मीमांसा दर्शन

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मीमांसा या पूर्वमीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या बड़े विचार के साथ की गयी है। इसके प्रणेता जैमिनी हैं। मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है । किसी विषय पर गहराई से किए गये विचार-विमर्श को मीमांसा कहते हैं (मीमांसनं मींमांसा )। मीमांसा दर्शन में "धर्म क्या है" इस विषय पर मीमांसा की गई है । इसके अनुसार "चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः" अर्थात् वेद-वाक्य से लक्षित अर्थ, धर्म है । वेद ने जिन कर्मों को करने के लिये कहा है, उनको करना और जिनको करने से मना किया है, उनको न करना "धर्म" है। श्रौतसूत्र आदि कर्मकाण्ड के ग्रन्थों के वाक्यों को लेकर मीमांसा में पर्याप्त मात्रा में कर्म मीमांसा की गई है, साथ में इन्हीं वाक्यों पर भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों पर भी गहराई से विचार-विमर्श किया गया है।

इस शास्त्र काे 'पूर्वमीमांसा' और वेदान्त काे 'उत्तरमीमांसा' भी कहा जाता है। पूर्वमीमांसा में धर्म का विचार है और उत्तरमीमांसा में ब्रह्म का। अतः पूर्वमीमांसा काे धर्ममीमांसा और उत्तर मीमांसा काे 'ब्रह्ममीमांसा' भी कहा जाता है।

पूर्वमीमांसा के सूत्र जैमिनि के हैं और भाष्य शबर स्वामी का है। जैमिनि द्वारा रचित सूत्र हाेने से पूर्वमीमांसा काे 'जैमिनीय धर्ममीमांसा' कहा जाता है। मीमांसा पर कुमारिल भट्ट के 'तन्त्रवार्तिक' और 'श्लोकवार्तिक' भी प्रसिद्ध हैं । मध्वाचार्य ने भी 'जैमिनीय न्यायमाला विस्तार' नामक एक भाष्य रचा है । मीमांसा शास्त्र में यज्ञों का विस्तृत विवेचन है, इससे इसे 'यज्ञविद्या' भी कहते हैं । बारह अध्यायों में विभक्त होने के कारण यह मीमांसा 'द्वादशलक्षणी' भी कहलाती है। इस शास्त्र का 'पूर्वमीमांसा' नाम इस अभिप्राय से नहीं रखा गया है कि यह उत्तरमीमांसा से पहले बना । 'पूर्व' कहने का तात्पर्य यह है कि कर्मकांड मनुष्य का प्रथम धर्म है ज्ञानकांड का अधिकार उसके उपरान्त आता है।

मीमांसा का तत्वसिद्धान्त विलक्षण है । इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में है । आत्मा, ब्रह्म, जगत् आदि का विवेचन इसमें नहीं है । यह केवल वेद वा उसके शब्द की नित्यता का ही प्रतिपादन करता है । इसके अनुसार मन्त्र ही सब कुछ हैं । वे ही देवता हैं; देवताओं की अलग कोई सत्ता नहीं । 'भट्ट दीपिका' में स्पष्ट कहा है 'शब्द मात्रं देवता' । मीमांसकों का तर्क यह है कि सब कर्मफल के उद्देश्य से होते हैं । फल की प्राप्ति कर्म द्वारा ही होती हैं अतः वे कहते हैं कि कर्म और उसके प्रतिपादक वचनों के अतिरिक्त ऊपर से और किसी देवता या ईश्वर को मानने की क्या आवश्यकता है । मीमांसकों और नैयायिकों में बड़ा भारी भेद यह है कि मीमांसक शब्द को नित्य मानते हैं और नैयायिक अनित्य । सांख्य और मीमांसा दोनों अनीश्वरवादी हैं, पर वेद की प्रामाणिकता दोनों मानते हैं । भेद इतना ही है कि सांख्य प्रत्येक कल्प में वेद का नवीन प्रकाशन मानता है और मीमांसक उसे नित्य अर्थात् 'कल्पान्त में भी नष्ट न होनेवाला' कहते हैं ।

पक्ष-प्रतिपक्ष को लेकर वेदवाक्यों के निर्णीत अर्थ के विचार का नाम मीमांसा है। उक्त विचार पूर्व आर्य परम्परा से चला आया है। किन्तु आज से प्रायः सवा पाँच हजार वर्ष पूर्व सामवेद के आचार्य कृष्ण द्वैपायन के शिष्य ने उसे सूत्रबद्ध किया। सूत्रों में पूर्व पक्ष और सिद्धान्त के रूप में बादरायण, बादरि, आत्रेय, आश्मरथ्य, आलेखन, ऐतिशायन, कामुकायन, कार्ष्णाजिनि और लाबुकायन महर्षियों का उल्लेख मिलता है, जिसका विस्तृत विवेचन सूत्रों के भाष्य और वार्तिक में किया गया है, जिनसे सहस्राधिकरण हो गए हैं।

जर्मन विद्वान मैक्समूलर का कहना है कि - "यह दर्शन शास्त्र कोटि में नहीं आ सकता, क्योंकि इसमें धर्मानुष्ठान का ही विवेचन किया गया है। इसमें जीव, ईश्वर, बन्ध, मोक्ष और उनके साधनों का कहीं भी विवेचन नहीं है।"

मैक्समूलर मत के पक्षपाती कुछ भारतीय विद्वान् भी इसे दर्शन शास्त्र कहने में संकोच करते हैं, क्योंकि न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग और वेदान्त में जिस प्रकार तत् तत् प्रकरणों में प्रमाण और प्रमेयों के द्वारा आत्मा-अनात्मा, बन्ध-मोक्ष आदि का मुख्य रूप से विवेचन मिलता है, वैसा मीमांसा दर्शन के सूत्र, भाष्य और वार्तिक आदि में दृष्टिगोचर नहीं होता।

उपर्युक्त विचारकों ने स्थूल बुद्धि से ग्रंथ का अध्ययन कर अपने विचार व्यक्त किए हैं। फिर भी स्पष्ट है कि मीमांसा दर्शन ही सभी दर्शनों का सहयोगी कारण है। जैमिनि ने इन विषयों का बीज रूप से अपने सूत्रों में उपन्यास किया है "सत्संप्रयोगे पुरुषस्येंद्रियणां बुद्धि जन्म तत् प्रत्यक्षम्" (जै.ध.मी.सू. १.१.४) चतुर्थ सूत्र में दो शब्द आए हैं - पुरुष और बुद्धि। पुरुष शब्द से "आत्मा" ही विवक्षित है। यह अर्थ कुमारिल भट्ट ने "भाट्टदीपिका" में लिखा है। बुद्धि शब्द से ज्ञान, (प्रमिति) प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण अर्थ को व्यक्त किया गया है।

वृत्तिकार ने "तस्य निमित्त परीष्टिः" पर्यन्त तीन सूत्रों में प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि प्रमाणों का सपरिकर विशद विवेचन तथा औत्पत्तिक सूत्र में आत्मवाद का विशेष विवेचन अपने व्याख्यान में किया है। इसी का विश्लेषण शाबर भाष्य, श्लोकवार्तिक, शास्त्रदीपिका, भाट्टचिन्तामणि आदि ग्रंथों में किया गया है जिसमें प्रमाण और प्रमेयों का भेद, बंध, मोक्ष और उनके साधनों का भी विवेचन है।

मीमांसा दर्शन में भारतवर्ष के मुख्य प्राणधन धर्म का वर्णाश्रम व्यवस्था, आधानादि, अश्वमेधांत आदि विचारों का विवेचन किया गया है।

प्रायः विश्व में ज्ञानी और विरक्त पुरुष सर्वत्र होते आए हैं, किंतु धर्माचरण के साक्षात् फलवेत्ता और कर्मकांड के प्रकांड विद्वान् भारतवर्ष में ही हुए हैं। इनमें कात्यायन, आश्वलायन, आपस्तम्ब, बोधायन, गौतम आदि महर्षियों के ग्रन्थ आज भी उपलब्ध हैं। (कर्मकांड के विद्वानों के लिए उपनिषदों में महाशालाः श्रोत्रियाः, यह विशेषण प्राप्त होता है)। भारतीय कर्मकांड सिद्धांत का प्रतिदान और समर्थन इसी दर्शन में प्राप्त होता है। डॉ॰ कुंनन् राजा ने "बृहती" के द्वितीय संस्करण की भूमिका में इसका समुचित रूप से निरूपण किया है। यद्यपि कणाद मुनि कृत वैशेषिक दर्शन में धर्म का नामतः उल्लेख प्राप्त होता है - (1. 1, 11. 1. 2, 1.1. 3) तथापि उसके विषय में आगे विचार नहीं किया गया है। किसी विद्वान् का कहना है -

धर्मव्याख्यातुकामस्य षट् पदार्थविवेचनम्।
समुद्रं गंतुकामस्य हिमवद् गमनं यथा॥

अर्थात् जैसे कोई मनुष्य समुद्र पर्यन्त जाने की इच्छा रखते हुए हिमालय में चला जाता है, उसी प्रकार धर्म के व्याख्यान के इच्छुक कणाद मुनि षट् पदार्थों का विवेचन करते रह गए। उत्तर मीमांसा (वेदान्त) के सिद्धान्त के अनुसार कर्मत्याग के पश्चात् ही आत्मज्ञान प्राप्ति का अधिकार है, किन्तु पूर्व मीमांसा दर्शन के अनुसार-

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥

इस वेदमन्त्र के अनुसार मुमुक्षु जनों को भी कर्म करना चाहिए। वेदविहित कर्म करने से कर्मबंधन स्वतः समाप्त हो जाता है - (कर्मणा त्यज्यते ह्यसौ, तस्मान्मुमुक्षुभिः कार्य नित्यं नैमित्तिकं तथा आदि वचनों के अनुसार भारतीय आस्तिक दर्शनों का मुख्य प्राण मीमांसा दर्शन है।

मीमांसा दर्शन का स्वरूप[संपादित करें]

जैमिनीय मीमांसा सोलह अध्यायों का है, जिसमें बारह अध्याय क्रमबद्ध हैं तथा शास्त्रसंगति, अध्यायसंगति, पादसंगति और अधिकारसंगतियों से सुसंबद्ध है। इन बारह अध्यायों में जो छूट गया है, उसका निरूपण शेष चार अध्यायों में किया गया है जो 'संकर्षकाण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। उसमें देवता के अधिकार का विवेचन किया गया है। अतः उसे 'देवता कांड' भी कहते हैं अथवा द्वादश अध्यायों का परिशिष्ट भी कह सकते हैं। कुल मिलाकर १६ अध्याय है । प्रत्येक अध्याय पादों में विभक्त है । प्रति अध्याय पाद की सङ्ख्या भिन्न-भिन्न है । प्रत्येक पाद पुनः विभिन्न अधिकरणों में विभक्त है । इन्हीं अधिकरणों को 'न्याय' भी कहते हैं । इस प्रकार मींमांसा में लगभग १००० न्याय है । छह दर्शन में सब से बड़ा दर्शन मीमांसा दर्शन है ।

भास्कर राय दीक्षित ने संकर्षण कांड की व्याख्या के अन्त में लिखा है कि षोडषाध्यायी मीमांसा के रहते हुए भी मध्य काल में द्वादशाध्याय का ही पठनपाठन होता था। जिस तरह चतुष्पदा गायत्री के रहने पर भी विद्वान् वर्ग त्रिपदा गायत्री को ही जपते हैं, उसी तरह वर्तमान काल में द्वादशाध्यायी मीमांसा का ही अध्ययन अध्यापन प्रचलित है।

कुछ विद्वानों के अनुसार मीमांसा के बिना वाक्यार्थ का निर्णय करना कठिन है, क्योंकि अमुक वाक्य उपस्थित अर्थ में प्रमाण है अथवा अन्य अर्थ में, इस विचार के निर्णय में जो निष्कर्ष आता है उसे मीमांसा कहा गया है, किंतु यहाँ मीमांसा शब्द का अर्थ दर्शन से है।

धर्मज्ञान के लिए परस्पर विरोध रहित वेदमंत्रों के अर्थों के विचार का नाम मीमांसा है। और विचारपूर्वक प्राप्त धर्मज्ञान मीमांसा का फल है। यही बात जैमिनि ने अपने मीमांसा दर्शन में कही है - अथातो धर्म जिज्ञासा। 1.1.1। कुमारिल भट्ट ने इसे इस प्रकार वर्णन किया है -

धर्माख्यं विषयं वक्तुं मीमांसायाः प्रयोजनम्।

आगे वाक्यार्थ निर्णयोपयोगी सहस्रों न्यायों का वर्णन किया गया है। यहाँ तक छह अध्यायों का संक्षिप्त विषयनिर्देश किया गया।

इस दर्शन में प्राप्ताप्राप्त विवेक न्याय से, अथवा अदग्ध दहन न्याय से उद्देश्य विधेय भाव का विचार कर वेद-वाक्यार्थ-निर्णय से कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान होता है। इसलिए धर्मज्ञान ही मीमांसा दर्शन का प्रयोजन है। इस दर्शन में धर्मविचार से उपक्रम (प्रारंभ) है। व्याकरण के लिए "पदशास्त्र", वैशेषिक न्याय के लिए "प्रमाणशास्त्र" और मीमांसा के लिए "वाक्यशास्त्र" का प्रयोग संस्कृत साहित्य में होता है। इस शास्त्र में ही धर्मविचार की चर्चा हैं। भारतीय जनता का मुख्य उद्देश्य धर्मानुष्ठान है। अनुष्ठान फल के बिना नहीं हो सकता और फलसाधनता भी साधन सामग्री के बिना नहीं हो सकती। अतः संक्षेप में साधन का भी विवेचन किया जाता है।

अनुष्ठान के पूर्व धर्म का लक्षण, प्रमाण और साधन फल जानना आवश्यक है। इस शास्त्र में साधन, अंग और शेष, ये तीनों पर्यायवाचक शब्द हैं। ऐसे ही साध्य, शेषी और अंगी ये तीनों पर्यायवाची हैं। उदाहरण के लिए स्वर्गप्राप्ति के निमित्त दर्श पूर्णमास का अनुष्ठान यदि करना हो तो उसमें दर्श और पूर्णमास अंगी होंगे और प्रयाज आदि अंग होंगे। दर्श याग अमावस्या तिथि को और पूर्णमास याग पूर्णिमा तिथि को होता है।) इसमें अंगी प्रधान अंग का प्रयोजक है और अंग प्रयोज्य है। इस प्रकार धर्मप्राप्ति के साधनों को जानकर अनुष्ठान के लिए पौर्वापर्य का भी ज्ञान अपेक्षित है एवं फल के लिए अनुष्ठेय अग्नि होत्रादि कर्मों के प्रकरण में पूर्वांग और उत्तरांग साधनों का भी विवेचन है, जिनके लिए "प्रकृति" शब्द का प्रयोग होता है। किंतु सौर्यादि कर्मके सन्निधि में अंग का पाठ नहीं है। उस स्थल पर आकांक्षा के उदय होने पर दर्श पूर्णमास में प्रतिपादित अंगों को लेना होता है जिसे अतिदेश कहते हैं। (यहाँ तक उत्तर षट्क का संक्षिप्त विषयनिर्देश हुआ)।

अन्य अंगों का संक्षिप्त विचार[संपादित करें]

सामान्य रूप से निर्णय होने पर भी किस कर्म से किस कर्म में अंग का आगमन होता है, इसका विवेचन विशेषातिदेश से कहा गया है। अंगों का अतिदेश होने पर भी प्रकृति में भेद होने के कारण प्राकृत पद के स्थान पर पदांतर को रखकर पाठ किया जाता है। उदाहरणार्थ "अग्नेय त्वा जुष्टं निर्वपामि"। इस श्रुतिवाक्य में अग्नि पद के स्थान में "सौर्योयेष्टि" के सूर्यपद रखकर "सूर्याय त्वाजुष्टं निर्वपामि" इस श्रुति को पढ़ते हैं। ऐसे वाक्य को "ऊह" कहते हैं। इन बातों के ज्ञान बिना यह समझ लेना संभव नहीं है कि किस अंग का कहाँ और कैसे उपयोग करना चाहिए जिससे अनुष्ठान समुचित फलदायक हो सके। जिस स्थल पर अंग पठित न हो वहाँ अन्य स्थल से अंग लाना चाहिए, किंतु जो विकृति याग के उपकार कर सकते हों वे ही प्रकृति में लिए जा सकते हैं। जो विकृति में उपकार नहीं कर सकते वहाँ अन्य अंगों का अध्याहार नहीं होता। और उनका अनुष्ठान भी नहीं होता। ऐसे वचनों को "बाध" कहते हैं। किस अंग का बाध होता है और किसका नहीं, इसका निर्णय "ऊह" बाध के अधीन है। एवं अभीप्सित फलदाता कर्म एक ही होता है। किंतु कहीं कहीं अनेक भी होते हैं। कुछ अंगों का अनुष्ठान प्रधान से पूर्व तथा कुछ का प्रधान के पश्चात् भी किया जाता है। उदाहरणार्थ सामिधेनी प्रायाजादि तथा स्विष्ट कृत अनुयाजादि। एक ही समय पर उन अंगों का एक बार अथवा अनेक बार प्रयोग करने के विषय में कहा गया है -

एक बार प्रयोग करने का नाम तंत्र है और अनेक (असकृत) बार के करने का नाम "आवृत्ति" अथवा "आवाप" है। कहीं कहीं अंगों का तंत्र से अनुष्ठान होता है और कहीं कहीं आवृत्ति से। इसलिए तंत्र और आवाप का विचार भी आवश्यक है।

किसी फल विशेष के लिए प्रधान अंगी का अनुष्ठान करते हैं और उसके अंगों को भी करते हैं। उन अंगों को भी अन्य अंगों की अपेक्षा होने पर जिसके प्रयोग की आवश्यकता होती है उसे प्रसंगी कहते हैं। इसमें प्रधान तंत्री होता है, जिसे प्रसंग कहते हैं। उदाहरणार्थ अग्निष्टोमीय पशु पुरोडाशादि पूर्वोक्त विषयों का पूर्णज्ञाता व्यक्ति ही सांगोपांग धर्मानुष्ठान कर सकता है, जिसकी विवेचना "मीमांसा दर्शन" में जैमिनि ने की है।

विभिन्न अध्यायों की विषयवस्तु[संपादित करें]

पूर्वमीमांसा में कुल सूत्रों की संख्या २७४५ है। छहों दर्शनों में मीमांसा सबसे बड़ा दर्शन है। इसका क्षेत्र समस्त वैदिक वाङ्मय में व्याप्त है, अतः इसकी क्लिष्टता कुछ बढ़ जाती है। इसमें बारह अध्याय हैं, नौ अध्यायों में चार-चार पाद हैं और तीसरे, छठे और दसवें अध्यायों में आठ-आठ पाद हैं। इनके अतिरिक्त चतुरध्यायात्मक संकर्ष काण्ड है, जिसे द्वादशाध्यायात्मक पूर्वमीमांसा का परिशिष्ट कहा जा सकता है। पूर्वमीमांसा के बारह अध्यायों में प्रतिपादित विषय संक्षेपत: निम्न प्रकार है—[1]

(१) प्रथम अध्याय "प्रमाणलक्षण" कहा गया है। इसके प्रथम पाद में विधि वाक्यों का प्रामाण्य, द्वितीय पाद में अर्थवाद एवं मन्त्र का प्रामाण्य, तृतीय पाद में मनु आदि स्मृतियों का प्रामाण्य और चतुर्थपाद में उद्भिद् आदि की नामधेयता (संज्ञा) का प्रामाण्य प्रतिपादित है।

(२) द्वितीय अध्याय "नानाकर्मलक्षण" कहा गया है, जिसके प्रथम पाद में अपूर्व आदि उपोद्धात, द्वितीय पाद में कर्म के भेद, तीसरे पाद में कर्मभेद, प्रामाण्य के अपवाद और चतुर्थपाद में नित्य-काम्य प्रयोगों का भेद निरूपित किया गया है।

(३) तृतीय अध्याय "शेषविनियोगलक्षण" कहा गया है। इसके प्रथमपाद में अङ्गत्व के बोधक छह प्रमाणों में से श्रुति, द्वितीय पाद में लिङ्ग, तृतीय पाद में वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्या का विवेचन, चतुर्थ पाद में श्रुति आदि का परस्पर विरोध-अविरोध, पञ्चम पाद में प्रतिपत्तिकर्म, षष्ठ पाद में अनारभ्याधीत, सप्तम पाद में प्रधानोपकारक कर्म और अष्टम पाद में यजमान के कर्मों पर विचार किया गया है।

(४) चतुर्थ अध्याय "प्रयोजकाप्रयोजकलक्षण" कहा गया है। इसके प्रथम पाद में प्रधान का प्रयोजकत्व, द्वितीय पाद में अप्रधान का प्रयोजकत्व, तृतीय पाद में द्रव्य-संस्कार-कर्मों का फलादि और चतुर्थ पाद में मुख्य-गौण अङ्गत्वादि का विवेचन किया गया है।

(५) पञ्चम अध्याय "क्रमनियमलक्षण" कहा गया है। इसके प्रथम पाद में श्रुति-अर्थ-पाठ का क्रम, द्वितीय पाद में क्रमविशेष, तृतीय पाद में वृद्धि-अवृद्धि आदि और चतुर्थ पाद में श्रुति आदि में पूर्व-पूर्व प्राबल्य का निरूपण है।

(६) षष्ठ अध्याय के प्रथम पाद में कर्मानुष्ठान में अधिकारी, द्वितीय पाद में अधिकारी के धर्म, तृतीय पाद में मुख्य के अभाव में प्रतिनिधि का ग्रहण, चतुर्थ पाद में कर्म का लोप, पञ्चम पाद में कालादि की विगुणता में प्रायश्चित्त, षष्ठ पाद में सत्र के अधिकारी, सप्तपाद में पित्रादि का अदेयत्व और अष्टम पाद में लौकिक अग्नि में होम का निरूपण है।

(७) सप्तम अध्याय के प्रथम प्राद में प्रत्यक्ष वचनों से अतिदेश, द्वितीय पाद में पूर्वोक्त अतिदेश का शेष, तृतीय पाद में अग्निहोत्र नाम से अतिदेश और चतुर्थ पाद में लिङ्ग का अतिदेश प्रतिपादित है।

(८) अष्टम अध्याय के प्रथम पाद में स्पष्ट लिङ्गों से अतिदेश, द्वितीय पाद में अस्पष्ट लिङ्गों से अतिदेश, तृतीय पाद में प्रबल लिङ्ग से अतिदेश और चतुर्थ पाद में अतिदेश के अपवादों का निरूपण किया गया है।

(९) नवम अध्याय के प्रथम पाद में ऊह का आरम्भ, द्वितीय पाद में साम का ऊह, तृतीय पाद में मन्त्र का ऊह और चतुर्थ पाद में मन्त्रोह पर प्रासङ्गिक विवेचन है।

(१०) दशम अध्याय के प्रथम पाद में बाध के हेतु द्वार-लोप, द्वितीय पाद में द्वार-लोप का विस्तार, तृतीयपाद में बाध के कारण कार्य-सम्बन्धी समानता, चतुर्थ पाद में बाध-कारण के अभाव में समुच्चय, पञ्चम पाद में बाध के प्रसङ्ग से ग्रहादि, षष्ठ पाद में बाध के प्रसङ्ग से नाम सम्बन्धी विचार, सप्तम पाद में बाध सम्बन्धी सामान्य विचार और अष्टम पाद में नञर्थ सम्बन्धी विचार है।

(११) एकादश अध्याय के प्रथम पाद में तन्त्र का आरम्भ, द्वितीय पाद में तन्त्र एवं आवाप, तृतीय पाद में तन्त्र का विस्तार और चतुर्थ पाद में आवाप का विस्तार निरूपित किया गया है।

(१२) द्वादश अध्याय के प्रथम पाद में प्रसङ्ग, द्वितीय पाद में तन्त्रियों का निर्णय, तृतीय पाद में समुच्चय और चतुर्थ पाद में विकल्प का विवेचन है॥

इस प्रकार एक एक विषय का प्रतिपादन बारह अध्यायों वाले इस मीमांसा दर्शन में किया गया है जिसे "द्वादशलक्षणी" भी कहा गया है। यहाँ लक्षण शब्द अध्यायवाचक है। इसको दो प्रकार से विभक्त किया गया है जिसे उपदेश और अतिदेश कहते हैं। प्रथम (पूर्व षट्क) अध्यायों में उपदेश का विवेचन है। द्वितीय (उत्तर षट्क) के छह अध्यायों में अतिदेश का विवेचन है। उक्त उपदेश अतिदेश द्वय विचारात्मक शास्त्र है। शास्त्र दीपिकाकार पार्थसारथि मिश्र के अनुसार उपदेश विचार के अनंतर अतिदेश विचार का आरंभ होता है।

वर्तमान काल में उपलब्ध मीमांसा दर्शन में द्वादश अध्याय हैं। प्रत्येक अध्याय में चार पाद होते हैं, किंतु तृतीय, षष्ठ और दशम अध्यायों में आठ आठ पाद हैं, जिसे "शबरा" अध्याय भी कहते हैं। इस तरह संपूर्ण ग्रंथ में साठ पाद हैं।

इस दर्शन की सूत्रसंख्या में विवाद है। किसी के मत में दो सहस्र छह सौ बावन (2652), किसी के मत में दो सहस्र सात सौ बयालीस (2742) सूत्र हैं। उपर्युक्त वर्णन "ऐसेकित" की "कर्ममीमांसा" नामक पुस्तक पृष्ठ चार में प्रतिपादित है। आनन्द आश्रम पूना से प्रकाशित "न्यायमाला" में दो सहस्र सात सौ पैंतालीस (2745) सूत्रों का प्रतिपादन है।

इसी प्रकार कुछ व्यक्तियों के मत से अधिकरण संख्या नौ सौ सात (907) प्राप्त होती है। कुछ के मत से नौ सौ पंद्रह (915) सूत्र हैं। किंतु "मीमांसासार संग्रह" के कर्ता शंकर भट्ट के अनुसार "पूर्वषट्क" में पाँच सौ तीस, (530) उत्तरषट्क में चार सौ सत्तर (470) सूत्र हैं। इस प्रकार संपूर्ण अधिकरण एक सहस्र संख्या में विभाजित है।

नत्वागणेश-वाग्राम-गुर्वङ्घ्रीन् भट्टशंकरः।
सहस्रं वक्ति सिद्धांतान् सार्धश्लोक शतद्वयान्॥

उपर्युक्त श्लोक के अनुसार अधिकरणों की संख्या एक सहस्र दो सौ पचास (1250) है।

अधिकरणों तथा सूत्रों के नियम[संपादित करें]

अनेक सूत्रों से एक अधिकरण बनता है, जिसमें एक प्रधान सूत्र तथा अन्य गुण सूत्र होते हैं। प्रधान सूत्र पूर्व पक्ष का प्रतिपादन करता है और अन्य सूत्र सिद्धांत का प्रतिपादन करते हैं। कहीं कहीं पर दो सूत्रों के द्वारा पूर्वोत्तर पक्ष का प्रतिपादन किया गया है। ऐसे ही कहीं कहीं पर बिना सूत्र के ही पूर्व पक्ष का उत्थापन करके सूत्र से सिद्धांत का प्रतिपादन किया गया है। कहीं कहीं सिद्धांत रूप से उपक्रम द्वारा पूर्व पक्ष कर सिद्धांत का प्रतिपादन किया है। एक पाद में कतिपय अधिकरण होते हैं। उदाहरणार्थ प्रथम पाद में आठ अधिकरण हैं।

अधिकरण में छः पदार्थ होते हैं - विषय, संशय, पूर्वपक्ष, सिद्धान्त, प्रयोजन और संगति। संगति तीन प्रकार की होती है - शास्त्र संगति, अध्याय संगति और पाद संगति।

प्रथम सूत्र - प्रथम अधिकरण का नाम जिज्ञासा अधिकरण है। विचार शास्त्र विषय है। विचार शास्त्र (विषय) आरंभ करने योग्य है या नहीं, यह संशय है। आरंभ करने योग्य नहीं है, यह पूर्व पक्ष है। सिद्धांत है कि विचार शास्त्र आरंभ करना चाहिए। इस विषय का मूल है कुमारिल भट्ट के मत में अध्ययन विधि और "प्रभाकर" (गुरु) मत में अध्यापन विधि। पूर्वपक्ष में अध्ययन का अदृश्य प्रयोजन है और सिद्धांत पक्ष में अर्थ-ज्ञान-रूप दृष्ट प्रयोजन है।

धर्म के विचार शास्त्र संबंधी होने के कारण इस विचार शास्त्र में इसका विवेचन संगत है। इस (प्रथम) अधिकरण में अध्ययन दृष्टार्थ होता है, यही सिद्ध किया गया है। अतएव विचार शास्त्र का मूल अध्ययन विधि है। अर्थज्ञान का साधन (विचार) अध्ययन विधि से आक्षिप्त होता है। इसीलिए विचार शास्त्र का आरंभ वैध है।

द्वितीय सूत्र - द्वितीय अधिकरण में धर्म का लक्षण और प्रमाण है, जिसकी कर्तव्यता विधिवाक्य से प्रतीत होती है। वह श्रेय का साधन है। यहाँ श्रेय शब्द से ऐहिक और आमुष्मिक दोनों अर्थ अभिप्रेत हैं। गम्य धर्म में गमक विधिवाक्य प्रमाण होता है। जो निषेध द्वारा प्रतिपादित होता है वह अनर्थ का साधन होता है, उसे ही अधर्म कहते हैं।

तृतीय सूत्र - तृतीय अधिकरण में विधि वाक्य ही प्रमाण है। यहाँ प्रतिज्ञा मात्र की गई है। वे दो प्रकार कही हैं - "चोदनैव लक्षणं यस्य, चोदना लक्षणमेव यस्य" अर्थात् यहाँ प्रत्यक्ष आदि प्रमाण धर्म से प्रमाण नहीं होते, किंतु विधिवाक्य ही धर्म में प्रमाण माना गया है।

चतुर्थ सूत्र - इस सूत्र में प्रथम प्रतिज्ञा के समर्थन के लिए चतुर्थ अधिकरण है। इस अधिकरण में लोक सिद्ध प्रत्यक्ष प्रमाण का लक्षण - "इंद्रियार्थसन्निकर्षजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्"। अर्थात् प्रत्यक्ष वर्तमान सन्निकृष्ट को ही ग्रहण करता है और धर्म उत्पद्यमान है, अतएव प्रत्यक्ष धर्म में प्रमाण नहीं हो सकता, क्योंकि धर्म भविष्यत् कालिक है। इन वचनों से मीमांसाकार ने प्रत्यक्षोपजीवी अनुमान उष्मान और अर्थापत्ति को भी प्रमाण नहीं माना है।

पंचम सूत्र - चतुर्थ सूत्र में चतुर्थ अधिकरण की प्रथम जिज्ञासा का समर्थन करके पंचम सूत्र के पंचम अधिकरण में द्वितीय प्रतिज्ञा का समर्थन किया गया है। इस अधिकरण में विधिवाक्य ही प्रमाण है, इसी प्रतिज्ञा का समर्थन किया गया है। इसी प्रसंग में प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः उत्पन्न और स्वतः गृहीत होता है। अर्थात् ज्ञानजनक सामग्री से प्रामाण्य उत्पन्न होता है और उसी सामग्री से प्रामाण्य गृहीत भी होता है।

वाक्य दो प्रकार के होते हैं - लौकिक और वैदिक। लौकिक वाक्य पौरुषेय (पुरुषकृत) होने के कारण पुरुषगत भ्रम, प्रमाद, विप्रलंभ (विप्रलिप्सा), करणापाटव आदि दोषों से युक्त होता है, अतएव पौरुषेय वाक्य प्रमाण नहीं होता।

मंत्र ब्राह्मणात्मक शब्दराशि वेद अपौरुषेय (पुरुषाप्रणीत) है। अतः विधिवाक्य में अप्रामाण्य के कारण भ्रमादि नहीं होने से विधिवाक्य ही धर्म में प्रमाण हैं। इस द्वितीय प्रतिज्ञा का समर्थन करने के लिए प्रमाण का लक्षण और शब्दार्थ का संबंध नित्य है। बादरायण ने भी प्रामाण्य में परापेक्षा को स्वीकार नहीं किया है।

वेद से पुरुष का संबंध[संपादित करें]

पदार्थ-प्रतिपादन में संकेत द्वारा शब्द से पदार्थों का, वाक्यार्थ-प्रतिपादन में ग्रंथ का और रचना द्वारा (पद का) पुरुष का त्रिधा संबंध होता है। शब्द और अर्थ का वाच्य-वाचक-संबंध नित्य मानकर वेद में पुरुष-प्रवेश का खंडन किया गया है। अर्थात्, वेद पुरुष के द्वारा प्रणीत हैं -ऐसा कहने का कारण यह है कि हमनें वाक्यों को बिना व्यक्ति के कभी नहीं सुना, पढा या जाना है। जबकि मीमांसकों के मत में शब्द (पद या वाक्य) तथा उसके द्वारा प्रतिपाद्य घटपटादि-अर्थ का सम्बन्ध नित्य है। अतः 'ये पद इस अर्थ को बताता है'- इस बात का हमें पता न होने पर भी पद अपने प्रतिपाद्य को बताता ही है। अर्थात् शक्तिग्रह न होने पर भी पद में प्रतिपादनसामर्थ्य है ही। और वाक्यार्थ संबंध के द्वारा पुरुष संबंध को पृथक् करने के लिए वाक्याधिकरण की प्रवृत्ति है। इस अधिकरण में यथा पद की पदार्थ में शक्ति होती है, वैसे ही वाक्य की वाक्यार्थ में शक्ति होती है, ऐसे जो प्रतिपादन करते हैं उसकी आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि पद से उपस्थित पदार्थ ही आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति से अन्वित होकर अंशत्रय विशिष्ट भावनारूप वाक्यार्थ का प्रतिपादन करता है। वैयाकरण मत से वाक्यार्थ वाक्यशक्ति से भासित होता है। इस मत के अनुसार शब्दबोध में पदार्थों का परस्पर संबंध संसर्ग मर्यादा से भासता है। यह नैयायिकों का मत है, जिससे वाक्य की वाक्यार्थ में पृथक् शक्ति की प्रतीति होती है, किंतु कुमारिल भट्ट ने अभिहितान्वय का समर्थन किया है। प्रभाकर ने अन्विताभिधान का समर्थन किया है। इस तरह वाक्यार्थ में पुरुष संडंध द्वितीय प्रकार से निरस्त हुआ। तृतीय प्रकार ग्रंथ रचना द्वारा होता है।

संदर्भ वाक्य का पुरुष के साथ दो प्रकार से संबंध होता है, एक कर्तृ-कर्म-भाव-संबंध द्वारा और द्वितीय प्रयुक्त-प्रवचन-भाव-संबंध द्वारा होता है। प्रवचन सर्वसाधारण और रचना असाधारण होती है। असाधारण विशेषण होता है। अतएव वेद पौरुषेय है।

कुछ विद्वानों के अनुसार वेदों में पुरुष, देश, नदी, वृक्ष आदि के निर्देश होने के कारण वेदों को पुरुषप्रणीत अथवा पौरुषेय कहते हैं, किंतु मीमांसा दर्शन के अनुसार प्रवचन भी असाधारण माना गया है। उदाहरणार्थ "कठसंहिता" अथवा "कठ ब्राह्मण" के विषय में किंवदंती है कि अनेक शाखा अध्यायियों के मध्य "कष्ट" महर्षि ने पूर्ण रूप से अध्ययन किया था। द्वितीय हेतु है कि वेद में पुरुष, नदी आदि का नाम आता है, इससे भी वेद पौरुषेय सिद्ध होता है, किंतु यह कल्पना चतुर-बुद्धि-विहित नहीं; क्योंकि प्रायः सर्वप्रथम सांसारिक वस्तुओं के नाम वेद से ही आए हैं, उसी दृष्टि से लोक-नाम की परंपरा चली है। अर्थात वेद इतिहास को अनित्य नहीं मानता, किंतु इतिहास के नित्यत्व का प्रतिपादन करता है, इसका विस्तृत विवेचन मीमांसा के "शाबरभाष्य" में दृष्टव्य है। नित्य विषय और वाक्य अथवा वचन को यथानुपूर्वी ब्रह्मर्षिगण समाधि में दर्शन करते हैं, अतएव वेद में पूर्वपुरुष कर्तृत्वकल्पना का लेश भी समावेश नहीं है।" लौकिक रचनाएँ पुरुष विशेष कर्तृत्व होने के कारण पौरुषेय हैं, यथा महाभारत, रामायण आदि।

कुमारिल भट्ट के अनुसार अध्ययन परम्परा अनादि है, अतएव वेद भी अपौरुषेय हैं। ऐसे ही अधिकरण सिद्धांत न्याय से ही वेद ग्रंथ रचना के द्वारा पुरुष संबंध नहीं हो सकता, अतएव विधि वाक्य ही धर्म में प्रमाण है।

मोक्ष और उसका साधन[संपादित करें]

मीमांसा-दर्शन में आत्म-तत्व का प्रतिपादक कोई भी मौलिक सूत्र नहीं है। यद्यपि उत्तरमीमांसा (वेदान्त) के '"एक एवात्मनः शरीरे भावात्" इस सूत्र के भाष्य में शंकराचार्य ने लिखा है कि "पूर्व-तंत्र" (पूर्वमीमांसा) में आत्मप्रतिपादक सूत्र नहीं है, इस वचन को कहकर आत्म स्वरूप का विवेचन किया है। वृत्तिकार मत को प्रमाण रूप से उद्धृत करते हुए लिखा है : "आत्माभिधानप्रसक्तौ यथात्मास्तित्वं तथा शारीरके वक्ष्यामः"। अभिप्राय यह हुआ कि पूर्वमीमांसा भी उत्तरमीमांसा की तरह अद्वय आत्मा को मानकर ही निर्मित हुए हैं, तथापि पूर्वमीमांसा शरीर के अतिरिक्त कर्त्ता-भोक्ता आत्मतत्व को मानकर ही प्रचलित हुआ है, क्योंकि कर्म-सिद्धान्त के अंतर्गत "कृतहानि" और "अकृताभ्यागम" निहित है। और यहीं से पुनर्जन्म आदि की सिद्धि भी होती है। "चोदना पुनरारम्भः" "सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणाम्" इन दोनों सूत्रों से आत्मबीज का प्रतिपादन किया गया है और वपन आदि संस्कार फली (फलभोक्ता) का संस्कार (उपचयाधानक्षम) है। पुरुषार्थ में पुरुष शब्द से अस्थि यज्ञ और कृत याग से आत्मा को फल प्राप्ति होती है।

शबर स्वामी ने सूत्र विशेष के बिना ही "यज्ञायुध वाक्य" को निमित्त मानकर अनात्मवादी के मत का खंडन करते हुए आत्मस्वरूप को तर्क और श्रुतियों के द्वारा सिद्ध किया है जिससे वेद प्रामाण्य की भी सिद्धि होती है।

उत्तर-मीमांसा में आत्मा को एक ही माना गया है; किंतु "सांख्य योग", न्याय, वैशेषिक और पूर्वमीमांसा में आत्मा को अनेक माना गया है, जिसका कर्म के द्वारा शरीर, इंद्रिय और मन से संबंध होता है। अतएव शरीर, इंद्रिय और विषय को बंध कहा गया है। उक्त त्रय आत्मा को बंधन में डालते हैं, जिससे आत्मा सुखदुःखादि द्वंद्व को भोगता है। नित्य नैमित्तिक कर्मों को कत्र्तव्य बुद्धया करते हुए प्रारब्ध कर्मों को जीव भोगता रहता है। शरीर इंद्रिय से अतिरिक्त जो ब्रह्म बुद्धि से आत्मा की उपासना करता है उसका शरीर इंद्रिय आदि से संबंध का कोई कारण (काम्य और निषिद्ध कर्म) नहीं है, ऐसा व्यक्ति वर्तमान शरीर के नाश के पश्चात् स्व स्वरूप में स्थित हो जाता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार शरीर, इंद्रिय और विषय को बंधन कहा गया है जो अज्ञान का कारण है; उसकी निवृत्ति ही मोक्ष है। उदाहरणार्थ -

निवृतिरात्मा मोहस्य ज्ञातत्वेनोपलक्षितः

पूर्वमीमांसा भी यही स्वीकार करता है कि शरीर, इंद्रिय और विषयों का संबंध ही बंधन हैं, तथा उसका विलय ही मोक्ष है, जिसका साधन, ज्ञान (उपासना) और कर्म समुच्चय है। आत्मज्ञान दो प्रकार का होता है। शरीरातिरिक्त आत्मज्ञान ऋतु का अंग होता है, जो निःश्रेयसकारक है। वैदिक और लौकिक वाक्यों का सहस्रों की संख्या में वाक्यार्थ निर्णयोपयोगी न्यायों का पूर्वमीमांसा ने ही प्रतिपादन किया है। अतएव भारतीय दर्शनों में प्रथम स्थान कर्म प्रतिपादक पूर्वमीमांसा दर्शन का ही है।

सृष्टि प्रलय के विषय में मीमांसक मत[संपादित करें]

उत्तरमीमांसा (वेदांत) अज्ञान से सृष्टि और आत्मज्ञान से सृष्टि का विनाश (मोक्ष) मानता है। न्याय, वैशेषिक दर्शन ने द्वयणुकादि क्रम से महाभूत पर्यंत महासृष्टि और महाभूत से परमाणु पर्यंत विनाश को महाप्रलय कहा है। अर्थात् संपूर्ण भाव कार्य द्वयणुकादि क्रम से उत्पन्न होते हैं और स्थूल से परमाणु पर्यंत जाकर नष्ट हो जाते हैं। पंच महाभूतों में पृथ्वी, जल, तेज और वायु के परमाणु नित्य हैं। आकाश स्वयं ही नित्य है, किंतु पूर्व मीमांसा के अनुसार दो प्रकार की सृष्टि और तीन प्रकार के प्रलय होते हैं, जिनमें महासृष्टि और खंड सृष्टि शब्द से दो सृष्टि कही गई है। ऐसे ही प्रलय, महाप्रलय और खंड प्रलय शब्द से तीन प्रलय कहे गए हैं। उनमें खंड सृष्टि और खंड प्रलय आजकल के समान ही माना गया है। उदाहरणार्थ किसी स्थल विशेष का भूकंप आदि से विनाश हो जाता है और कहीं पर नवीन वस्तु की सृष्टि हो जाती है। महासृष्टि में परमाणुओं से द्वयणुकादि द्वारा पंचमहाभूत पर्यंत नवग्रहादिकों की सृष्टि होती है, जिसका उल्लेख ऋग्वेद के दशम मंडल में प्राप्त होता है -

सूर्याचंद्रमसौधाता यथापूर्वमकल्पयत्

मत्स्यपुराणादि में भी खंड प्रलय के अंतर्गत विद्यमान पदार्थों की स्थिति का विवरण प्राप्त होता है, किंतु पूर्व मीमांसा महासृष्टि और महाप्रलय को स्वीकार नहीं करता। उसके अनुसार सभी पदार्थों के नाश में कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं होता। जैसा कि वार्तिककार ने कहा है -

प्रलयेऽपि प्रमाणं नः सर्वोच्छेदात्मके नहि।
तस्मादद्यवदेवात्र सर्गप्रलयकल्पना॥

मीमांसा दर्शन, खंड सृष्टि और खंड प्रलय को ही मानता है।

ईश्वर के संबंध में पूर्वमीमांसा का मंतव्य[संपादित करें]

भारतीय छः आस्तिक दर्शनों में न्याय, वैशेषिक और वेदान्त की ईश्वर साधक युक्तियाँ प्रायः समान ही हैं। उदाहरणार्थ "यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते", "द्यावाभूमी जनयन् देव एकः", "विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता" इन श्रुतियों के द्वारा और "जन्माद्यस्य यतः" इस वेदान्त सूत्र के द्वारा ईश्वर की सिद्धि होती है। इसी प्रकार न्याय शास्त्र के "क्षित्यंकुरादिक कर्तृजन्य कार्यत्वात् घटवत्" अनुमान से भी ईश्वर की सिद्धि की गई है, किंतु वेदांतियों ने श्रुतियों से ईश्वर को सिद्ध कर अनुमान प्रमाण को उनका सहकारी कारण माना है। और नैयायिकों ने अनुमान से ईश्वर के सिद्ध कर श्रुतियों को सहकारी कारण माना है। सांख्य दर्शन में दो मत हैं - सेश्वर और निरीश्वर। सेश्वर सांख्यवादी ईश्वर को मानते हैं, किंतु उसे पुरुष विशेष शब्द से व्यवहार करते हैं। निरीश्वर सांख्यवादी ईश्वर का निषेध करते हैं, "किंतु विज्ञान भिक्षु ने "ईश्वरासिद्धेः" इस सूत्र में "प्रमाणाभावात्" इस पद का उल्लेख कर ईश्वर को स्वीकार किया है।

मीमांसा दर्शन नैयायिकों के समान विधि मुख से ईश्वर का समर्थन अैर निरीश्वर सांख्यवादियों के समान निषेध भी नहीं करता, किंतु "संबंधाक्षेपपरिहार" ग्रंथ में कुमारिल भट्ट ने शब्दार्थ के संबंध का कर्ता ईश्वर का निराकरण किया है। अभिप्राय यह है कि संबंध का कर्ता ईश्वर नहीं है। उपर्युक्त वचनों को स्वीकार कर लोकप्रसिद्धि है कि मीमांसक निरीश्वरवादी है। कुमारिल भट्ट, नंदीश्वर आदि मीमांसकों ने अनुमानसिद्ध ईश्वर का निराकरण किया है और वेदसिद्ध ईश्वर को स्वीकार किया है।

वस्तुतः मीमांसा वेद से सिद्ध ब्रह्म अथवा ईश्वर को स्वीकार करता ही है। क्याेंकि मीमांसा दर्शन वेद काे स्वतः प्रमाण मानता है। मीमांसा काे पूर्वमीमांसा और वेदान्त काे उत्तरमीमांसा नाम से भी जाना जाता है। इससे भी वेदान्त काे मीमांसा के सिद्भान्त और मीमांसा काे वेदान्त के सिद्धान्त मान्य हैं यह बात स्पष्ट हाेती है।

देवता विषयक विचार[संपादित करें]

वेदविहित यागादि कर्म द्रव्य और देवता इन दो से साध्य हैं। द्रव्य दध्यादि है और देवता शास्त्रैक समधिगम्य है। अर्थात् विधि वाक्य जिसको देवता कहता है उसे ही देवता माना जाता है। यहाँ देवता के विषय में तीन पक्ष दशमाध्याय के चतुर्थपाद में और शाबर भाष्य आदि ग्रंथों में भी स्वीकार किया गया है। अर्थ देवता, शब्द विशिष्ट अर्थ देवता और शब्द देवता हैं। इन तीनों में अंतिम पक्ष ही सिद्धांत है, क्योंकि अर्थ का स्मरण शब्द के द्वारा हुआ करता है। अतएव शब्द की प्रथम उपस्थिति होने के कारण शब्द ही देवता माना गया है। उदाहरणार्थ "इंद्राय स्वाहा, तक्षकाय स्वाहा" शब्दों में इंद्राय और तक्षकाय ये चतुर्थांत पद ही देवता हैं। अर्थ को देवता स्वीकार करने वाले व्यक्ति भी शब्द की उपेक्षा नहीं कर सकते। अतः तीनों पक्षों में शब्द मुख्य होने के कारण मीमांसकों ने शब्द को ही देवता स्वीकार किया है। यहाँ पर एक नियम है - विधि वाक्य में जो देवतावाचक शब्द है उसका आवाहन, त्याग और सूक्त वाक्य आदि में उच्चारण करना चाहिए, न कि उसके पर्यायवाची शब्दों को। उदाहरणार्थ "आग्नेयमष्टाकपालम्" में अग्नि के पर्यायवाची "जातवेदस" शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उक्त बातों से विदित होता है कि "शब्दमयी देवता" ही मीमांसा दर्शन का सिद्धांत है।

देवता के विग्रहादि सदसद् भाव का विचार - अग्नि आदि देवता के विग्रहादि पाँच इस दर्शन में माने जाते हैं।

विग्रहो हविषां भोग ऐश्वर्य च प्रसन्नता।
फलदातृत्वमित्ये तत् पंचकं विग्रहादिकम्॥

अर्थात् विग्रह, हविष, भोग, ऐश्वर्य, प्रसन्नता और फलदातृत्व (फलदायकता) ये पाँच विग्रह कहे जाते हैं। उक्त वचन के आधार पर ही वेदांतियों ने देवता के विग्रहादि पाँच स्वरूप माने हैं। अभिप्राय यह है कि मनुष्य आदि के समान ही कर, चरण आदि अवयव देवताओं के भी होते हैं, वे हविष स्वीकार करते हैं, भक्षण करते हैं और प्रसन्न होकर यजमान को फल देते हैं। अतः देवता विग्रहादिमान हैं। उपर्युक्त विचार ही यास्क महर्षि ने "निरुक्त" के "अथाकार चिंतनम्" वाक्य से पुरुषविग्रहता को सिद्ध किया है।

मीमांसा दर्शन के अनुसार "शब्दमयी देवता" का समर्थन किया गया है, किंतु शबर स्वामी ने अपने षष्ठ देवताधिकरण भाष्य में देवता विग्रह का खंडन किया है। प्रायः पार्थसारथि, खंडदेव आदि सभी विद्वानों ने इसी मार्ग का अवलंबन किया है, किंतु कुमारिल भट्ट ने अपनी टीका में देवता को प्रधान न मानकर द्रव्य के समान उसे अंग माना है और कर्म को ही प्रधानतया स्वीकार किया है तथा कहा है कि कर्म ही फल देता है। स्वामी के रहते हुए दास से कोई फल की याचना नहीं करता।

(1) कर्मणा फलजनकत्वं तथा (2) शब्दमयी देवता, उक्त द्वय सिद्धांतों का समर्थन देवता विग्रहादि को मानकर अन्य मीमांसकों ने किया है। भाष्यकार शबर का देवता विग्रह का निराकरण प्रौढ़िवाद से जानना चाहिए। अतएव पूर्वमीमांसा "शब्दमयी देवता" को ही स्वीकर करता है। उसका ज्ञान, तद्धित, चतुर्थी विभक्ति और मंत्रवर्ण इन तीनों से होता है। केवल इनमें परस्पर अंतर यह है कि तद्धित शक्ति की आवृत्ति से देवता क बोधन करता है। चतुर्थी विभक्ति लक्षणया और मंत्रवर्ण अधिष्ठान का बोधन करता है।

मीमांसादर्शन ने अपनी कर्मपरकता की दृष्टि से उक्त प्रकार से देवता काे कर्म का अंग माना है। वस्तुतः देवताशास्त्र ताे निरूक्त है। निरूक्त वेदांग है और मीमांसाशास्त्र वेदाेपांग है। अतः वैदिक देवतातत्त्वविचार के प्रसंग में निरूक्त के विवेचन काे स्वतन्त्र और मुख्य देवतातत्त्वविचार मानना आवश्यक हाेता है।

शाब्द बोध के विषय में मीमांसक मत[संपादित करें]

वाक्यों के द्वारा जो बोध (ज्ञान) होता है उसे वाक्यार्थ बोध या शाब्द बोध कहते हैं। वाक्य भी आख्यातांत ही होता है -

(1) सुबंतचयः वाक्यम्, (2) तिंगंतचयोवाक्यम्, (3) सुप्तिंगन्तचयो वाक्यम्। उसमें ये तीन पक्ष हैं, जिनमें कारकान्वित क्रिया होनी चाहिए। अमरकोश के अनुसार - "तिङ्सुबन्त चयो वाक्यं क्रिया वा कारकान्विता"।

अर्थात् सुबंत और तिंगन्त वाक्यों का कारकान्वित क्रिया पर्यवसान होता है। पूर्वमीमांसा में कुमारिल भट्ट, प्रभाकर और मुरारी के तीन मत प्रसिद्ध हैं, किंतु अंतिम में "त्रिपाद नीति नयन" इस नाम से ख्यात ग्रंथ भी विदित हुआ है। मीमांसकों में अभिहितान्वयवाद अैर अन्विताभिधानवाद नाम से दो प्रस्थान प्रसिद्ध हैं। इनमें प्रथम कुमारिल भट्ट और द्वितीय प्रभाकर का मत है। शाब्ध बोध में भावना को मुख्य रूप से भट्ट ने स्वीकार किया है। प्रभाकर ने कार्य को मुख्य स्वीकार किया है। अभिहितान्वय शब्द का यह अर्थ है कि पदों से प्रतिपादित पदार्थ ज्ञान आकांक्षा, योग्यता और आसक्ति समन्वित होकर लक्षणा के द्वारा शाब्दबोध (वाक्यार्थ बोध) कराते हैं

न्यायमत में पदों की पदार्थ में शक्ति है और पद ज्ञान लक्षण या बोध करते हैं। पदों से पदार्थ की उपस्थिति होती है। इसी प्रकार मीमांसा में कहा गया है, उदाहरणार्थ "ज्योतिष्टोमेन स्वर्ग कामो यजेत"। यहाँ "यजेत" में दो अंश हैं -"यज" धातु और "त" प्रत्यय। प्रत्यय आख्यातांश को लेकर आर्थी भावना का प्रतिपादन करता है। उस भावना की तीन आकांक्षाएँ होती हैं - साध्याकांक्षा साधनाकांक्षा और "इतिकर्तव्यताकांक्षा"। साध्याकांक्षा होने पर (स्वर्गकामाधिकरण से) स्वर्ग का साध्यत्वेन अन्वय होता है। साधनाकांक्षा होने पर धात्वर्थ का कारणत्वेन अन्वय होता है। (भावार्थाधिकरण न्याय से)। इति कर्तव्यताकांक्षा होने पर (दीक्षिणीयादि) इतिकर्तव्यतात्वेन अन्वय होता है। वाक्यार्थाधिकरण में कहा गया है-

भावनैव हि वाक्यार्थः सर्वत्राख्यातवत्तया।
अनेक गुण जात्यादि कारकार्थानुराजिता॥

विशिष्ट अर्थ का बोध करने के लिए वाक्य लोक में प्रयुक्त होता है। पदश्रवण से पदार्थों का पृथक् पृथक् ज्ञान होता है। यह वाच्यार्थ है, किंतु जो पदार्थज्ञान होता है वह श्रोता को अभिप्रेत नहीं और जिसके लिए वाक्य प्रयुक्त हुआ उससे श्रोता का कार्य नहीं होता, ऐसे स्थल में वाक्य तात्पर्य की अनुत्पत्ति होती है। अतएव अनुपपत्ति के निवारणार्थ लक्षणा मानी गई है। सभी दार्शनिकों ने तात्पर्यानुपपत्ति को लक्षणा का बीज स्वीकार किया है। पदों के दो प्रकार के तात्पर्य माने गए हैं, प्रथम तात्पर्य तथा द्वितीय महातात्पर्य। प्रथम अवांतर तात्पर्य पदार्थ विषय का प्रतिपादन करता है और महातात्पर्य वाक्यार्थ विषय का प्रतिपादन करता है। अभिहितान्वयवाद में वाक्य से वाक्यार्थ का बोध लक्षणया होता है। कुमारिल भट्ट ने निम्न श्लोकों से प्रतिपादन किया है -

साक्षात् यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम्।
वर्णास्तथापि नैतस्मिन् पयंवस्यन्ति निष्फले॥
वाक्यार्थमितये तेषां प्रवृत्तो नान्तरीगकम।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थ-प्रतिपादनम्॥

इस वचन से भट्ट पादका अभिहितान्वयवाद का स्वरूप दिग्दर्शित होता है। कुछ विद्वानों का कथन है कि "अनन्वितावस्थ" पदार्थ पदों से अभिहित होते हैं। उनकी अन्वितावस्था केवल लक्षित होती है। अतएव "अन्विताभिधानवाद" कुमारिल भट्ट का है, किंतु भट्ट मत का अनुवादक अन्विताभिधानवाद मानकर जो खंडन करते हैं, यह उचित नहीं है, क्योंकि उनके ग्रंथों में उपर्युक्त लेख की चर्चा कहीं भी नहीं है।

प्रभाकर मत : अन्विताभिधानवाद[संपादित करें]

अन्विताभिधान शब्द का यह अर्थ है - पद अन्वितार्थ (अन्वय और पदार्थ को शक्त्या वृत्या) बोधन करते हैं। अतएव पद शक्ति से ही पदार्थ और वाक्यार्थ दोनों का बोध हो जाता है। पद शक्ति से अतिरिक्त लक्षणा आदि मानने की कोई आवश्यकता नहीं है। वयोवृद्ध पुरुष किसी वस्तु को लाने ले जाने के लिए शब्द का प्रयोग करता है। उसके पास का बालक उस शब्द को श्रवण कर औ दूसरे पुरुष के ले आने और ले जाने का कार्य करते देखकर शब्द का अर्थ समझ लेता है। यही प्रवृत्ति का कार्यताज्ञान कारण है। लोक में क्रिया को भी कार्य समझा जाता है, उसी प्रकार वेद में भी यागादि क्रिया को प्रथमतः कार्य समझा जाता है। यागादि क्रिया क्षणिक है और स्वर्ग कालांतर भावी है। अतएव उक्त (स्वर्गकाम पद समभिव्यवहार अन्यथानुपपत्तिः) वेद वाक्य विमर्श से यागातिरिक्त "अपूर्व, नामक वस्तु समझी जाती है। यहाँ पर "एक कार्य शब्द" की पूर्वोक्त दो शक्तियाँ दो अर्थों में स्वीकार करनी पड़ती हैं। एक में शक्ति (अभिधा) और दूसरे से लक्षणा माननी होती है। उसमें भी अलौकिक कार्य में विशेष शक्ति है, जैसा विद्वानों में प्रचलित है -

अनन्यलभ्यः शब्दार्थः

लोक में क्रिया रूप कार्य में लक्षणा होती है। वेद में पद ही वाक्य होते हैं (पदान्येव वाक्यम्) और पदार्थ ही वाक्यार्थ होता है (वाक्यार्थः पदार्थः)। इस मत में वाक्यार्थ, अन्वय और संसर्ग ये सब पर्याय हैं। अर्थात् अन्वित ही अन्वय में निमित्त होता है। प्रभाकर ने ग्राहक ग्रहण को माना है, उससे भी अन्विताभिधानवाद सिद्ध होता है। इस मत में - "यजेत स्वर्गकामः" (जो स्वर्ग की कामना करता है उसे यज्ञ करना चाहिये) इस वाक्य से अन्विताभिधान का शाब्द बोध होता है।

इस दर्शन में स्वर्गप्राप्ति के लिए याग का ही विधान है। स्वर्ग से अभिप्राय यह है - जो दुःख से ग्रस्त न हो तथा दुःख उत्पन्न की उसमें संभावना न हो और अभिलाषा को पूर्ण करे उसे स्वर्ग कहते हैं। "दशंपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" इत्यादि वाक्यों द्वारा दर्शपूर्णमास याग से स्वर्ग के साधन का विधान किया गया है। याग को क्षणिक माना गया है, क्योंकि किसी देवता के उद्देश्य से द्रव्य के त्याग का नाम याग है। "इन्द्राय इदं न मम" इस वाक्य से मानस व्यापार का त्याग होता है। उस क्षण में उस व्यापार का नाश हो जाता है। निरतिशय प्रीति विषय को स्वर्ग कहा गया है। वह कालांतर अथवा जन्मांतर में प्राप्त होता है। यह दर्शन शास्त्र का नियम है, कायोंत्पत्ति के अव्यवहित पूर्व क्षण में कारण को रहना चाहिए और क्षणिक याग जन्मांतर भावी स्वर्गोत्पत्ति के अव्यवहित पूर्वक्षण में संभव नहीं है। एतदर्थ उक्त श्रुति के आधार से याग का साध्य, स्वर्ग का साधन अथवा याग की उत्तरावस्था एवं फल की पूर्वावस्था, ये सब एक वस्तु सिद्ध होती हैं, जिसे अतिशय, अपूर्व, या योग्यता कहते हैं। इसका विस्तृत विवेचन कुमारिल भट्ट ने अपूर्वाधिकरण में युक्तिपूर्वक किया है। यागानुष्ठान के पूर्व पुरुष में स्वर्ग के उपभोग करने की योग्यता नहीं होती। अनुष्ठान के पूर्व याग में भी स्वर्गादि फल देने की योग्यता नहीं होती एवं पुरुष की अयोग्यता तथा कर्म की अयोग्यता का निराकरण कर शास्त्रगम्य सामर्थ्य अब वा अतिशययोग्यता को अपूर्व माना गया है। यथा

कर्मभ्यः प्रागयोग्यस्य कर्मणः पुरुषस्य वा।
योग्यता शास्त्रजन्या या सा पराऽपूर्वमुच्यते।"

इसे अधिकारापूर्व अथवा फलापूर्व कहते हैं। जहाँ एक ही प्रधान हो वहाँ प्रधान याग से जो अपूर्व उत्पन्न होता उसे उत्पत्यपूर्व कहते हैं। अंगों से जो अपूर्व उत्पन्न होता है, उसे अंगापूर्व कहते हैं। अंगापूर्व और प्रधानापूर्व दोनों मिलकर परमापूर्व को उत्पन्न करते हैं। उससे स्वर्गादि फल की प्राप्ति होती है। कुछ यागों में अनेक प्रधानों से फल होता है। उदाहरणार्थ - दर्श में तीन याग होते हैं और पौर्णमास में भी तीन याग होते हैं। यहाँ तीनों प्रधानों से उत्पन्न होनेवाले तीन उत्पत्यपूर्वो से एक समुदाया पूर्व उत्पन्न होता है। दोनों समुदायापूर्वों से एक परमापूर्व उत्पन्न होता है। अभिप्राय यह हुआ कि उपर्युक्त प्रथम उदाहरण में तीन अपूर्व (उत्पत्ययपूर्व, अंगापूर्व और परमापूर्व) माने जाते हैं। द्वितीय उदाहरण में उत्पत्यपूर्व, अंगापूर्व, समुदायापूर्व और फलापूर्व, चार अपूर्व माने जाते हैं। ये ही मीमांसकों का सर्वस्व है। इसमें भाट्ट मीमांसक शाबर भाष्य 2.1. 2 के "यागेन अपूर्व कृत्वा स्वर्ग भावयेत्" अनुसार शब्द से तथा श्रुतार्थापत्ति से अपूर्व की सिद्धि करते हैं। और उसे लिंगादि का वाच्य तथा शब्दबोध में मुख्य विशेष्य मानते हैं। सभी दार्शनिकों के द्वारा अपूर्व का जो खंडन किया गया है वह वाच्यत्वांश और प्राधान्यांश का ही खंडन है।

प्रामाण्य विचार[संपादित करें]

दर्शन शास्त्रों में पदार्थविवेचना के लिए चार कोटियाँ मानी गई हैं -

(1) प्रमाण (2) प्रमेय (3) प्रमिति (4) प्रमाता।

प्रमाण - प्रमाण उसे कहते हैं जिससे विषय का निश्चयात्मक ज्ञान हो और विषय का निर्धारण हो।

प्रमेय - प्रमाण के द्वारा जिसका ज्ञान हो उसे प्रमेय (वस्तु-विषय) कहते हैं।

प्रमिति - प्रमाण के द्वारा जिस किसी भी विषय का निश्चयात्मक ज्ञान हो, उसे प्रमिति कहते हैं।

प्रमाता - प्रमाण के द्वारा प्रमेय ज्ञान को जो जानता है - उसे प्रमाता कहते हैं।

यहाँ विभिन्न भारतीय दार्शनिकों ने ज्ञान के विषय में द्विविध विचार किया है -

ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः ग्राह्य है अथवा परतः ग्राह्य है। स्वतः कोटि में मीमांसक, वेदांती और बौद्ध आते हैं। परतः कोटि में न्याय, वैशेषिक, योग, जैन और चार्वाक आते हैं। यहाँ प्रामाण्य शब्द से अर्थतथात्व लक्षण (विषय का यथार्थ स्वरूप) प्रामाण्य समझना चाहिए, न कि अज्ञातार्थ ज्ञापकत्व लक्षण प्रामाण्य। चोदनालक्षणोधर्मः सूत्र में - "ननु अतथाभूतमप्यर्थ ब्रूयात् चोदना" इत्यादि भाष्य से अर्थतथात्व ही विवक्षित है। "तच्च अबाधितत्वं, अर्थनिरुठो धर्म विशेषः, तस्य ज्ञानेन निरूप्रणात्"। चौदना सूत्र के भाष्य "अतथात्व भूतं अर्थ" से अबाधित्व अर्थनिष्ठ धर्म विवक्षित है, जिसका निरूपण ज्ञान के द्वारा होता है। अतएव प्रामाण्य को ज्ञाननिष्ठ कहा जाता है। वह परतः उत्पन्न और परतः गृहीत होता है। यह नैयायिकों का सिद्धांत है। अर्थात् जिस सामग्री से ज्ञान उत्पन्न होता है, उससे प्रामाण्य उत्पन्न न होकर अन्य सामग्री से उत्पन्न होता है एवं जिससे ज्ञान ग्रहीत होता है, उससे प्रामाण्य गृहीत न होकर अन्य गुण ज्ञानादि से गृहीत होता है। इससे यह आया कि ज्ञानोत्पादक सामग्री से भिन्न सामग्री से प्रामाण्य उत्पन्न होता है और ज्ञान ग्राहक सामग्री से भिन्न सामग्री के द्वारा प्रामाण्य गृहीत होता है। इस मत में प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों परतः होते हैं। यह नैयायिक संमत विवेचना है।

उपर्युक्त मत में मीमांसक लोग अनवस्था दोष बताते हैं (अनवस्था उसे कहते हैं जिसमें कल्पना का विश्राम न हो।) जिससे ज्ञानमत प्रामाण्य कभी सिद्ध नहीं हो सकता। अर्थात् लोकव्यवहार विच्छिन्न हो जाएगा। अतः ज्ञानगत प्रामाण्य स्वतः उत्पन्न और स्वतः गृहीत होता है। अभिप्राय यह है कि जिस समाग्री से ज्ञान उत्पन्न होता है, उसी सामग्री से प्रामाण्य भी उत्पन्न होता है; और जिस सामग्री से ज्ञान गृहीत होता है उसी सामग्री से प्रामाण्य भी गृहीत होता है। यही स्वतःप्रामाण्यवादी मीमांसकादिकों का प्रामाण्य का स्वतस्त्व है, जिसका कुमारिल भट्ट ने अपने ग्रंथ भाट्ट वार्तिक में अनेक युक्तियों से समर्थन किया है -

स्वत: सर्वप्रमाणानां प्रमाण्यमिति गम्यताम्।
नहि स्वतोऽसती शक्तिः कर्तुमन्येन पार्यते॥
परापेक्षं प्रमाणत्वं नात्मानं लभते क्वचित्।
मूलोच्छेदकरं पक्षं कोहि नामाध्यवस्यति॥" -- शास्त्रदीपिका

यहाँ भट्टमत में ज्ञान अनुमेय है। ज्ञान के विषय में कुछ अतिशय उत्पन्न होता है जिससे "ज्ञातोघटः" यह अनुभव होता है। इससे ज्ञातता नामक एक धर्म घटादि विषय में उत्पन्न होता है, जिसे प्राकट्यम्, भासनं, प्रकाशः आदि शब्दों से कहा जाता है। इससे यह आया कि ज्ञातता लिंगक अनुमान से ज्ञान का ग्रहण होता है। इसी से प्रामाण्य का भी ग्रहण होता है।

प्रभाकर (गुरु) मत में ज्ञान स्वयं प्रकाश है। अतः ज्ञान से ही ज्ञाननिष्ठ प्रामाण्य का भी ग्रहण होता है। अतएव स्वतः प्रामाण्य दोनों मतों में समान है, जिसका विवेचन "श्लोक वार्तिक", "प्रकरण पंजिका", "न्याय रत्नमाला" में विस्तृत रूप से किया गया है।

विधि[संपादित करें]

प्रत्यक्ष, अनुमान आदि से अनवगत (अज्ञात) अर्थ के बोधक वाक्य को विधि कहते हैं। अर्थात् अज्ञातज्ञापक अप्रवृत्तप्रवर्तक जो वाक्य हैं उसका नाम "विधि" है। विध्यर्थ के संबंध में मीमांसकों के दो पक्ष हैं - एक प्रवर्तना को विध्यर्थ मानता है। इसमें प्रायशः सभी मीमांसक आ जाते हैं। दूसरा कार्य को विध्यर्थ मानता है। यह प्रभाकर का सिद्धांत है। इस पक्ष में इस प्रकार का उत्पादन होता है -

लोक में प्रवर्तक पुरुष, आचार्य अथवा राजा अपने शिष्य अथवा भृत्य को प्रवृत्त कराने के लिए "गामानय" इत्यादि वाक्य का प्रयोग करते है। शिष्य या भृत्य उक्त वाक्य को सुनकर उसके अर्थ का अनुसंधान करता है। पश्चात् "गवानयन" (गाय लाने) आदि कार्य में प्रवृत्त होता है। इसलिए प्रवर्तक पुरुष का जो अभिप्राय विशेष है, उसे लोक में विध्यर्थ कहते हैं। वह पुरुष की क्रिया है जो पुरुष में रहती है। अतएव इसे पुरुषाभिप्राय भी कहते हैं। वेद अपौरुषेय होने के कारण वैदिक लिंगादि का अर्थ पुरुषाभिप्राय नहीं कहा जा सकता। अतः पुरुष के स्थान पर लिंगादि (लिंग लुंग आदि लकार) शब्द का प्रयोग होता है। उसका व्यापारविशेष ही विध्यर्थ है। शब्दनिष्ठ होने के कारण इसे शाब्दी भावना भी कहते हैं। इसका लक्षण इस प्रकार किया गया है "पुरुषप्रवृत्यनुकूलः प्रवर्तक लिंगादिनिष्ठो व्यापारविशेषः शाब्दी भावना"। शास्त्र में इसे ही प्रवर्तना, प्रेरणा आदि कहा गया हैं। लोक में प्रवृत्ति दो प्रकार की होती है - प्रथम अपनी इच्छा से (इष्ट साधन समझकर) पुरुष प्रवृत्त होता है। द्वितीय प्रवर्तक पुरुष, अथवा शब्द के द्वारा व्यक्ति प्रवृत्त होता है, जिसे "प्रेरणा जन्य" कहते हैं। जहाँ प्रेरणा के पश्चात् प्रवृत्ति होती है, वहाँ प्रवर्तन ज्ञान ही प्रवर्तक माना जाता है, जिसे मंडन मिश्र, पार्थसारथि प्रभृति विद्वानों ने "इष्टसाधन" माना है। न्याय सुधाकर ने इसे अलौकिक धर्म विशेष माना है। प्रभाकर मिश्र ने प्रवृत्ति के प्रति कार्यताज्ञान को कारण माना है, जिससे इष्टसाधनत्व आदि आक्षिप्त हो जाता है। अतः "चोदना लक्षणो धर्मः" सूत्र में लिखा है - "आचार्य चोदित" करोमि" इस भाष्य की व्याख्या करते हुए शालिकनाथ ने कहा है - चोदितः प्रवर्तितः, कार्यमवबोधितः इत्यर्थः, कार्यताज्ञान विना प्रवृत्तेरसंभवादिति" (तदभूतादि प्र0 पं0) अतएव प्रभाकर मत में कहा गया है - "कार्य विध्यर्थः, तच्च कार्य धात्वर्थातिरिक्तम्, अपूर्व शब्द वाच्यम् तदेव विध्यर्थ इति"

विधि का भेद[संपादित करें]

वेद वाक्यार्थ निर्णय के लिए प्रवृत्त मीमांसा दर्शन में चार प्रकार की विधि का प्रतिपादन किया गया है -

(1) उत्त्पत्तिविधि : जिस वाक्य से कर्म स्वरूप की कत्र्तव्यता प्रथमतः विदित होती हो उसे उत्पत्तिविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "अग्निहोत्रं जुहोति" इस वाक्य से अग्निहोत्र नामक होम से इष्ट को प्राप्त करना अर्थ होता है।

(2) विनियोगविधि : अंगप्रधान का संबंध जिस विधिवाक्य से ज्ञात होता है, उसे विनियोगविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "दध्ना जुहोति" इस वाक्य से दही से हवन करने का अर्थ बोधित होता है। इसमें दधि साधन है और होम साध्य है। यहाँ विनियोग विधि में विनियोग शब्द से संबंध को समझना चाहिए। वह संबंध साध्य-साधन-भाव, अंगांगि भाव अथवा शेषशेषी भाव में समाप्त होता है।

(3) प्रयोगविधि : जो प्रधान और अंग के अनुष्ठान में क्रम का बोध कराता है उसे प्रयोगविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ प्रयाजादि अंग से उपकृत प्रधान दर्शपूर्णमास याग से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसी अभिप्राय से लक्षण किया गया है "अंगानां क्रमबोधको विधि; प्रयोगविधिः"

(4) अधिकारविधि : जिस विधि से कर्मजन्य फल का भोक्ता कर्ता को माना जाता हो उसे अधिकारविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "यजेत स्वर्ग कामः" यहाँ जो यागकर्ता है वही स्वर्गफल का भोक्ता है।

इसी प्रकार से अपूर्व विधि, नियम विधि और परिसंख्या विधि के भेद से तीन प्रकार की विधियाँ प्रसिद्ध हैं -

  • (क) जो अत्यन्त अप्राप्य विषय का विधान करता हो उसे अपूर्व विधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "ब्रीहीन् प्रोक्षति, दर्शपूर्ण मासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत" यहाँ ब्रीही में प्रोक्षण क्रिया का विधान है और दर्शपूर्णमास में स्वर्ग के साधन का विधान है। यह बात उपर्युक्त वाक्यों के अतिरिक्त अन्य प्रमाणों से सर्वदा और सर्वथा अप्राप्त है। अतः यह अपूर्वविधि है।
  • (ख) जो पक्ष प्राप्त अर्थ को नियमित (अप्राप्तांश पूरक) करता है उसे नियमविधि कहते हैं। उदाहरणार्थ "ब्रीहीन् अवहंति"। यहाँ वैतुष्य के प्रति अवधात साधन है। ऐसे ही अश्म कुट्टनादि साधन है। जो पुरुष शास्त्रीय उपाय अवधात को त्यागकर अश्म कुट्टनादि या नखविदलनादि से वैतुष्य करता हो उसे शास्त्रीय विधि के अनुसार अवधात से ही वैतुष्य करना चाहिए - "ब्रीहीनवहन्यादेव" यहाँ अवधात के प्रत्यक्ष होने पर भी अवधात नियम अप्रत्यक्ष है।
  • (ग) जहाँ एक काल में दो समुच्चय से प्राप्त हों और उनमें एक की व्यावृत्ति (निवृत्ति) करना ही जिसका फल हो उसे परिसंख्या विधि कहते हैं। उदाहरणार्थ - 'पंच पंचनखा भक्ष्याः' यह पंचनख भक्षण राग प्राप्त होने के कारण इसका विधान नहीं करता। पंचनखेतर पंचनख भक्षण भी प्राप्त है अर्थात् राग से पंचनखवाले पाँच का भक्षण जैसे प्राप्त होता है वैसे ही पंचनख से भिन्न पंचनखवालों का भी भक्षण रागतः प्राप्त है। इसलिए यहाँ अपूर्व विधि या नियम विधि नहीं। पंचेतर पंचनख भक्षण निवृत्ति है। इसलिए यह परिसंख्याविधि का उदाहरण है। नियम विधि में इतर निवृत्ति का वाचक शब्द नहीं किंतु अर्थात् होती है। परिसंख्या विधि में इतर निवृत्ति का बोधक शब्द रहता है। एवकार का दोनों में प्रयोग होता है। लेकिन नियमविधि में एवकार अयोग व्यावृत्ति का बोधक है और परिसंख्याविधि में एवकार अन्य योग व्यावृत्ति का बोधक है।

ऊपर विधियों के दो प्रकार बताए गए हैं, उसे इस प्रकार समझना चाहिए कि अपूर्वविधि में उत्पत्ति, विनियोग प्रयोग और अधिकार विधि चारों अंतर्गत होते हैं। नियम तथा परिसंख्या विधि, विनियोग विधि में ही अंतर्गत है। इस विषय का विशेष ज्ञान भाट्ट चिन्तामणि में द्रष्टव्य है।

पूर्वमीमांसा में वर्णित अर्थीकरण के सिद्धान्त[संपादित करें]

मीमांसा दर्शन में वाक्यार्थ करने की प्रक्रिया भी समझाई गई है, विशेषकर वैदिक वाक्यों के अर्थ करने की प्रक्रिया। सबसे पहले कुछ ऐसे सिद्धान्त बताए गए हैं, जिनके आधार पर अर्थनिर्धारण करना चाहिए –[2][3]

  • (१) सार्थक्यता – प्रत्येक शब्द व वाक्य को सार्थक समझना चाहिए, व उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। कारिका में इस सिद्धान्त की व्याख्या की गयी है।
शब्दाधिक्यात् अर्थाधिक्यम् ( अर्थ - जितने ही अधिक शब्द प्रयुक्त होते हैं, उतने ही अधिक अर्थ निकलते हैं।)
  • (२) लाघव – जहां एक नियम पर्याप्त हो, वहाँ अन्यों का ग्रहण नहीं करना चाहिए। वेदों में यह चर्चा बहुत काल से रही है कि मन्त्रों के दोबारा, तिबारा पढ़े जाने से वहां पुनरुक्ति दोष है।
  • (३) अर्थैकत्व – एक स्थान पर एक पद अथवा वाक्य का एक ही अर्थ ग्रहण करना चाहिए, अनेक नहीं। (यह निर्देश तो वेदों पर कहीं नहीं घटता। वेदों के पदों अथवा मन्त्रों के तीन अर्थ – आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक – तो लगभग सर्वत्र ही घटते हैं, और इनसे अधिक अर्थ भी यत्र-तत्र सम्भव हैं । प्रतीत होता है कि यह सिद्धान्त ब्राह्मण, स्मृति आदियों के लिए ही निर्दिष्ट है । इससे यहां कुछ सन्देह भी हो जाता है कि पूर्वमीमांसा के सिद्धान्त वेदों के लिए हैं भी या केवल इतर ग्रन्थों के लिए।)
  • (४) गुणप्रधान – यदि कोई पद वा वाक्य उत्सर्ग वाक्य के विपरीत हो, तो उत्सर्ग वाक्य को या तो अपवाद वाक्य के अनुसार कुछ परिवर्तित कर देना चाहिए, या फिर पूर्णतया त्याग देना चाहिए। (गुणमुख्यव्यतिक्रमे तदर्थत्वान्मुख्येन वेदसंयोगः) धर्म-विषय में इसको ऐसे समझना चाहिए – प्राणीहिंसा वर्जित है, परन्तु राजा और क्षत्रियों के लिए यह किन्हीं स्थितियों में निर्दिष्ट है, जैसे दण्ड देने अथवा राष्ट्र-रक्षा में। पाणिनि की अष्टाध्यायी तो सम्पूर्णतया इसी आधार पर लिखी गई है। प्रतीत होता है यह पद्धति हमारे ग्रन्थों में आरम्भ से चली आ रही है।
  • (५) सामञ्जस्य – जहां भी वैपरीत्य प्रतीत हो रहा हो, वहां पहले पदों वा वाक्यों में सामंजस्य बैठाने का प्रयत्न करना चाहिए।
  • (६) विकल्प – जहां अपरिहार्य वैपरीत्य है, वहां दोनों पदों वा वाक्यों में से किसी का भी ग्रहण किया जा सकता है । यह निर्देश प्रक्रियाओं, विशेषकर याज्ञिक प्रक्रियाओं से अधिक सम्बद्ध है । जैसे – किसी अनुष्ठान में एक स्थल पर दूध के प्रयोग का निर्देश हो, अन्यत्र जल का, तो दोनों में से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है।

अर्थनिर्धारण के विधान[संपादित करें]

नीचे पूर्वमीमांसा में कुछ विशेष विधान दिए गए हैं जिनसे अर्थ ग्रहण किया जाए –

श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये परदौर्ब ल्यमर्थविप्रकर्षात्
  • (१) श्रुति – जब क्रियापद व उससे सम्बद्ध संज्ञापद स्पष्ट अर्थ व्यक्त करते हैं, वाक्यार्थ सुनने से ही ज्ञात हो जाता है, तो उस अर्थ को वैसे ही ग्रहण कर लेना चाहिए, उसमें और तोड़-मरोड़ नहीं करनी चाहिए।
  • (२) लिङ्ग – जिसमें शब्द अथवा वाक्य किसी अन्य वस्तु व तथ्य के संकेत होते हैं, और वाक्य को समझने के लिए उस संकेत को समझना आवश्यक होता है । इसको लोक में लक्ष्यार्थ कहा जाता है, जैसे जब हम कहते है, “रिक्शा, इधर आओ !”, तब हम रिक्शा को नहीं, अपितु रिक्शा-चालक को सम्बोधित कर रहे होते हैं – ‘रिक्शा’ चालक का लिङ्ग है।
  • (३) वाक्य – जब पढ़ा गया वाक्य लगता तो पूर्ण है, परन्तु उसका अर्थ वास्तव में सही नही बैठता, तब उसके अर्थ को पूर्ण करने के लिए कहीं और से किसी अन्य पद व वाक्यांश का अध्याहार करना होता है।

मीमांसादर्शन के कुछ मौलिक सिद्धान्त[संपादित करें]

(१) वेद नित्य स्वयंभू एवं अपौरुषेय और अमोघ है।

(२) शब्द और अर्थ का सम्बन्ध नित्य है, वह किसी व्यक्ति के द्वारा उत्पन्न नही है।

(३) आत्माएँ अनेक नित्य एवं शरीर से भिन्न हैं। वे ज्ञान एवं मन से भी भिन्न हैं। आत्मा का निवास शरीर में होता है।

(४) यज्ञ में हवि प्रधान है और देवता गौण।

(५) फल की प्राप्ति यज्ञ से ही होती है, ईश्वर या देवताओं से नहीं।

(६) सीमित बुद्धि वाले लोग वेदवचनों को भली भांति न जानने के कारण भ्रामक बातें करते हैं।

(७) अखिल विश्व की न तो वास्तविक सृष्टि होती है और न ही विनाश।

(८) यज्ञसम्पादन सम्बन्धी कर्म एवं फल के बीच दोनों को जोड़ने वाली "अपूर्व" नामक शक्ति होती है। यज्ञ का प्रत्येक कृत्य एक “अपूर्व” की उत्पत्ति करता है, जो सम्पूर्ण कृत्य के अपूर्व का छोटा रूप होता है।

(९) प्रत्येक अनुभव सप्रमाण होता है, अतः वह भ्रामक या मिथ्या नहीं कहा जा सकता।

(१०) महाभारत एवं पुराण मनुष्यकृत हैं, अतः उनकी स्वर्गविषयक धारणा अविचारणीय है। स्वर्गसम्बन्धी वैदिक निरूपण केवल अर्थवाद (प्रशंसापर वचन ) है।

(११) निरातिशय सुख ही स्वर्ग है और उसे सभी खोजते हैं।

(१२) अभिलषित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए वेद में जो उपाय घोषित है वह इह या परलोक में अवश्य फलदायक होगा।

(१३) निरतिशय सुख (स्वर्ग) व्यक्ति के पास तब तक नही आता जब तक वह जीवित रहता है। अतः स्वर्ग का उपभोग दूसरे जीवन में ही होता है।

(१४) आत्मज्ञान के विषय में उपनिषदों की उक्तियां केवल अर्थवाद है क्योंकि वे कर्ता को यही ज्ञान देती हैं कि वह आत्मवान् है और आत्मा कि कुछ विशेषताएं हैं।

(१५) निषिद्ध और काम्य कर्मों को सर्वथा छोड़ कर नित्य एवं नैमित्तिक कर्म निष्काम बुद्धि से करना ही मोक्ष (अर्थात् जन्म मरण से छुटकारा) पाने का साधन है।

(१६) कर्मों के फल उन्ही को प्राप्त होते हैं जो उन्हे चाहते हैं।

(१७) प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद होते है:– (१) निर्विकल्प (२) सविकल्पक।

(१८) वेदों के दो प्रकार के वाक्य होते हैं :– सिद्धार्थक (जैसे– 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म)' और विधायक। वेद का तात्पर्य विधायक वाक्यों में ही है। सिद्धार्थक वाक्य अन्ततो गत्वा विधि वाक्यों से संबंधित होने के कारण ही चरितार्थ होते हैं।

(१९) वेदमन्त्रों में जिन ऋषियों के नाम पाये जाते हैं वे उन मन्त्रों के “द्रष्टा” होते हैं, कर्ता नहीं।

(२०) स्वतः प्रामाण्यवाद :– (१) ज्ञान की प्रामाणिकता या यथार्थता कही बाहर से नही आती अपितु वह ज्ञान की उत्पादक सामग्री के संग में अपने आप उत्पन्न होती है।

(२१) ज्ञान उत्पन्न होते ही उसके प्रामाण्य का ज्ञान भी उस समय होता है। उसकी सिद्धि के लिए अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

(२२) ज्ञान का प्रामाण्य स्वतः होता है किन्तु उसका अप्रामाण्य “परतः” होता है।

(२३) यह संसार भोगायतन (शरीर), भोगसाधन (इन्द्रियां) और भोगविषय (शब्दादि) इन तीन वस्तुओं से युक्त तथा अनादि और अनन्त है।

(२४) कर्मों के फलोन्मुख होने पर अणुसंयोग से व्यक्ति उत्पन्न होते हैं और कर्म फल की समाप्ति होने पर उनका नाश होता है।

(२५) कार्य की उत्पत्ति के लिए उत्पादन कारण के अतिरिक्त “शक्ति”की भी आवश्यकता होती है। शक्तिहीन उत्पादन कारण से कार्योत्पत्ति नहीं होती।

(२६) आत्मा – कर्ता, भोक्ता, व्यापक और प्रतिशरीर में भिन्न होता है। वह परिणामशील होने पर भी नित्य पदार्थ है।

(२७) आत्मा में चित् तथा अचित् दो अंश होते हैं। चिदंश से वह ज्ञान का अनुभव पाता है और अचित् अंश से वह परिणाम को प्राप्त करता है।

(२८) आत्मा चैतन्यस्वरूप नहीं अपि तु चैतन्यविशिष्ट है।

(२९) अनुकुल परिस्थिति में आत्मा में चैतन्य का उदय होता है, स्वप्नावस्था में शरीर का विषय से सम्बंध न होने से आत्मा मे चैतन्य नही रहता।

(३०) कुमारिल भट्ट आत्मा को ज्ञान का कर्ता तथा ज्ञान का विषय दोनों मानते हैं, परन्तु प्रभाकर आत्मा को प्रत्येक ज्ञान का केवल कर्ता मानते है क्योंकि एक ही वस्तु एकसाथ कर्ता तथा कर्म नहीं हो सकती।

(३१) भूत, भविष्य, वर्तमान, सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट पदार्थों को बतलाने में जितना सामर्थ्य “चोदना” में (अर्थात् विधि प्रतिपादक वेदवाक्यों में) है उतना इन्द्रियों या अन्य प्रमाणों में नहीं है।

(३२) नित्य कर्मों के अनुष्ठान से दुरितक्षय (पापों का नाश) होता है। उनके न करने से प्रत्यवाय दोष उत्पन्न होता है।

(३३) देवता शब्दमय या मन्त्रात्मक होते हैं। मन्त्रों के अतिरिक्त देवताओं का अस्तित्व नहीं होता।

(३४) प्राचीन मीमांसा ग्रन्थों के आधार पर ईश्वर की सत्ता सिद्ध नहीं मानी जाती। उत्तरकालीन मीमांसकों ने ईश्वर को कर्मफल के दाता के रूप में स्वीकार किया है।

(३५) जब लौकिक या दृष्ट प्रयोजन मिलता है तब अलौकिक या अदृष्ट की कल्पना नहीं करनी चाहिए ।

(३६) वेदमन्त्रों के अर्थज्ञान के सहित किये हुए कर्म ही फलदायक हो सकते हैं, अन्य नहीं।

(३७) किसी भी ग्रन्थ के तत्त्वज्ञान या तात्पयार्य का निर्णय- उपक्रम, उपसंहार , अभ्यास, अपूर्वता, फल, अर्थवाद और उपपत्ति इन सात प्रमाणों के आधार पर करना चाहिए ।

(३८) किसी भी सिद्धान्त का प्रतिपादन विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और प्रयोजन (या निर्णय) इन पांचो अंगों के द्वारा होना चाहिए ।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]