सत्य

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सत्य (truth) के अलग-अलग सन्दर्भों में एवं अलग-अलग सिद्धान्तों में सर्वथा भिन्न-भिन्न अर्थ हैं।

जब किसी भी मनुष्य को तीव्र इच्छा होती है विश्व का परम् सत्य को जाने के लिए वहां अत्याधिक चितंन मनन व कल्पना करता है कि विश्व की संरचना कैसी है विश्व की उत्पत्ति व अंत क्या है विश्व की प्रकृति व मानव समाज का संचालन का नियम क्या है और परमात्मा आत्मा जीवात्मा वास्तव में है या नहीं।

इन सबको जाने के लिऐ सबसे पहले वहां व्यक्ति विज्ञान के सिध्दांतों को पढ़ता देखता और सुनता है जिसके अनुसार विश्व की उत्पत्ति आज से 13.8 अरब पहले हुई है जिसका आकंलन वैज्ञानिक अंतरिक्ष के एक तारे की सबसे पूराने प्रकाश को माप के करे है इस सिध्दान्त के अनुसार कुछ नहीं था अर्थात शून्य था फिर एक वहां एक बिन्दु पर महाविस्फोट हुआ जिसे कई कण बने अंतरिक्ष असंख्य किलोमीटर के रूप में असित्व में आया वहां उन कणों के मध्य रसायनिक क्रिया होकर तारे बने उन तारों में विस्फोट हुआ उसके तत्व से ग्रह उपग्रह बने जो किसी अन्य तारे के चारों ओर घूम रहे है वही सूर्य है ये सब घटना आठ अरब वर्षों में हुआ फिर चार अरब वर्ष पहले हमारा पृथ्वी बना यहां जीवन समुद्र में एक रसायन के रूप में उत्पन्न हुआ फिर वनस्पति व जीव जन्तु अस्तित्व में आए तथा छैः करोड़ वर्ष पहले उल्का पिण्ड से वे जीव जन्तु वनस्पति की आधे से ज्यादा प्रजाति खत्म हो गई मनुष्य की उत्पत्ति आज से दो लाख वर्ष पहले अफ्रीका के जंगलों में बंदरों के विकास क्रम से हुई और सभ्य मनुष्य पांच हजार वर्षों से है जो आज तक आधुनिकीकरण कर रहा है । इस विश्व का अंत बिंग क्रांच बिंग रिलिफ ब्लैक होल से होगा ये सिध्दान्त एक परिकल्पना है । विज्ञान के एक और सिध्दान्त के अनुसार यहां विश्व कभी नहीं बनना है और कभी खत्म नहीं होगा । यही सिध्दान्त सत्य है । विज्ञान के अनुसार विश्व का आकार अरबों प्रकाश वर्ष है जिसके बंद अनंत शून्य है कहा जाऐ तो ब्राम्ह्मण है फिर आकाशगंगा है उसमें तारे है वे तारे के कारण सौर मण्डल में ग्रह उपग्रह है उसी में एक ग्रह पृथ्वी है । विज्ञान के सिध्दान्त के अनुसार विश्व का संचालन स्वतः ही हो रहा ब्राम्ह्मण में आकाशगंगा एक दूसरे के चक्कर लगा रहे है आकाशगंगा के केन्द्र का चक्कर तारे लगा रहे है तारों का चक्कर ग्रह लगा रहे है और ग्रहों का चक्कर उपग्रह लगा रहे हैं। विज्ञान के कुछ सिध्दान्त अनुसार विश्व का निर्माण व अंत बार बार होता है ।

परन्तु प्रचीन धर्मो के अनुसार विश्व का निर्माण अंत के कई कहानियां है===

जैसे हिन्दू धर्म  शिव ब्राम्हा विष्णु व जगदम्बा  से यहां विश्व बनना है और इन सब की अलग अलग कहानी है फिर इसका अंत इनके कारण ही होगा परन्तु ये ब्राम्ह्मण का बार बार निर्माण करते है इसके अनुसार ब्राम्ह्मण में तीन लोक है उन लोकों में चौदह भुवन है  विश्व का संचालन इनकी शक्ति से हो रहा है और ये ही जीवन के कारण है मनुष्य इनका ही अंश है जो बार बार जन्म मरण चक्र में है ।

ऐसी ही मान्यता इसे उत्पन्न धर्म जैन सिख की भी है परन्तु इनमें परमात्मा का स्वरूप भिन्न है इनमें वाहे गुरू ये तीर्थंकर परमात्मा है । बौध्द झेन धर्मो में परमात्मा के अस्तित्व को नकार दिया गया है इस ब्राम्ह्मण के बारे में कहा गया है यहां सदैव था है और रहेगा । फिर शिन्तो ताओ कन्यफूजियस में प्रकृति व सूर्य को ही परमात्मा कहा गया है जो सृष्टि का निर्माण किये है । पश्चिमी धर्मो में विश्व की उत्पत्ति अंत आकार की एक ही कथा है परन्तु उन धर्मो के परमात्मा भिन्न है इस्लाम के लिए आल्लाहा इसाई के लिए गाॅड फादर यहूदी के लिए यहूवा और इनके रीति रिवाज पहनावा रहन सहन खानपान पूजाविधि विवाह विधि आदि संस्कार में अंतर है पारसी धर्म की भी अपनी कथा है लोक धर्म आदिवासी संस्कृति की भी भिन्न कथाऐ है । प्रायः स्वर्ग व नरक की अवधारणा सभी धर्मों में है ।

विश्व के प्रायः सभी लोग अपने धर्मों के सिध्दान्त के अनुसार ही विश्व की उत्पत्ति अंत आकार संचालन का नियम जानते है कुछ लोग सभी धर्मों के सिध्दान्त को जानते है परन्तु उन्हें असत्य मानकर स्वयं धर्म या विज्ञान के सिध्दान्त को सत्य मनाते है ।

परन्तु चेतना जागृत होने पर इन सभी सिध्दांतों में सत्य को जाने की तीव्र इच्छा के कारण विश्व का परम् सत्य का बौध्द होता है । जैसे विश्व की उत्पत्ति ना कभी हुई है ना इसका अंत होगा । विश्व मात्र पृथ्वी ही है सभी तारे ग्रह नक्षत्र सूर्य चन्द्र पृथ्वी के चारों ओर घुमाते है अंतरिक्ष भ्रम है वहां कही जीवन नहीं है ना वहां अनंत है खुले आंखों से जितना दिखता है उतना ही सत्य है उसके बाद अंतरिक्ष शून्य है कुछ नहीं है वहां ना स्वर्ग है ना नरक । विश्व का संचालन स्वतः ही हो रहा है प्रकृति के नियम अनुसार सूर्य चन्द्र ग्रह नक्षत्र स्वतः ही गति कर रहे है पृथ्वी में वनस्पति व जीव जन्तु प्रकृति के नियम से जन्म मृत्यु लेते व जीते है ।

मानव समाज के संचालन के लिए ही प्रकृति से स्वतः ही कई धर्म संस्कृति है जो उनके चेतना अर्थात मस्तिष्क के केन्द्र में है सभी के चेतना में परमात्मा का भिन्न भिन्न स्वरूप है जिसमें यहूदी के लिए यहूवा हिन्दू के लिए शिव मुस्लिम के लिए अल्लाह इसी प्रकार अन्यों के लिए भी परमात्मा का स्वरूप उनके कल्पना के अनुसार है तो सभी धर्मों के कथा विज्ञान के सिध्दान्त और उनके प्रमाणित स्थल कथा अवशेष क्या है वे लोगों की परिकल्पना है अर्थात कहा जाऐ तो वहां कथा मनुष्य को विश्व का सत्य ज्ञात होता है तो उसको पढ़ने देखने सुनने से ऐसा लगाता है की यहाँ मेरी कहनी है कहा जाऐ तो उसकी आत्मा की कहनी है वहां ये कथाओ तीन वर्षों के परिकल्पना के बाद अन्यों के कथा भी परिकल्पना है ज्ञात हो जाता है तो ये इन सब कहानियों के स्थल अवशेष कैसे है तो ज्ञात होता है ये पृथ्वी में एक खरब वर्षों का समय चक्र है जिसमें चार युग है जो पांच सौ पांच सौ वर्षों के है जिसे के कारण मनुष्य लोग लौह युग ताम्र युग रजत युग स्वर्ण युग में है उन्हें इसका ज्ञान ही नहीं है ना इसका प्रमाण है इन युगों के कारण शिक्षा आधुनिकीकरण उच्च से निम्न होते रहते है जिसके कारण उन्हें वास्तविक युग के बारे में जानकारी ही नहीं रहती और वास्तविक युग के घटना इतिहास इमारत लोगों का कभी अस्तित्व ही नहीं रहता प्रकृति व मानवीय हस्तक्षेप के कारण और सदैव विश्व में परिकल्पना की दुनिया कहा जाऐ तो प्रचीन धर्म सभ्यता व साम्राज्य के कथा इमारत व अवशेष रहते है । मनुष्य का संचालन उसके भीतर की आत्मा के मन व चेतना के भिन्न भिन्न होने के कारण होता है जिसमें पंचमहाभूत क्रिया प्रतिक्रिया करते है और सभी मनुष्य एक अरब जन्म लेते है और बार बार यही समय वापस आता रहता है ।

सत्य का महत्व[संपादित करें]

सत्य इस संसार में बड़ी शक्ति हैं. सत्य के बारे में व्यवहारिक बात यह है कि सत्य परेशान हो सकता हैं. मगर पराजित नहीं. भारत में कई सत्यवादी विभूतियाँ हुई जिनकी दुहाई आ भी दी जाती हैं जैसे राजा हरिश्चन्द्र, सत्यवीर तेजाजी महाराज आदि. इन्होने अपने जीवन में यह संकल्प कर लिया था कि भले ही जो कुछ हो जाए वे सत्य की राह को नहीं छोड़ेगे.

सत्य का शाब्दिक अर्थ होता है सते हितम् यानि सभी का कल्याण. इस कल्याण की भावना को ह्रदय में बसाकर ही व्यक्ति सत्य बोल सकता हैं. एक सत्यवादी व्यक्ति की पहचान यह है कि वह वर्तमान, भूत, भविष्य के बारे में विचार किये बिना अपनी बात पर दृढ़ रहता हैं. मानव स्वभाव की सत्य के प्रति आगाध श्रद्धा झूठ के प्रति गुस्से के भाव आते हैं.

सत्य के विभिन्न सिद्धान्त[संपादित करें]

न्याय दर्शन में प्रमुख रूप में प्रत्येक निर्णय और अनुमान पर विचार होता है। इनमें निर्णय का स्थान केंद्रीय है। निर्णय का शाब्दिक प्रकाशन वाक्य है। जब हम किसी वाक्य को सुनते हैं, तो उसे स्वीकार करते हैं या अस्वीकार करते हैं; स्वीकार और अस्वीकार में निश्चय न कर सकने की अवस्था संदेह कहलाती है। प्रत्येक निर्णय सत्य होने का दावा करता है। जब हम इसे स्वीकार करते हैं तो इसके दावे को सत्य मानते हैं; अस्वीकार करने में उसे असत्य कहते हैं। विश्वास हमारी साधारण मानसिक अवस्था है। जब किसी विश्वास में त्रुटि दिखाई देती है, तो हम इसका स्थान किसी अन्य विश्वास तक जाने की मानसिक क्रिया ही चिंतन है। विश्वास, सत्य हो या असत्य, क्रिया का आधार है, यही जीवन में इसे महत्वपूर्ण बनाता है। न्याय का काम निर्णय या वाक्य के सत्यासत्य की जाँच करना है; इसके लिए यह बात असंगत है कि कोई इसे वास्तव में सत्य मानता है या नहीं।

सत्य के संबंध में दो प्रश्न विचार के योग्य हैं - किसी निर्णय या वाक्य को सत्य कहने में हमारा अभिप्राय क्या होता है।

सत्य और असत्य में भेद करने का मापक साधन क्या है? हमारे ज्ञान के विषयों में प्रमुख ये हैं - हमारी अपनी चेतना अवस्थाएँ, प्राकृतिक पदार्थ, तथा चेतना के अन्य केंद्र, या दूसरों के मन।

मैं कहता हूँ कि मुझे दांत में दर्द हो रहा है। इसका अर्थ क्या है? मेरा अनुभव एक धारा है जिसमें निरंतर गति होती रहती है। मैं कहता हूँ कि धारा का जो भाग वर्तमान में ज्ञात है, दु:ख की अनुभूति उसमें प्रमुख पक्ष है। मेरे लिए यह स्पष्ट अनुभव है और मैं इसमें संदेह कर ही नहीं सकता। मेरे लिए इसे जाँचने को दूसरा मापक न है, न हो सकता है। स्पष्ट बोध से अधिक अधिकार किसी अन्य अनुभव का नहीं।

अनुरूपता का सिद्धान्त (Correspondence theory)[संपादित करें]

अन्य चेतनों का हमें स्पष्ट बोध नहीं हो सकता। कुछ लोग कहते हैं कि अनुरूपता के आधार पर हम उनके अस्तित्व में विश्वास करते हैं। परंतु ऐसा अनुमान करने की योग्यता प्राप्त होने से पहले ही बच्चा ऐसा विश्वास करता है। संभवत: वह सभी पदार्थों को अपने नमूने का समझता है और पीछे कुछ वस्तुओं को अपने असमान पाकर अचेतन समझने लगता है।

निर्णायों के सत्य असत्य का प्रश्न प्राय: प्राकृतिक तथ्यों के संबंध में उठता है। मैं कहता हूँ "मेज पर पुस्तक पड़ी है" इस वाक्य के यथार्थ होने का अर्थ क्या है?

मैं ख्याल करता हूँ कि मुझसे अलग, बाहर, मेज और पुस्तक विद्यमान हैं और उनमें एक विशेष संबंध है। यदि स्थिति वास्तव में ऐसी ही है तो मेरा वाक्य सत्य है; ऐसा न होने की हालत में असत्य है। यह "सत्य का अनुरूपता सिद्धांत" है।

अनुरूपता का सिद्धांत वस्तुवाद से गठित है और सर्वमान्य सा है। भारत के दर्शन में प्रत्यक्ष को प्रथम प्रमाण का पद दिया गया है। प्रत्यक्ष "इंद्रिय और उसके विषय के सामीप्य का फल है"। यह सामीप्य दो प्रकार से हो सकता है : या तो पदार्थ इंद्रिय के पास आए, या मन इंद्रिय द्वार से गुजरकर पदार्थ तक पहुँचे। दूसरी घटना घटती है और मन विषय का रूप ग्रहण करता है। यह अनुरूपता सिद्धांत का स्पष्ट समर्थन है।

अनुरूपता सिद्धांत के अनुसार हम अपने विचार और बाह्य स्थिति में समानता देखते हैं। अपने विचारों का तो हमें स्पष्ट बोध होता है, पर बाहर की स्थिति को हम कैसे जानते हैं? हम दो विचारों को साथ रखकर उनकी समानता असमानता की बाबत कह सकते हैं, परंतु बाह्य पदार्थ तो हमारी चेतना में प्रविष्ट ही नहीं हो सकता। उसकी तुलना किसी विचार से कैसे करेंगे? अनुरूपतावाद में यह मान लिया जाता है कि बाह्य स्थिति का ज्ञान हमें पहले से ही है। यदि पहले ही ऐसा ज्ञान हो तो निर्णय के सत्य असत्य होने का प्रश्न ही नहीं उठता। हमारी स्थिति ऐसे मनुष्य की स्थिति है जिसने ताजमहल के चित्र देखे हैं, परंतु ताजमहल को नहीं देखा और जानना चाहता है कि वे चित्र परंतु ताजमहल को नहीं देखा और जानना चाहता है कि वे चित्र ताजमहल को वास्तविक रूप में दिखाते हैं या नहीं।

अविरोध का सिद्धान्त (Coherence theory of truth)[संपादित करें]

अध्यात्मवाद कहता है कि वस्तुवाद के पास इस आपत्ति से बचने का कोई साधन नहीं। सत्य के मापक की खोज स्वयं अनुभव में करनी चाहिए। अनुभव में "आंतरिक अविरोध" सत्य की कसौटी है। अपने पिछले दृष्टांत को फिर लें। "पुस्तक मेज पर पड़ी है", मैं यह कैसे जानता हूँ? आंख ऐसा बताती है। यह एक अनुभव है। परंतु आँख कभी कभी धोखा भी दे देती है। मैं हाथ से पुस्तक और मेज को छूता हूँ। यह दूसरा अनुभव पहले अनुभव की पुष्टि करता है। हाथ से खटकाता हूँ तो जो शब्द सुनाई देता है, वह पुस्तक और मेज से निकला प्रतीत होता है। तीसरा अनुभव पहले दोनों अनुभवों की पुष्टि करता है दूसरे भी पुस्तक को मेज पर पड़ा देखते हैं। अनुरूपता सत्य का चिह्न है, परंतु यह अनुरूपता विचार और बाह्य पदार्थ के दरमियान नहीं, अनुभव के विविध भागों के दरमियान होती है। आकर्षणनियम के अनुसार प्रत्येक पदार्थ अन्य पदार्थों से आकृष्ट होता है और उन्हें खींचता भी है। इसी तरह सत्य ज्ञान के सभी भाग एक दूसरे पर आश्रित हैं। जो निर्णय इस तरह शेष अनुभव से युक्त हो सकता है, वह सत्य है; जिसमें यह योग्यता नहीं वह असत्य है।

इस विवरण से ऐसा लगता है कि सत्य अनेक सत्य वाक्यों का समुदाय है और इस समुदाय में प्रत्येक सत्य की अपनी स्वतंत्र स्थिति है। अविरोधवाद इस विचार को स्वीकार नहीं करता। सत्य समुदाय नहीं अपितु समग्र है जिसका तत्व आंशिक सत्यों के रूप को निश्चित करता है। वास्तव में सत्य एक ही है, बहुवचन में सत्यों का वर्णन करना अनुचित है। समूह में कुछ एकांग अलग हो जाए तो दूसरों की स्थिति में भेद नहीं पड़ता। ईंटों के ढेर में से कोई चार ईंटें उठा ले जाए, तो बाकी ईंटों को इसमें आपत्ति नहीं होती। शरीर के एक अंग पर चोट लगे, तो सारा शरीर दुखी होता है। आंशिक सत्यों में हर एक अंश समग्र को किसी पक्ष में दरसाता है और इस विषय में सभी अंशों का मूल्य एक नहीं होता। अविरोधवाद के अनुसार सत्यों में परिमाण का भेद होता है।

जिन वाक्यों को हम सत्य कहते हैं, वे दो प्रकार के होते हैं- वैज्ञानिक नियम संबंधी और तथ्य संबंधी। "दो और दो चार होते हैं," यदि किसी त्रिकोण के भुज बराबर हों, तो उसके कोण भी बराबर होंगे। - यह वाक्य हर कहीं और सदा सत्य हैं; देश और काल का भेद उनके सत्य होने से असंगत है। "भारत 1947 ई. में स्वाधीन हुआ।" 1947 ई. से पहले यह वाक्य कहा ही नहीं जा सकता था, परंतु अब यह भी सदा के लिए सत्य है।

व्यवहारवाद[संपादित करें]

सत्य का तीसरा सिद्धांत "व्यवहारवाद" या "प्रैग्मेटिज्म" के नाम से प्रसिद्ध है। अपने आधुनिक रूप में यह अमरीका की देन है। वास्तव में व्यवहारवाद कोई सिद्धांत नहीं, एक मनोवृत्ति है जो सामान्य से विशेष को, स्थिरता से परिवर्तन को, चिंतन से क्रिया को अधिक महत्व देती है। इस विचार के प्रसार में चाल्र्स पीअर्स, विलियम जेम्स और जान डियूई का विशेष भाग है। पीअर्स नैयामिक था, जेम्स मनोवैज्ञानिक था, डियूई की अभिरुचि नीति और राजनीति में थी। पीअर्स ने प्रत्ययों के "अर्थ" को स्पष्ट करने में व्यवहारवाद की विधि का प्रयोग किया, जेम्स ने "सत्य का स्वरूप निर्णीत करने में इसे बर्ता, डियूई ने "भद्र" पर इसे लागू किया। इस तरह वे न्याय, सौंदर्यशास्त्र और नीति को अनुभववाद के निकट ले आए।

पीअर्स ने नए विचार को "प्रैग्मेटिस्म" का नाम दिया। उसकी दृढ़ धारणा थी कि दर्शन को विज्ञान के दृष्टिकोण और उसकी विधि को अपनाना चाहिए। दर्शन के लिए सत्य ज्ञान निरपेक्ष या समग्र का दोषरहित ज्ञान है; विज्ञान की दृष्टि में ऐसा ज्ञान मानव बुद्धि के लिए अप्राप्य है। हमे सापेक्ष ज्ञान से संतुष्ट होना चाहिए, यही हमारे लिए काम की वस्तु है। दर्शन का प्रमुख काम स्वीकृत मान्यताओं को सिद्ध करना रहा है, विज्ञान के लिए आविष्कार प्रमुख है। नवीन वैज्ञानिक विधि में आगमन और निगमन दोनों का समन्वय होता है। कुछ उदाहरणों की नींव पर प्रतिज्ञा की जाती है, उसे सत्य मानकर निष्कर्ष निकाले जाते हैं और अंत में देखा जाता है कि अनुभव इनकी पुष्टि करता है या नहीं। किसी प्रतिज्ञा की ऐसी पुष्टि ही उसकीसत्यता है। प्रत्येक सत्य की स्थिति सामयिक प्रतिज्ञा की स्थिति है। प्राकृतिक नियम भी स्थायी नहीं, वे भी विकासाधीन हैं। आकर्षणयिम का क्षेत्र अब पहले से अधिक विस्तृत है और भविष्य में वर्तमान से भी अधिक विस्तृत हो जाएगा। नियम भी आदतों की तरह पुष्ट होते जाते हैं।

जेम्स ने अमूर्त सत्य को नहीं, अपितु विशेष विश्वासों के सत्य को अपने विवेचन का विषय बनाया। उसके विचारानुसार सत्य कोई स्थायी वस्तु नहीं जिसे देखना ही हमारा काम है, यह तो क्रिया में बनता है। अपनी पुस्तक "व्यवहारवाद" में वह कहता है-

"व्यवहारवाद, मूल रूप में, उन दार्शनिक विवादों को मिटाने का नियम है जो इसके बिना अंतरहित होते। जगत् एक है या अनेक? स्वाधीन है या पराधीन? प्राकृतिक है या आध्यात्मिक? ये विचार ऐसे हैं जिनमें एक या दूसरा सत्य या असत्य हो सकता है और ऐसे विचारों पर विवादों का कोई अंत नहीं। व्यवहारवाद की विधि इन विषयों के संबंध में यह है कि हम प्रत्येक प्रत्यय का समाधान इसके व्यावहारिक परिणामों के परीक्षण से करें। यदि कोई प्रत्यय दूसरे प्रत्यय के स्थान में सत्य होता, तो इससे किसी मनुष्य के लिए व्यावहारिक भेद क्या पड़ता? यदि कोई व्यावहारिक भेद दिखाई न दे तो व्यवहार में दोनों पक्षांतर एक ही हैं और सारा विवाद व्यर्थ है। जब कोई विवाद गंभीर हो तो हमें यह दिखाई के योग्य होना चाहिए कि दोनों पक्षों में एक या दूसरे के सत्य होने पर कोई व्यावहारिक भेद होता है"।

जेम्स से बहुत पहले इसी भाव को प्रकट करते हुए रामानुज ने कहा था-"व्यवहार योग्यता सत्यम्"।

व्यवहारवाद ज्ञानमीमांसा में उपयोगितावाद है : "जो कुछ विश्वास के संबंध में अपने आपको मूल्यवान् सिद्ध करता है, वह सत्य है। व्यवहारवाद बिना झिझक के यह मान लेता है कि जो विश्वास एक के लिए सत्य है, वह दूसरे के लिए असत्य हो सकता है।

ऊपर कहा गया है कि व्यवहारवाद सामान्य से विशेष को और स्थिरता से परिवर्तन को अधिक महत्व देता है। डियूई की शिक्षा में हम इसे स्पष्ट देखते हैं।

राजनीति में राजतंत्र, शिष्टजनतंत्र और प्रजातंत्र शासनों में भेद किया जाता है। राजतंत्र और शिष्टजनतंत्र अधिक सफल हों, तो भी प्रजातंत्र उनसे अच्छा है, क्योंकि यह व्यक्ति के मूल्य को स्वीकार करता है। नीति में कुछ नियमपालन को और कुछ श्रेय की सिद्धि को लक्ष्य बताते हैं। डियूई के अनुसार दोनों वर्ग एक ही भ्रांति में पड़े हैं; वे विशेष को उचित महत्व नहीं देते। नीति को एक नहीं अनेक नियमों को, एक नहीं अनेक साध्यों को स्वीकार करना चाहिए। उद्देश्य हर हालत में वर्तमान कठिनाई को दूर करना होता है; जो क्रिया इसमें अधिक से अधिक सहायक हो, वही उस स्थिति में सर्वश्रेष्ठ है। कोई मनुष्य कहीं भी स्थित हो, वह अच्छा मनुष्य है यदि वह आगे बढ़ रहा है, बुरा मनुष्य है यदि पीछे हट रहा है। जीवन का एकमात्र लक्ष्य उत्थान या वृद्धि है; पूर्णता नहीं, अपितु पूर्णता की ओर निरंतर गति है।

यह गति ही शिक्षा है, नैतिक जीवन और शिक्षा एक ही वस्तु है। प्रचलित विचार के अनुसार शिक्षाकाल तैयारी का समय है; यह व्यक्ति को पराधीनता से विमुक्त करके स्वाधीन बना देता है। यदि ऐसा ही है, तो शिक्षाकाल की समाप्ति पर शिक्षा की आवश्यकता भी नहीं रहती। डियूई कहता है कि वृद्धि का यत्न तो जीवन के अंत तक जारी रहना चाहिए, सारा जीवन ही शिक्षाकाल है। जो कुछ स्कूलों कालेजों में पढ़ाया जाता है, उसमें साहित्य और भाषाओं के ज्ञान की अपेक्षा विज्ञान को अधिक महत्व मिलना चाहिए। विज्ञान में भी जो भाग पुस्तकों से प्राप्त होता है, उससे अधिक मूल्य उस भाग का है जो विद्यार्थी अपनी क्रिया से सीखता है। मनुष्य का दिमाग का नहीं, क्रिया का अस्त्र है।

निष्कर्ष[संपादित करें]

वास्तव में अनुरूपतावाद, अविरोधवाद और व्यवहारवाद एक ही प्रश्न का उत्तर नहीं। दो प्रश्न उत्तर की माँग करते हैं - सत्य से क्या अभिप्रेत है? सत्य और असत्य में भेद करने की कसौटी क्या है? अनुरूपतावाद पहले प्रश्न का उत्तर देता है; अविरोधवाद और व्यवहारवाद दूसरे प्रश्न का उत्तर देते हैं। जेम्स ने कहा है कि व्यवहार की दृष्टि में जब कोई विश्वास सत्य सिद्ध होता है, तो उसके लिए आवश्यक है कि वह उसी प्रकार के सत्यों से युक्त हो सके। यह धारणा व्यवहार को अविरोधवाद के निकट ले आती है। तीनों विचार एक दूसरे के विरुद्ध नहीं, एक दूसरे के पूरक हैं।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

विश्व के परम् सत्य से अधिकांश मनुष्यों का मन दूरी बनाकर रखता है क्योंकि उनका मन उन्हें संसारिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है । विश्व के अधिकांश मनुष्य स्वयं के धर्म के परिकल्पनिक इतिहास भविष्य सृष्टि का सृजन व लय को ही सत्य मानकर गंभीरतापूर्वक जीवनयापन करते है या फिर कुछ विज्ञान के सिध्दान्त के अनुसार सम्पूर्ण सृष्टि ब्राम्ह्मण की रचना व अंत को स्वीकार कर अपना जीवनयापन करते है । अधिकांश मनुष्यों को सृष्टि का परम् सत्य ना जाने की इच्छा होती है ना ही सुने पढ़ने की इच्छा होती है क्योंकि विधि के विधान अनुसार उन्हें संसारिक जीवन जीना है जब कभी उन्हें सृष्टि का सत्य ज्ञात हुआ होगा या होगा तो आज जिन्हें सृष्टि का परम् सत्य जान लिये है या जाने की इच्छा होगी वे उनसे दूरी बना लेंगे या फिर उनकी शब्दों ज्ञान को अनदेखा अनसुना कर देगा विश्व का प्रकृति नियम के अनुसार एक साथ विश्व का परम् सत्य सभी को ज्ञात नही हो सकता है मात्र विश्व की अबादी में हजारों लोग को ही परम् सत्य ज्ञात रहता है ।

संसारिक मनुष्य स्वयं के धर्म को सत्य मानकर अपने सामान्य पवित्र व दुष्ट प्रवृत्ति के अनुसार संसार में कर्म कर जीवन जीता है । संसारिक मनुष्य का जीवन अत्याधिक व्यस्त होता है वे अपने कर्तव्य जिसमे परिवार समाज के लोगो के प्रति अपने जिम्मेदारी निभाता है फिर उत्तरदायित्व जिसमें समाज के रोजगार व्यवसाय से समाज की जरूरत पूरी करके अपने लिए धन दौलत एकत्रित करता है जिसे वहां अपने कर्तव्य व उद्देश्य की पूर्ति कर सके और अंत में उद्देश्य इसे इच्छा या लक्ष्य कहा जा सकता है कुछ मनोरंजन के आदतों से ग्रसित होते है घुमाना खाना पीना प्रेम प्रसंग फिल्म संगीत देखना सुना सौन्दर्य सामग्री का इस्तेमाल ही करते है कुछ धर्म संस्कृति सामाज देश दुनिया के विकास सुरक्षा को ही महत्व देते है कुछ को प्रसिध्द होना है कुछ को अत्याधिक धनी बना है कुछ को अधिकारी नेता कलाकार खिलाड़ी बना है कुछ को रोजगार व्यवसाय करना है कुछ को शादी करना है बच्चों का भविष्य बनना है कुछ को स्वाथ्य रहना है कुछ गृह कलेश से परेशान है जिसे शांत करना चाहते है कुछ खुद के मन के विचार कल्पना प्रेम करने की इच्छा से परेशान है जिसे वे शांत करना चाहते है । हम सब मनुष्य के भीतर अंतर्मन है जो एक दूसरे की भावनाओं इच्छाओं व कर्मो को समझता है इसलिए जिसके साथ जैसा व्यवहार करना है कैसा सम्बन्ध रखना है यहां अच्छी तरहा से जानकर प्रतिक्रिया करता है मानवीय समाज में।

मनुष्य अपने उद्देश्य जिसमें इच्छा व लक्ष्य होते है वे उसकी पूर्ति के लिए मानसिक व शारीरिक परिश्रम करता है परन्तु सभी मनुष्य अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व का निर्वाह अनिर्वाय रूप से करते है बहुत ही कम लोग अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्तव्य या उत्तरदायित्व या दोनो को व्यर्थ मानकर उस नही निभाते है कुछ लोग अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व को निभाने के लिए अपने इच्छा व लक्ष्य को त्याग देते है मन से पर अधिकांश मनुष्य कर्तव्य उत्तरदायित्व व उद्देश्य कहा जाए तीनों के लिए मानसिक व शारीरिक परिश्रम करते है जीवनभर ।