राष्ट्रभाषा

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राष्ट्रभाषा एक देश की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा होती है, जिसे सम्पूर्ण राष्ट्र में भाषा कार्यों में (जैसे लिखना, पढ़ना और वार्तालाप) के लिए प्रमुखता से प्रयोग में लाया जाता है। वह भाषा जिसमें राष्ट्र के काम किए जायें। राष्ट्र के काम-धाम या सरकारी कामकाज के लिये स्वीकृत भाषा।

(२). वह भाषा जिसे राष्ट्र के समग्र नागरिक अन्य भाषा-भाषी होते हुए भी जानते समझते हों और उसका व्यवहार करते हों। राष्ट्र द्वारा मान्यताप्राप्त भाषा।


भारत की सभी भाषाएँ राष्ट्रभाषा है। खड़ी बोली संज्ञा स्त्री० [हिं० खड़ी (या खरी?) + बोली (भाषा)] वर्तमान हिंदी का एक रूप जिसमें संस्कृत के शब्दों की बहुलता करके वर्तमान हिंदी भाषा की और फारसी तथा अरबी के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि की गई है। वह बोली जिसपर ब्रज या अवधी आदि की छाप न हो। ठेंठ हिंदीं। आज की राष्ट्रभाषा हिंदी का पूर्व रूप। इसका इतिहास शताब्दियों से चला आ रहा है। परिनिष्ठित पश्चिमी हिंदी का एक रूप। वि० दे० 'हिंदी'। विशेष—जिस समय मुसलमान इस देश में आकर बस गए, उस समय उनेहें यहाँ की कोई एक भाषा ग्रहण करने की आव— श्यकता हुई। वे प्राय? दिल्ली और उसके पूरबी प्रांतों में ही अधिकता से बसे थे और ब्रजभाष तथा अवधी भाषाएँ, क्लिष्ट होने के कारण अपना नहीं सकते थे, इसलिये उन्होंने मेरठ और उसके आसपास की बोली ग्रहण की और उसका नाम खड़ी (खरी?) बोली रखा। इसी खड़ी बोली में वे धीरे धीरे फारसी और अरबी शब्द मिलाते गए जिससे अंत में वर्तमान उर्दू भाषा की सृष्टि हुई। विक्रमी १४वीं शताब्दी मे पहले पहल अमीर खुसरो ने इस प्रांतीय बोली का प्रयोग करना आरंभ किया और उसमें बहुत कुछ कविता की, जो सरल तता सरस होने के कारण शीघ्र ही प्रचलित हो गई। बहुत दिनों तक मुसलमान ही इस बोली का बोलचाल और साहित्य में व्यवहार करते रहे, पर पीछे हिंदुओं में भी इसका प्रचार होने लगा। १५वीं और १६ वीं शताब्दी में कोई कोई हिंदी के कवि भी अपनी कविता में कहीं कहीं इसका प्रयोग करने लगे थे, पर उनकी संख्या प्राय? नहीं के समान थी। अधिकांश कविता बराबर अवधी और व्रजभाषा में ही होती रही। १८वीं शताव्धी में हिंदू भी साहित्य में इसका व्यवहार करने लगे, पर पद्य में नहीं, केवल गद्य में; और तभी से मानों वर्तमान हिंदी गद्य का जन्म हुआ, जिसके आचार्य मु० सदासुख, लल्लू जी लाल और सदल मिश्र माने जाते हैं। जिस प्रकार मुसलमानों ने इसमें फारसी तथा अरबी आदि के शब्द भरकर वर्तमान उर्दू भाषा बनाई, उसी प्रकार हिंदुओं ने भी उसमें संस्कुत के शब्दों की अधिकता करके वर्तमान हिंदी प्रस्तुत की। इधर थोड़े दिनों से कुछ लोग संस्कृतप्रचुर वर्तमान हिंदी में भी कविता करने लग गए हैं और कविता के काम के लिये उसी को खड़ी बोली कहतो हैं।

राष्ट्रभाषा के बारे में गांधीजी के वि‍चार: दिनांक ४-३-१९०९: हिंदुस्तान को ग़ुलाम बनाने वाले जो हम अंग्रेज़ी जानने वाले लोग हैं। प्रजा की हाय अंग्रेज़ों पर नहीं, बल्कि हम लोगों पर पड़ेगी।

दिनांक ६-२-१९१४: अंग्रेज़ी भाषा हमारे राष्ट्र के पाँव में बेड़ी बन कर पड़ी हुई है।

दिनांक १०-५-१९१७: हिंदी ही हिंदुस्तान के शिक्षित समुदाय की भाषा हो सकती है। यह निर्विवाद है। यह कैसे हो-केवल यही विचार करना है। जिस स्थान को लेने का अंग्रेज़ी भाषा प्रयत्न कर रही है और जिसे लेना उसके लिए असंभव है। वही स्थान हिंदी को मिलना चाहिए, क्योंकि हिंदी का उस पर अधिकार है। यह स्थान अंग्रेज़ी को नहीं मिल सकता है, क्योंकि वह विदेशी भाषा है और हमारे लिए बड़ी कठिन है। अंग्रेज़ी की अपेक्षा हिंदी सीखना सरल है।

सितम्बर १९२०: सच्चा शिक्षित तो वही मनुष्य कहा जा सकता है जो अपने शरीर को अपने वश में रख सकता हो और जिसका शरीर अपना सौंपा हुआ काम आसानी और सरलता से कर सकता हो।...जो विद्या हमें मुक्ति से दूर भगा ले जाती हो वह त्याज्य है, राक्षसी है, अधर्म है।...देशी भाषा का अनादर राष्ट्रीय अपघात है।

सितंबर १९२०: माता का दूध पीने से लेकर ही जो सँस्कार और मधुर शब्दों द्वारा जो शिक्षा मिलती है उसके और पाठशाला की शिक्षा के बीच संगत होना चाहिए। परकीय भाषा से वह शृंखला टूट जाती है और उस शिक्षा से पुष्ट होकर हम मातृद्रोह करने लग जाते हैं।

दिनांक २१-४-१९२०: माध्यम की आवश्यकता पर तो किसी तरह का इतराज नहीं उठाया जाता। पर वह माध्यम, अंग्रेज़ी नहीं हो सकती।...हमारी शिक्षा प्रणाली में अंग्रेज़ी भाषा को देशी भाषाओं से उच्च स्थान दिया गया है। यह कैसी अप्राकृतिक घटना है। यह शिक्षा प्रणाली राक्षसी है। मैंने अपना जीवन इसी प्रणाली के नष्ट करने के लिए दे रखा है।

दिनांक १३-४-१९२१: यह शिक्षाप्रणाली अत्यन्त दुष्परिणामकारी है। इस प्रणाली को नष्ट करने के लिए मैं तन, मन से प्रयत्न कर रहा हूँ।

दिनांक १-९-१९२१: अब रही शिक्षा के माध्यम की बात। इस विषय पर मेरे विचार इतने स्पष्ट है कि यहाँ उनके दोहराने की ज़रूरत नहीं। इस विदेशी भाषा के माध्यम ने लड़कों के दिमाग़ को शिथिल कर दिया और उनकी शक्तियों पर अनावश्यक जोर डाला, उन्हें रट्टू और नक़लची बना दिया, मौलिक विचारों और कार्यों के लिए अयोग्य कर दिया और अपनी शिक्षा का सार अपने परिवारवालों तथा जनता तक पहुँचाने में असमर्थ बना दिया है। इस विदेशी माध्यम ने हमारे बच्चों को अपने ही घर में पूरा पक्का परदेशी बना दिया है। वर्तमान शिक्षा-प्रणाली का यह सबसे बड़ा दु:खांत दृश्य है। अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम ने हमारी देशी भाषाओं की बढ़ती को रोक दिया है। यदि मेरे हाथ में मनमानी करने की सत्ता होती तो मैं आज से ही विदेशी भाषा के द्वारा हमारे लड़के और लड़कियों की पढ़ाई बन्द कर देता और सारे शिक्षकों और अध्यापकों से यह माध्यम तुरंत बदलवाता या उन्हें बर्खास्त करता। मैं पाठ्य पुस्तकों की तैयारी का इंतज़ार न करता, वे तो परिवर्तन के पीछे-पीछे चली आवेंगी। यह ख़राबी तो ऐसी है, जिसके लिए तुरन्त इलाज की ज़रूरत है।...मेरा तो यह निश्चित मत है कि दुनिया में किसी संस्कृति का भण्डार इतना भरा पूरा नहीं है जितना कि हमारी स्सकृति का है। हमने उसे जाना नहीं है, हम उसके अध्ययन से दूर रखे गये हैं और उसके गुण को जानने और मानने का मौक़ा हमें नहीं दिया गया है।

दिनांक २-२-१९२१: अंग्रेज़ी के मोह से छुटना स्वराज्य का आवश्यक और अनिवार्य तत्त्व है।

दिनांक ५-७-१९२८: हमारे यहाँ विदेशी भाषा के माध्यम ने राष्ट्र की शिक्षा हर ली है। विद्यार्थियों की आयु घटा दी है। उन्हें आम लोगों से दूर कर दिया है और शिक्षा को बिना कारण र्चीला बना दिया है। देश के नौजवानों पर एक विदेशी भाषा माध्यम थोप देने से उनकी प्रतिभा कुंठित हो रही है और इतिहास में इसे विदेशी शासन की बुराइयों में से सबसे बड़ी बुराई माना जाएगा। इसलिए शिक्षित भारतीय अपने आपको विदेशी से इस व्यामोह से जितनी जल्दी मुक्त कर लेंगे, हिंदी और देशी भाषाओं को अपना लेंगे, उतना ही अच्छा होगा।

दिनांक ५-७-१९२९: यदि अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षण की प्रक्रिया जारी रही तो यह राष्ट्र की अस्मिता नष्ट कर देगी।

दिनांक १५-१०-१९३४: बिना राष्ट्रभाषा के राष्ट्रवादी नहीं हुआ जा सकता है, वैसी ही हालत में अंतरराष्ट्रीय-वादी होना भी नामुमकिन है। अंतरराष्ट्रीयता तभी संभव है जबकि राष्ट्रीयता वास्तवि‍क स्थापित हो जाती है।

दिनांक १५-८-१९४७: दुनिया से कह दो कि 'गांधी अंग्रेज़ी नहीं जानता'।