दर्शनशास्त्र

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प्राचीन ग्रीस के एथेंस में दर्शनशास्र की गोष्ठी

दर्शनशास्त्र (यूनानी- φιλοσοφία, अंग्रेज़ी-philosophy) वह विद्या है जो परम सत्य और सिद्धान्तों, और उनके कारणों की विवेचना करता है। दर्शन यथार्थ की परख के लिये एक दृष्टिकोण है। दार्शनिक चिन्तन मूलतः जीवन की अर्थवत्ता की खोज का पर्याय है। वास्तव में, दर्शन को परिभाषित करना स्वयं में ही एक दार्शनिक प्रश्न है। वस्तुतः दर्शनशास्त्र स्वत्व, तथा समाज और मानव चिंतन तथा संज्ञान की प्रक्रिया के सामान्य नियमों का विज्ञान है। दर्शनशास्त्र सामाजिक चेतना के रूपों में से एक है।

दर्शन उस विद्या का नाम है जो सत्य एवं ज्ञान की खोज करता है। व्यापक अर्थ में दर्शन, तर्कपूर्ण, विधिपूर्वक एवं क्रमबद्ध विचार की कला है। इसका जन्म अनुभव एवं परिस्थिति के अनुसार होता है। यही कारण है कि संसार के भिन्न-भिन्न व्यक्तियों ने समय-समय पर अपने-अपने अनुभवों एवं परिस्थितियों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के जीवन-दर्शन को अपनाया।

भारतीय दर्शन का इतिहास अत्यन्त पुराना है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी अर्जित दर्शन है इसके जड़ तक जाना असम्भव है किन्तु पश्चिमी दर्शनशास्त्र के अर्थों में दर्शनशास्त्र पद का प्रयोग सर्वप्रथम पाइथागोरस ने लिखित रूप से किया था। विशिष्ट अनुशासन और विज्ञान के रूप में दर्शन को प्लेटो ने विकसित किया था। उसकी उत्पत्ति दास-स्वामी समाज में एक ऐसे विज्ञान के रूप में हुई जिसने वस्तुगत जगत तथा स्वयं अपने विषय में मनुष्य के ज्ञान के सकल योग को ऐक्यबद्ध किया था। यह मानव इतिहास के आरम्भिक सोपानों में ज्ञान के विकास के निम्न स्तर के कारण सर्वथा स्वाभाविक था। सामाजिक उत्पादन के विकास और वैज्ञानिक ज्ञान के संचय की प्रक्रिया में भिन्न भिन्न विज्ञान दर्शनशास्त्र से पृथक होते गये और दर्शनशास्त्र एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में विकसित होने लगा। जगत के विषय में सामान्य दृष्टिकोण का विस्तार करने तथा सामान्य आधारों व नियमों का करने, यथार्थ के विषय में चिंतन की तर्कबुद्धिपरक, तर्क तथा संज्ञान के सिद्धांत विकसित करने की आवश्यकता से दर्शनशास्त्र का एक विशिष्ट अनुशासन के रूप में जन्म हुआ। पृथक विज्ञान के रूप में दर्शन का आधारभूत प्रश्न स्वत्व के साथ चिंतन के, भूतद्रव्य के साथ चेतना के सम्बन्ध की समस्या है।[1]

दर्शन अथवा फिलॉसफ़ी[संपादित करें]

दर्शन विभिन्न विषयों का विश्लेषण है । इसलिये भारतीय दर्शन में चेतना की मीमांसा अनिवार्य है जो आधुनिक दर्शन में नहीं। मानव जीवन का चरम लक्ष्य दुखों से छुटकारा प्राप्त करके चिर आनंद की प्राप्ति है। भारतीय दर्शनों का भी एक ही लक्ष्य दुखों के मूल कारण अज्ञान से मानव को मुक्ति दिलाकर उसे मोक्ष की प्राप्ति करवाना है। यानी अज्ञान व परंपरावादी और रूढ़िवादी विचारों को नष्ट करके सत्य ज्ञान को प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य उद्देश्य है। सनातन काल से ही मानव में जिज्ञासा और अन्वेषण की प्रवृत्ति रही है। प्रकृति के उद्भव तथा सूर्य, चंद्र और ग्रहों की स्थिति के अलावा परमात्मा के बारे में भी जानने की जिज्ञासा मानव में रही है। इन जिज्ञासाओं का शमन करने के लिए उसके अनवरत प्रयास का ही यह फल है कि हम लोग इतने विकसित समाज में रह रहे हैं। परंतु प्राचीन ऋषि-मुनियों को इस भौतिक समृद्धि से न तो संतोष हुआ और न चिर आनंद की प्राप्ति ही हुई। अत: उन्होंने इसी सत्य और ज्ञान की प्राप्ति के क्रम में सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं गूढ़तम साधनों से ज्ञान की तलाश आरंभ की और इसमें उन्हें सफलता भी प्राप्त हुई। उसी सत्य ज्ञान का नाम दर्शन है।

दृश्यतेह्यनेनेति दर्शनम् (दृष्यते हि अनेन इति दर्शनम्)

अर्थात् असत् एवं सत् पदार्थों का ज्ञान ही दर्शन है। पाश्चात्य फिलॉस्पी शब्द फिलॉस (प्रेम का)+सोफिया (प्रज्ञा) से मिलकर बना है। इसलिए फिलॉसफी का शाब्दिक अर्थ है बुद्धि प्रेम। पाश्चात्य दार्शनिक (फिलॉसफर) बुद्धिमान या प्रज्ञावान व्यक्ति बनना चाहता है। पाश्चात्य दर्शन के इतिहास से यह बात झलक जाती है कि पाश्चात्य दार्शनिक ने विषय ज्ञान के आधार पर ही बुद्धिमान होना चाहा है। इसके विपरीत कुछ उदाहरण अवश्य मिलेंगें जिसमें आचरण शुद्धि तथा मनस् की परिशुद्धता के आधार पर परमसत्ता के साथ साक्षात्कार करने का भी आदर्श पाया जाता है। परंतु यह आदर्श प्राच्य है न कि पाश्चात्य। पाश्चात्य दार्शनिक अपने ज्ञान पर जोर देता है और अपने ज्ञान के अनुरूप अपने चरित्र का संचालन करना अनिवार्य नहीं समझता। केवल पाश्चात्य रहस्यवादी और समाधीवादी विचारक ही इसके अपवाद हैं।

भारतीय दर्शन में परम सत्ता के साथ साक्षात्कार करने का दूसरा नाम ही दर्शन हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार मनुष्य को परम सत्ता का साक्षात् ज्ञान हो सकता है। इस प्रकार साक्षात्कार के लिए भक्ति ज्ञान तथा योग के मार्ग बताए गए हैं। परंतु दार्शनिक ज्ञान को वैज्ञानिक ज्ञान से भिन्न कहा गया है। वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने में आलोच्य विषय में परिवर्तन करना पड़ता है ताकि उसे अपनी इच्छा के अनुसार वश में किया जा सके और फिर उसका इच्छित उपयोग किया जा सके। परंतु प्राच्य दर्शन के अनुसार दार्शनिक ज्ञान जीवन साधना है। ऐसे दर्शन से स्वयं दार्शनिक में ही परिवर्तन हो जाता है। उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त हो जाती है। जिसके द्वारा वह समस्त प्राणियों को अपनी समष्टि दृष्टि से देखता है। समसामयिक विचारधारा में प्राच्य दर्शन को धर्म-दर्शन माना जाता है और पाश्चात्य दर्शन को भाषा सुधार तथा प्रत्ययों का स्पष्टिकरण कहा जाता है

दर्शनशास्त्र का क्षेत्र[संपादित करें]

दर्शनशास्त्र अनुभव की व्याख्या है। इस व्याख्या में जो कुछ अस्पष्ट होता है, उसे स्पष्ट करने का यत्न किया जाता है। हमारी ज्ञानेंद्रियाँ बाहर की ओर खुलती हैं, हम प्राय: बाह्य जगत् में विलीन रहते हैं। कभी कभी हमारा ध्यान अंतर्मुख होता है और हम एक नए लोक का दर्शन करते हैं। तथ्य तो दिखाई देते ही हैं, नैतिक भावना आदेश भी देती है। वास्तविकता और संभावना का भेद आदर्श के प्रत्यय को व्यक्त करता है। इस प्रत्यय के प्रभाव में हम ऊपर की ओर देखते हैं। इस तरह दर्शन के प्रमुख विषय बाह्य जगत्, चेतन आत्मा और परमात्मा बन जाते हैं। इनपर विचार करते हुए हम स्वभावत: इनके संबंधो पर भी विचार करते हैं। प्राचीन काल में रचना और रचयिता का संबंध प्रमुख विषय था, मध्यकाल में आत्मा और परमात्मा का संबंध प्रमुख विषय बना और आधुनिक काल में पुरुष और प्रकृति, विषयी और विषय, का संबंध विवेन का केंद्र बना। प्राचीन यूनान में भौतिकी, तर्क और नीति, ये तीनों दर्शनशास्त्र के तीन भाग समझे जाते थे। भौतिकी बाहर की ओर देखती है, तर्क स्वयं चिंतन को चिंतन का विषय बनाता है, नीति जानना चाहती है कि जीवन को व्यवस्थित करने के लिए कोई निरपेक्ष आदेश ज्ञात हो सकता है या नहीं।

तत्वज्ञान में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

1. ज्ञान के अतिरिक्त ज्ञाता और ज्ञेय का भी अस्तित्व है या नहीं?

2. अंतिम सत्ता का स्वरूप क्या है? वह एक प्रकार की है, या एक से अधिक प्रकार की?

प्राचीन काल में नीति का प्रमुख लक्ष्य नि:श्रेयस के स्वरूप को समझना था। आधुनिक काल में कांट ने कर्तव्य के प्रत्यय को मौलिक प्रत्यय का स्थान दिया। तृप्ति या प्रसन्नता का मूल्यांकन विवाद का विषय बना रहा है।

ज्ञानमीमांसा में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

1. ज्ञान क्या है?

2. ज्ञान की संभावना भी है या नहीं?

3. ज्ञान प्राप्त कैसे होता है?

4. मानव ज्ञान की सीमाएँ क्या हैं?

ज्ञानमीमांसा ने आधुनिक काल में विचारकों का ध्यान आकृष्ट किया। पहले दर्शन को प्राय: तत्वज्ञान (मेटाफिजिक्स) के अर्थ में ही लिया जाता था। दार्शनिकों का लक्ष्य समग्र की व्यवस्था का पता लगाना था। जब कभी प्रतीत हुआ कि इस अन्वेषण में मनुष्य की बुद्धि आगे जा नहीं सकती, तो कुछ गौण सिद्धांत विवेचन के विषय बने। यूनान में, सुकरात, प्लेटो और अरस्तू के बाद तथा जर्मनी में कांट और हेगल के बाद ऐसा हुआ। यथार्थवाद और संदेहवाद ऐसे ही सिद्धांत हैं। इस तरह दार्शनिक विवेचन में जिन विषयों पर विशेष रूप से विचार होता रहा है, वे ये हैं-

(1) मुख्य विषय -

(2) गौण विषय -

इन विषयों को विचारकों ने अपनी अपनी रुचि के अनुसार विविध पक्षों से देखा है। किसी ने एक पक्ष पर विशेष ध्यान दिया है, किसी ने दूसरे पक्ष पर। प्रत्येक समस्या के नीचे उपसमस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं।

भारतीय दर्शन[संपादित करें]

विस्तृत विवरण के लिये भारतीय दर्शन देखें।

वैसे तो समस्त दर्शन की उत्पत्ति वेदों से ही हुई है, फिर भी समस्त भारतीय दर्शन को आस्तिक एवं नास्तिक दो भागों में विभक्त किया गया है। जो ईश्वर यानी शिव जी तथा वेदोक्त बातों जैसे न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत पर विश्वास करता है, उसे आस्तिक माना जाता है; जो नहीं करता वह नास्तिक है।

आस्तिक या वैदिक दर्शन[संपादित करें]

वैदिक परम्परा के ६ दर्शन हैं :

  1. सांख्य
  2. योग
  3. न्याय
  4. वैशेषिक
  5. मीमांसा
  6. वेदान्त

यह दर्शन पराविद्या, जो शब्दों की पहुंच से परे है, का ज्ञान विभिन्न दृष्टिकोणों से समक्ष करते हैं। प्रत्येक दर्शन में अन्य दर्शन हो सकते हैं, जैसे वेदान्त में कई मत हैं।

नास्तिक या अवैदिक दर्शन[संपादित करें]

समकालीन भारतीय दार्शनिक[संपादित करें]

  1. श्री अरविन्द
  2. महात्मा गांधी
  3. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
  4. स्वामी विवेकानंद
  5. आचार्य रजनीश ओशो
  6. प्रभात रंजन सरकार

पाश्चात्य दर्शन[संपादित करें]

प्राचीन पाश्चात्य दर्शन[संपादित करें]

सुकरात-पूर्वी दर्शन[संपादित करें]

श्रेण्य युनानी दर्शन काल[संपादित करें]

हेलेनीय दर्शन काल[संपादित करें]

रोमन दर्शनकाल[संपादित करें]

मध्यकालीन दर्शन[संपादित करें]

आधुनिक पाश्चात्य दर्शन[संपादित करें]


समकालीन पाश्चात्य दर्शन[संपादित करें]

दर्शनशास्त्र में महिलाएं[संपादित करें]

यद्यपि दार्शनिक विद्या में पुरुषों का वर्चस्व रहा है, महिलाएं इस शास्त्र के लम्बे इतिहास के हर काल में व्यापक रही हैं। प्राचीन उदाहरणों में मैत्रेयी (१००० ईसा पूर्व), गार्गी वाचक्नवी (७०० ईसा पूर्व), मारोनिया की हिप्पर्चिया ( सक्रिय- ३२५ ईसा पूर्व) और साइरेन की एरेट (सक्रिय- ५वीं -४वीं शताब्दी ईसा पूर्व) का नाम प्रसंशनीय हैं। मध्ययुगीन और आधुनिक युग के दौरान कुछ महिला दार्शनिकों को स्वीकार किया गया था, लेकिन २०वीं और २१वीं सदी तक उनमें से किसी की भी दर्शन कृतियाँ, पाश्चात्य ग्रंथावली का हिस्सा नहीं बन पायी। २०वीं शताब्दी से ही सुज़ैन लैंगर, गर्ट्रूड एलिजाबेथ एंस्कोम्बे, हन्ना अरेंड्ट और सिमोन डी ब्यूवोइरजैसी दार्शनिकों के साथ महिलााएं दर्शन ग्रंथावली में प्रवेश करने लगीं।

दर्शन के इतिहास में स्त्री की भूमिका[संपादित करें]

प्रसिद्ध दार्शनिक और खगोलशास्त्री हाइपेशिया, की बीशप के विरुद्ध षण्यंत्र के आरोप में इसाइयों के एक झुंड ने हत्या कर दी।

दर्शन के इतिहासकारों का यह मानना है कि महिला दार्शनिकों को दर्शन-साहित्य से जानभूजकर, अपवर्जित किया गया है। द अटलांटिक के 13 मई, 2015 के अंक में , सुसान प्राइस ने चिन्हित किया कि भले ही 1747 में कांट ने अपने पहले कृति में एमिली डू चेटेलेट , एक दार्शनिक जो कि "... न्यूटन, धर्म, विज्ञान और गणित की विद्वान" थी, को उद्धृत करते हैं, पर, "नॉर्टन के दर्शनशास्त्र परिचय के नए संस्करण के 1,000 से अधिक पन्नो में उनका( डू चेटेलेट का) कार्य नहीं मिलेगा।[2]" नॉर्टन परिचय में 20वीं सदी के मध्य में आने एक भी महिला दार्शनिक का नाम उल्लेखित नहीं मिलता। शिक्षविदों का मानना है कि महिलाएं विश्वविद्यालय की कक्षाओं में प्रयुक्त अन्य प्रमुख संकलनों" से भी अनुपस्थित हैं। सुसान प्राइस नें कहा है कि विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र संकलन में आमतौर पर 17वीं सदी की महिला दार्शनिकों, जैसे कि मार्गरेट कैवेन्डिश, ऐनी कॉनवे , और लेडी डामारिस माशम, का उल्लेख नहीं है।[3] 1967 में प्रकाशित 'द एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फिलॉसफी' में "... 900 से अधिक दार्शनिकों पर लेख थे, लेकिन इसमें वोलस्टोनक्राफ्ट , अरेंड्ट या डी ब्यूवोइर के लिए एक प्रविष्टि तक शामिल नहीं थी। उस समय के निर्धारित ग्रंथसंग्रह के हिसाब से भी ये महिला दार्शनिक शायद ही कभी हाशिए पर थीं।"

पूर्वाधुनिक युग के दर्शन में[संपादित करें]

पश्चिम में, प्राचीन समय में प्लेटो और अरस्तू जैसे पुरुष दार्शनिकों का वर्चस्व था,इस अवधि के दौरान स्त्री दार्शनिक जैसे कि मैरोनिया की हिप्पर्चिया (सक्रिय 325 ईसा पूर्व), साइरेन की एरेट (सक्रिय 5 वीं -4 वीं शताब्दी ईसा पूर्व) और मिलेटस की एस्पासिया(470-400 ईसा पूर्व) मौज़ूद थीं।

उपनिषदों के सबसे पुराने साहित्य में, 700 ईसा पूर्व, महिला दार्शनिक गार्गी और मैत्रेयी, ऋषि याज्ञवल्क्य के साथ दार्शनिक शास्त्रार्थ व वाद विवाद का हिस्सा हैं। उभया भारती (800 ईस्वी) और अक्का महादेवी (1130-1160) भारतीय दार्शनिक परंपरा में अन्य महिला दार्शनिक हैं। 

चीन में, कन्फ्यूशियस ने लू की महिला जिंग जियांग (5वीं ईसा पूर्व) को बुद्धिमान और अपने छात्रों के लिए एक उदाहरण के रूप में सम्मानित किया, जबकि बान झाओ (45-116) ने कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और दार्शनिक ग्रंथ लिखे। कोरिया में,इम युंजीडांगो(1721-93) प्रबुद्ध मध्य-चुसन युग के दौरान सबसे उल्लेखनीय महिला दार्शनिकों में से एक थीं।उल्लेखनीय महिला मुस्लिम दार्शनिकों में बसरा की राबिया (714–801), दमिश्क की ऐशा अल-बाउनियाह (मृत्यु 1517), और वर्तमाम नाइजीरिया की सोकोतो खलीफा से नाना असमाउ (1793-1864) हैं। 

उल्लेखनीय मध्ययुगीन दार्शनिकों में हाइपेशिया (5वीं शताब्दी), बिंगन की सेंट हिल्डेगार्ड (1098-1179) और सिएना की सेंट कैथरीन (1347-1380) प्रमुख हैं। हाइपेशिया (ई. 350-370 से 415) एलेक्जेंड्रिया (जो कि उस समय पूर्वी रोमन साम्राज्य का हिस्सा था) की एक यूनानी गणितज्ञ,खगोलशास्त्री और दार्शनिक थी। वह अलेक्जेंड्रिया में नवप्लेटोवादि स्कूल की प्रमुख विचारक थीं, जहाँ उन्होंने दर्शन और खगोल विज्ञान पढ़ाया । हाइपेशिया, अपने जीवनकाल में एक महान शिक्षक और एक बुद्धिमान परामर्शदाता के रूप में प्रसिद्ध थी। रोमन अधिकारी ओरेस्टेस को अलेक्जेंड्रिया के बिशप, सिरिल के विरुद्ध भड़काने के आरोप में मार्च 415 ईस्वी में ईसाइयों की भीड़ द्वारा उसकी हत्या कर दी गई।

आधुनिक युग के दर्शन में[संपादित करें]

एमिली डू चेटेलेट (1706-1749) एक फ्रांसीसी गणितज्ञ, भौतिक विज्ञानी और प्रबुद्धता के युग के दौरान लेखक थे । उन्होंने इसाक न्यूटन के सुप्रसिद्ध ग्रंथ "प्राकृतिक दर्शन के गणितीय सिद्धांत" (लैटिनPhilosophiæ Naturalis Principia Mathematica) का अनुवाद किया और उसपर भाष्य भी लिखा। उन्होंने जॉन लॉक के दर्शन की आलोचना की और अनुभव के माध्यम से ज्ञान के सत्यापन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने स्वतंत्र इच्छा और तत्वमीमांसा की क्रियाविधि के बारे में भी सिद्धांत दिया।

मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट (1759-1797) एक अंग्रेजी लेखिका, दार्शनिक और महिलाओं के अधिकारों की हिमायती थीं । उन्हें नारीवादी दर्शन की संस्थापकों में से एक माना जाता है। "महिलाओं के अधिकारों की एक पक्षप्रमाणिकता" (अंग्रेजी - A Vindication of the Rights of Woman(1792)) उनका सबसे प्रसिद्ध और प्रभावशाली कार्य है, जिसमें उनका तर्क है कि महिलाएं स्वाभाविक रूप से पुरुषों से कमतर नहीं हैं, बल्कि केवल इसलिए दिखाई देती हैं क्योंकि उनमें शिक्षा की कमी है।

मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट द्वारा रचित "महिलाओं के अधिकारों की एक पक्षप्रमाणिकता", नारिवादि चिंतन का एक श्रेण्य ग्रंथ है।

रोजा लक्जमबर्ग (1871-1919) पोलिश-यहूदी वंश की मार्क्सवादी सिद्धांतकार, दार्शनिक, अर्थशास्त्री और क्रांतिकारी समाजवादी थी। जबकि लक्समबर्ग ने मार्क्स की द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और इतिहास की उनकी अवधारणा का बचाव किया, उन्होंने सहज जमीनी - आधारित वर्ग संघर्ष का आह्वान भी किया।

समकालिन दर्शन में[संपादित करें]

समकालीन दर्शन पश्चिमी दर्शन के इतिहास में वर्तमान काल है जो 19वीं शताब्दी के अंत में शैक्षिक दर्शन के व्यावसायीकरण के साथ तथा विश्लेषणात्मक और महाद्वीपीय दर्शन के उदय के साथ शुरू हुआ । इस अवधि की कुछ प्रभावशाली महिला दार्शनिकों में शामिल हैं:

एलिजाबेथ एंस्कोम्बे (1919-2001), एक ब्रिटिश विश्लेषणात्मक दार्शनिक थीं । एंस्कोम्बे के 1958 के लेख "मॉडर्न मोरल फिलॉसफी " ने विश्लेषणात्मक दर्शन की भाषा में " परिणामीवाद " शब्द की शुरुआत की , और समकालीन सद्गुण नैतिकता पर एक मौलिक प्रभाव डाला। उनके विनिबंध "इन्टेन्शन" को आम तौर पर उनके सबसे महान और सबसे प्रभावशाली कृतियों के रूप में जाना जाता है, जिससे इष्टार्थ, कार्रवाई और व्यावहारिक तर्क की अवधारणाओं में निरंतर दार्शनिक रुचि से मुख्य प्रेरणा मिलती रही है।

हन्ना अरेंड्ट (1906-1975) जर्मनी में जन्मी, अमेरिका में आत्मसात, एक यहूदी राजनीतिक सिद्धांतकार थी। उनकी रचनाएँ सत्ता की प्रकृति , और राजनीति के विषयों,प्रत्यक्ष लोकतंत्र,अधिकार और अधिनायकवाद से संबंधित हैं। वह समकालीन राजनीतिक दर्शनशास्त्र में एक प्रमुख विद्वान् हैं।

सिमोन डी बेवॉयर (1908-1986) एक फ्रांसीसी लेखक, बुद्धिजिवी, अस्तित्ववादी दार्शनिक, राजनीतिक कार्यकर्ता, नारीवादी और सामाजिक सिद्धांतकार थी।हालांकि वह खुद को एक दार्शनिक नहीं मानती थी, लेकिन नारीवादी अस्तित्ववाद और नारीवादी सिद्धांत दोनों पर उनका महत्वपूर्ण प्रभाव था। डी बेवॉयर ने दर्शन, राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर उपन्यास, निबंध, आत्मकथाएँ, और प्रबंध लिखे।वह अपने 1949 के ग्रंथ द सेकेंड सेक्स के लिए जानी जाती हैं, जो महिलाओं के उत्पीड़न का विस्तृत विश्लेषण और समकालीन नारीवाद का एक मूलभूत कृति है।

पेट्रीसिया चर्चलैंड (जन्म 1943) एक कनाडाई-अमेरिकी दार्शनिक हैं, जो तंत्रिकादर्शन(neurophilosophy) और मन के दर्शन में उनके योगदान के लिए विख्यात हैं । वह कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो (यूसीएसडी) में विश्वविद्यालय राष्ट्रपति की दर्शनशास्त्र की एमेरिटा प्रोफेसर हैं, जहां वह 1984 से पढ़ा रही हैं।

सुसान हैक (जन्म 1945) मानविकी में विशिष्ट प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर और मियामी विश्वविद्यालय में विधि की प्रोफेसर हैं। उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की । उन्होंने तर्कशास्त्र , भाषा के दर्शन ,ज्ञानमीमांसा और तत्वमीमांसा पर लिखा है । उसकी व्यावहारिकतावाद, चार्ल्स सैंडर्स पीयर्स के समान है ।दर्शन में हैक का प्रमुख योगदान उसका ज्ञानमीमांसक सिद्धांत है जिसे संस्थापकवाद(Foundheretism) कहा जाता है ,  जो शुद्ध नींववाद(Foundationalism, जो अनंत प्रतिगमन के लिए अतिसंवेदनशील है) और शुद्ध संसक्ततावाद(Coherentism, जो चक्रिलता के लिए अतिसंवेदनशील है) दोनों की तार्किक समस्याओं से बचने का उनका प्रयास है। वह हैक रिचर्ड रॉर्टी की घोर आलोचक रहे हैं । वह इस विचार की आलोचना करती हैं कि तर्क और वैज्ञानिक सत्य पर एक विशेष रूप से महिला दृष्टिकोण है और नारीवादी ज्ञानमीमांसा की आलोचनात्मक है । वह मानती हैं कि विज्ञान और दर्शन की कई नारीवादी आलोचनाएँ 'राजनीतिक संशुद्धता' से अत्यधिक चिंतित है।

फिलिपा फुट (1920–2010) एक ब्रिटिश दार्शनिक थी, जो नीतिशास्त्र  में उनके कार्यों के लिए सबसे उल्लेखनीय थी। वह अरस्तू की नैतिकता से प्रेरित, समकालीन सद्गुण नीतिशास्त्र की संस्थापकों में से एक थीं। उनके कुछ कार्य ,दर्शन के भीतर मानकदंडक नैतिकता के पुन: उभरने में महत्वपूर्ण थे, विशेष रूप से परिणामवाद और गैर-संज्ञानात्मकता की उनकी आलोचना । सुप्रसिद्ध ट्रॉली समस्या उनके द्वारा ही प्रतिपादित किया गया है। फ़ुट का दृष्टिकोण विट्गेन्स्टाइन के बाद के काम से प्रभावित था । 

जूडिथ बटलर (जन्म- 1956) एक अमेरिकी दार्शनिक और ज़ेन्डर सिद्धांतकार हैं, जिनके कार्य ने राजनीतिक दर्शन,  नीतिशास्त्र, समालोचनात्मक सिद्धांत और नारीवाद की तीसरी लहर  , क्वीर सिद्धांत , और साहित्यिक सिद्धांत के क्षेत्रों को प्रभावित किया है। वो लैंगिक प्रदर्शनत्व (gender performativity) की अवधारणा के लिए समकालीन अमेरिकी राजनीति और संकृति में एक प्रमुख हस्ति हैं।

मार्था नुस्बौम ( जन्म-1947) एक प्रसिद्ध बुद्धिजिवी, समकालिक अमेरिकी दार्शनिक और शिकागो विश्वविद्यालय में विधि और नीतिशास्त्र  की वर्तमान अर्न्स्ट फ्रायंड विशिष्ट सेवा प्रोफेसर हैं , जहां उन्हें विधि विद्यालय और दर्शन विभाग में संयुक्त रूप से नियुक्त किया गया है। पशु अधिकारों सहित प्राचीन यूनानी और रोमन दर्शन , राजनीतिक दर्शन , अस्तित्ववाद ,  नारीवाद और नीतिशास्त्र में उनकी विशेष योगदान है। उन्हें राजनीति में अमर्त्य सेन के साथ क्षमता दृष्टिकोण के विकास के लिये जाना जाता है। दक्षिणी एशियाई अध्ययन समिति की सदस्य हैं, और मानवाधिकार कार्यक्रम के बोर्ड सदस्य हैं। उन्हें कला और दर्शनशास्त्र में 2016 का क्योटो पुरस्कार , 2018 बर्गग्रेन पुरस्कार और 2021 का होलबर्ग पुरस्कार मिला।

वर्तमान चुनौतीयां[संपादित करें]

पूरे इतिहास में महिलाओं के दर्शन में भाग लेने के बावज़ूद, अकादमिक दर्शन में आज भी लिंग असंतुलन पर्याप्त है। इसका श्रेय महिलाओं के विरुद्ध भेदभाव और निहित पूर्वाग्रहों को दिया जा सकता है। महिलाओं को यौन उत्पीड़न जैसी कार्यस्थल की बाधाओं का सामना भी करना पड़ा है। १९९० के दशक की शुरुआत में, कैनेडीय दर्शन संगठन ने दावा किया कि दर्शन के शैक्षणिक क्षेत्र में लिंग असंतुलन और लिंग पूर्वाग्रह है।[4] स्टैनफोर्ड दर्शनशास्त्र विश्वकोश के संपादकों ने महिला दार्शनिकों के कम प्रतिनिधित्व के विषय में चिंता जताई है, और उन्हें महिला दार्शनिकों के योगदान का प्रतिनिधि सुनिश्चित करने के लिए संपादकों और लेखकों की आवश्यकता है।[5] जेनिफर शाऊल के अनुसार, "दर्शन, मानविकी में सबसे पुराना, सबसे पुरूष(वादि) भी है। जबकि मानविकी के अन्य क्षेत्र लैंगिक समानता पर या उसके निकट हैं, दर्शन वास्तव में यहां तक ​​कि,गणित की तुलना में भी अधिक पुरुष(वादि) है।" [6][7] अमेरिकी दार्शनिक मार्था नुसबौम , जिन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र में पीएचडी पूरी की १९९५ में, आरोप लगाया कि हार्वर्ड में अपनी पढ़ाई के दौरान उन्हें यौन उत्पीड़न और उनकी बेटी के लिए शिशुसंरक्षण प्राप्त करने में समस्याओं सहित भारी मात्रा में भेदभाव का सामना करना पड़ा।[8] १९९० के दशक की शुरुआत में, कैनेडीय दर्शन संगठन ने दावा किया कि "... दर्शनशास्त्र के लिंग असंतुलन" और "इसके कई सैद्धांतिक उत्पादों में पूर्वाग्रह और पक्षपात है" के "... इसके ठोस सबूत हैं।[9] १९९३ में, अमेरिकी दर्शनशास्त्र संगठन की यौन उत्पीड़न समिति ने दर्शन विभागों में इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-२६५-६६, ISBN ५-0१000९0७-२
  2. Price, Susan (2015-05-13). "Reviving the Female Canon". The Atlantic (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-10-15.
  3. Price, Susan (2015-05-13). "Reviving the Female Canon". The Atlantic (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-10-15.
  4. "Women in Philosophy: Problems with the Discrimination Hypothesis by Rafael De Clercq | NAS". www.nas.org (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-10-15.
  5. "Women in Philosophy: Problems with the Discrimination Hypothesis by Rafael De Clercq | NAS". www.nas.org (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-10-15.
  6. Price, Susan (2015-05-13). "Reviving the Female Canon". The Atlantic (अंग्रेज़ी में). अभिगमन तिथि 2022-10-15.
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