तत्त्वमीमांसा

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तत्त्वमीमांसा (Metaphysics), दर्शन की वह शाखा है जो किसी ज्ञान की शाखा के वास्तविकता (reality) का अध्ययन करती है। परम्परागत रूप से इसकी दो शाखाएँ हैं - ब्रह्माण्ड विद्या (Cosmology) तथा सत्तामीमांसा या आन्टोलॉजी (ontology)।

तत्वमीमांसा में प्रमुख प्रश्न ये हैं-

  1. ज्ञान के अतिरिक्त ज्ञाता और ज्ञेय का भी अस्तित्व है या नहीं?
  1. अंतिम सत्ता का स्वरूप क्या है? वह एक प्रकार की है, या एक से अधिक प्रकार की?

जैन तत्वमीमांसा[संपादित करें]

जैन दर्शन के अनुसार तत्त्व सात है। यह हैं-

  1. जीव- जैन दर्शन में आत्मा के लिए "जीव" शब्द का प्रयोग किया गया हैं। आत्मा द्रव्य जो चैतन्यस्वरुप है। [1]
  2. अजीव- जड़ या की अचेतन द्रव्य को अजीव (पुद्गल) कहा जाता है।
  3. आस्रव - पुद्गल कर्मों का आस्रव करना
  4. बन्ध- आत्मा से कर्म बन्धना
  5. संवर- कर्म बन्ध को रोकना
  6. निर्जरा- कर्मों को शय करना
  7. मोक्ष - जीवन व मरण के चक्र से मुक्ति को मोक्ष कहते हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ सूची[संपादित करें]

  • शास्त्री, प. कैलाशचन्द्र (२००७), जैन धर्म, आचार्य शंतिसागर 'छाणी' स्मृति ग्रन्थमाला, आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-902683-8-4 
  1. शास्त्री २००७, प॰ ६४.