भाषा

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ये त्याग कि बात है सुनो भारतीयो मै भी एक भारतीय हू और अपनी फीलिंग शेयर कर रहा हू तुम सब विकिपीडिया हिन्दी वाला चलाने वाले भारतीय ही हो गे हम सब एक परिवार है चलो हम अपनी एक जाती ही मानलेते है भारतीय जैसे जर्मन जाती है इंग्लिश जाती है स्पेनिश जाती है ग्रीक जाती है लेबनानियो कि जाती है इजरायलीयो कि जाती है यहा के इलाको मे जाती नही क्लास थोड़ी बहुत होती है पर शादी विवाह भाईचारा सब आपस मे होता है |पुरे पंजाब से लेकर मणीपुर तक हम है कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक है अभी भारत यही है |हम मनुष्य है भारतीय है पाकिस्तान हमारा दुश्मन चीन हमारा दुश्मन ठीक है इतिहास मे अनेक युद्धो के थपेड़े सहे है | उंचनीच जातीपाती मौजुद है है यह अतीत है अतीत को भुलकर एक ऐैसे भारत का निर्माणकरे अपनीतरफ से कुछ हल्का त्याग करके कि हमारा भारत नार्वे स्वीडन जैसा दुनिया का सबसे शांत खुशहाल देश हो स्वीटजरलैंड जैसा सुंदर देश हो सारे भारतीय प्रसन्न हो खुश हो स्वस्थ हो सुंदर हटे कट्टे आकर्षक हो संस्कारी हो भारतीय परम्परा के अनुसार बुद्धिमान हो आपसमे भाईचारा हो एक जाती बस भारतीय हो अरे भाईयो बुढ़ा के एक दिन मरना है क्यो इतना समय व्यर्थ किया जाये दुसरे देशो के लोग जैसे नाूर्वे स्वीटजरलैंड वाले हमारे बारे मे क्या सोचते होंगे भारतीय नाटे भद्दे काले कुरूप गंदगी फैलाने वाले टुटी फुटी सड़को के साथ और नाखुस लोग होते है अविकसीत होत है यहातक कि हमलोगो कि पश्चिम कि तरफ बसने वाले पाकिस्तानीयो मे भी जरूर कुछ सुपीयरयारीटी काम्पलेक्स होता है अब जो कुछ भी हो पर यह सब भारतीय संसकृती से मैच नही करता हम भारतीयो को अब हर तरह से मजबुत बनना है व्यभिचार तो नही करना है हमारी संस्कृती मे शाकाहारअहींसा आदि का महत्व है यह सही बात है मुझे भी जीव हिंसा गलत लगती है सारे भारतीयो को मांसाहार नही करना चाहिये या नही करे | भगवान बुद्ध महावीर वेद शास्त्र पुराण इत्यादि का इस भारतीय धरा पर जन्म हुआ गणित का शुन्य का अविष्कार हुआ हम लोगो मे भारतीयो मे काबिलियत तो है विक्रम जैसा राजा हुआ मैयह सब बात पुरानी बात मे नही पड़ना चाहता पर एक दुसरा आव्शयक बात यह है कि हम भारतीयो कि एक संस्कृती रही है आत्मसात करने कि लोगो को देखते होगे सुंदर गोरे लंबे बुद्धिमान स्त्री या पुरुष तो मनमे कुछ फिलिंग तो आती है प्रतेयक मनुष्य मे कामवासना तो होती है उसकी पुरती तो आवश्यक है सब भारतीय लोग खुब आन्नद लो पर एक जिम्मेदारी है हमलोगो को भारत को सही मायने मे स्वर्ग बनाना है कुछ भारतीय होने से बाकी देशो से कुछ फीलिंग तो होती है हममे अफ्रीका वाले काले व पीछड़े युरोप वाले गोरे बगल मे पाकिस्तान अफगानिसं्तान वाले हिंसक पर भारतीयो से कुछ सुंदरता के मामले मे ठीक है | एैसा नही है कि हम भारतीयो के पास संसाधन नही है मुसलिम धर्म मे कुछ अपवित्रता है पर हमलोग सनातन धर्म वाले है सब भारतीय एक परिवार है बहुत से धर्म है सबको जिनेदेंगे आन्नदपुरवक रहे सब पर भारत को स्वर्ग बनना है पुरी दुनिया मे सबसे विकसीत शांत सुंदर भारत हो हम भारतीय भाईचारे से रहे जितनी भूमि भारत मे है उसका प्रयोग हो भारतीय वहा वहा है दुसरे देशो से मतलब नही हमलोग लंबे खुब गोरे या हल्के गेहुवे रंग के भारतीयो को बढ़वा दे बुद्धिमान निरोगी ताकतवार सुंदर विवेकी संस्कारी मानवीय दयालु पर गलत चीज पर कड़ा एकशन लेने वाली अच्छी जिनट्री भारत की जो दुनिया मे सबसे सुंदर हो एैसे लोगो को छाटे ब्राह्मण पुरी दुनिया मे सिर्फ भारत मे है ब्राह्मण एक गोत्र इत्यादि कि व अनादि संसकृती है व्यभिचार सबसे कम इस संसकृति मे है संतान मे डीएनए मे विकृति नही आती है संभवत: ब्राह्मण गोत्र इत्यादि के हिसाब से विवाह करने पर ब्राह्मण भी बटते गये है कोई जरूरी नही कि ब्राह्मण गोरा लंबा स्वस्थ बुद्धिमान हो पर ब्राह्मण कोइ चीजतो है साथ मे गोरा लंबा बुद्धिमान सुंदर नाक नक्स यह सब भी कुछ चीज है एैसा हो सकता है पहले सब ब्राह्मण रहे हो संसार मे बादमे गलत सही करने से बहुत से कुछ हलका फुलका उपर नीचे कइ जाती बनगयी हो ै कुछ तो सब है पर है भारतीय सब बुढ़ा के मरना है जिंदगी खत्म तो सब खत्म इसके अलावा फालतु कि मारकाट उचनीच मची रहती है ना जाने किस किस अस्तर तक किस किस तरह कि जातीया है छोड़े यार यह सब युरोपियो ग्रीको से पाकिस्तानीयो नुरीस्तानियो ईरानियो इन सबसे हमसबको कम्पटीशन करना है |आओ भारत को स्वर्ग बनाये बच्चे तो बच्चे है जितनी जाती है भारतमे सब मनुष्य एक दुसरे को हेल्प करो हम अकेले मे जोकुछ सोचते है उसीतरह सोचो हम भारतदेश और भारतीय एक परिवार है मेरा कहने का मतलब है गोरे हलके गेहुंवे लंबे सुंदर तेज बुद्धि के दयालु मानवीय पछ वाले पर वीर निरोगी साकाहारी व भारत की संसकार संसकृती के समनवय वाले स्त्री पुरूष लोग खुब बच्चे पैदा करके दो तीन अपने पास रखो व एक दो बच्चे त्याग कि भावना से काले भद्दे लोगो को दो काले लोग आन्नद से रहे सम्भोग करे पर बच्चे ये गोरेवाले रखलो संतोष कि भावना से हमसब परिवार है भारत को एक जाती भारतीय बनाना है जितना इलाका है पुरव से पश्चिम उत्तर से दक्षिण को इ हीनभावना ना हो जो कुछ मौजुद है अब उसका लाभ ाले ना है नाजीयो कि तरह से नही बल्कि विश्वास आपसी सहयोग व भारतीय तरीके से अरे भाइयो गहराई से सोचो यही भारत के पिछड़ेपन की व कइ तरह के जातीयो की वजह है | भारत मे अफ्रीका कि तरह काले काले काफी बढ़ गये ह छेत्रवाद भाषावाद बहुत तरह की प्राब्लम है फिर भी सोचो हमसब भारतीय है हर चीज का सुलझालेते है अपने परिवार की बात है अच्छे लोगो का चुनाव हमसबको इसके लिये करना है सिर्फ दसपंद्रह साल के बाद जाती जैसे चीज खत्म नार्वे डेनमारक की तरह सांती स्वीटजरलैंड की खुबसुरती इजराइल की तरह शक्ति और आपसी भाईचारा सब होगा बहुत जादा गोरे नही सही होते पर अच्छे गोरे हलके गेंहुवे लंबे सारी बात बताचुका हू बिलकुल आराम से आपसी सहयोग से सबकुछ करो भारत परिवार सबसे ताकतवर हर तरह से बनना है हम भारतीयो को अरे बुढ़ा को मरना ह कोइ लाद के जायेगा सबकुछ हिंदु मुसलिम जातीपाती सब भारत मे खत्म करना है पर पहले ये सब काम करके सब जीयेंगे मस्त रहेंगे भारतमाता की जय वंदे मातरमैै | मिटाना नही हर एक जान किमती है और इनसान चाह जाये तो क्या नही पैसिबल ह








भाषा वह साधन है जिसके द्वारा हम अपने विचारों को व्यक्त करते है और इसके लिये हम वाचिक ध्वनियों का उपयोग करते हैं। भाषा मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह है जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। किसी भाषा की सभी ध्वनियों के प्रतिनिधि स्वन एक व्यवस्था में मिलकर एक सम्पूर्ण भाषा की अवधारणा बनाते हैं। व्यक्त नाद की वह समष्टि जिसकी सहायता से किसी एक समाज या देश के लोग अपने मनोगत भाव तथा विचार एक दूसरे पर प्रकट करते हैं। मुख से उच्चारित होनेवाले शब्दों और वाक्यों आदि का वह समूह जिनके द्वारा मन की बात बतलाई जाती है। बोली। जबान। वाणी। विशेष— इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह सीखे नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाकों के भी अनेक वर्ग उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हमारी हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है। संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कुत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है।

सामान्यतः भाषा को वैचारिक आदान-प्रदान का माध्यम कहा जा सकता है। भाषा आभ्यंतर अभिव्यक्ति का सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम है। यही नहीं वह हमारे आभ्यंतर के निर्माण, विकास, हमारी अस्मिता, सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का भी साधन है। भाषा के बिना मनुष्य सर्वथा अपूर्ण है और अपने इतिहास तथा परम्परा से विच्छिन्न है।

इस समय सारे संसार में प्रायः हजारों प्रकार की भाषाएँ बोली जाती हैं जो साधारणतः अपने भाषियों को छोड़ और लोगों की समझ में नहीं आतीं। अपने समाज या देश की भाषा तो लोग बचपन से ही अभ्यस्त होने के कारण अच्छी तरह जानते हैं, पर दूसरे देशों या समाजों की भाषा बिना अच्छी़ तरह सीखे नहीं आती। भाषाविज्ञान के ज्ञाताओं ने भाषाओं के आर्य, सेमेटिक, हेमेटिक आदि कई वर्ग स्थापित करके उनमें से प्रत्येक की अलग अलग शाखाएँ स्थापित की हैं और उन शाखाओं के भी अनेक वर्ग-उपवर्ग बनाकर उनमें बड़ी बड़ी भाषाओं और उनके प्रांतीय भेदों, उपभाषाओं अथाव बोलियों को रखा है। जैसे हिंदी भाषा भाषाविज्ञान की दृष्टि से भाषाओं के आर्य वर्ग की भारतीय आर्य शाखा की एक भाषा है; और ब्रजभाषा, अवधी, बुंदेलखंडी आदि इसकी उपभाषाएँ या बोलियाँ हैं। पास पास बोली जानेवाली अनेक उपभाषाओं या बोलियों में बहुत कुछ साम्य होता है; और उसी साम्य के आधार पर उनके वर्ग या कुल स्थापित किए जाते हैं। यही बात बड़ी बड़ी भाषाओं में भी है जिनका पारस्परिक साम्य उतना अधिक तो नहीं, पर फिर भी बहुत कुछ होता है।

संसार की सभी बातों की भाँति भाषा का भी मनुष्य की आदिम अवस्था के अव्यक्त नाद से अब तक बराबर विकास होता आया है; और इसी विकास के कारण भाषाओं में सदा परिवर्तन होता रहता है। भारतीय आर्यों की वैदिक भाषा से संस्कृत और प्राकृतों का, प्राकृतों से अपभ्रंशों का और अपभ्रंशों से आधुनिक भारतीय भाषाओं का विकास हुआ है।

प्रायः भाषा को लिखित रूप में व्यक्त करने के लिये लिपियों की सहायता लेनी पड़ती है। भाषा और लिपि, भाव व्यक्तीकरण के दो अभिन्न पहलू हैं। एक भाषा कई लिपियों में लिखी जा सकती है और दो या अधिक भाषाओं की एक ही लिपि हो सकती है। उदाहरणार्थ पंजाबी, गुरूमुखी तथा शाहमुखी दोनो में लिखी जाती है जबकि हिन्दी, मराठी, संस्कृत, नेपाली इत्यादि सभी देवनागरी में लिखी जाती है।

परिभाषा[संपादित करें]

भाषा को प्राचीन काल से ही परिभाषित करने की कोशिश की जाती रही है। इसकी कुछ मुख्य परिभाषाएं निम्नलिखित हैं-

  • (१) भाषा शब्द संस्कृत के भाष् धातु से बना है जिसका अर्थ है बोलना या कहना अर्थात् भाषा वह है जिसे बोला जाय।
  • (2) प्लेटो ने सोफिस्ट में विचार और भाषा के संबंध में लिखते हुए कहा है कि विचार और भाषआ में थोड़ा ही अंतर है। विचार आत्मा की मूक या अध्वन्यात्मक बातचीत है पर वही जब ध्वन्यात्मक होकर होठों पर प्रकट होती है तो उसे भाषा की संज्ञा देते हैं।
  • (3) स्वीट के अनुसार ध्वन्यात्मक शब्दों द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।
  • (4) वेंद्रीय कहते हैं कि भाषा एक तरह का चिह्न है। चिह्न से आशय उन प्रतीकों से है जिनके द्वारा मानव अपना विचार दूसरों पर प्रकट करता है। ये प्रतीक कई प्रकार के होते हैं जैसे नेत्रग्राह्य, श्रोत्र ग्राह्य और स्पर्श ग्राह्य। वस्तुतः भाषा की दृष्टि से श्रोत्रग्राह्य प्रतीक ही सर्वश्रेष्ठ है।
  • (5) ब्लाक तथा ट्रेगर- भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तंत्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह सहयोग करता है।
  • (6) स्त्रुत्वा – भाषा यादृच्छिक भाष् प्रतीकों का तंत्र है जिसके द्वारा एक सामाजिक समूह के सदस्य सहयोग एवं संपर्क करते हैं।
  • (7) इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका - भाषा को यादृच्छिक भाष् प्रतिकों का तंत्र है जिसके द्वारा मानव प्राणि एक सामाजिक समूह के सदस्य और सांस्कृतिक साझीदार के रूप में एक सामाजिक समूह के सदस्य संपर्क एवं संप्रेषण करते हैं।
  • (8) ‘‘भाषा यादृच्छिक वाचिक ध्वनि-संकेतों की वह पद्धति है, जिसके द्वारा मानव परम्परा विचारों का आदान-प्रदान करता है।’’[1] स्पष्ट ही इस कथन में भाषा के लिए चार बातों पर ध्यान दिया गया है-
(१) भाषा एक पद्धति है, यानी एक सुसम्बद्ध और सुव्यवस्थित योजना या संघटन है, जिसमें कर्ता, कर्म, क्रिया, आदि व्यवस्थिति रूप में आ सकते हैं।
(२) भाषा संकेतात्कम है अर्थात् इसमे जो ध्वनियाँ उच्चारित होती हैं, उनका किसी वस्तु या कार्य से सम्बन्ध होता है। ये ध्वनियाँ संकेतात्मक या प्रतीकात्मक होती हैं।
(३) भाषा वाचिक ध्वनि-संकेत है, अर्थात् मनुष्य अपनी वागिन्द्रिय की सहायता से संकेतों का उच्चारण करता है, वे ही भाषा के अंतर्गत आते हैं।
(४) भाषा यादृच्छिक संकेत है। यादृच्छिक से तात्पर्य है - ऐच्छिक, अर्थात् किसी भी विशेष ध्वनि का किसी विशेष अर्थ से मौलिक अथवा दार्शनिक सम्बन्ध नहीं होता। प्रत्येक भाषा में किसी विशेष ध्वनि को किसी विशेष अर्थ का वाचक ‘मान लिया जाता’ है। फिर वह उसी अर्थ के लिए रूढ़ हो जाता है। कहने का अर्थ यह है कि वह परम्परानुसार उसी अर्थ का वाचक हो जाता है। दूसरी भाषा में उस अर्थ का वाचक कोई दूसरा शब्द होगा।

हम व्यवहार में यह देखते हैं कि भाषा का सम्बन्ध एक व्यक्ति से लेकर सम्पूर्ण विश्व-सृष्टि तक है। व्यक्ति और समाज के बीच व्यवहार में आने वाली इस परम्परा से अर्जित सम्पत्ति के अनेक रूप हैं। समाज सापेक्षता भाषा के लिए अनिवार्य है, ठीक वैसे ही जैसे व्यक्ति सापेक्षता। और भाषा संकेतात्मक होती है अर्थात् वह एक ‘प्रतीक-स्थिति' है। इसकी प्रतीकात्मक गतिविधि के चार प्रमुख संयोजक हैः दो व्यक्ति-एक वह जो संबोधित करता है, दूसरा वह जिसे संबोधित किया जाता है, तीसरी संकेतित वस्तु और चौथी-प्रतीकात्मक संवाहक जो संकेतित वस्तु की ओर प्रतिनिधि भंगिमा के साथ संकेत करता है।

विकास की प्रक्रिया में भाषा का दायरा भी बढ़ता जाता है। यही नहीं एक समाज में एक जैसी भाषा बोलने वाले व्यक्तियों का बोलने का ढंग, उनकी उच्चापण-प्रक्रिया, शब्द-भंडार, वाक्य-विन्यास आदि अलग-अलग हो जाने से उनकी भाषा में पर्याप्त अन्तर आ जाता है। इसी को शैली कह सकते हैं।

बोली, विभाषा, भाषा और राजभाषा[संपादित करें]

यों बोली, विभाषा और भाषा का मौलिक अन्तर बता पाना कठिन है, क्योंकि इसमें मुख्यतया अन्तर व्यवहार-क्षेत्र के विस्तार पर निर्भर है। वैयक्तिक विविधता के चलते एक समाज में चलने वाली एक ही भाषा के कई रूप दिखाई देते हैं। मुख्य रूप से भाषा के इन रूपों को हम इस प्रकार देखते हैं-

(१) बोली,

(२) विभाषा और

(३) भाषा (अर्थात् परिनिष्ठित या आदर्श भाषा)

बोली भाषा की छोटी इकाई है। इसका सम्बन्ध ग्राम या मण्डल से रहता है। इसमें प्रधानता व्यक्तिगत बोली की रहती है और देशज शब्दों तथा घरेलू शब्दावली का बाहुल्य होता है। यह मुख्य रूप से बोलचाल की ही भाषा है। अतः इसमें साहित्यिक रचनाओं का प्रायः अभाव रहता है। व्याकरणिक दृष्टि से भी इसमें असाधुता होती है।

विभाषा का क्षेत्र बोली की अपेक्षा विस्तृत होता है यह एक प्रान्त या उपप्रान्त में प्रचलित होती है। एक विभाषा में स्थानीय भेदों के आधार पर कई बेलियां प्रचलित रहती हैं। विभाषा में साहित्यिक रचनाएं मिल सकती हैं।

भाषा, अथवा कहें परिनिष्ठित भाषा या आदर्श भाषा, विभाषा की विकसित स्थिति हैं। इसे राष्ट्र-भाषा या टकसाली-भाषा भी कहा जाता है।

प्रायः देखा जाता है कि विभिन्न विभाषाओं में से कोई एक विभाषा अपने गुण-गौरव, साहित्यिक अभिवृद्धि, जन-सामान्य में अधिक प्रचलन आदि के आधार पर राजकार्य के लिए चुन ली जाती है और उसे राजभाषा के रूप में या राष्ट्रभाषा घोषित कर दिया जाता है।

राज्यभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा[संपादित करें]

किसी प्रदेश की राज्य सरकार के द्वारा उस राज्य के अंतर्गत प्रशासनिक कार्यों को सम्पन्न करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है, उसे राज्यभाषा कहते हैं। यह भाषा सम्पूर्ण प्रदेश के अधिकांश जन-समुदाय द्वारा बोली और समझी जाती है। प्रशासनिक दृष्टि से सम्पूर्ण राज्य में सर्वत्र इस भाषा को महत्त्व प्राप्त रहता है।

भारतीय संविधान में राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के लिए हिन्दी के अतिरिक्त २१ अन्य भाषाएं राजभाषा स्वीकार की गई हैं। राज्यों की विधानसभाएं बहुमत के आधार पर किसी एक भाषा को अथवा चाहें तो एक से अधिक भाषाओं को अपने राज्य की राज्यभाषा घोषित कर सकती हैं।

राष्ट्रभाषा सम्पूर्ण राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करती है। प्राय: वह अधिकाधिक लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली भाषा होती है। प्राय: राष्ट्रभाषा ही किसी देश की राजभाषा होती है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. A language is a system of arbitrary vocal symbols by means of which a social group co-operates. - Outlines of linguistic analysis, b. Block and G.L. Trager, page 5.


संबंधित पुस्तकें[संपादित करें]

  • भाषा विज्ञान - भोला नाथ तिवारी, किताब महल, नई दिल्ली, 1951
  • भाषा और समाज - रामविलास शर्मा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]