परमात्मा

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परमात्मा शब्द दो शब्दों ‘परम’ तथा `आत्मा’ की सन्धि से बना है। परम का अर्थ सर्वोच्च एवं आत्मा से अभिप्राय है चेतना, जिसे प्राण शक्ति भी कहा जाता है। ईश्वर। आधुनिक हिन्दी में ये शब्द ईश्वर का ही मतलब रखता है।

परमात्मा का साक्षात्कार == ध्यान अवस्था में जो प्रकाश का दृश्य होता है वही परमात्मा का साक्षात्कार है ।

इस परम् सत्य को जो समझ जाता है वहां संसारिक दुखों से मुक्ति पा लेता है और परमात्मा व स्वयं को एक जानकर परमानंद में लीन रहता है । चाहे उस प्रकाश को किसी धर्म के परमात्मा के स्वरूप में परिकल्पना करके वास्तविक संसार में उसकी पूजा भक्ति की जा सकती है ।

परमात्मा की प्राप्ति के बाद संसार में कुछ प्राप्त करने की इच्छा ही नहीं होती है विश्व में सबसे बड़ी सफलता परमात्मा के यथार्थ रूप को समझ जाना है ।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

  1. प्रभु-जन्म की आरती

परमात्मा ____ एक ऐसी शक्ति जिसे सम्पूर्ण विश्व का निर्माण हुआ है और जिसे हर निर्जीव व जीव के हर परिस्थिति घटनाओं व गतिविधियों की पूर्ण जानकारी होती है । प्रायः अधिकांश धर्मो में परिकल्पना की दुनिया की मुख्य शक्ति जो वास्तविक दुनिया के निर्माण भी करता है पश्चिमी धर्म जिसमे मुस्लिम इसाई यहूदी है उनमें परमात्मा सर्व शक्तिमान है परन्तु उनसे मात्र एक प्रतिशत कम शक्तिशाली ही नकारत्मक शक्ति है जो विश्व को पाप से ग्रसित करता है इसलिए ये धर्म के अनुयायी पाप को पाप पुन्य पुन्य मानते है । पारसी धर्म में भी एसी ही मान्यता है । हिन्दू में मात्र परमात्मा ही है कोई भी नकारात्मक शक्ति नहीं है नकारत्मक शक्ति परमात्मा के ही अंश है जो शुद्ध होकर परमात्मा में ही समा गए है इसलिए हिन्दू सभी असुरों राक्षसों को भी पूज्यनीय मानते है इसलिए वे पाप पुन्य को माया समझते है हिन्दू में एक ही परमात्मा के कई स्वरूप माने गए है वही शिव विष्णु ब्राम्हा राम कृष्ण गणेश हनुमान दुर्गा अम्बा गायत्री जगदम्बा व सभी देव असुर दैत्य राक्षस है । जैन धर्म में जो सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित कर लिया वही परमात्मा है इनमें मात्र 24 तीर्थंकर ही ज्ञात व्यक्ति है जो सम्पूर्ण ज्ञान अर्जित किये है परन्तु वास्तविक में तीर्थंकर भी परिकल्पना के दुनिया के प्रमुख परमात्मा है । सिख ___ परमात्मा को अकाल पुरूष मानते है जिसे सम्पूर्ण जगत का निर्माण हुआ है । बौध्द में अमितय व सिध्दार्थ ही अनंत ज्ञान प्राप्त प्रमुख व्यक्ति है तथा 24 बुध्द की जानकारी है कहा जाए तो यही दोनों ही भगवान है । शिन्तो ताओ कन्यफूजियस में किसी भी नकारात्मक शक्ति की विवेचना नहीं है परन्तु परमात्मा सूर्य या फिर देवी देवता या फिर प्रकृति को ही कहा गया है ।

वास्तव में परमात्म वही है जो स्वयं के चेतना में जिसका स्वरूप है इसलिए स्वयं के लिए स्वयं के धर्म में परमात्मा जिसे कहा गया है वही है क्योंकि मनुष्य पुथ्वी के जिस स्थान पर है वही उसके लिए पृथ्वी का केन्द्र बिन्दु है । अन्य स्वरूप मात्र एक भ्रम है क्योंकि स्वयं के चेतना में परमात्म का स्वरूप स्वयं के धर्म के अनुसार दृश्यमान है ।