यूनानी दर्शन

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यूनान की भूमि दर्शन के लिये बहुत उर्वर रही है। बहुत से विद्वान मानते हैं कि यूनानी दर्शन ने सम्पूर्ण पाश्चात्य चिन्तन पर अमिट छाप छोड़ा है।

परिचय[संपादित करें]

यूनानी दर्शन को तीन भागों में विभक्त किया जाता है। पहला भाग उन लोगों के विचार हैं जो यूनानी थे, परंतु यूनान के बाहर यूनानी बस्तियों में रहते थे। सोफिस्ट संप्रदाय के विचारकों और सुकरात के साथ एथंस दर्शनशास्त्र की राजधानी बना। सुकरात, प्लेटो और अरस्तू ने यूनानी दर्शन को इसकी प्रौढ़ता प्रदान की और पश्चिमी विचारधारा पर न मिटनेवाली छाप लगा दी। अरस्तू के बाद, प्राचीन दर्शन नीचे की ओर लुढ़कने लगा। स्वतंत्र विचारों के स्थान में, प्लेटो और अरस्तू की व्यवस्था ही विवेचन का लक्ष्य बन गई। यूनानी दर्शन का जन्म आइओनिया में हुआ। थेल्स (624-550 ई.पू.) एनैक्सिमैंडर (611-547 ई.पू.) और ऐनेक्सिमिनिज़ (588-524 ई.पू.) ने सृष्टि के मूल तत्व के विषय में अपने विचार प्रकट किए। तीनों की धारणा एक ही थी कि मूल तत्व एक है और भौतिक है। थेल्स ने जल को, एनैक्सिमेंडर ने अव्यक्त प्रकृति को और एनेक्सिमिनिज़ ने वायु को मूल तत्व का पद दिया। प्रत्येक भौतिक पदार्थ में गुण और मात्रा प्रत्यक्ष दिखते हैं। आइओनिया के विचारकों ने गुण पर ध्यान दिया और मात्रा की उपेक्षा की। पाइथेगारस ने मात्रा को सत्ता का तत्व समझा। मात्रा की जाँच इकाई की नींव पर होती है, और यह संख्या का आधार है। पाइथेगोरस के अनुसार संख्या सत्ता का तत्व है। इस तरह उसने अमूर्त को दार्शनिक विवेचन में प्रविष्ट कर दिया। पाइथेगोरस के विचारानुसार सृष्टि में अनुरूपता और सामंजस्य हर ओर दीखते हैं। यह अनुरूपता गायन में प्रसिद्ध होती है, संख्या की तुल्यता राग की जान है। नक्षत्र अपनी गति में मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हैं, यद्यपि हम उसे सुन नहीं सकते, क्योंकि उसकी तीव्रता हमारी श्रवणशक्ति की सीमाओं में नहीं आती।

सुकरात से पर्व के दर्शन में एक महत्वपूर्ण विवाद पार्मेनाइडीस और हिरेक्लिटस ने प्रस्तुत कर दिया। पार्मेनाइडीस ने गुण की तरह मात्रा की भी उपेक्षा की, और स्वयं सत्ता या "सत्" को मूल तत्व के रूप में देखा। यह "सत्" एकरस निरपेक्ष है, इसमें कोई पविर्तन नहीं होता, यह अनंत है, अविभाज्य है, देश और काल से असंबद्ध है। "असत्" में इन सब गुणों का अभाव है। उद्भव "सत्" और "असत्" का मेल है। हिरेक्लिट्स न कहा कि परिवर्तन सत्ता का तत्व है, सत्ता उद्भव के अतिरिक्त कुछ नहीं। इन दोनों विचारकों ने "सत्" और "प्रकाशन" के प्रत्ययों को दार्शनिक विवेचन में केंद्रीय प्रश्न बना दिया। हिरैक्लिटस के प्रवाहवाद के विरोध में, पार्मेनाइडीस के शिष्य जीनो ने यह बताना चाहा कि गति या परिवर्तन की तो संभावना ही नहीं, तीर प्रति क्षण किसी न किसी बिंदु पर स्थित है, दो बिंदुओं पर एक साथ तो हो नहीं सकता।

प्राचीन दशर्न के प्रथम युग में दो और नामों का महत्व है। डिमाक्राइटस (460-361 ई.पू.) ने कहा कि पदार्थों में गुणभेद उन परमाणुओं के परिमाण, आकार और स्थान पर निर्भर है, जिनके संयोग से पदार्थ बनते हैं। एक तरह से, डिमाक्राइटस का परमाणुवाद सद्वाद और प्रवाहवाद का समन्वय था : परमाणु सत् हैं, उनके संयोग से प्रवाह व्यक्त हाता है। एनैक्सेगोरस ने कहा कि अचेतन प्रकृति सृष्टि की व्यवस्था का समाधान नहीं कर सकती; इस समाधान के लिए चेतना की आवश्यकता है। सृष्टि विवेचन में चेतना का अनिष्ट होना एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था। पीछे अरस्तू ने तो कहा कि मदिरा पिए हुए लोगों में एनेक्सेगोरस ही सावधान था।

यूनानी दर्शन के प्रथम भाग ने निम्नांकित प्रत्ययों को विचारकों के सम्मुख रख दिया-

1. सृष्टि का मूल तत्व, 2. सत् और उद्भव, सत्ता और प्रकाशन 3. रचना में चेतना का स्थान

स्पष्ट है कि उत्तरकालीन विवेचन इनमें से किसी प्रत्यय की उपेक्षा नहीं कर सका।

साफिस्ट समुदाय और सुकरात[संपादित करें]

साफिस्ट समुदाय और सुकरात के साथ यूनानी दर्शन एथेंस में आ पहुँचा। अभी तक दर्शन तत्वज्ञान के अर्थ में समझा जाता था, अब नीति और ज्ञानमीमांसा भी उसके साथ मिल गई। दोनों के संबंध में साफिस्ट विचारकों और सुकरात के दृष्टिकोण में मौलिक भेद था। प्रोटैगोरस ने कहा कि मनुष्य सभी वस्तुओं का मापक है। प्रत्येक मनुष्य के लिए वही सत्य है जो उसे इंद्रियों द्वारा ज्ञात होता है, प्रत्येक के लिए वही शुभ है जो उसे प्रिय लगता है। सुकरात ने कहा कि इस वर्णन के अनुसार तो सत्य और शुभ का अस्तित्व ही नहीं रहता। यदि हर एक मनुष्य केवल अपने बोध और अपनी पसंद के विषय में कहता है, तो सत्य और शुभ के संबंध में दो मनुष्यों में मतभेद हो ही नहीं सकता। सुकरात ने कहा किं सत्य और शुभ सब के लिए एक ही हैं। इस विवाद ने दार्शनिक विवेचन में सामान्य और विशेष के प्रत्ययों को प्रविष्ट कर दिया।

नीति के संबंधन में सुकरात ने कहा कि ज्ञान और सच्चरित्रता एक ही वस्तु हैं। इसका अर्थ यही नहीं कि कोई कर्म शुभकर्म नहीं होता, जब तक कि कर्ता को उसके शुभ होने का ज्ञान न हो, अपितु यह भी कि ऐसा ज्ञान होने पर व्यक्ति के लिए अनिवार्य हो जाता है कि वह उस कर्म को करे। बुरा कर्म प्रत्येक अवस्था में अज्ञानजनित कर्म होता है। सुकरात नैतिक प्रत्ययों का यथार्थ लक्षण करना चाहता था और इसके लिए उसने आगमन का प्रयोग किया। दर्शनशास्त्र के लिए सुकरात की सबसे बड़ी देन यह थी कि उसने प्लेटो और अरस्तू के काम को संभव बना दिया। दोनों सुकरात के बताए मार्ग पर चले और उनके द्वारा सारे उत्तरकालीन विवेचन पर सुकरात के विचारों की छाप लग गई।

प्लेटो[संपादित करें]

प्राचीन पश्चिमी दर्शन में प्लेटो का स्थान शिखर पर है। सुकरात के अतिरिक्त पार्थेनाइडिस और हिरैक्लिटस के विचारों में भी प्लेटो के दृष्टिकोण को निर्णीत करने में भाग लिया। सुकरात के प्रभाव में उसने प्रत्ययों का महत्व समझा और उन्हें पार्मेनाइडिस की सत्ता का पद दिया। दृष्ट जगत् को उसने हिरेक्लिटस के उद्भव के रूप में देखा। अंतिम सत्ता सामान्य या प्रत्ययों की है, विशेष पदार्थ किसी प्रत्यय की अपूर्ण नकल होते हैं। यह प्लेटो का विख्यात प्रत्यय सिद्धांत है। इन प्रत्ययों में मौलिक और प्रमुख प्रत्यय श्रेय या शुभ का प्रत्यय है।

नीति में सच्चरित्रता का स्वरूप निर्णीत करने में प्लेटो ने व्यक्ति को समाज का एक नन्हा नमूना समझा। व्यक्ति की शुभ भावनाएँ समाज की आवश्यकताओं के अनुकूल हैं। उसने विवेक, साहस, संयम और न्याय को मुख्य सद्भावनाओं का पद दिया। न्याय का अर्थ यही था कि अन्य तीन वृत्तियाँ अपने अपने क्षेत्र में रहे और जीवन में सामंजस्य बना रहे। ज्ञानमीमांसा में उसने ज्ञान को तीन स्तरों पर रखा। सबसे निचले स्तर पर विशेष वस्तुओं का ज्ञान है। ऐसे ज्ञान में वस्तुओं की दशा, माध्यम और ज्ञाता की सामयिक अवस्था का प्रभाव पड़ता है। यह नहीं कह सकते कि किसी विशेष पदार्थ को देखनेवाले उसे एक ही रूप में देखते हैं। प्लेटो ऐसे ज्ञान को सम्मति पद देता है। जो ज्ञान गणित से प्राप्त होता है वह विशेष पदार्थ के ज्ञान से ऊँचे स्तर पर है। हम किसी विशेष त्रिकोण को लेते हैं परंतु जो कुछ सिद्ध करते हैं वह सभ त्रिकोणों के विषय में मान्य होता है। वहाँ विशेष सामान्य क प्रतिनिधित्व करता है। सब से ऊँचे स्तर पर दार्शनिक विवेचन है, इसमें केल सामान्य विचार का विषय होता है। यथार्थ में यही बोध ज्ञान कहलाने का अधिकारी है।

प्लेटो ने अपने प्रत्यय सिद्धांत को अपने संवादों में सत्ता और जीवन के विविध पक्षों पर लागू किया। इन संवादों में "रिपब्लिक" प्रमुख है। कुछ आलोचकों के विचार में, अन्य संवादों में हम प्लेटो को किसी एक पक्ष में देखते हैं, "रिपब्लिक" में समस्त प्लेटो को देखते हैं।

अरस्तू[संपादित करें]

प्लेटो ने विश्व का व्यापक आलोकन प्रस्तुत करने का यत्न किया। ज्ञानेंद्रियाँ तो इस संबंध में कुछ बता नहीं सकतीं। जो कुछ ये बताती हैं, उसके प्रति प्लेटो का भाव अनादर का था। अरस्तू की प्रकृति इससे भिन्न थी, वह तत्वत: वैज्ञानिक था। वैज्ञानिक के लिए विशेष का महत्व होता है और वह उसे जानने के लिए इंद्रियदत्त बोध का आश्रय लेता है। अरस्तू ने "न्याय" से आरंभ किया; भौतिकी, नीति, राजनीति और कला पर लिखा, और अंत में तत्वज्ञान पर एक अपूर्ण ग्रंथ लिखा। तत्वज्ञान में प्लेटों के प्रत्येक सिद्धांत की कड़ी आलोचना की। प्लेटो ने कहा था कि किसी श्रेणी के सभी विशेष पदार्थ एक ही सामान्य या प्रत्यय की अपूर्ण नकलें हैं। नकलें होंगी, परंतु ये दृष्ट जगत् में आ कैसे गई। प्रत्ययों में तो परिवर्तन होता नहीं, वे अपनी पूर्ण या अपूर्ण नकलें नहीं बना सकते। यदि नकलें किसी प्रकार बन भी गई, तो अचल जगत् ही विद्यमान होगा- गति या परिवर्तन रहस्य ही बने रहते हैं। प्लेटो ने कहा था कि सामान्य श्रेणी के विशेषों में अंतर होता है और इसीलिए एक श्रेणी के विशेष दूसरी श्रेणी के विशेषों से भिन्न होते हैं। अरस्तू ने व्यक्ति को विशेष महत्व दिया। व्यक्ति सामग्री और आकृति का मेल होता है। आरंभिक सामग्री अव्यक्त प्रकृति थी, इसमें किसी प्रकार की आकृति न थी। विकास में आकृति सामग्री को अपनी कृति से विशेष रूप देती है। पदार्थों में ऊँच नीच का भेद इसी बात पर निर्भर करता है कि आकृति सामग्री को किस सीमा तक प्रभावित कर सकी है। संसार में सब कुछ आगे बढ़ रहा है, पीछे से धकेला नहीं जाता, आगे से आकृष्ट हो रहा है। आकर्षक शक्ति विशुद्ध आकृति है, जिसे अरस्तू परमात्मा का नाम देता है।

नीति में, अरस्तू ने प्लेटो की तरह मौलिक सद्भावनाओं पर विचार नहीं किया, उसने सामान्य सद्भावना का स्वरूप निर्णीत करना चाहा। वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि शुभ या भद्र दो चरम सीमाओं में मध्यवर्ती स्थिति है। घृष्टता और कायरता दोनों अवगुण हैं; इनके मध्य में साहस है जो सदाचार है। शिष्टाचार उद्दंडता और दासभाव के बीच की अवस्था है। इस समाधान से शुभ और अशुभ का भेद मात्रा का भेद बन जाता है। दार्शनिकों में प्राय: इसे गुणात्मक भेद समझा जाता है। भलाई और बुराई भिन्न प्रकार की वस्तुएँ हैं।

सुकरात ने प्रत्ययों की परिभाषा पर बल दिया था। अरस्तू ने निगमन न्याय का निर्माण किया, और तनिक भेद के साथ निगमन आज भी अरस्तू का निगमन न्याय ही है। अनुमान में प्रमुख बात प्रामाणिकता है। हमें देखना होता है कि उत्तरपक्षों को स्वीकार करने पर हम किस निष्कर्ष को स्वीकार करने पर बाधित हो जाते हैं। वाक्यों में कोई वाक्य जिसमें आंतरिक विरोध हो, अनिवार्य रूप में अमान्य हो जाता है।

दर्शन में अरस्तू की प्रमुख देन द्रव्य का प्रत्यय है। यों तो उसने सत्ता के 10 अंतिम पक्षों (कैटेगोरीज़) का वर्णन किया है, परतु वास्तव में वे द्रव्य और उसके गुण ही हैं। जैसा हम देखेंगे, द्रव्य का प्रत्यय दार्शनिक विवेचन में चिर काल तक विचार का केंद्रीय प्रत्यय बना रहा।

अरस्तू के बाद[संपादित करें]

अरस्तू के साथ प्राचीन दर्शन की प्रौढ़ता का काल समाप्त होता है। उसकी मृत्यु के कुछ ही वर्षों बाद, ज़ीनो और एपिक्युरस ने लगभग एक साथ दो नई विचारधाराओं की नींव रखी। दोनों विचारों में न्याय, भौतिकी और नीतिदर्शन के तीन भाग है। न्याय में दोनों अरस्तू के अनुयायी थे। प्राकृत जगत् में दोनों अप्रतिहत शासन स्वीकार करते थे। दोनों का ऐतिहासिक महत्व नीति के संबध में है। विवाद का मुख्य विषय भोग या तृप्ति की स्थिति है। ऐपिक्युरस के अनुसार यह तृप्ति ही जीवन में एकमात्र मूल्य है। मानसिक तृप्ति का पद शारीरिक तृप्ति के पद से ऊँचा है, क्षणिक तृप्ति से स्थायी तृप्ति अधिक मूल्यवान् है। सुखी जीवन के लिय सरलता, संयम, परिमितता बहुत सहायक होती हैं। यह एपिक्यूरस का मत और आचरण था, परंतु उसके अनुयायियों के लिए मौलिक सिद्धांत बहुत प्रबल सिद्ध हुआ। यदि जीवन में तृप्ति ही एकमात्र मूल्य की वस्तु है तो जितनी अधिक मात्रा में यह मिल सके, जितनी जल्दी मिल सके, इसे प्राप्त करना चाहिए। साधारण लोगों के लिए एपिक्यूरियन सिद्धांत यही हो गया- "खाओ, पियो और प्रसन्न रहो" अधम अवस्था में यही जीवनदर्शन होता है। यह यूनान की स्थिति के अनुकूल था, वहीं कुछ देर के लिए टिका रहा। ज़ीनो के विचार (स्टोइकबाद) के अनुसार जीवन का अकेला मूल्य सदाचार है। सदाचार का तत्व आवेगों पर विजयी होता है। इसके लिए दो बातों की आवश्यता है- सुख और दु:ख दोनों से मनुष्य ऊपर उठ सके। स्टोइक विचार के अनुसार जीवन में मौलिक सूत्र यह है- कष्ट सहन करो, भोगों में अलिप्त रहो। यह विचारधारा यूनान की तत्कालीन स्थिति के अनुकूल न थी, वहाँ से रोम में पहुँची, जहाँ इसे उचित वातावरण मिल गया। रोमन वीरता और स्टोइक मनोवृत्ति पर्यायवाची शब्द बन गए। रोम में स्टोइक विचारधारा को कई योग्य प्रसारक मिल गए। इनमें एपिकटिटस और सम्राट् मार्कस औरेलियस के नाम विख्यात है। स्टोइक विचार जीवन को मानव प्रकृति के अनूकूल बनाना चाहता था; इस प्रकृति में बुद्धि मुख्य अंश है, और अच्छा जीवन वही है जिसमें बुद्धि का शासन हो।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]