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ब्राह्मण-ग्रन्थ

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ब्राह्मण जाति आदि के लिये देखें: ब्राह्मण, पुरोहित

वेदोक्त ब्राह्मणादि कर्मकांड लिए देखें: कल्प (वेदांग)


वेदों का गद्य में व्याख्या वाला खण्ड ब्राह्मण कहलाता है। वरीयता के क्रम में ब्राह्मण, वैदिक वाङ्मय का दूसरा भाग है। इसमें गद्य रूप में देवताओं की तथा यज्ञ की व्याख्या की गयी है और मन्त्रों पर भाष्य भी दिया गया है। इनकी भाषा वैदिक संस्कृत है। चारों वेदों का एक या एक से अधिक ब्राह्मण हैं (हर वेद की अपनी अलग-अलग शाखा है)। आज जो ब्राह्मण उपलब्ध हैं वे निम्नलिखित हैं-

ब्राह्मण ग्रंथों का एक उदाहरण। बाएं तैत्तिरीय संहिता; जिसमें मंत्र मोटे अक्षरों में हैं और जबकि दाहिने भाग में ऐतरेय ब्राह्मण का एक अंश।
  • ऋग्वेद :
    • ऐतरेयब्राह्मण-(शैशिरीयशाकलशाखा)
    • कौषीतकि-(या शांखायन) ब्राह्मण (बाष्कल शाखा)
  • सामवेद :
    • प्रौढ(पंचविंश) ब्राह्मण
    • षडविंश ब्राह्मण
    • आर्षेय ब्राह्मण
    • मन्त्र (या छान्दिग्य) ब्राह्मण
    • जैमिनीय (या तावलकर) ब्राह्मण
  • यजुर्वेद
    • शुक्ल यजुर्वेद :
      • शतपथब्राह्मण-(माध्यन्दिनीय वाजसनेयि शाखा)
      • शतपथब्राह्मण-(काण्व वाजसनेयि शाखा)
    • कृष्णयजुर्वेद :
      • तैत्तिरीयब्राह्मण
      • मैत्रायणीब्राह्मण
      • कठब्राह्मण
      • कपिष्ठलब्राह्मण
  • अथर्ववेद :
    • गोपथब्राह्मण (पिप्पलाद शाखा)

'ब्राह्मण' शब्द की व्युत्पत्ति

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'ब्राह्मण' शब्द में 'ब्रह्मन्' मूल शब्द है, इससे अण् प्रत्यय करके ब्राह्मण शब्द बनता है। ब्राह्मण शब्द "ग्रन्थ" का वाचक है और यह नपुंसकलिङ्ग में होता है -- ब्राह्मणं ब्रह्मसंघाते वेदभागे नपुंसकम्।" (मेदिनी कोश) । "एतद् ब्राह्मणान्येव पञ्च हवींषि ।" (तैत्तिरीय-संहिता---३.७.१.१) ।[1]

ग्रन्थ अर्थ में "ब्राह्मण" शब्द की तीन प्रकार से व्युत्पत्ति दिखाई जाती हैः

(१) शतपथ-ब्राह्मण (7.1.1.5) के अनुसार "ब्राह्मण" शब्द का अर्थ "मन्त्र" हैः- "ब्रह्म वै मन्त्रः"। अतः वेदमन्त्रों की व्याख्या और विनियोग प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को "ब्राह्मण" कहते हैं।

(२) शतपथ-ब्राह्मण (3.1.4.15) के अनुसार ब्राह्मण शब्द का दूसरा अर्थ "यज्ञ" हैः-"ब्रह्म यज्ञः"। अतः यज्ञों की व्याख्या और विवरण प्रस्तुत करने वाले ग्रन्थ को "ब्राह्मण" कहते हैं।

(३) ब्रह्मन् शब्द का एक अन्य अर्थ है- 'पवित्र ज्ञान या रहस्यात्मक विद्या'। अतः जिन ग्रन्थों में वैदिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, उन्हें "ब्राह्मण" कहते हैं। इन ग्रन्थों में यज्ञों का आध्यात्मिक, आधिदैविक और वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।

सत्यव्रत सामश्रमी के अनुसार ब्राह्मण शब्द से प्रोक्त (कथित, वर्णित) अर्थ में अण् प्रत्यय करके ब्राह्मण शब्द बनता है (ऐतरेयालोचन)। इसका अभिप्राय है कि ब्राह्मणों द्वारा यज्ञ-विषयक व्याख्यारूप में निर्मित ग्रन्थों को "ब्राह्मण" कहते हैं---"ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः ।" (भट्ट-भास्कर का भाष्य-तैत्तिरीयसंहिता -१.५.१)

ब्राह्मण का अर्थ

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मीमांसा दर्शन का कहना है कि मन्त्रभाग या संहिताग्रन्थों के अतिरिक्त वेद-भाग को "ब्राह्मण" कहते हैं- "शेषे ब्राह्मणशब्दः।" (मीमांसा-2.1.33) इसका अभिप्राय यह है कि संहिता भाग में पद्य, गद्य या गीति रूप में मन्त्र हैं, उनके अतिरिक्त व्याख्या-ग्रन्थों को "ब्राह्मण" कहते हैं। भट्ट भास्कर का कहना है कि कर्मकाण्ड और मन्त्रों के व्याख्यान ग्रन्थों को "ब्राह्मण" कहते हैंः---

"ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां व्याख्यानग्रन्थः।" (तैत्तिरीयसंहिताभाष्य-1.5.1)

वाचस्पति मिश्र ने वर्ण्य-विषयों का निर्देश करते हुए कहा है कि "ब्राह्मण" उन ग्रन्थों को कहते हैं, जिनमें निर्वचन (निरुक्ति), मन्त्रों का विविध यज्ञों में विनियोग, प्रयोजन, प्रतिष्ठान (अर्थवाद) और विधि का वर्णन होता हैः--

"नैरुक्त्यं यत्र मन्त्रस्य विनियोगः प्रयोजनम्।
प्रतिष्ठानं विधिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते।।"

ब्राह्मण ग्रंथ यानि सत-ज्ञान ग्रंथ, वेदों के कई सूक्तों या मंत्रों का अर्थ करने मे सहायक रहे हैं। वेदों में दैवताओं के सूक्त हैं जिनको वस्तु, व्यक्तिनाम या आध्यात्मिक-मानसिक शक्ति मानकर के कई व्याख्यान बनाए गए हैं। ब्राह्मण ग्रंथ इन्ही में मदद करते हैं। जैसे -

  1. विद्वासों हि देवा - शतपथ ब्राह्मण के इस वचन का अर्थ है, विद्वान ही देवता होते हैं।
  2. यज्ञः वै विष्णु - यज्ञ ही विष्णु है।
  3. अश्वं वै वीर्यम, - अश्व वीर्य, शौर्य या बल को कहते हैं।
  4. राष्ट्रम् अश्वमेधः - तैत्तिरीय संहिता और शतपथ ब्राह्मण के इन वचनों का अर्थ है - लोगों को एक करना ही अशवमेध है।
  5. अग्नि वाक, इंद्रः मनः, बृहस्पति चक्षु .. (गोपथ ब्राह्मण)। - अग्नि वाणी, इंद्र मन, बृहस्पति आँख, विष्णु कान हैं।

इसके अतिरिकत भी कई वेद-विषयक शब्दों का जीवन में क्या अर्थ लेना चाहिए इसका उद्धरण ब्राह्मण ग्रंथों में मिलता है। कई ब्राह्मण ग्रंथों में ही उपनिषद भी समाहित हैं।

सन्दर्भ

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इन्हें भी देखें

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