गुण (भारतीय संस्कृति)

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गुण शब्द का कई अर्थों में व्यवहार होता है। सामान्य बोलचाल की भाषा में वस्तु की उत्कर्षाधायक विशेषता को गुण कहते हैं। प्रधान के विपरीत अर्थ में ('गौण' के अर्थ में) भी गुण शब्द का प्रयोग होता है। रस्सी को भी गुण कहते हैं।

सांख्यशास्त्र[संपादित करें]

सांख्य शास्त्र में 'गुण' शब्द प्रकृति के तीन अवयवों के अर्थ में प्रयुक्त होता है। प्रकृति सत्व, रजस् तथा तमस् इन तीन गुणोंवाली है। गुणों की साम्यावस्था का ही नाम प्रकृति है। इन तीनों गुणों से अलग प्रकृति कुछ भी नहीं है। प्रकृति के जितने परिणाम हैं सबमें इन तीनो गुणों की स्थिति है परंतु कभी सत्व प्रधान होता है, कभी रजस् और कभी तमस्। सत्व की प्रधानता होने पर ऊर्ध्वगमन, ज्ञान, धर्म, ऐश्वर्य आदि उत्पन्न होते हैं। रजस् चल है, अत: गति का कारण है। तमस् गति को निरोधक तथा अधर्म, अज्ञान आदि का कारण है। इसी कारण प्रकृति को त्रिगुणात्मिका कहते हैं। इन गुणों की प्रधानता के आधार पर व्यक्तियों की प्रकृति, आहार आदि का भी विभाग किया जाता है। परंतु सांख्य के अनुसार पुरुष या आत्मा गुणातीत है। योग के अनुसार ईश्वर भी इन गुणों से परे है। सारे क्लेश, सांसारिक आनंद आदि का अनुभव गुणों के कारण होता है, अत: योग का चरम लक्ष्य निस्त्रैगुण्य अवस्था माना गया है।

वैशेषिकदर्शन[संपादित करें]

वैशेषिक दर्शनों में 'गुण' द्रव्यों की वह विशेषता है जो द्रव्यों से पृथक् है पर द्रव्यों में ही समवाय संबंध से रहती है और न तो यह क्रिया है, न सामान्य और न विशेष। इनकी संख्या २४ है-

बुद्धि, सुख, दु:ख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, गुरुत्व, स्नेहत्व, द्रवत्व, संख्या, परिमाण, पृथकत्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द, धर्म, अधर्म और संस्कार।

साहित्यशास्त्र[संपादित करें]

साहित्यशास्र में दस शब्दगुण और दस ही अर्थगुण माने गए हैं। इन दोनों प्रकारों में गुणों के नाम एक जैसे ही है परंतु उनके लक्षणों में भेद है : श्लेष, प्रसाद, समता, माधुर्य, सुकुमारता, अर्थव्यक्ति, उदारता, ओजस्, कांति तथा समाधि ये इनके नाम हैं। शब्दगुण के रूप में इनका लक्षण संक्षेप में यों है- श्लेष, जिस बंध में शैथिल्य न हो। प्रसाद-गुण-युक्त रचना में पहले तो शैथिल्य दिखाई देता है, बाद में गाढ़ता आ जाती है। जिस रचना में आरंभ से अंत तक एक ही रीति का निर्वाह हो वह समता गुण से युक्त होती है। जिस रचना में पद अलग अलग हों और संयुक्त वर्णों का अभाव सा हो उसे माधुर्य-गुण-युक्त कहते हैं। जिस रचना में पुरुष वर्ण न हो वह सुकुमार-गुण-युक्त होती है। जिस रचना का अर्थ अनायास ज्ञात हो जाता है उसे अर्थव्यक्ति गुण से युक्त मानते हैं। जिस रचना में कठोर वर्णों का संनिवेश हो वह उदारता गुण से युक्त होती है। जिस रचना में संयुक्त वर्णों का प्राचुर्य हो उसे ओजस् गुण से युक्त मानते हैं।

अप्रचलित पदों का परिहार करते हुए प्रचलित प्रयोगों से युक्त रचना कांति-युक्त होती है। जिस रचना में पहले गाढ़ बंध हो और बाद में शिथिलता हो उसे समाधि-गुण-युक्त रचना मानते हैं। ये शब्दगुण रचना में शब्दसंनिवेश की विशेषता से संबंधित है। अर्थगुणों का संबंध शब्द से न होकर रचना के अर्थ से होता है। क्रिया के कर्मों का एकत्र संनिवेश श्लेष गुण है। जितना अर्थ वर्णनीय हो उसके अनुरूप पदों के प्रयोग से जो अर्थ की स्पष्टता होती है उसे प्रसाद कहते हैं। उपक्रम का निर्वाह करते हुए अर्थ की घटना समता कहलाती है। एक ही उक्ति को पुन: दूसरे ढंग से कहना माधुर्य है। अस्थान में शोकादि का प्रदर्शन जिस रचना में न हो उसको सुकुमारता से युक्त मानते हैं। वर्णनीय वस्तु के असाधारण रूप और क्रियाओं का वर्णन अर्थव्यक्ति कहलाता है। अश्लीलता से रहित रचना उदारता-गुण-युक्त होती है। एक पदार्थ का बहुत पदों से, बहुत से पदार्थों का एक ही पद से, एक वाक्यार्थ का बहुत से वाक्यों से तथा बहुत से वाक्यार्थों का एक ही वाक्य से निर्देश करना तथा विशेषणों का अभिप्राय प्रयोग ओजस् कहलाता है। जिस रचना में रस स्पष्ट प्रतीयमान होता है उसे कांतिगुणयुक्त कहते हैं। अमुक अर्थ का वर्णन पहले नहीं हुआ अथवा वर्णन किसी पूर्वकवि के वर्णन की छाया है, यह आलोचना समाधि कहलाती है। मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि नव्य साहित्यशास्रियों के अनुसार माधुर्य, ओजस् तथा प्रसाद ये ही तीन गुण मुख्य हैं। बाकी गुणों का इन्हीं में अंतर्भाव हो जाता है। कुछ आचार्य अर्थगुणों को स्वीकार ही नहीं करते। ये गुण रस मात्र के धर्म माने गए हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • ईश्वरकृष्ण : सांख्यकारिका;
  • विश्वनाथ : न्यास-सिद्धांत-मुक्तावली;
  • साहित्यदर्पण;
  • जगन्नाथ : रसगंगाधर