वस्तुनिष्ठावाद

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वस्तुनिष्ठावाद, पॉजिटिविज्म (Positivism) का हिन्दीकरण है। फ्रांसीसी शब्द "पाजिटिफ्" से उद्भूत पॉजिटिविज्म "निश्चित", असंदिग्ध" एवं "दृढ़तापूर्वक कहे जाने" के अर्थ में प्रयुक्त होता है। यह अनुभवातीत तत्व वैज्ञानिक अटकलों तथा पूर्व धारणाओं का परित्याग कर अनुभवप्रदत्तों तक सीमित रह सभी अनुभववादी दर्शनों पर लागू होता है। कॉन्त (Comte) ने यह पद विचार तथा जीवन की उस प्रणाली के लिए चुना था जो ज्ञान को केवल यथार्थ भौतिक घटनाओं की खोजों तथा विधियों पर आधारित मानती है परंतु विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त होकर "वस्तुनिष्ठावाद" यथार्थ, निश्चित एवं शुद्ध के अतिरिक्त उपयोगी, सापेक्ष, नियमबद्ध तथा सहानुभूतिपूर्ण भी बन गया।

परिचय[संपादित करें]

यद्यपि व्यवस्थित ज्ञान की उपलब्धि में वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग बाबीलोनिया, मिस्र तथा ग्रीस में प्राचीन काल में तथा कोपरनिकस, केपलर, गैलिलियो, बेकन और देकार्त द्वारा आधुनिक काल में भी हो चुका है, तथापि सामान्यतया "वस्तुनिष्ठावाद" कॉन्त के दर्शन के लिए ही प्रयुक्त होता है जो अतींद्रिय निरपेक्ष सत्ता के ज्ञान के समक्ष वैज्ञानिक ज्ञान की अधिक उपयोगिता स्वीकार करता है, क्योंकि वह प्राकृतिक शक्तियों को अधिकृत कर मानवोन्नति में योग देता है। कॉन्त के अनुसार वैज्ञानिक विधियों के अतिरिक्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना भी आवश्यक है जिससे भौतिक घटनाओं की भाँति ही जीवन के नैतिक एवं सामाजिक व्यापार भी व्यवस्थित तथा क्रमबद्ध किए जा सकें।

ह्यूम की भाँति अतींद्रिय परिकल्पनाओं का परित्याग कर वस्तु निष्ठावाद संशयवादी अथवा अज्ञेयवादी निषेधात्मक दर्शन नहीं अपनाता वरन् निश्चित रूप से सिद्ध करता है कि संवेदनों के अतिरिक्त अनुभव में वैज्ञानिक नियम प्राप्त होते हैं जो प्रकृति की एकरूपता की अतींद्रिय परिकल्पना पर आधारित होने से केवल संभाव्य हैं परंतु अप्राप्त निरपेक्ष से उत्कृष्ट हैं।

कॉन्त ने "वस्तुनिष्ठावादी दर्शन" में सांस्कृतिक विकास की तीन अवस्थाओं के मौलिक नियमों के द्वारा वस्तुनिष्ठावादी दर्शन के अर्थनिर्धारण का प्रयास किया है। धार्मिक, दार्शनिक तथा निश्चित जैसी तीन अवस्थाओं में से प्रथम अंतिम कारणों की खोज में ईश्वर पर पहुंचती है; दूसरी, अदृष्ट शक्तियों के चिंतन में प्रकृति पर टिकती है; तथा तृतीय निश्चित नियमों की खोज कर सामान्य नियम प्राप्त करती है। विभिन्न अवस्थाएँ मनुष्य जाति की शैशव, किशोर तथा प्रौढ़ अवस्थाओं की द्योतक हैं। मनुष्य मात्र का सांस्कृतिक विकास मानवीयकरण की प्रारंभिक प्रवृत्ति से प्रारंभ होकर दार्शनिक नियमों की प्रतिष्ठा के मध्य होकर वस्तुनिष्ठावादी स्तर पर पहुंचता है।

परंपरागत दर्शनों की प्रतिक्रिया के रूप में वस्तुनिष्ठावाद का पर्याप्त प्रचार, विशेषकर, दक्षिण अमरीका में हुआ। संयुक्त राज्य में व्यवहारवाद, नव्य वस्तुवाद, आलोचनात्मक वस्तुवाद तथा जड़वाद के प्रचलन से वस्तुनिष्ठावाद का केवल एक विशेष रूप "तार्किक अनुभववाद" पनप सका जो कॉन्त का दृष्टिकोण अपनाए हुए है।

तार्किक वस्तुनिष्ठावाद (logical positivism) ह्यूम के अनुभववाद, कॉन्त के वस्तुनिष्ठावाद तथा ह्वाइटहेड रसेल के तार्किक विश्लेषण का विचित्र सम्मिश्रण है। विज्ञानों को निरापद आधारप्रदान तथा अतींद्रिय तत्वविज्ञान की निरर्थकता के युगल उद्देश्यों की पूर्ति के हेतु वह भाषा के तार्किक विश्लेषण की विधि अपनाता है जिससे यह परंपरागत मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का परित्याग कर देता है। सत्यापन की प्रक्रिया को ही किसी प्रस्तावना का अर्थ मानकर तार्किक वस्तुनिष्ठावादी परंपरागत दार्शनिक प्रश्नों को निरर्थक मानते हैं क्योंकि इस नवीन व्याख्या के अनुसार इंद्रियातीत विषयों से संबंधित होने के कारण वे कोई अर्थ नहीं रखते। उद्गमन को "कार्य करने का नियम" तथा वैज्ञानिक नियमों को "एकवचनीय प्रस्तावनाओं की योजनाएँ" मानकर तार्किक अनुभववादी विज्ञान का वह संगत चित्र प्रस्तुत करता है जिसके अनुसार तत्ववैज्ञानिक परिकल्पनाएँ पूर्णतया बहिष्कृत हैं।

परंतु व्यक्ति के अनुभव पर आधारित विज्ञान में वस्तुगतता का सर्वथा अभाव ही होगा। इस वस्तुनिष्ठावाद में इस प्रकार निश्चित निरपेक्ष तथा वस्तुगत कुछ भी नहीं रह जाता। अनुभववाद तथा तार्किक बुद्धिवाद जैसी विरोधी प्रवृत्तियों का यह रचनात्मक संश्लेषण अर्थ के अर्थनिर्धारण में ही स्वयं अपने सिद्धांत को तिलांजलि दे देता है।