ज्ञान

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ज्ञान लोगों के भौतिक तथा बौद्धिक सामाजिक क्रियाकलाप की उपज ; संकेतों के रूप में जगत के वस्तुनिष्ठ गुणों और संबंधों, प्राकृतिक और मानवीय तत्त्वों के बारे में विचारों की अभिव्यक्ति है। ज्ञान दैनंदिन तथा वैज्ञानिक हो सकता है। वैज्ञानिक ज्ञान आनुभविक और सैद्धांतिक वर्गों में विभक्त होता है। इसके अलावा समाज में ज्ञान की मिथकीय, कलात्मक, धार्मिक तथा अन्य कई अनुभूतियाँ होती हैं। सिद्धांततः सामाजिक-ऐतिहासिक अवस्थाओं पर मनुष्य के क्रियाकलाप की निर्भरता को प्रकट किये बिना ज्ञान के सार को नहीं समझा जा सकता है। ज्ञान में मनुष्य की सामाजिक शक्ति संचित होती है, निश्चित रूप धारण करती है तथा विषयीकृत होती है। यह तथ्य मनुष्य के बौद्धिक कार्यकलाप की प्रमुखता और आत्मनिर्भर स्वरूप के बारे में आत्मगत-प्रत्ययवादी सिद्धांतों का आधार है।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. दर्शनकोश, प्रगति प्रकाशन, मास्को, १९८0, पृष्ठ-२२६, ISBN: ५-0१000९0७-२

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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स्वप्रसारित ज्ञान और केंद्र प्रसारित ज्ञान- स्वप्रसारित ज्ञान अनादि सत्ता है और केंद्र प्रसारित ज्ञान मस्तिस्क से प्रसारित होने वाला ज्ञान है. केंद्र प्रसारित ज्ञान मृत्यु के साथ बीज रूप में स्वप्रसारित ज्ञान में लीन हो जाता है, पुनः सुसुप्ति से स्वप्न और जाग्रत अवस्था की तरह जन्म लेता है. स्व प्रसारित ज्ञान सर्वत्र है. केंद्र प्रसारित ज्ञान देह बद्ध है. केंद्र प्रसारित ज्ञान के कारण अहँकार की सत्ता है. स्व प्रसारित ज्ञान परमात्मतत्त्व है. जिस प्रकार केंद्र प्रसारित ज्ञान देह का भासित ईश्वर है उसी प्रकार स्व प्रसारित ज्ञान सृष्टि का ईश्वर है. स्व प्रसारित ज्ञान का जब एक अंश अपरा (जड़ )प्रकृति को स्वीकार कर लेता है तो केंद्र प्रसारित ज्ञान का उदय होता है और वह प्रजापति होकर शरीर का कारण दिखायी देता है. स्व प्रसारित ज्ञान साक्षी रूप में देह में भासित होता है केंद्र प्रसारित ज्ञान कर्ता, भोक्ता के रूप में दिखायी देता है. जब तक स्मृति है तब तक देहस्थ मैं का बोध है और जब स्मृति निरति में विलीन हो जाती है तब स्वरूप स्थिति का बोध होता है जो यथार्थ मैं है. यह ही ब्रह्म बोध है यहाँ वह जानता है ‘अहम् ब्रह्मास्मि’. सन्दर्भ - बसंत प्रभात जोशी के आलेख से