आर्थर शोपेनहावर

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आर्थर शोपेनहावर

आर्थर शोपेनहावर (Arthur Schopenhauer) (२२ फरवरी, १७८८ - २१ सितम्बर, १८६०) जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक थे। वे अपने 'नास्तिक निराशावाद' के दर्शन के लिये प्रसिद्ध हैं। उन्होने २५ वर्ष की आयु में अपना शोधपत्र पर्याप्त तर्क के चार मूल (On the Fourfold Root of the Principle of Sufficient Reason) प्रस्तुत किया जिसमें इस बात की मीमांसा की गयी थी कि क्या केवल तर्क (reason) संसार के गूढ रहस्यों से पर्दा उठा सकता है? बौद्ध दर्शन की भांति शोपेनहावर भी कि इच्च्हाओं (will) के शमन की आवश्यकता पर बल दिया है।

शोपेनहावर पर अन्य विचारकों का प्रभाव[संपादित करें]

शोपेनहावर का कहना था कि वे उपनिषदों, कॉन्ट एवं प्लेटो से प्रभावित थे। शोपेनहावर के लेखों में भारतीय दर्शन का बार-बार उल्लेख आता है। वे बुद्ध की शिक्षाओं को मानते थे और स्वयं को बौद्धधर्मी कहते उनका यहाँ तक कहना था कि यदि ये शिक्षाएँ नहीं होतीं तो उनका दर्शन भी नहीं होता। उपनिषदों के बारे में उन्होने कहा - " मेरे जीवन में उपनिषदों से शान्ति (solace) मिली है; उनसे ही मुझे मृत्यु के समय भी शान्ति मिलेगी।"

शोपेनहावर का प्रभाव[संपादित करें]

शोपेनहावर का इच्छा का विश्लेषण एवं उनकी मानवी इच्छा एवं प्रेरणाओं पर विचार ने फ्रेडरिक नीत्शे, रिचर्ड वाग्नर, लुड्विग विटिंगस्टीन एवं सैमुएल फ्रायड आदि प्रसिद्ध दार्शनिकों को प्रभावित किया। उनके पश्चवर्ती विचारकों पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा, यद्यपि यह प्रभाव दर्शन की अपेक्षा कला के क्षेत्र में ज्यादा है।

भारतविद्या (Indology)[संपादित करें]

शोपेनहावर ने उपनिषद का लैटिन अनुवाद पढा था जो फ्रांसीसी लेखक अंकेतिल दू पेरों (Anquetil du Perron) द्वारा दारा शिकोह के फारसी में सिरे-अकबर (महान रहस्य) से अनूदित था। वह उपनिषदों के दर्शन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होने कहा कि उपनिषदों ने मानव का सर्वोच्च ज्ञान उत्पन्न किया है

It is the most satisfying and elevating reading (with the exception of the original text) which is possible in the world; it has been the solace of my life and will be the solace of my death.साँचा:Citequote

ओप्नीखत् (Oupnekhat) (अर्थात उपनिषद) नामक पुस्तक सदा उनकी मेज पर पड़ी रहती थी और सोने के पहले वे उसे जरूर पढते थे। संस्कृत साहित्य को वह अपनी शताब्दी का सर्वोत्कृष्ट उपहार कहते थे। उन्होने भविष्यवाणी की थी कि उपनिषदों का ज्ञान और दर्शन ही पश्चिम का धर्म बन जायेगा।

पशुओं का अधिकार (animal rights)[संपादित करें]

अपने दर्शन के कारण शोपेनहावर जानवरों के अधिकार के प्रति बहुत संवेदन्शील हो गये थे।

शोपेनहावर और बौद्धधर्म[संपादित करें]

१८३० एवं १८४० के दशकों में स्वयं शोपेनहावर एवं अन्य यूरोपीय विचारक शोपेनहावर के दर्शन एवं बौद्ध दर्शन (चार परम सत्य) में बहुत एकरूपता पाते थे।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

लेख[संपादित करें]