mind is in some sense reflected in such occurrences as sensations, perceptions, emotions, memory, desires, various types of reasoning, motives, choices, traits of personality, and the unconscious.""मन (Mind)" (अंग्रेज़ी में). ब्रिटानिका एन्साइक्लोपीडिया. अभिगमन तिथि 19 दिसम्बर 2014.;