ध्यान

ध्यान या अवधान (attention) चेतन मन की एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी चेतना बाह्य जगत् के किसी चुने हुए दायरे अथवा स्थलविशेष पर केंद्रित करता है। यह अंग्रेजी "अटेंशन" के पर्याय रूप में प्रचलित है। हिंदी में इसके साथ "देना", "हटाना", "रखना" आदि सकर्मक क्रियाओं का प्रयोग, इसमें व्यक्तिगत प्रयत्न की अनिवार्यता सिद्ध करता है। ध्यान द्वारा हम चुने हुए विषय की स्पष्टता एवं तद्रूपता सहित मानसिक धरातल पर लाते हैं।[1]
योगसम्मत ध्यान से इस सामान्य ध्यान में बड़ा अंतर है। पहला दीर्घकालिक अभ्यास की शक्ति के उपयोग द्वारा आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर प्रेरित होता है, जबकि दूसरे का लक्ष्य भौतिक होता है और साधारण दैनंदिनी शक्ति ही एतदर्थ काम आती है। संपूर्णानंद आदि कुछ भारतीय विद्वान् योगसम्मत ध्यान को सामान्य ध्यान की ही एक चरम विकसित अवस्था मानते हैं।
अवधान की परिभाषा
[संपादित करें](१) डमविल (Dumville) के अनुसार- किसी दूसरी वस्तु के बजाय एक ही वस्तु पर चेतना का केन्द्रीकरण अवधान है।
- (Attention is the concentration of consciousness upon one object rather than upon another.)
(२) रॉस (Ross) के अनुसार- “अवधान, विचार की किसी वस्तु को मस्तिष्क के सामने स्पष्ट रूप से उपस्थित करने की प्रक्रिया है।
- (Attention is a process of getting an object of thought clearly before the mind.)
(३) वेलेन्टाइन के अनुसार- “अवधान, मस्तिष्क की शक्ति न होकर सम्पूर्ण रूप से मस्तिष्क की क्रिया या अभिवृत्ति है।
- (Attention is not a faculty of the mind. It rather describes an attitude or activity of the mind.)
परिचय
[संपादित करें]किसी भी मनुष्य का सभी बाहरी कार्यों से विरक्त होकर किसी एक कार्य में लीन हो जाना ही ध्यान है। आशय यह है कि किसी एक कार्य में किसी का इतना लिप्त होना कि उसे समय,मौसम,एवं अनय शारीरिक जरूरतों का बोध न रहे इसे ही ध्यान कहते हैं।
ध्यान तीन प्रकार के स्वभावोंवाला होता है-
- (क) सहज (यथा धमाके की आवाज पर)
- (ख) बलात्- (यथा, नक्शे में ढूँढने की स्थिति में),
- (ग) अर्जित (यथा, ताजे अखबार के शीर्षकों में)।
ध्यान का एक फैलाव क्षेत्र (स्पैन) होता है। एक सीमित समय में कुछ गिनती की वस्तुओं में ही थोड़ी-थोड़ी देर पर ध्यान चक्कर काटता रहता है। उदाहरण के लिए, कमरे में दो तीन मित्र बातें करते हों तो उनके अलग अलग चेहरे, बात का विषय, कमरे की दीवाल या कैलेंडर, मेजपोश या पेपरवेट आदि ही कुछ वस्तुएँ हैं जो हमारे ध्यान के फैलाव क्षेत्र में उस समय हैं। कमरे का बाहरी वातावरण उस क्षेत्र से बाहर है।
सबसे पहले इस विषय पर लिखते हुए दार्शनिक लेखक वोल्फ (1754) ने ध्यान को विशिष्ट मानस गुण (मेंटल फैकल्टी) माना। विलियम जेम्स (1842-1910) ने इसकी प्रथम सुसंबद्ध वैज्ञानिक व्याख्या इसे "चेतनाप्रवाह" की गति का आयामविशेष मानते हुए की। रिब्बो (1839-1916) ने ध्यान को पूर्वानुप्रेरित क्रिया (ऐंटिसिपेटरी बिहेवियर) कहा। टिचनर (1867-1927) ने अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक स्पष्टता के साथ बताया कि ध्येय विषय चेतना द्वारा प्रसीमित क्षेत्र (फोकस) में आते हैं और अन्य वस्तुएँ इसके इर्द-गिर्द हाशिये (मार्जिन) पर होती हैं। यों ध्यान हमारी चेतना का लक्ष्य बिंदु बनाता है। हाशियों पर ध्यान क्रमश: निस्तेज होता हुआ विलुप्त होता रहता है।
कोफ्का, कोहलर तथा वर्थाइमर ने इस सदी के दूसरे दशक में मनोविज्ञान के गेस्टाल्ट संप्रदाय की स्थापना करके आंतरिक सूझबूझ तथा बिखरी वस्तुओं में सावयवताबोध को विशेष महत्व दिया (1912)। इनके अनुसार ध्यान की प्रक्रिया में पूरी वस्तु को अलग-अलग परिप्रेक्ष्य द्वारा बदले जाने पर उसकी अलग-अलग सावयवता दिखाई देती है। शतरंज की पाटी को देर तक देखें, तो कभी काले खाने एक वर्ग में होकर सफेद को पृष्ठभूमि बनाते हैं और कभी-कभी सफेद ही आगे आकर काले खानों को पीछे ढकेल देते हैं। तीन सीधी रेखाओं में बीच की एक सर्वाधिक बड़ी रेखा पूरे चित्र में ही कार्निस की शक्ल में आगे की ओर निकले होने का बोध देती है। मुड़े हुए आयताकार वस्तु का ज्यामितिक चित्र हमारे ध्यान को उसके भीतर एवं बाहर की ओर मुड़े होने का बारी बारी से बोध कराता है। यों हमारे ध्यानाकर्षण की क्रिया में भी चेतना का प्रक्षेपण होता है।
कैटेल निर्मित टैचिस्टोकोप में विभिन्न संख्या में छपे स्पष्ट बिंदुओं के कार्ड थोड़ी देर में उजागर कर छिपा लिए जाते हैं और देखनेवालों से ठीक संख्या पूछी जाती है। न्यूनतम संख्या ध्यान के लिए अधिक स्पष्ट सिद्ध होती हैं क्योंकि 4 की संख्या ऐसी थी जिसे शत प्रतिशत लोगों ने ठीक बताया। अददों का कम होना ध्यान की स्पष्टता की एक शर्त है।
ध्यान के संबंध में बहुत सी प्रायोगिक परीक्षाएँ भी हुई हैं- जेवंस तथा हैमिल्टन द्वारा ध्येय और ध्येता के बीच की दूरी (रेंज ऑव एटेंशन) का माप, विटेनबोर्न द्वारा फैक्टर विश्लेषण की आँकड़ा शास्त्रीय पद्धति पर विशेष परिस्थित क्रम में अंकों के समानुवर्तन के साथ ध्यान प्रक्रिया की सहमति; मौर्गन तथा फोर्ड द्वारा आकस्मिक हरकतों, दोलनों अथवा चेष्टाओं से ध्यान का संबंधनिरूपण और इसी प्रकार वस्तुओं के नए एवं पुराने; तीव्र और मंद आदि गुणों में प्रथम से ही ध्यान का सांप्रतिक संबंध; ध्यान में मांसपेशियों के सापेक्ष आकुंचन की मात्रा आदि। ध्यानराहित्य (इनैटेंशन) तथा अन्यमनस्कता ध्यान के अभाव नहीं हैं बल्कि ये ध्यान के अपेक्षित वस्तु पर न लगाकर उसके कहीं और लगे होने के सूचक हैं। हैमिल्टन ने अमूर्त विचार या चिंतन (एब्सट्रैक्शन) को ध्यान का ही पूरक किंतु एक प्रकार का निषेधात्मक पक्ष माना है।
ध्यान जीवन है इस का समय के साथ कोई संबध नही होता है ये समय से परे है और यही जीवन है ध्यान का मतलब है अपने में स्थिर होना और अपनी चेतना के साथ जीना जो समय से परे है असल में समय का बोध न होना ही ध्यान है
अवधान की विशेषताएँ
[संपादित करें](१) मानसिक सक्रियता (Conation)- किसी बात पर ध्यान देने के लिए मानसिक सक्रियता जरूरी है। जब हम गुलाब के फूल पर ध्यान देते हैं तो हमारा दिमाग उसकी विशेषताओं की ओर आकर्षित हो जाता है और सक्रिय हो जाता है। ध्यान मानसिक क्रिया का एक रूप है।
(२) चंचलता/गतिशीलता (Mobility)- ध्यान की स्थिरता नगण्य है. यह बहुत चंचल है. यह किसी भी वस्तु पर 10-12 सेकंड से ज्यादा नहीं रह सकता। इसी चंचलता के कारण ही व्यक्ति सदैव नई-नई चीजों की खोज में रुचि लेता है।
(३) चयनात्मकता – जिस वस्तु के प्रति हमारी रुचि अधिक होगी, ध्यान का झुकाव भी वहीं अधिक होगा तथा ध्यान की स्थिरता अन्य वस्तुओं की अपेक्षा उस वस्तु पर अधिक होगी। दिलचस्प चीजों पर हमारा ध्यान
(४) संकीर्णता (Narrowness)- ध्यान का दायरा बहुत संकीर्ण है। हम एक ही समय में कई चीज़ों पर ध्यान नहीं दे सकते क्योंकि ध्यान चयनात्मक और संकीर्ण होता है। यह दिलचस्प वस्तुओं की ओर जल्दी आकर्षित हो जाता है।
(५) उद्देश्यपूर्णता (Purposiveness)- जब हम किसी सुन्दर वस्तु को देखते हैं तो हमारा ध्यान आकर्षित हो जाता है। क्योंकि हमें सुंदरता का एक आकर्षक एहसास हुआ और इसलिए हमारा ध्यान उधर चला गया। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ध्यान किसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाता है। उद्देश्य प्राप्ति की संभावना जितनी अधिक होगी, ध्यान की स्थिरता भी उतनी ही अधिक होगी।
(६) तत्परता (Readiness)- वुडवर्थ के शब्दों में, “प्रारंभिक तत्परता या तैयारी ध्यान में एक आवश्यक प्रतिक्रिया है। यानी व्यक्ति को किसी वस्तु पर ध्यान देने के लिए तैयार रहना होगा।
(७) गतियों का समायोजन (मोटर समायोजन) – किसी विशेष वस्तु पर ध्यान देते समय समायोजन आवश्यक है। उदाहरण के लिए, देखने के लिए आंखों की गतिविधियों को दृश्यों के अनुरूप समायोजित किया जाता है।
(८) सक्रिय केंद्र- जिन चीज़ों पर हम ध्यान देते हैं वे हमारे दिमाग में सक्रिय रूप से स्पष्ट हो जाती हैं। इसके विपरीत जिन चीजों पर हम ध्यान नहीं देते, उनका हमारे दिमाग पर कोई असर नहीं होता।
(९) खोजपूर्ण, विश्लेषणात्मक और सिंथेटिक दृष्टिकोण – वुडवर्थ के शब्दों में, “ध्यान चंचल है क्योंकि यह खोजपूर्ण है, यह जांच के लिए लगातार कुछ नया खोजता है। हमारा ध्यान अक्सर नई वस्तुओं की ओर निर्देशित होता है। जब कोई व्यक्ति कोई नई चीज़ पाता है , वह इसकी संरचना और स्वरूप का विश्लेषण और संश्लेषण करना शुरू कर देता है। यही मानवीय प्रवृत्ति है।
(१०) अवधान की अवस्थायें (Stages of Attention)- इसकी दो अवस्थायें होती हैं- भावात्मक अवस्था तथा अभावात्मक अवस्था।
जब हमारा अवधान एक पहलू की ओर जाता है तो दूसरे पहलू की ओर से अवधान स्वतः ही हट जाता है। पहली अवस्था भावात्मक तथा दूसरी अवस्था अभावात्मक अवस्था कहलाती है।
अवधान के प्रकार
[संपादित करें]मनोवैज्ञानिक जे. एस. रॉस ने अवधान को निम्न प्रकार वर्गीकृत किया है-
(1) ऐच्छिक अवधान (Volitional Attention)- ऐच्छिक अवधान अर्जित अभिरुचि या रुचि पर आधारित होता है। यह दो प्रकार का होता है-
- अविचारित अवधान (Implicit Attention)- यह अवधान ऐसा होता है जिसमें व्यक्ति को अपनी चेतना केन्द्रित करने के लिये किसी सोच-विचार की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- विचारित अवधान (Explicit Attention)- यह उस प्रकार का अवधान है जिसमें चेतना को किसी वस्तु पर खूब सोच-विचारकर केन्द्रित किया जाता है।
(2) अनैच्छिक अवधान (Non-Volitional Attention)- जब व्यक्ति बिना किसी इच्छा के ही किसी वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो उसे अनैच्छिक अवधान कहा जाता है। यह अग्र दो प्रकार का होता है-
- सहज अवधान (Spontaneous Attention)- इस तरह के अवधान मूल प्रवृत्तियों की प्रेरणा से किसी वस्तु पर स्वाभाविक रूप से केन्द्रित हो जाते हैं।
- बाध्य अवधान (Enforced Attention)- जब हम किसी कारण से बाध्य होकर किसी वस्तु पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं तो वह बाध्य अवधान कहलाता है। यह अवधान किसी उद्दीपन के कारण होता है
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ "ध्यान की परिभाषा". Hindi webdunia. मूल से से 19 जुलाई 2019 को पुरालेखित।.
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