संस्कृत व्याकरण

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संस्कृत में व्याकरण की परम्परा बहुत प्राचीन है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप में जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अधययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है ('वेदांग' देखें)। व्याकरण के मूलतः पाँच प्रयोजन हैं . रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंदेह।

वचन[संपादित करें]

संस्कृत में तीन वचन होते हैं- एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन।

संख्या में एक होने पर एकवचन का, दो होने पर द्विवचन का तथा दो से अधिक होने पर बहुवचन का प्रयोग किया जाता है।

लिंग[संपादित करें]

  • पुलिंग
  • स्त्रीलिंग
  • नपुंसकलिंग

पुरुष[संपादित करें]

  • प्रथम पुरुष (First person) - स:, सा, कुमारः, रामः, गोविन्दः
  • मध्यम पुरुष (Second person) - त्वम्, युवाम्, युयम्
  • उत्तम पुरुष (Third person) - अहं, आवाम्, वयम्

समास[संपादित करें]

समास यानि संक्षेपीकरण। यथा -"राजा के समीप"="उपराजम्", यहाँ केवल "राजा के समीप" की जगह "उपराजम्" कहने से काम चल जाएगा. समास ६ प्रकार के होते हैं।

१) तत्पुरुष

२) द्वंद्व

३) कर्मधारयः

४) बहुव्रीहि

५) अव्ययीभाव

६) द्विगु

समास क्रिया पदों में नहीं होता। समास के पहले पद को पूर्व पद कहते हैं बाकी सभी को उत्तर पद कहते हैं। समास के तोड़ने को विग्रह कहते हैं, जैसे -- "रामश्यामौ" यह समास है और रामः च श्यामः च (राम और श्याम) इसका विग्रह है।

कारक[संपादित करें]

कारक नाम - वाक्य के अन्दर उपस्थित पहचान-चिह्न

कर्ता - ने

कर्म - को (to)

करण - से (by), द्वारा

समप्रदान - मे लिये (for)

अपादान - से (from) अलगाव

सम्बन्ध - का के की (of) रा, रे, री, ना, ने, नी

अधिकरण - मे, पे, पर (in/on)

सम्बोधन - हे, अरे,

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]