अंतरिक्ष

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पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच इंटरफेस।
जूल्स वेर्ने स्वचालित ट्रांसफर वाहन पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करता है

किसी ब्रह्माण्डीय पिण्ड, जैसे पृथ्वी, से दूर जो शून्य (void) होता है उसे अंतरिक्ष (Outer space) कहते हैं। यह पूर्णतः शून्य (empty) तो नहीं होता किन्तु अत्यधिक निर्वात वाला क्षेत्र होता है जिसमें कणों का घनत्व अति अल्प होता है। इसमें हाइड्रोजन एवं हिलियम का प्लाज्मा, विद्युतचुम्बकीय विकिरण, चुम्बकीय क्षेत्र तथा न्युट्रिनो होते हैं। सैद्धान्तिक रूप से इसमें 'डार्क मैटर' dark matter) और 'डार्क ऊर्जा' (dark energy) भी होती है।

मूल[संपादित करें]

संस्कृत और वैदिक साहित्य में अंतरिक्ष शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है - जहाँ से हिन्दी का शब्द और अर्थ लिया गया है। हाँलांकि वैदिक साहित्य में अंतरिक्ष का अर्थ पृथ्वी और द्युलोक - द्युलोक, यानि तारे और सूरज, प्रकाशमान, द्युत पदार्थों का लोक - के मध्य की चीज़ों को अंतरिक्ष कहते हैं। अंतरिक्ष शब्द का प्रयोग वेदों में द्यावा और पृथवी के साथ देखने को मिलता है। [1][2] इस परिभाषा के अनुसार अंतरिक्ष में धरती के वायुमंडल को भी शामिल कर सकते हैं। लेकिन हिन्दी अर्थ में प्रायः वायुमंडल को शामिल नहीं किया जाता। वास्तव में अंतरिक्ष इतना बड़ा है कि हम इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते|

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. जैसे यजुर्वेद के ३६ वें अध्याय का १७ वाँ श्लोक - द्यौः शान्तिरअंतरिक्षं शान्तिः पुथ्वी शान्तिरापोः शान्तिरोषधयः। वनस्पतयः शान्ति.. यानि द्युलोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी, पानी (आप) और ओषधियाँ सबों को शान्ति मिले ..
  2. या ऋग्वेद ७.३५.५ वाला श्लोक - शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमअंतरिक्षं दृशये नो अस्तु। ... यानि द्युलोक, पृथ्वी और सूर्य चंद्र वाला अंतरिक्ष हमारे दर्शन के लिए अच्छा हो ..

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]