धर्म

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धर्मचक्र (गुमेत संग्रहालय, पेरिस)

धर्म का अर्थ होता है, धारण, अर्थात जिसे धारण किया जा सके, धर्म ,कर्म प्रधान है, गुणों को जो प्रदर्शित करे वह धर्म है, धर्म को गुण भी कह सकते है,

( पालि : धम्म ) भारतीय संस्कृति और दर्शन की प्रमुख संकल्पना है। 'धर्म' शब्द का पश्चिमी भाषाओं में कोई तुल्य शब्द पाना बहुत कठिन है। साधारण शब्दों में धर्म के बहुत से अर्थ हैं जिनमें से कुछ ये हैं- कर्तव्य, अहिंसा, न्याय, सदाचरण, सद्गुण आदि।

हिन्दू धर्म[संपादित करें]

सनातन धर्म में चार पुरुषार्थ स्वीकार किए गये हैं जिनमें धर्म प्रमुख है। तीन अन्य पुरुषार्थ ये हैं- अर्थ, काम और मोक्ष।

गौतम ऋषि कहते हैं - 'यतो अभ्युदयनिश्रेयस सिद्धिः स धर्म।' (जिस काम के करने से अभ्युदय और निश्रेयस की सिद्धि हो वह धर्म है। )

मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं:

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम् ॥
(धृति (धैर्य), क्षमा (दूसरों के द्वारा किये गये अपराध को माफ कर देना, क्षमाशील होना), दम (अपनी वासनाओं पर नियन्त्रण करना), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (अन्तरङ्ग और बाह्य शुचिता), इन्द्रिय निग्रहः (इन्द्रियों को वश मे रखना), धी (बुद्धिमत्ता का प्रयोग), विद्या (अधिक से अधिक ज्ञान की पिपासा), सत्य (मन वचन कर्म से सत्य का पालन) और अक्रोध (क्रोध न करना) ; ये दस धर्म के लक्षण हैं।)

जो अपने अनुकूल न हो वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैव अनुवर्त्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचरेत् ॥
(धर्म का सर्वस्व क्या है, सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।)

हिन्दू धर्म (संस्कृत : सनातन धर्म) विश्व के सभी बड़े धर्मों में सबसे पुराना धर्म है। ये वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, मत, सम्प्रदाय और दर्शन समेटे हुए हैं। ये दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा धर्म है, पर इसके ज़्यादातर उपासक भारत में हैं और विश्व का सबसे ज्यादा हिन्दुओं का प्रतिशत नेपाल में है। हालाँकि इसमें कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन असल में ये एकेश्वरवादी धर्म है।

हिन्दी में इस धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं। इंडोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है। हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नहीं है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है " हिन्सायाम दूयते या सा हिन्दु " अर्थात जो अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दु है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है।

वात्स्यायन के अनुसार धर्म[संपादित करें]

वात्स्यायन ने धर्म और अधर्म की तुलना करके धर्म को स्पष्ट किया है। वात्स्यायन मानते हैं कि धर्म केवल क्रियों या कर्मों से सम्बन्धित नहीं है बल्कि धर्म चिन्तन में भी होता है, वाणी में भी होता है।[1]

  • शरीर का अधर्म : हिंसा, अस्तेय, प्रतिसिद्ध मैथुन
  • शरीर का धर्म : दान, परित्राण, परिचरण (दूसरों की सेवा करना)
  • बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा अधर्म : मिथ्या, परुष, सूचना, असम्बन्ध
  • बोले और लिखे गये शब्दों द्वारा धर्म : सत्व, हितवचन, प्रियवचन, स्वाध्याय (self study)
  • मन का अधर्म : परद्रोह, परद्रव्याभिप्सा (दूसरे का द्रव्य पा लेने की इच्छ), नास्तिक्य (denial of the existence of morals and religiosity)
  • मन का धर्म : दया, स्पृहा (disinterestedness), और श्रद्धा

जैन धर्म[संपादित करें]

जैन मंदिर में अंकित: अहिंसा परमॊ धर्मः

जैन ग्रंथ, तत्त्वार्थ सूत्र में १० धर्मों का वर्णन है। यह १० धर्म है:[2]

  • उत्तम क्षमा
  • उत्तम मार्दव
  • उत्तम आर्जव
  • उत्तम शौच
  • उत्तम सत्य
  • उत्तम संयम
  • उत्तम तप
  • उत्तम त्याग
  • उत्तम आकिंचन्य
  • उत्तम ब्रह्मचर्य

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Klaus Klostermaier, A survey of Hinduism,, SUNY Press, ISBN 0-88706-807-3, Chapter 3: Hindu dharma
  2. जैन २०११, पृ॰ १२८.

सन्दर्भ सूची[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]