ब्रह्मा

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हंसासन में भगवान ब्रह्मा।
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ब्रह्मा (संस्कृत: ब्रह्मा) हिन्दू या सनातन धर्म के अनुसार सृजन के देव हैं।[1] हिन्दू दर्शनशास्त्रों में ३ प्रमुख देव बताये गये है जिसमें ब्रह्मा सृष्टि के सर्जक, विष्णु पालक और महेश विलय करने वाले देवता हैं।[2] व्यासलिखित पुराणों में ब्रह्मा का वर्णन किया गया है कि उनके चार मुख हैं, जो चार दिशाओं में देखते हैं।[3] ब्रह्मा को स्वयंभू (स्वयं जन्म लेने वाला)[4] और चार वेदों का निर्माता भी कहा जाता है।[3][5] हिन्दू मिथक के अनुसार हर वेद ब्रह्मा के एक मुँह से निकला था।[3][5] ज्ञान, विद्या, कला और संगीत की देवी सरस्वती ब्रह्मा की पत्नी हैं।[6] बहुत से पुराणों में ब्रह्मा की रचनात्मक गतिविधि उनसे बड़े किसी देव की मौजूदगी और शक्ति पर निर्भर करती है।[7]

ये हिन्दू दर्शनशास्त्र की परम सत्य की आध्यात्मिक संकल्पना ब्रह्मन् से अलग हैं।[8][9] ब्रह्मन् लिंगहीन हैं परन्तु ब्रह्मा पुलिंग हैं।[8][9] प्राचीन ग्रंथों में इनका सम्मान किया जाता है पर इनकी पूजा बहुत कम होती है।[10][11] भारत और थाईलैण्ड में इन पर समर्पित मंदिर हैं। राजस्थान के पुष्कर का ब्रह्मा मंदिर[12] [13][14] और बैंकॉक का इरावन मंदिर (अंग्रेज़ी: Erawan Shrine)[15][16] इसके उदाहरण हैं।

व्युत्पत्ति[संपादित करें]

कर्नाटक के सोमनाथपुरा में १२ वीं शताब्दी के चेनाकेस्वा मंदिर में ब्रह्मा की मूर्ति।

ब्रह्मा की उत्पत्ति के विषय पर वर्णन किया गया है। ब्रह्मा की उत्पत्ति विष्नु की नाभी से निकले कमल में स्वयंभु हुइ थी। इसने चारो और देखा जिनकी वजह से उनके चार मुख हो गये। [17] भारतीय दर्शनशास्त्रो में निर्गुण, निराकार और सर्वव्यापी माने जाने वाली चेतन शक्ति के लिए ब्रह्म शब्द प्रयोग किया गया है। [18][19]इन्हे परब्रह्म या परम तत्व भी कहा गया है। पूजापाठ करने वालो के लिए ब्राह्मण शब्द प्रयोग किया गया है।

इतिहास[संपादित करें]

वैदिक साहित्य[संपादित करें]

विष्णु और शिव के साथ ब्रह्मा के सबसे पुराने उल्लेखों में से एक पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व में लिखित मैत्रायणी उपनिषद् के पांचवे पाठ में है। ब्रह्मा का उल्लेख पहले कुत्सायना स्तोत्र कहलाए जाने वाले छंद ५.१ में है। फिर छंद ५.२ इसकी व्याख्या करता है।[20][21]

सर्वेश्वरवादी कुत्सायना स्तोत्र कहता है[20] कि हमारी आत्मा ब्रह्मन् है और यह परम सत्य या ईश्वर सभी प्राणियों के भीतर मौजूद है। यह आत्मा का ब्रह्मा और उनकी अन्य अभिव्यक्तियों के साथ इस प्रकार समीकरण करता है: तुम ही ब्रह्मा हो, तुम ही विष्णु हो, तुम ही रूद्र (शिव) हो, तुम ही अग्नि, वरुण, वायु, इंद्र हो, तुम सब हो।[20][22]

छंद ५.२ में विष्णु और शिव की तुलना गुण की संकल्पना से की गई है। यह कहता है कि ग्रन्थ में वर्णित गुण, मानस और जन्मजात प्रवृत्तियाँ सभी प्राणियों में होती हैं।[22][23] मैत्री उपनिषद का यह अध्याय दावा करता है कि ब्रह्माण्ड अंधकार (तपस) से उभरा है। जो पहले आवेग (रजस) के रूप में उभरा था पर बाद में पवित्रता और अच्छाई (सत्त्व) में बदल गया।[20][22] फिर यह ब्रह्मा की तुलना रजस से इस प्रकार करता है:[24]

फिर उसका वो भाग जो तमस है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों (ब्रह्मचारी), रूद्र है।
उसका वो भाग जो रजस है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों, ब्रह्मा है।
उसका वो भाग जो सत्त्व है, हे पवित्र ज्ञान के विद्यार्थियों, विष्णु है।
वास्तव में वो एक था, वो तीन बन गया, आठ, ग्यारह, बारह और असंख्य बन गया।
यह सबके भीतर आ गया, वो सबका अधिपति बन गया।
यही आत्मा है, भीतर और बाहर, हाँ भीतर और बाहर।

—मैत्री उपनिषद ५.२[20][22]

हालाँकि मैत्री उपनिषद ब्रह्मा की तुलना हिन्दू धर्म के गुण सिद्धांत के एक तत्व से करता है, पर यह उन्हें त्रिमूर्ति का भाग नहीं बताता है। त्रिमूर्ति का उल्लेख बाद के पुराणिक साहित्य में मिलता है।[25]

पौराणिक साहित्य[संपादित करें]

भागवत पुराण में कई बार कहा गया है कि ब्रह्मा वह है जो "कारणों के सागर" से उभरता है।.[26] यह पुराण कहता है कि जिस क्षण समय और ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ था, उसी क्षण ब्रह्मा हरि (विष्णु, जिनकी प्रशंसा भागवत पुराण का मुख्य उद्देश्य है) की नाभि से निकले एक कमल के पुष्प से उभरे थे। यह पुराण कहता है कि ब्रह्मा निद्रा में हैं, गलती करते हैं और वे ब्रह्माण्ड की रचना के समय अस्थायी रूप से अक्षम थे।[26] जब वे अपनी भ्रान्ति और निद्रा से अवगत हुए तो उन्होंने एक तपस्वी की तरह तपस्या की, हरि को अपने हृदय में अपना लिया, फिर उन्हें ब्रह्माण्ड के आरंभ और अंत का ज्ञान हो गया, और फिर उनकी रचनात्मक शक्तियां पुनर्जीवित हो गईं। भागवत पुराण कहता है कि इसके बाद उन्होंने प्रकृति और पुरुष: को जोड़ कर चकाचौंध कर देने वाली प्राणियों की विविधता बनाई।[26]

भागवत पुराण माया के सृजन को भी ब्रह्मा का काम बताता है। इसका सृजन उन्होंने केवल सृजन करने की खातिर किया। माया से सब कुछ अच्छाई और बुराई, पदार्थ और आध्यात्म, आरंभ और अंत से रंग गया।[27]

पुराण समय बनाने वाले देवता के रूप में ब्रह्मा का वर्णन करते हैं। वे मानव समय की ब्रह्मा के समय के साथ तुलना करते हैं। वे कहते हैं कि महाकल्प (जो कि एक बहुत बड़ी ब्रह्मांडीय अवधि है) ब्रह्मा के एक दिन और एक रात के बराबर है।[28]

ब्रह्मा के बारे में विभिन्न पुराणों की कथाएँ विविध और विसंगत हैं। उदाहरण के लिए स्कन्द पुराण में पार्वती को "ब्रह्माण्ड की जननी" कहा गया है। यह ब्रह्मा, देवताओं और तीनों लोकों को बनाने का श्रेय भी पार्वती को देता है। यह कहता है कि पार्वती ने तीनों गुणों (सत्त्व, रजस और तपस) को पदार्थ (प्रकृति) में जोड़ कर ब्रह्माण्ड की रचना की।[29]

पौराणिक और तांत्रिक साहित्य ब्रह्मा के रजस गुण वाले देव के वैदिक विचार को आगे बढ़ाता है। यह कहता है कि उनकी पत्नी सरस्वती में सत्त्व (संतुलन, सामंजस्य, अच्‍छाई, पवित्रता, समग्रता, रचनात्मकता, सकारात्मकता, शांतिपूर्णता, नेकता गुण) है। इस प्रकार वे ब्रह्मा के रजस (उत्साह, सक्रियता, न अच्छाई न बुराई पर कभी-कभी दोनों में से कोई एक, कर्मप्रधानता, व्यक्तिवाद, प्रेरित, गतिशीलता गुण) को अनुपूरण करती हैं।[30][31][32]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. http://hindi.webdunia.com/sanatan-dharma-mahapurush/%E0%A4%AD%E0%A4%97%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B9%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%BE-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%9A%E0%A4%AF-112040700120_1.htm
  2. http://hindi.dadabhagwan.org/vaignanik-hal/adhyatmik-vignan/bhagwan-ki-pehchan/brahma,-vishnu,-mahesh/
  3. Bruce Sullivan (1999), Seer of the Fifth Veda: Kr̥ṣṇa Dvaipāyana Vyāsa in the Mahābhārata, Motilal Banarsidass, ISBN 978-8120816763, pages 85-86
  4. Alf Hiltebeitel (1999), Rethinking India's Oral and Classical Epics, University of Chicago Press, ISBN 978-0226340517, page 292
  5. Barbara Holdrege (2012), Veda and Torah: Transcending the Textuality of Scripture, State University of New York Press, ISBN 978-1438406954, pages 88-89
  6. http://bhajan-bhakti.in/hindu-temples-mandir/hindu-devotional/hindu-devi-devta-main/515-brahma-hindi
  7. Frazier, Jessica (2011). The Continuum companion to Hindu studies. London: Continuum. pp. 72. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8264-9966-0. 
  8. James Lochtefeld, Brahman, The Illustrated Encyclopedia of Hinduism, Vol. 1: A–M, Rosen Publishing. ISBN 978-0823931798, page 122
  9. PT Raju (2006), Idealistic Thought of India, Routledge, ISBN 978-1406732627, page 426 and Conclusion chapter part XII
  10. http://m.khabar.ibnlive.com/news/dharm-karm/41963.html
  11. Brian Morris (2005), Religion and Anthropology: A Critical Introduction, Cambridge University Press, ISBN 978-0521852418, page 123
  12. http://aajtak.intoday.in/story/story-of-pushkar-about-brahma-and-savitri-1-750836.html
  13. http://www.shreebrahmajimandir.com/brahma_mandir_history.html
  14. SS Charkravarti (2001), Hinduism, a Way of Life, Motilal Banarsidass, ISBN 978-8120808997, page 15
  15. http://www.bangkok.com/shrines/erawan-shrine.htm
  16. Ellen London (2008), Thailand Condensed: 2,000 Years of History & Culture, Marshall Cavendish, ISBN 978-9812615206, page 74
  17. हेमाद्री संकल्प, खंड-१
  18. http://vishwahindusamaj.com/tatva2.htm
  19. http://www.shriprannathgyanpeeth.org/personality_of_lord_hi.htm
  20. Hume, Robert Ernest (1921), The Thirteen Principal Upanishads, Oxford University Press, प॰ 422–424 
  21. Maitri Upanishad - Sanskrit Text with English Translation EB Cowell (Translator), Cambridge University, Bibliotheca Indica, page 255-256
  22. Max Muller, The Upanishads, Part 2, Maitrayana-Brahmana Upanishad, Oxford University Press, pages 303-304
  23. Jan Gonda (1968), The Hindu Trinity, Anthropos, Vol. 63, pages 215-219
  24. Paul Deussen, Sixty Upanishads of the Veda, Volume 1, Motilal Banarsidass, ISBN 978-8120814684, pages 344-346
  25. GM Bailey (1979), Trifunctional Elements in the Mythology of the Hindu Trimūrti, Numen, Vol. 26, Fasc. 2, pages 152-163
  26. Richard Anderson (1967), Hindu Myths in Mallarmé: Un Coup de Dés, Comparative Literature, Vol. 19, No. 1, pages 28-35
  27. Richard Anderson (1967), Hindu Myths in Mallarmé: Un Coup de Dés, Comparative Literature, Vol. 19, No. 1, page 31-33
  28. Frazier, Jessica (2011). The Continuum companion to Hindu studies. London: Continuum. pp. 72. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 978-0-8264-9966-0. 
  29. Nicholas Gier (1997), The Yogi and the Goddess, International Journal of Hindu Studies, Vol. 1, No. 2, pages 279-280
  30. H Woodward (1989), The Lakṣmaṇa Temple, Khajuraho and Its Meanings, Ars Orientalis, Vol. 19, pages 30-34
  31. Alban Widgery (1930), The principles of Hindu Ethics, International Journal of Ethics, Vol. 40, No. 2, pages 234-237
  32. Joseph Alter (2004), Yoga in modern India, Princeton University Press, page 55

श्याम विवर की गहराईयो मे जाने से पहले भौतिकी और सापेक्षता वाद के कुछ मूलभूत सिद्धांतो की चर्चा कर ली जाये ! त्री-आयामी

त्री-आयामी काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा

सामान्यतः अंतराल को तीन अक्ष में मापा जाता है। सरल शब्दों में लंबाई, चौड़ाई और गहराई, गणितिय शब्दों में x अक्ष, y अक्ष और z अक्ष। यदि इसमें एक अक्ष समय को चौथे अक्ष के रूप में जोड़ दे तब यह काल-अंतराल का गंणितिय माँडल बन जाता है।

त्री-आयामी भौतिकी में काल-अंतराल का अर्थ है काल और अंतराल संयुक्त गणितिय माडल। काल और अंतराल को एक साथ लेकर भौतिकी के अनेकों गूढ़ रहस्यों को समझाया जा सका है जिसमे भौतिक ब्रह्मांड विज्ञान तथा क्वांटम भौतिकी शामिल है।

सामान्य यांत्रिकी में काल-अंतराल की बजाय अंतराल का प्रयोग किया जाता रहा है, क्योंकि काल अंतराल के तीन अक्ष में यांत्रिकी गति से स्वतंत्र है। लेकिन सापेक्षता वाद के सिद्धांत के अनुसार काल को अंतराल के तीन अक्ष से अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि , काल किसी पिंड की प्रकाश गति के सापेक्ष गति पर निर्भर करता है।

काल-अंतराल की अवधारणा ने बहुआयामी सिद्धांतो(higher-dimensional theories) की अवधारणा को जन्म दिया है। ब्रह्मांड के समझने के लिये कितने आयामों की आवश्यकता होगी यह एक यक्ष प्रश्न है। स्ट्रींग सिद्धांत जहां 10 से 26 आयामों का अनुमान करता है वही M सिद्धांत 11 आयामों(10 आकाशीय(spatial) और 1 कल्पित(temporal)) का अनुमान लगाता है। लेकिन 4 से ज्यादा आयामों का असर केवल परमाणु के स्तर पर ही होगा। काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा का इतिहास

काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा आईंस्टाईन के 1905 के विशेष सापेक्षता वाद के सिद्धांत के फलस्वरूप आयी है। 1908 में आईंस्टाईन के एक शिक्षक गणितज्ञ हर्मन मिण्कोवस्की आईंस्टाईन के कार्य को विस्तृत करते हुये काल-अंतराल(Space-Time) की अवधारणा को जन्म दिया था। ‘मिंकोवस्की अंतराल’ की धारणा यह काल और अंतराल को एकीकृत संपूर्ण विशेष सापेक्षता वाद के दो मूलभूत आयाम के रूप में देखे जाने का प्रथम प्रयास था।’मिंकोवस्की अंतराल’ की धारणा यह विशेष सापेक्षता वाद को ज्यामितीय दृष्टि से देखे जाने की ओर एक कदम था, सामान्य सापेक्षता वाद में काल अंतराल का ज्यामितीय दृष्टिकोण काफी महत्वपूर्ण है। मूलभूत सिद्धांत

काल अंतराल वह स्थान है जहां हर भौतिकी घटना होती है : उदाहरण के लिये ग्रह का सूर्य की परिक्रमा एक विशेष प्रकार के काल अंतराल में होती है या किसी घूर्णन करते तारे से प्रकाश का उत्सर्जन किसी अन्य काल-अंतराल में होना समझा जा सकता है। काल-अंतराल के मूलभूत तत्व घटनायें (Events) है। किसी दिये गये काल-अंतराल में कोई घटना(Event), एक विशेष समय पर एक विशेष स्थिति है। इन घटनाओ के उदाहरण किसी तारे का विस्फोट या ड्रम वाद्ययंत्र पर किया गया कोई प्रहार है। पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष

पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष

काल-अंतराल यह किसी निरीक्षक के सापेक्ष नहीं होता। लेकिन भौतिकी प्रक्रिया को समझने के लिये निरीक्षक कोई विशेष आयामों का प्रयोग करता है। किसी आयामी व्यवस्था में किसी घटना को चार पूर्ण अंकों(x,y,z,t) से निर्देशित किया जाता है। प्रकाश किरण यह प्रकाश कण की गति का पथ प्रदर्शित करती है या दूसरे शब्दों में प्रकाश किरण यह काल-अंतराल में होनेवाली घटना है और प्रकाश कण का इतिहास प्रदर्शित करती है। प्रकाश किरण को प्रकाश कण की विश्व रेखा कहा जा सकता है। अंतराल में पृथ्वी की कक्षा दीर्घ वृत्त(Ellpise) के जैसी है लेकिन काल-अंतराल में पृथ्वी की विश्व रेखा हेलि़क्स के जैसी है।

पृथ्वी की कक्षा- काल अंतराल के सापेक्ष सरल शब्दों में यदि हम x,y,z इन तीन आयामों के प्रयोग से किसी भी पिंड की स्थिती प्रदर्शित कर सकते है। एक ही प्रतल में दो आयाम x,y से भी हम किसी पिंड की स्थिती प्रदर्शित हो सकती है। एक प्रतल में x,y के प्रयोग से, पृथ्वी की कक्षा एक दीर्घ वृत्त के जैसे प्रतीत होती है। अब यदि किसी समय विशेष पर पृथ्वी की स्थिती प्रदर्शित करना हो तो हमें समय t आयाम x,y के लंब प्रदर्शित करना होगा। इस तरह से पृथ्वी की कक्षा एक हेलिक्स या किसी स्प्रींग के जैसे प्रतीत होगी। सरलता के लिये हमे z आयाम जो गहरायी प्रदर्शित करता है छोड़ दिया है।

काल और समय के एकीकरण में दूरी को समय की इकाई में प्रदर्शित किया जाता है, दूरी को प्रकाश गति से विभाजित कर समय प्राप्त किया जाता है। काल-अंतराल अन्तर(Space-time intervals)

काल-अंतराल यह दूरी की एक नयी संकल्पना को जन्म देता है। सामान्य अंतराल में दूरी हमेशा धनात्मक होनी चाहिये लेकिन काल अंतराल में किसी दो घटना(Events) के बीच की दूरी(भौतिकी में अंतर(Interval)) वास्तविक , शून्य या काल्पनिक(imaginary) हो सकती है। ‘काल-अंतराल-अन्तर’ एक नयी दूरी को परिभाषित करता है जिसे हम कार्टेशियन निर्देशांको मे x,y,z,t मे व्यक्त करते है।

s2=r2-c2t2

s=काल-अंतराल-अंतर(Space Time Interval) c=प्रकाश गति

r2=x2+y2+z2

काल-अंतराल में किसी घटना युग्म (pair of event) को तीन अलग अलग प्रकार में विभाजित किया जा सकता है

   1.समय के जैसे(Time Like)- दोनो घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरत से ज्यादा समय व्यतित होना; s2 <0)
   2.प्रकाश के जैसे(Light Like)-(दोनों घटनाओ के मध्य अंतराल और समय समान है;s2=0)
   3.अंतराल के जैसे (दोनों घटनाओ के मध्य किसी प्रतिक्रिया के लिये जरूरी समय से कम समय का गुजरना; s2>0) घटनाये जिनका काल-अंतराल-अंतर ऋणात्मक है, एक दूसरे के भूतकाल और भविष्य में है।
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समय (Time) एक वास्तविक घटना हैं जिसकी वजह से हमेशा परिवर्तन की प्रक्रिया चलती रहती हैं। समय गति की वजह से ही स्पष्ट होता हैं। रात-दिन, बदलते मौसम, खगोलीय पिंडों की आवाजाही यह सभी निरंतर परिवर्तन के सूचक हैं। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी समय का ही एक हिस्सा हैं। हमारे मन में समय के बारे में ज्यादातर यही सवाल उठते हैं की आखिर यह समय हैं क्या ? What Is Time? क्यों यह हमेशा चलता ही रहता हैं ? Is Time Real? इसकी शुरुआत कैसे हुई (When Did Time Begin)? क्या इसका कोई अंत होगा (End of Time) ?

समय का एक महत्वपूर्ण पहलू हैं परमाणु स्तर पर अणुओं की गति की उपस्थिति। जैसे की फोटॉन्स की परमाणु स्तर पर गतिविधि। ब्रह्माण्ड की किसी भी चीज या ताकत में समय की उपस्थिति तो होती ही हैं। ज्यादातर हम समय को तिन रूपों से जानते हैं : भूतकाल,वर्तमान और भविष्य।

समय की सबसे अधिक वास्तविकता हम अभी के समय में देखते हैं। जिसे हम वर्तमान भी कहते हैं। लेकिन हम वर्तमान में कोई चीज़ देखने या अनुभव करने से पहले ही वह भूतकाल हो जाती हैं। वर्तमान एक छोटा सा पल हैं जो हर जगह हो रहा हैं। वह भूतकाल से लेकर भविष्य की समयरेखा पर एक छोटे से बिंदु के समान हैं। जो भूतकाल से आगे बढ़कर भविष्य की तरफ बढ़ता चला जा रहा हैं। हमारे दिमाग में वर्तमान की स्मृतियां भूतकाल के स्वरुप में स्टोर होती जाती हैं। लेकिन इसके लिए हमारा पूरी तरह से जागृत अवस्था में होना अनिवार्य हैं।

वर्तमान को छोड़ कर हम भूतकाल और भविष्य को माप सकते हैं। जैसे की कोई एतिहासिक घटना या कोई शादी के फंक्शन को आप किसी रिकॉर्डिंग यन्त्र से संग्रह कर सकते हैं। इस तरह भविष्य एक बिना रिकॉर्ड की गयी टेप की तरह हैं और भूतकाल रिकॉर्ड की हुई टेप हैं। भविष्य हमारे दिमाग में संग्रहित भूतकाल के अनुभवों की वजह से बनी हुई छबि की तरह प्रतीत होता हैं।

लेकिन केवल गति से समय को समजना पर्याप्त नहीं हैं। बल भी समय का हिस्सा बनते हैं। समय को एक तीर के रूप में समजाया जा सकता हैं अगर हम समय को बलों और गति की उपस्थिति के रूप में सोचे। समय की अनुभूति भूतकाल,वर्तमान और भविष्य के रूप में हमारे लिए एक भ्रम पैदा करती हैं। समय का सटीक अनुभव हमें तब तक नहीं हो सकता जब तक उसे भूतकाल या भविष्य से मापा न जाए। समय एक BLOCK UNIVERSE के रूप में आल्बर्ट आइनस्टाइन कहते थे की “हमारे जैसे लोग जो भौतिकी में विश्वास करते हैं उनके लिए वर्तमान,भूतकाल और भविष्य सिर्फ एक भ्रम हैं।” block universe में वर्तमान,भूतकाल और भविष्य एकसाथ अलग अलग आयामो में पहले से मौजूद हैं।

इस हिसाब से अगर समय को सोंचे तो डायनोसोर अभी जिन्दा हैं और भविष्य में पृथ्वी का सर्वनाश भी हो गया हैं। यह द्रश्य समय के चौथे आयाम में स्थित हैं जो आल्बर्ट आइनस्टाइन की General Relativity (GR) पर आधारित हैं। block universe के हिसाब मैं भूतकाल और भविष्य पहले से ही वहाँ पर मौजूद हैं। यहाँ तक की समय की छोटी सी अवधि में block universe की सभी चीजों की अनगिनत संख्या होनी चाहिए।block universe हमें कुछ समस्याओं और विरोधाभास की ओर ले जाता है। हम ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को किस तरह समजे क्योकि वह तो हमेशा से वहां पर मौजूद था। अगर वहाँ पर बिग बैंग हुआ था तो वह अभी भी मौजूद हैं।अगर समय और अन्तरिक्ष पहले से ही मौजूद हैं तो वह क्या हैं जिसने उन्हें गति दी? कैसे हमारी चेतना समय को पार कर लेती हैं ? वह क्या हैं जो ब्रह्माण्ड की सभी चीजों को गति देता हैं ? इन चीजों का हमारे पास अभी कोई भी जवाब नहीं हैं।

अधिकांश cosmologists मानते हैं की 13 अरब साल पहले बिग बैंग की घटना होने पर ब्रह्माण्ड का जन्म हुआ। हम सब उस फैलते हुए ब्रह्माण्ड में जी रहे हैं जिसमें सभी तारे और आकाशगंगाए एक दुसरे से दूर जा रही हैं। हम कह सकते हैं की बिग बैंग एक क्षण में पैदा हुआ और भविष्य में अनंत काल तक चला जा रहा हैं। ब्रह्माण्ड का अनंत भविष्य उसके जन्म के साथ बिग बैंग के दौरान ही शुरू हुआ था।

समय हमें इस घटना को समजने में बहुत ही कठिनाई पैदा कर रहा हैं। हम समय में डूबते जा रहे हैं लेकिन समय के बारे में हम कुछ भी अच्छी तरह से समज नहीं पा रहे हैं। समय एक ऐसी चीज़ हो सकती हैं जो हमारी सोचने की शक्ति से भी परे हो या वह एक भ्रम भी हो सकता हैं। किन्तु भविष्य में हम इंसान समय का राज़ भी एक दिन खोल ही देंगे।

विश्व रेखा(World Line) : भौतिकी के अनुसार किसी पिंड का काल-अंतराल के चतुर्यामी तय किये गये पथ को विश्व रेखा कहा जाता है। समय यात्रा TIME TRAVEL के बारे में सोचना दिमाग चकरा देनेवाली बात हैं. क्या समय यात्रा संभव हैं? Is Time Travel Possible? Time Travel Theory के अनुसार, क्या होगा अगर आप समय में पीछे भूतकाल में जाकर अपने माता-पिता को मिलने से रोक दे. उन्हें कभी एक-दूसरें से मिलने ही ना दे. इसका मतलब होगा की आप अपने खुद के जन्म को ही रोक देंगे. लेकिन अगर तब आपका जन्म ही नहीं हुआ था तो आप भूतकाल में कैसे जा सकते हैं. इस चीज़ का तो कोई मतलब ही नहीं होता.

हम सब समय में यात्रा करते हैं. पिछले साल से में एक साल समय में आगे बढ़ चूका हूँ. दूसरें शब्दों में कहूँ तो हम सब प्रति घंटे 1 घंटा की दर से समय में यात्रा करते हैं. लेकिन यहाँ पर सवाल यह है कि क्या हम प्रति घंटे 1 घंटा की दर से भी ज्यादा तेजी से यात्रा कर सकते है? क्या हम समय में पीछे जा सकते हैं? क्या हम प्रति घंटे 2 घंटे की रफ़्तार से यात्रा कर सकते है? 20 वी सदी के महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने विशेष सापेक्षता (Special Relativity) नामक सिद्धांत विकसित किया था. विशेष सापेक्षता के सिध्धांत के बारे में तो कल्पना करना भी मुश्किल हैं क्योंकि यह रोजमर्रा की जिंदगी से कुछ अलग तरह की ही चीज़े उजागर करता हैं. इस सिध्धांत के मुताबिक समय और अंतरिक्ष एक ही चीज़ हैं. दोनों एकदूसरे से जुड़े हुए हैं. जिसे space-time भी कहते हैं. space-time में कोई भी चीज़ यात्रा कर रही हो उसकी गति की एक सीमा हैं- 3 लाख किलोमीटर. यह प्रकाश की गति हैं. READ 5 Amazing Science Facts In Hindi वैज्ञानिक तथ्य जो आपका दुनिया देखने का नजरिया बदल देंगे

विशेष सापेक्षता का सिध्धांत यह भी दर्शाता हैं की space-time में यात्रा करते वक्त कई आश्चर्यजनक चीजे होती हैं, खास कर के जब आप प्रकाश की गति या उसके आसपास की गति पा लेते हैं. जिन लोगो को आपने पृथ्वी पर पीछे छोड़ दिया हैं उनकी तुलना में आपके लिए समय की गति कम हो जाएगी. आप इस असर को वापस आए बिना नोटिस नहीं कर सकते हैं. सोचिए की आपकी उम्र अभी 15 साल की हैं और आप एक अंतरिक्ष यान में प्रकाश की गति की तुलना में 99.5% तक की गति पा लेते हैं. अपनी यात्रा के दौरान आपने अपने 5 जनमदिन सेलिब्रेट किए, यानी आपने अंतरिक्ष यान में 5 साल बिताए. 5 साल के सफ़र के बाद आप 20 साल की उम्र में अपने घर वापस आते हैं. आप देखेंगे की आपकी उम्र के आपके दोस्त 65 साल के हो गए होंगे. क्योंकि अंतरिक्ष यान में समय आपके लिए ज्यादा धीरे से बिता था. आपने जितने समय में 5 साल अनुभव किए उनते ही समय में आपके दोस्तों ने 50 साल महसूस किए.


time travel

आप जितनी तेज मूवमेंट करेंगे समय की गति आपके लिए कम हो जाएगी. मेरा खूद का एक अनुभव बताता हूँ. जब में सुबह जोगिंग करने के लिए जाता हूँ तब ज्यादातर मेरे काने में headphones लगे हुए होते हैं. मैंने कई बार नोटीस किया की जब में काफी देर तक दौड़ने के बाद थक जाता हूँ और मेरे दिल की धड़कन तेज हो जाती हैं तब में किसी जगह आराम के लिए रुकता हूँ. तब मेरे कान में लगे हुए headphones में बज रहा गाना काफी धीमी गति से चलता महसूस होता हैं. जैसे की किसी ने गाने की रफ़्तार कम कर दी हो. वैसे मेरे दौड़ने के दौरान भी गाने की गति धीमी ही महसूस होती हैं. यह बात सिर्फ दौड़ने के विषय तक ही सिमित नहीं हैं. ऐसी कोई भी मूवमेंट जो की काफी तेजी से की गयी हो और आप का दिल तेजी से धडकने लगा हो औए आप हाफ़ने लगे हो. समय की रफ़्तार आप को थोड़ी कम लगेगी. आप एक काम कीजिए अपने हाथ में अपनी घडी लीजिये और उसे पकड़कर उसे हवा में मूव कीजिए और देखीए. आप देखेंगे की घडी के मूवमेंट के दौरान एक एक सेकंड की टिक कुछ ज्यादा लम्बी लगेगी. READ Meditation in Hindi - ध्यान

आइंस्टीन के General Relativity के सिध्धांत के मुताबिक किसी भी तरह के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में समय की रफ़्तार कम हो जाती हैं. जैसे समय की गति हमारी पृथ्वी पर अंतरिक्ष की तुलना में कम होगी. जैसे की किसी ब्लैक होल के नजदीक गुरुत्वाकर्षण बहुत तीव्र हो जाता हैं. ऐसी जगह पर समय की रफ़्तार बहुत ही कम हो जाती हैं. तीव्र गुरुत्वाकर्षण की वजह से space-time में कई विकृतियाँ पैदा हो जाती हैं. ऐसी विकृतियों से worm holes पैदा हो सकते हैं, जो की space-time में सफ़र करने के लिए शार्टकट हो सकते हैं. कुछ वैज्ञानिक तो ऐसा ही मानते हैं. जो भी हो मेरा तो यहीं मानना हैं की समय यात्रा सिर्फ भविष्य की ही मुमकिन हो सकती हैं. क्योंकि समय में पीछे जाना मुमकिन ही नहीं हैं. क्योंकि जो हो गया वह हम कभी बदल नहीं सकते लेकिन जो होनेवाला हैं वह अभी भी हाथ में हैं. हम शायद भविष्य की सैर कर सकते हैं लेकिन उसके लिए हमे बहुत ही उम्दा टेक्नोलॉजी की जरुरत होगी और बहुत ज्यादा उर्जा की भी जरुरत होगी.


वास्तविकता के 10 आयाम 10 Dimensions of Reality In Hindi Dimensions in hindi

umang prajapati January 6, 2016 5 Comments

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10 Dimensions of Reality: Including 4th,5th And 7th Dimension: वास्तविकता के 10 आयाम. आपके लिए आज इस विशाल space और time (अंतरिक्ष समय) की भयानक संभावनाओं का एक आसान सचित्र संदर्भ रखने जा रहा हूँ.

विज्ञान मानता हैं की हमारा ब्रह्माण्ड कई Dimensions (आयाम) का बना हो सकता हैं.सुपरस्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड में ऐसे कम से कम दस आयाम हो सकते हैं. (M-थ्योरी के अनुसार ब्रह्माण्ड में ऐसे 11 आयाम हो सकते हैं और बोजोनिक स्ट्रिंग सिद्धांत के अनुसार 26 आयाम). हम में से अधिकांश लोग ज्यादातर बुनियादी तीन आयामों को समझते हैं. कई लोगो का कहना हैं की चौथा आयाम समय हैं. लेकिन इन आयामों से परे के आयाम वास्तव में किस तरह के हैं? आइये देखते हैं? 1st Dimension प्रथम आयाम: लंबाई

null

प्रथम आयाम लंबाई है…x-axis…एक सीधी रेखा, बिना कोई अन्य विशेषताओं के साथ. 2nd Dimension दूसरा आयाम: ऊंचाई

दूसरा आयाम: ऊंचाई

ऊंचाई…y-axis…दो आयामी वस्तु बनाने के लिए इसे लंबाई के साथ जोड़ा जा सकता हैं. जैसे की त्रिकोण या वर्ग. READ 5 Amazing Science Facts In Hindi वैज्ञानिक तथ्य जो आपका दुनिया देखने का नजरिया बदल देंगे 3rd Dimension तीसरा आयाम: गहराई

तीसरा आयाम गहराई

गहराई, या z अक्ष…z अक्ष को पिछले दो आयामों के साथ जोड़कर तीसरा आयाम बनता हैं. जैसे की एक घन, पिरामिड या कोई क्षेत्र.

यह तीन मनुष्य के द्वारा सीधे शारीरिक रूप से प्रत्यक्ष आयाम थे. इन तीन आयामों से परे के आयाम सैद्धांतिक हैं. 4th Dimension चौथा आयाम: समय

चौथा आयाम: समय

चौथा आयाम एक तीन आयामी वस्तु के कब्जे में समय में स्थिति है. दूसरे शब्दों में कहे तो आप समय में आगे-पीछे झाँख सकते हैं. 5th Dimension पांचवां आयाम: संभावित विश्व

पांचवा आयाम: संभावित विश्व

पांचवें आयाम में हमारे जैसे दूसरे विश्व होंगे जो हमारी दुनिया से थोड़े अलग होंगे. जिसमे हमारी दुनिया जैसी दुनियाए होंगी और उनमें हम असमानताए ढूंढ सकते हैं. 6th Dimension छठां आयाम : सभी प्रकार के संभवित विश्वों का एक आयाम, एक ही तरह की शुरूआती अवस्थाओं के साथ.

छठां आयाम एक ऐसा आयाम हैं जहाँ सभी प्रकार के संभावित विश्व होंगे लेकिन एक ही तरह की शुरूआती अवस्थाओं के साथ. (उन सब की शुरुआत एक एक जैसी ही होंगी) READ समय क्या हैं? Time In Hindi 7th Dimension सातवां आयाम: सभी प्रकार के संभावित विश्व अलग अलग शुरूआती अवस्थाओं के साथ.

इस आयाम में अलग अलग विश्वों की शुरूआती अवस्थाएं भी अलग अलग होंगी. 8th Dimension आठवां आयाम: सभी प्रकार के संभवित विश्व अलग अलग शुरूआती अवस्थाओं के साथ, जहाँ प्रत्येक विश्व अनंत बाहरी शाखाओं में बंटे हुए होंगे.

चक्कर आ गए? यह एक ऐसा आयाम हैं जो इंसानियत की समज के परे हैं. हमारे दिमाग इसकी संरचना को ना ही समज सकते हैं और ना ही उसके बारे में सोच सकते हैं. आगे के आयाम भी ऐसे ही होंगे. 9th Dimension नौवां आयाम: सभी प्रकार के संभवित विश्व, संभावित अलग अलग शुरूआती अवस्थाओं के साथ, अलग अलग भौतिकी के नियमों के साथ.

इस आयाम में आठवे आयाम की सारी खूबियाँ होंगी, लेकिन इसके हर एक विश्व में भौतिकी के नियम संभावित अलग अलग होंगे. READ ब्रह्माण्ड पूरी तरह से अव्यवस्थित क्यों हैं? 10th Dimension दसवां आयाम: अनंत संभावनाएं

जटिलता के इस स्तर पर, सबकुछ संभव हैं और इसमें सारी कल्पनाए मौजूद हैं. अगर आप इस आयाम में होते तो आप भगवान होते.

(पहले तीन आयामों के बाद के सभी आयाम काल्पनिक हैं)


1. ब्रह्मांण्ड का अध्ययन करने वाले विज्ञान को खगोलविज्ञान या अंग्रेजी में astronomy कहा जाता है. खगोल विज्ञान, विज्ञान की एक बहुत ही रोचक और रहस्मई शाखा है. खगोल विज्ञान में बहुत ही दूर स्थित आकाशी पिंडो का अध्ययन किया जाता है जिसे एक शाधारण मनुष्य सरलता से समझ नही सकता. खगोल विज्ञान से जुड़े कई सिद्धात बहुत प्रतलित है. जैसे के विशेष तथा साधारण सापेतक्षतावाद. 2. आप का T.V. या कोई और आवाज़ पैदा करने वाला रिकार्डर जा music set जब ठीक से नही चल रहा होता तब यह जो बेकार सी आवाज पैदा करता है यह Big Bang(महाविस्फोट) के तुरंत बाद बनने वाली रेडिऐशन का नतीजा है जो आज 15 अरब साल बाद भी है. 3. खगोलविज्ञान के अनुसार हम कहते है कि हर भौतिक वस्तु इस ब्रह्मांण्ड में मौजुद है. इसमें ही खरबों तारे, सौर मंण्डल और आकाशगंगाएं है. पर यह सिर्फ सारी वस्तुओं का 25 प्रतीशत ही है. अभी भी कई ऐसी और चीजों के बारें में पता लगाया जाना बाकी है.

4. अगर नासा एक पंक्षी को अंतरिक्ष में भेजे तो वह उड़ नही पाएगा और जल्दी ही मर जाएगा. क्योंकि वहां पर उड़ने के लिए बल ही नही है.

5. क्या आप को पता है श्याम पदार्थ (dark matter) ब्रह्माण्ड में पाया जाने वाला ऐसा पदार्थ है जो दिखता नही पर इसके गुरूत्व का प्रभाव जरूर पाया गया है. तभी इसे श्याम पदार्थ का नाम दिया गया है क्योंकि यह है तो दिखता नही.

6. अगर आप 1 मिनट में 100 तारे गिने तो आप 2000 साल में एक पुरी आकाशगंगा गिन देगें.

7. महाविस्फोट के बाद ब्रह्माण्ड विस्तारित होकर अपने वर्तमान स्वरूप में आया . पर आधुनिक विज्ञान के अनुसार भौतिक पदार्थ प्रकाश की गति से फैल नही सकता. पर महाविस्फोट सिद्धांत में तो यह पक्का है कि ब्रह्माण्ड 15 खरब साल में 93 खरब प्रकाश वर्ष तक फैल चुका है. (1प्रकाश वर्ष( light year)=प्रकाश के द्वारा एक साल में तय की गई दूरी). पर इस उलझण को आइंस्टाइन का साधारण सापेक्षतावाद का सिद्धात समझाता है. इसके अनुसार दो आकाशगंगाएँ एक-दुसरे से जितनी दूर है उतने ही अनुपात से यह और दूर होती जाती है. यह तथ्य थोड़ा समझने में कठिन लगेगा मगर जब इसे ध्यान से पढ़ेगें तो कुछ-कुछ समझ आ जाएगा.

8. हमारी आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी(Milky way) है, हमारा सौर मंण्डल इसी आकाशगंगा में है. आकाशगंगा का ग्रीक भाषा में अर्थ है- ‘दूध’. अगर आप एक खगोलीए दूरबीन लेकर आकाशगंगओं को देखे तो ऐसा लगेगा जैसे दूध की धारा बह रही हो.

9. द लार्ज मेगालीनिक कलाउड आकाशगंगा सभी आकाशगंगाओं से सबसे ज्यादा चमकदार है. यह केवल दक्षिणी गोलाअर्थ में ही दिखेगी. यह धरती से 1.7 लाख प्रकाश वर्ष दूर है और इसका व्यास 39,000 प्रकाश वर्ष है.

10. Abell 2029 ब्रह्माण्ड की सबसे बड़ी आकाशगंगा है. इसका व्यास 56,00,000 प्रकाश वर्ष है और यह हमारी आकीशगंगा से 80 गुना ज्यादा बड़ी है यह धरती से 107 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है.

11. धनु बौनी आकाशगंगा की खोज 1994 मे हुई थी और यह सभी आकाशगंगायों से धरती के सबसे करीब है यह धरती से 70,000 प्रकाश वर्ष दूर है.

12. ऐड्रोमेडा आकाशगंगा नंगी आखों से देखी जाने वाली सबसे दूर स्थित आकाशगंगा है यह पृथ्वी से 2309000 प्रकाश वर्ष दूर है. इसमें लगभग 300 खरब (30×10 11) तारे है और इसका व्यास 1,80,000 प्रकाश वर्ष है.

13. ज्यादातर आकाशगंगाओं की शकल अंडाकार है पर कुछ अपनी शकल बदलती रहती है. हमारी आकाशगंगा मंदाकिनी अंडाकार है.

14. Abell 135 IR 1916 आकाशगंगा हमारे ब्रह्माण्ड की सबसे दूर स्थित आकाशगंगा है यह धरती से आश्चार्यजनक 13.2 खरब प्रकाश वर्ष दूर है. 2004 में युरोपीय दक्षिणी वेधशाला के खगोलविदों ने इस आकाशगंगा की खोज की घोषणा की ।


महाविस्फोट का सिद्धांत (The Big Bang Theory) आशीष श्रीवास्तव / अगस्त 29, 2006

किसी बादलों और चांद रहित रात में यदि आसमान को देखा जाये तब हम पायेंगे कि आसमान में सबसे ज्यादा चमकीले पिंड शुक्र, मंगल, गुरु, और शनि जैसे ग्रह हैं। इसके अलावा आसमान में असंख्य तारे भी दिखाई देते है जो कि हमारे सूर्य जैसे ही है लेकिन हम से काफी दूर हैं। हमारे सबसे नजदीक का सितारा प्राक्सीमा सेंटारी हम से चार प्रकाश वर्ष (१०) दूर है। हमारी आँखों से दिखाई देने वाले अधिकतर तारे कुछ सौ प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं। तुलना के लिये बता दें कि सूर्य हम से केवल आठ प्रकाश मिनट और चांद १४ प्रकाश सेकंड की दूरी पर है। हमे दिखाई देने वाले अधिकतर तारे एक लंबे पट्टे के रूप में दिखाई देते है, जिसे हम आकाशगंगा कहते है। जो कि वास्तविकता में चित्र में दिखाये अनुसार पेचदार (Spiral) है। इस से पता चलता है कि ब्रह्मांड कितना विराट है ! यह ब्रह्मांड अस्तित्व में कैसे आया ? महा विस्फोट के बाद ब्रह्मांड का विस्तार

महा विस्फोट के बाद ब्रह्मांड का विस्तार

महा विस्फोट का सिद्धांत ब्रह्मांड की उत्पत्ति के संदर्भ में सबसे ज्यादा मान्य है। यह सिद्धांत व्याख्या करता है कि कैसे आज से लगभग १३.७ खरब वर्ष पूर्व एक अत्यंत गर्म और घनी अवस्था से ब्रह्मांड का जन्म हुआ। इसके अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक बिन्दु से हुयी थी।

हब्बल के द्वारा किया गया निरीक्षण और ब्रह्मांडीय सिद्धांत(२)(Cosmological Principle)महा विस्फोट के सिद्धांत का मूल है।

१९१९ में ह्ब्बल ने लाल विचलन(१) (Red Shift) के सिद्धांत के आधार पर पाया था कि ब्रह्मांड फैल रहा है, ब्रह्मांड की आकाशगंगाये तेजी से एक दूसरे से दूर जा रही है। इस सिद्धांत के अनुसार भूतकाल में आकाशगंगाये एक दूसरे के और पास रही होंगी और, ज्यादा भूतकाल मे जाने पर यह एक दूसरे के अत्यधिक पास रही होंगी। इन निरीक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है कि ब्रम्हांड ने एक ऐसी स्थिती से जन्म लिया है जिसमे ब्रह्मांड का सारा पदार्थ और ऊर्जा अत्यंत गर्म तापमान और घनत्व पर एक ही स्थान पर था। इस स्थिती को गुरुत्विय ‘सिन्गुलरीटी ‘ (Gravitational Singularity) कहते है। महा-विस्फोट यह शब्द उस समय की ओर संकेत करता है जब निरीक्षित ब्रह्मांड का विस्तार प्रारंभ हुआ था। यह समय गणना करने पर आज से १३.७ खरब वर्ष पूर्व(१.३७ x १०१०) पाया गया है। इस सिद्धांत की सहायता से जार्ज गैमो ने १९४८ में ब्रह्मांडीय सूक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB)(३) की भविष्यवाणी की थी ,जिसे १९६० में खोज लीया गया था। इस खोज ने महा-विस्फोट के सिद्धांत को एक ठोस आधार प्रदान किया।

महा-विस्फोट का सिद्धांत अनुमान और निरीक्षण के आधार पर रचा गया है। खगोल शास्त्रियों का निरीक्षण था कि अधिकतर निहारिकायें(nebulae)(४) पृथ्वी से दूर जा रही है। उन्हें इसके खगोल शास्त्र पर प्रभाव और इसके कारण के बारे में ज्ञात नहीं था। उन्हें यह भी ज्ञात नहीं था की ये निहारिकायें हमारी अपनी आकाशगंगा के बाहर है। यह क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है एक रहस्य था।

१९२७ मे जार्जस लेमिट्र ने आईन्साटाइन के सापेक्षता के सिद्धांत(Theory of General Relativity) से आगे जाते हुये फ़्रीडमैन-लेमिट्र-राबर्टसन-वाकर समीकरण (Friedmann-Lemaître-Robertson-Walker equations) बनाये। लेमिट्र के अनुसार ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक प्राथमिक परमाणु से हुयी है, इसी प्रतिपादन को आज हम महा-विस्फोट का सिद्धांत कहते हैं। लेकिन उस समय इस विचार को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया।

इसके पहले १९२५ मे हब्बल ने पाया था कि ब्रह्मांड में हमारी आकाशगंगा अकेली नहीं है, ऐसी अनेकों आकाशगंगाये है। जिनके बीच में विशालकाय अंतराल है। इसे प्रमाणित करने के लिये उसे इन आकाशगंगाओं के पृथ्वी से दूरी गणना करनी थी। लेकिन ये आकाशगंगाये हमें दिखायी देने वाले तारों की तुलना में काफी दूर थी। इस दूरी की गणना के लिये हब्बल ने अप्रत्यक्ष तरीका प्रयोग में लाया। किसी भी तारे की चमक(brightness) दो कारकों पर निर्भर करती है, वह कितना दीप्ति(luminosity) का प्रकाश उत्सर्जित करता है और कितनी दूरी पर स्थित है। हम पास के तारों की चमक और दूरी की ज्ञात हो तब उनकी दीप्ति की गणना की जा सकती है| उसी तरह तारे की दीप्ति ज्ञात होने पर उसकी चमक का निरीक्षण से प्राप्त मान का प्रयोग कर दूरी ज्ञात की जा सकती है। इस तरह से हब्ब्ल ने नौ विभिन्न आकाशगंगाओं की दूरी का गणना की ।(११)

१९२९ मे हब्बल जब इन्ही आकाशगंगाओं का निरीक्षण कर दूरी की गणना कर रहा था। वह हर तारे से उत्सर्जित प्रकाश का वर्णक्रम और दूरी का एक सूचीपत्र बना रहा था। उस समय तक यह माना जाता था कि ब्रह्मांड मे आकाशगंगाये बिना किसी विशिष्ट क्रम के ऐसे ही अनियमित रूप से विचरण कर रही है। उसका अनुमान था कि इस सूची पत्र में उसे समान मात्रा में लाल विचलन(१) और बैगनी विचलन मिलेगा। लेकिन नतीजे अप्रत्याशित थे। उसे लगभग सभी आकाशगंगाओ से लाल विचलन ही मिला। इसका अर्थ यह था कि सभी आकाशगंगाये हम से दूर जा रही है। सबसे ज्यादा आश्चर्य जनक खोज यह थी कि यह लाल विचलन अनियमित नहीं था ,यह विचलन उस आकाशगंगा की गति के समानुपाती था। इसका अर्थ यह था कि ब्रह्मांड स्थिर नहीं है, आकाशगंगाओं के बिच की दूरी बढ़ते जा रही है। इस प्रयोग ने लेमिट्र के सिद्धांत को निरीक्षण से प्रायोगिक आधार दिया था। यह निरीक्षण आज हब्बल के नियम के रूप मे जाना जाता है।

हब्बल का नियम और ब्रह्मांडीय सिद्धांत(२)ने यह बताया कि ब्रह्मांड का विस्तार हो रहा है। यह सिद्धांत आईन्स्टाईन के अनंत और स्थैतिक ब्रह्मांड के विपरीत था।

इस सिद्धांत ने दो विरोधाभाषी संभावनाओ को हवा दी थी। पहली संभावना थी, लेमिट्र का महा-विस्फोट सिद्धांत जिसे जार्ज गैमो ने समर्थन और विस्तार दिया था। दूसरी संभावना थी, फ़्रेड होयेल का स्थायी स्थिती माडल (Fred Hoyle’s steady state model), जिसमे दूर होती आकाशगंगाओं के बिच में हमेशा नये पदार्थों की उत्पत्ति का प्रतिपादन था। दूसरे शब्दों में आकाशगंगाये एक दूसरे से दूर जाने पर जो खाली स्थान बनता है वहां पर नये पदार्थ का निर्माण होता है। इस संभावना के अनुसार मोटे तौर पर ब्रह्मांड हर समय एक जैसा ही रहा है और रहेगा। होयेल ही वह व्यक्ति थे जिन्होने लेमिट्र का महाविस्फोट सिद्धांत का मजाक उड़ाते हुये “बिग बैंग आईडीया” का नाम दिया था।

काफी समय तक इन दोनो माड्लो के बिच मे वैज्ञानिक विभाजित रहे। लेकिन धीरे धीरे वैज्ञानिक प्रयोगो और निरिक्षणो से महाविस्फोट के सिद्धांत को समर्थन बढता गया। १९६५ के बाद ब्रम्हांडिय सुक्षम तरंग विकिरण (Cosmic Microwave Radiation) की खोज के बाद इस सिद्धांत को सबसे ज्यादा मान्य सिद्धांत का दर्जा मिल गया। आज की स्थिती मे खगोल विज्ञान का हर नियम इसी सिद्धांत पर आधारित है और इसी सिद्धांत का विस्तार है।

महा-विस्फोट के बाद शुरुवाती ब्रह्मांड समांगी और सावर्तिक रूप से अत्यधिक घनत्व का और ऊर्जा से भरा हुआ था. उस समय दबाव और तापमान भी अत्यधिक था। यह धीर धीरे फैलता गया और ठंडा होता गया, यह प्रक्रिया कुछ वैसी थी जैसे भाप का धीरे धीरे ठंडा हो कर बर्फ मे बदलना, अंतर इतना ही है कि यह प्रक्रिया मूलभूत कणों(इलेक्ट्रान, प्रोटान, फोटान इत्यादि) से संबंधित है।

प्लैंक काल(५) के १० -३५ सेकंड के बाद एक संक्रमण के द्वारा ब्रह्मांड की काफी तिव्र गति से वृद्धी(exponential growth) हुयी। इस काल को अंतरिक्षीय स्फीति(cosmic inflation) काल कहा जाता है। इस स्फीति के समाप्त होने के पश्चात, ब्रह्मांड का पदार्थ एक क्वार्क-ग्लूवान प्लाज्मा की अवस्था में था, जिसमे सारे कण गति करते रहते हैं। जैसे जैसे ब्रह्मांड का आकार बढ़ने लगा, तापमान कम होने लगा। एक निश्चित तापमान पर जिसे हम बायरोजिनेसीस संक्रमण कहते है, ग्लुकान और क्वार्क ने मिलकर बायरान (प्रोटान और न्युट्रान) बनाये। इस संक्रमण के दौरान किसी अज्ञात कारण से कण और प्रति कण(पदार्थ और प्रति पदार्थ) की संख्या मे अंतर आ गया। तापमान के और कम होने पर भौतिकी के नियम और मूलभूत कण आज के रूप में अस्तित्व में आये। बाद में प्रोटान और न्युट्रान ने मिलकर ड्युटेरीयम और हिलीयम के केंद्रक बनाये, इस प्रक्रिया को महाविस्फोट आणविक संश्लेषण(Big Bang nucleosynthesis.) कहते है। जैसे जैसे ब्रह्मांड ठंडा होता गया, पदार्थ की गति कम होती गयी, और पदार्थ की उर्जा गुरुत्वाकर्षण में तबदील होकर विकिरण की ऊर्जा से अधिक हो गयी। इसके ३००,००० वर्ष पश्चात इलेक्ट्रान और केण्द्रक ने मिलकर परमाणु (अधिकतर हायड्रोजन) बनाये; इस प्रक्रिया में विकिरण पदार्थ से अलग हो गया । यह विकिरण ब्रह्मांड में अभी तक ब्रह्मांडीय सूक्ष्म तरंग विकिरण (cosmic microwave radiation)के रूप में बिखरा पड़ा है।

कालांतर में थोड़े अधिक घनत्व वाले क्षेत्र गुरुत्वाकर्षण के द्वारा और ज्यादा घनत्व वाले क्षेत्र मे बदल गये। महा-विस्फोट से पदार्थ एक दूसरे से दूर जा रहा था वही गुरुत्वाकर्षण इन्हें पास खिंच रहा था। जहां पर पदार्थ का घनत्व ज्यादा था वहां पर गुरुत्वाकर्षण बल ब्रह्मांड के प्रसार के लिये कारणीभूत बल से ज्यादा हो गया। गुरुत्वाकर्षण बल की अधिकता से पदार्थ एक जगह इकठ्ठा होकर विभिन्न खगोलीय पिंडों का निर्माण करने लगा। इस तरह गैसो के बादल, तारों, आकाशगंगाओं और अन्य खगोलीय पिंडों का जन्म हुआ ,जिन्हें आज हम देख सकते है।

आकाशीय पिंडों के जन्म की इस प्रक्रिया की और विस्तृत जानकारी पदार्थ की मात्रा और प्रकार पर निर्भर करती है। पदार्थ के तीन संभव प्रकार है शीतल श्याम पदार्थ (cold dark matter)(६), तप्त श्याम पदार्थ(hot dark matter) तथा बायरोनिक पदार्थ। खगोलीय गणना के अनुसार शीतल श्याम पदार्थ की मात्रा सबसे ज्यादा(लगभग ८०%) है। मानव द्वारा निरीक्षित लगभग सभी आकाशीय पिंड बायरोनिक पदार्थ(८)से बने है।

श्याम पदार्थ की तरह आज का ब्रह्मांड एक रहस्यमय प्रकार की ऊर्जा ,श्याम ऊर्जा (dark energy)(६) के वर्चस्व में है। लगभग ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा का ७०% भाग इसी ऊर्जा का है। यही ऊर्जा ब्रह्मांड के विस्तार की गति को एक सरल रैखिक गति-अंतर समीकरण से विचलित कर रही है, यह गति अपेक्षित गति से कहीं ज्यादा है। श्याम ऊर्जा अपने सरल रूप में आईन्स्टाईन के समीकरणों में एक ब्रह्मांडीय स्थिरांक (cosmological constant) है । लेकिन इसके बारे में हम जितना जानते है उससे कहीं ज्यादा नहीं जानते है। दूसरे शब्दों में भौतिकी में मानव को जितने बल(९) ज्ञात है वे सारे बल और भौतिकी के नियम ब्रह्मांड के विस्तार की गति की व्याख्या नहीं कर पा रहे है। इसे व्याख्या करने क एक काल्पनिक बल का सहारा लिया गया है जिसे श्याम ऊर्जा कहा जाता है।

यह सभी निरीक्षण लैम्डा सी डी एम माडेल के अंतर्गत आते है, जो महा विस्फोट के सिद्धांत की गणीतिय रूप से छह पैमानों पर व्याख्या करता है। रहस्य उस समय गहरा जाता है जब हम शुरू वात की अवस्था की ओर देखते है, इस समय पदार्थ के कण अत्यधिक ऊर्जा के साथ थे, इस अवस्था को किसी भी प्रयोगशाला में प्राप्त नहीं किया जा सकता है। ब्रह्मांड के पहले १० -३३ सेकंड की व्याख्या करने के लिये हमारे पास कोई भी गणितिय या भौतिकिय माडेल नहीं है, जिस अवस्था का अनुमान ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory)(७)करता है। पहली नजर से आईन्स्टाईन का गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत एकगुरुत्विय बिन्दु (gravitational singularity) का अनुमान करता है जिसका घनत्व अपरिमित (infinite) है।. इस रहस्य को सुलझाने के लिये क्वांटम गुरुत्व के सिद्धांत की आवश्यकता है। इस काल (ब्रह्मांड के पहले १० -३३ सेकंड) को समझ पाना विश्व के सबसे महान अनसुलझे भौतिकिय रहस्यों में से एक है।

मुझे लग रहा है इस लेख ने महा विस्फोट के सिद्धांत की गुत्थी को कुछ और उलझा दिया है, इस गुत्थी को हम धीरे धीरे आगे के लेखों में विस्तार से चर्चा कर सुलझाने का प्रयास करेंगे। अगला लेख श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम उर्जा(dark energy) पर होगा।

सागर जी क्या ख्याल है, आपके प्रश्नों की सूची कम हुयी या और बढ़ गयी?

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(१) लाल विचलन (Red Shift) के बारे मे यहां देखे.

(२)ब्रह्मांडीय सिद्धांत (Cosmological Principle) : यह एक सिद्धांत नहीं एक मान्यता है। इसके अनुसार ब्रह्मांड समांगी(homogeneous) और सावर्तिक(isotrpic) है| एक बड़े पैमाने पर किसी भी जगह से निरीक्षण करने पर ब्रह्मांड हर दिशा में एक ही जैसा प्रतीत होता है।

(३)ब्रह्मांडीय सूक्ष्म तरंग विकिरण(cosmic microwave background radiation-CMB): यह ब्रह्मांड के उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक सम्पूर्ण ब्रह्मांड मे फैला हुआ है। इस विकिरण को आज भी महसूस किया जा सकता है।

(४)निहारिका (Nebula) : ब्रह्मांड में स्थित धूल और गैस के बादल।

(५) प्लैंक काल: मैक्स प्लैंक के नाम पर , ब्रह्मांड के इतिहास मे ० से लेकर १०-४३ (एक प्लैंक ईकाइ समय), जब सभी चारों मूलभूत बल(गुरुत्व बल, विद्युत चुंबकीय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल) एक संयुक्त थे और मूलभूत कणों का अस्तित्व नहीं था।

(६) श्याम पदार्थ (Dark Matter) और श्याम ऊर्जा(dark energy) इस पर पूरा एक लेख लिखना है।

(७)ब्रहृत एकीकृत सिद्धांत(Grand Unification Theory) : यह सिद्धांत अभी अपूर्ण है, इस सिद्धांत से अपेक्षा है कि यह सभी रहस्य को सुलझा कर ब्रह्मांड उत्पत्ति और उसके नियमों की एक सर्वमान्य गणितिय और भौतिकिय व्याख्या देगा।

(८) बायरान : प्रोटान और न्युट्रान को बायरान भी कहा जाता है। विस्तृत जानकारी पदार्थ के मूलभूत कण लेख में।

(९) भौतिकी के मूलभूत बल :गुरुत्व बल, विद्युत चुंबकीय बल, कमजोर आणविक आकर्षण बल और मजबूत आणविक आकर्षण बल

(१०) : एक प्रकाश वर्ष : प्रकाश द्वारा एक वर्ष में तय की गयी दूरी। लगभग ९,५००,०००,०००,००० किलो मीटर। अंतरिक्ष में दूरी मापने के लिये इस इकाई का प्रयोग किया जाता है।

(११)आज हम जानते है कि अत्याधुनिक दूरबीन से खरबों आकाशगंगाये देखी जा सकती है, जिसमे से हमारी आकाशगंगा एक है और एक आकाशगंगा में भी खरबों तारे होते है। हमारी आकाशगंगा एक पेचदार आकाशगंगा है जिसकी चौड़ाई लगभग हजार प्रकाश वर्ष है और यह धीमे धीमे घूम रही है। इसकी पेचदार बाँहों के तारे १,०००,००० वर्ष में केन्द्र की एक परिक्रमा करते है। हमारा सूर्य एक साधारण औसत आकार का पिला तारा है, जो कि एक पेचदार भुजा के अंदर के किनारे पर स्थित है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]